भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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छठा अध्याय 6/171-174 ] सकते हैं। किसी मणिमें ऐसी शक्ति निहित होती है जिससे मणि सोनेकी सृष्टि करके भी अपने मणिवाले स्वरूपको किसी अन्य रूपमें परिणत अथवा परिवर्तित नहीं करती। सोनेकी सृष्टि करनेसे पहले मणि जिस प्रकारकी थी, सोनेको उत्पन्न करनेके बाद भी उसी रूपमें ही रहती है। जिस प्रकार वास्तवमें अपने अन्दर निहित शक्तिके प्रभावसे मणि स्वयं विकृत न होकर और अपनेसे भिन्न किसी अन्य वस्तु (सोने) को उत्पन्न करके भी अपने मणि-स्वरूपमें अवस्थित रह सकती है, उसी प्रकार सच्चिदानन्द ईश्वर अपनी मायाशक्तिको सञ्चालित करके, वैसी शक्तिको विकारयोग्य गुणमय जगत्के रूपमें परिणत कर सकते हैं। ईश्वर अपनी एक शक्तिको विकारमय जगत्रूपमें परिणत करके भी अपने स्वरूपको विकार-रहित रख सकते हैं, - यह नित्यशक्ति उनमें विद्यमान है॥ 171 ॥ गुरु-व्यासदेवको भ्रान्त कहनेके कारण मायावादी विवर्त्तवादी हैं, इसलिये वे-श्रौतपथ-विरोधी नास्तिक :- व्यास-भ्रान्त बलि' सेइ सूत्रे दोष दिया। 'विवर्त्तवाद' स्थापियाछे कल्पना करिया॥ 172 ॥ अनुवाद- शङ्कराचार्यने श्रीव्यासदेवके सूत्रमें दोष निकालकर उनको भ्रान्त कह दिया और अपनी कल्पनाके अनुसार सूत्रपर भाष्य लिखकर ‘विवर्त्तवाद’ को स्थापित किया॥ 172 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- ‘परिणाम-वाद’ माननेसे ईश्वर ‘विकारी’ हो जायेंगे, इसलिये व्यासदेवको तब ‘भ्रान्त’ कहना होगा, - ऐसा कहकर सूत्रके मुख्यार्थमें दोषारोपण करके गौणार्थ करके ‘विवर्त्तवाद’को स्थापित किया॥ 172 ॥ अनुभाष्य- ‘सेइ सूत्र’ - ब्रह्मसूत्रके प्रारम्भमें “अथातो ब्रह्मजिज्ञासा” सूत्रके उत्तरमें सर्वप्रथम “जन्माद्यस्य यतः” - यह सूत्र परिणामवादके उद्देश्यसे ही लिखा गया है। जैसे- “यतो वा इमानि भूतानि” - इस तैत्तिरीय-वाक्य, “यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च” - इस मुण्डक-वाक्य और श्रीमद्भागवतके प्रारम्भमें कहे गये सभी श्लोकोंका तात्पर्य ही ‘परिणामवाद’ है। किन्तु शङ्कराचार्यका ‘परिणामवाद’ ग्रहण करनेपर काल्पनिक लक्षणावृत्ति-वादी लोग ‘जन्माद्यस्य यतः’ - इस सूत्रको ‘दुष्टसूत्र’ और उसके लेखक श्रीव्यासदेवको ‘भ्रान्त’ कहेंगे। इससे बचनेके लिये और अपने गुरु व्यासको परिणामवादी एवं ‘जन्माद्यस्य’ सूत्रको परिणामवाद कहकर वे निन्दा न करें, इस उद्देश्यसे काल्पनिक युक्तिके द्वारा उन्होंने वेदके किसी विशेष-अंशमें लिखे ‘विवर्त्तवाद’ जिसका कोई अन्य तात्पर्य है, उसे ही सत्य कहकर स्थापित किया॥ 172 ॥ देहमें आत्मबुद्धिरूप विवर्त्त ही मिथ्या है; जगत्-सत्य, किन्तु नश्वर है :- जीवेर देहे आत्मबुद्धि सेइ मिथ्या हय। जगत् ये मिथ्या नहे, नश्वरमात्र हय॥ 173 ॥ अनुवाद-जीवकी जो देहमें आत्मबुद्धि है, वह मिथ्या है। किन्तु यह जगत् मिथ्या नहीं है, केवल नश्वरमात्र है॥ 173 ॥ अनुभाष्य-निर्मल जीव स्वरूपतः नित्य कृष्णदास है। परन्तु जब वह कर्मफल भोगनेवाले स्थूल और सूक्ष्म शरीरोंको भ्रमपूर्वक ‘मैं’ समझता है, ऐसी बुद्धि मिथ्या है- इसको दिखलानेके लिये ‘विवर्त्तवाद’-शब्दका प्रयोग होता है। जीवात्मा नित्य है, वह कभी भी तात्कालिक स्थूलशरीर और सूक्ष्मशरीरके समान कालके वशमें नहीं है। विश्व वास्तवमें मिथ्या नहीं है, तो भी कालके द्वारा परिवर्तन-योग्य है। विश्वको अपने भोगकी वस्तु मानना ही जीवका ‘विवर्त्त’ है। यह जड़-जगत् ईश्वरकी शक्तिका परिणाम है। मायावादी लोग जीवके स्वरूपमें और विश्वके स्वरूपमें ‘विवर्त्त’ विचार करते हैं, किन्तु दोनों (जीव और विश्व) ही ईश्वरकी शक्तिके परिणाम हैं॥ 173 ॥ ओंकार ही आदि-महावाक्य और ईश्वर-मूर्ति एवं वेद-कल्पतरुका बीज :- 'प्रणव' ये महावाक्य-ईश्वरेर मूर्ति। प्रणव हैते सर्ववेद, जगते उत्पत्ति॥ 174 ॥ । 193

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