श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1045, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 6/182–187 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्लोक-भावानुवाद—मैं कलियुगमें मालवर देशमें शङ्कर नामसे जन्म ग्रहण करके असत्-शास्त्र जिसमें नित्य भगवद्-विमुख कर्म-ज्ञानको परम कहा गया है, उसके द्वारा (ब्रह्मसे भिन्न ईश्वर-जीव-विश्व, तीनों मायासे कल्पित मिथ्या विकारमात्र हैं) ऐसे मायावादरूप प्रच्छन्न-बौद्धमतको स्थापित करूँगा॥ 182॥ विलासहीन केवल चिद्-साहित्य-वाद और चिद्-राहित्य-वाद, दोनों ही जागतिक विचारसे उत्पन्न मनोधर्मके अन्तर्गत हैं॥ 182॥ महाप्रभुकी व्याख्या सुनकर भट्टाचार्य विस्मित :— शुनि' भट्टाचार्य हैल परम विस्मित। मुखे ना निःसरे वाणी, हइला स्तम्भित ॥ 183 ॥ अनुवाद—महाप्रभुकी व्याख्याको सुनकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य आश्चर्यचकित हो गये। कुछ भी बोलनेमें वे असमर्थ हो गये और वे स्तम्भित हो गये ॥ 183 ॥ श्रीकृष्णभक्ति ही जीवका परम पुरुषार्थ :— प्रभु कहे,—“भट्टाचार्य, ना कर विस्मय। भगवाने भक्ति—परम-पुरुषार्थ हय ॥ 184 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“भट्टाचार्य ! आश्चर्य मत करो। भगवद्भक्ति ही परम पुरुषार्थ है ॥ 184 ॥ दिव्यसूरिगण भी श्रीकृष्ण-चरणोंके प्रति आकृष्ट :— 'आत्माराम' पर्यन्त करे ईश्वर-भजन। ऐछे अचिन्त्य भगवानरे गुणगण ॥ 185 ॥ अनुवाद—आत्माराम अर्थात् आत्मामें रमण करनेवाले मुक्त पुरुष भी भगवान्का भजन करते हैं, क्योंकि भगवान्में ऐसे अचिन्त्य गुण हैं कि वे आत्माराम मुनियोंके चित्तको भी आकर्षित करते हैं ॥ 185 ॥ श्रीमद्भागवत (1/7/10) :— आत्मारामश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः ॥ ”186 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 186 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—आत्मामें ही जिनकी रति है, ऐसे वासना-ग्रन्थियोंसे शून्य सभी मुनि भी बृहत्कर्मा श्रीकृष्णकी अहैतुकी भक्ति करते हैं; क्योंकि जगत्के चित्तहारी श्रीहरिका ऐसा ही एक गुण है ॥ 186 ॥ अनुभाष्य—स्वभावतः ब्रह्मानन्दमें निमग्न परमहंस श्रीशुकदेवने किसलिये श्रीकृष्ण-नाम-रूप-गुण-लीला और कथापूर्ण श्रीमद्भागवतका अभ्यास किया,—शौनक आदि ऋषियोंके इस प्रश्नके उत्तरमें श्रीसूतकी उक्ति,— आत्मारामः (आत्मनि भगवति रमन्ते ये ते कृष्णक्रीड़नशीलाः) मुनयः (भोगपर-जड़-विषयरहिताः) निर्ग्रन्थाः (हृदयजकामग्रन्थिहीनाः ब्रह्मभूताः) अपि उरुक्रमे (अजिते कृष्णे) अहैतुकीम् (अन्याभिलाषिताशून्यं कर्मज्ञानाद्यनावृतं शुद्धां कृष्णानुशीलनमयी) भक्तिं (सेवां) कुर्वन्ति। हरिः इत्थम्भूतगुणः (मुक्तामुक्त-सर्वास्थ-जीवाकर्षण-धर्मयुतः)। [अलौकिक-गुणाधारः हरिर्मायावादनिरतानां जनानां तत्तन्मत-वादात् मोचयित्वा कृपया तेभ्यः स्वचरणं प्रयच्छति]। श्लोक-भावानुवाद—स्वभावतः श्रीकृष्णकी लीलाओंमें रमण करनेवाले आत्माराम, जड़विषयोंसे विरक्त मुनि और जिनकी हृदयकी कामनाओंकी ग्रन्थि खुल गयी है—ऐसे ब्रह्मभूत पुरुष, सभी उरुक्रम अर्थात् अजित भगवान्की अन्याभिलाषिता-शून्य, कर्म-ज्ञानसे अनावृत शुद्ध कृष्णानुशीलनमयी भक्ति करते हैं। हरि अपने स्वाभाविक गुणोंसे मुक्त और बद्ध अवस्थावाले सभी जीवोंको आकर्षण करनेवाले हैं। [हरि अलौकिक गुणोंके आधार हैं, वे मायावादादिमें निरत लोगोंको उन-उन मतवादोंसे मुक्त करके कृपापूर्वक अपने चरणोंका आश्रय प्रदान करते हैं।] ॥ 186 ॥ श्रीसार्वभौमकी श्लोककी व्याख्या सुननेकी इच्छा :— शुनि' भट्टाचार्य कहे,—“शुन, महाशय। एइ श्लोकेर अर्थ शुनिते वाञ्छा हय ॥” 187 ॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुसे कहा,—“सुनो महाशय ! इस श्लोकका अर्थ सुननेकी मेरी इच्छा हो रही है॥” 187 ॥ 196 ।