श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1044, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंछठा अध्याय 6/179-182 ] ब्रह्मसे है, अभिधेय-ज्ञान-वैराग्य है और प्रयोजन-मुक्ति है; यह बद्धजीवकी कल्पना-मात्र है। वेद स्वयं ही प्रमाण है; 'लक्षणा' वृत्तिके द्वारा उनका काल्पनिक अर्थ होता है॥ 179 ॥ ईश्वरके आदेशसे शङ्करके द्वारा असुर-मोहन :- आचाय्येर दोष नाहि, ईश्वर-आज्ञा हैल। अतएव कल्पना करि' नास्तिक-शास्त्र कैल ॥ 180 ॥ अनुवाद—इसमें वास्तवमें शङ्कराचार्यका दोष नहीं है, भगवान्की आज्ञासे ही उन्होंने ऐसा प्रचार किया है। इसलिये उन्होंने काल्पनिक नास्तिक शास्त्रोंकी रचना की है॥ 180 ॥ अनुभाष्य—कूर्मपुराणके पूर्वभागमें 16/115-117 संख्यामें श्रीभगवद्-वाक्य— “तस्माद् हि वेदवाह्यानां रक्षणार्थाय पापिनाम्। विमोहनाय शास्त्राणि करिष्यसि वृषध्वज॥ एवं संचोदितो रुद्रो माधवेनासुरारिणा। चकार मोहशास्त्राणि केशवोऽपि शिवे स्थितः॥ कापालं नाकुलं वामं भैरवं पूर्वपश्चिमम्। पाञ्चरात्र-पाशुपतं तथान्यानि सहस्रशः॥” 180 ॥ अर्थात् “इसलिये हे वृषध्वज ! वेदसे बाह्य लोगोंकी रक्षाके उद्देश्यसे और पापियोंको मोहित करनेके लिये सभी शास्त्रोंको प्रकाश करूँँगा। इस प्रकारसे श्रीरुद्रने असुर-विनाशक श्रीमाधवके द्वारा प्रेरित होकर और श्रीकेशवने भी शिव-बुद्धिमें अवस्थित होकर कापाल, नाकुल, वाम, भैरव, पूर्व-पश्चिम (अथवा पूर्वभैरव, पश्चिमभैरव ?), पाशुपत-पञ्चरात्र तथा अन्य सहस्र शास्त्रोंका प्रवर्त्तन किया॥” 180 ॥ पद्मपुराणके उत्तरखण्डमें सहस्रनामका वाक्य (62/31) :- स्वागमैः कल्पितैस्त्वञ्च जनान् मद्दिमुखान् कुरु। माञ्च गोपय येन स्यात् सृष्टिरेषोत्तरोत्तरा ॥ 181 ॥ अनुवाद—भगवान्ने श्रीमहादेवको कहा, —'कलियुगमें मनुष्योंको वेदोंके काल्पनिक अर्थोंके द्वारा उन्हें मुझसे विमुख करो। उन कल्पित-शास्त्रोंमें मेरे नित्य-भगवत् स्वरूपका विषय गुप्त रखो। इससे जगत्की बहिर्मुख सृष्टि उत्तरोतर परिवर्द्धित होती रहेगी ॥ 181 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-भगवान्ने श्रीमहादेवसे कहा,-अपने कल्पित आगमके द्वारा मनुष्योंको मुझसे विमुख करो। मुझे इस प्रकार गोपन करो, जिसके द्वारा बहिर्मुख-जीवोंकी जीववृद्धिकार्यसे विरक्ति उत्पन्न नहीं हो॥181॥ अनुभाष्य— [हे शिव], त्वं कल्पितैः (सत्याद्द्र (निजतन्र्त्रादिकैः) जनान् (जड़विषयरतान् लोकान्) मद्दिमुखान् (हरिजनविमुखान् कर्मज्ञाननिरतान्) कुरु; मां गोपय च, येन (भगवद्गोपन-कार्येण) उत्तरोत्तरा एषा सृष्टिः (संसारप्रवृत्तिः) स्यात्। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। देहात्मबुद्धि होनेसे केवल शौक्र-विचारकी प्रबलताके कारण संसारको भोग करनेकी प्रवृत्ति होती है और जहाँ भोग-प्रवृत्ति होती है, वहाँ शुद्धभक्ति गुप्त रहती है॥ 181 ॥ पद्मपुराणके उत्तरखण्ड (25/7) में :- मायावादमसच्छास्त्रं प्रच्छन्नं बौद्धमुच्यते। मयैव विहितं देवि कलौ ब्राह्मणमूर्तिना ॥” 182 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 182 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीमहादेवने कहा, —मैं कलियुगमें ब्राह्मणमूर्ति धारण करके असत्-शास्त्रके द्वारा मायावादरूप प्रच्छन्न-बौद्धमतका विधान करूँगा॥ 182 ॥ अनुभाष्य— मायावादम् (ईश्वर-जीव-विश्व-स्वरूपत्रयं माया- कल्पित-मिथ्या-विकारमात्रं ब्रह्मणः भिन्नमिति विचारपरम्) असच्छास्त्रं (नित्य-भगवद्बहिर्मुखकर्मज्ञानपरम् अनित्योपदेशमयं ग्रन्थं) प्रच्छन्नं (कपट-वेदविचार-परं श्रौतपथविरुद्धं) बौद्धं (नास्तिक- बौद्धमतानुगतम्) उच्यते। हे देवि! मया ब्राह्मणमूर्तिना (मालवरदेशोद्भूतेन शङ्कराख्येन देहेन) कलौ (विवादयुगारम्भे) [मायावादमतम् एव] विहितं (स्थापितम्)। । 195