भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1046, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1046

छठा अध्याय 6/188-198 ] महाप्रभुके अनुरोधसे श्रीसार्वभौमके द्वारा व्याख्या करते हुए अपने पाण्डित्यका प्रकाश :- प्रभु कहे, —"तुमि कि अर्थ कर, ताहा शुनि'। पाछे आमि करिब अर्थ, येबा किछु जानि ॥" 188 ॥ शुनि' भट्टाचार्य श्लोक करिल व्याख्यान। तर्कशास्त्र-मत उठाय विविध विधान ॥ 189 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, —"आप इस श्लोकका क्या अर्थ करते हैं, मैं उसे सुनना चाहता हूँ। बादमें मैं जो कुछ जानता हूँ, उसके अनुसार अर्थ करूँगा।" यह सुनकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने उपरोक्त श्लोककी व्याख्या की और तर्कशास्त्रके मतानुसार उन्होंने विविध अर्थ बतलाये ॥ 188-189 ॥ श्रीसार्वभौमके द्वारा यथाशक्ति नौ प्रकारकी व्याख्या :- नवविध अर्थ कैल शास्त्रमत लञा। शुनि' प्रभु कहे किछु ईषत् हासिया ॥ 190 ॥ महाप्रभुका मान देनेका धर्म-श्रीसार्वभौमकी प्रशंसा :- “भट्टाचार्य, जानि—तुमि साक्षात् बृहस्पति। शास्त्रव्याख्या करिते ऐछे कारो नाहि शक्ति ॥ 191 ॥ किन्तु तुमि अर्थ कैले पाण्डित्य-प्रतिभाय। इहा वइ श्लोकेर आछे आरो अभिप्राय ॥" 192 ॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने शास्त्रोंके मतानुसार इस श्लोकके नौ प्रकारके अर्थ किये। जिसे सुनकर महाप्रभुने मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए कहा, —"भट्टाचार्य ! ऐसा लगता है कि आप तो साक्षात् देवगुरु बृहस्पति हैं। इस जगत्में शास्त्रोंकी ऐसी व्याख्या करनेकी शक्ति और किसीमें नहीं है। किन्तु आपने पाण्डित्य प्रतिभासे जो अर्थ प्रकाशित किये हैं, इनके अतिरिक्त भी इस श्लोकका और भी अभिप्राय है ॥" 190-192 ॥ भट्टाचार्यकी प्रार्थनासे महाप्रभुकी स्वतन्त्र व्याख्या :- भट्टाचार्येर प्रार्थनाते प्रभु व्याख्या कैल। ताँर नव अर्थ-मध्ये एक ना छुँइल ॥ 193 ॥ महाप्रभुके द्वारा अठारह प्रकारसे व्याख्या :- आत्मारामश्च-श्लोके 'एकादश' पद हय। पृथक् पृथक् कैले पदेर अर्थ निश्चय ॥ 194 ॥ तत्तत्पद-प्राधान्ये 'आत्माराम' मिलाञा। अष्टादश अर्थ कैल अभिप्राय लञा ॥ 195 ॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी प्रार्थनापर महाप्रभुने उनके द्वारा किये हुए नौ प्रकारके अर्थोंमेंसे किसीको स्पर्श किये बिना 'आत्मारामश्च'-श्लोककी व्याख्या आरम्भ की। आत्मारामश्च-श्लोकमें 'ग्यारह' पद हैं। महाप्रभुने सभी पदोंकी एक-एक करके व्याख्या की। महाप्रभुने श्लोकके प्रधान पदोंके लेकर प्रत्येकके साथ 'आत्माराम' पदको जोड़कर अठारह प्रकारसे व्याख्या की ॥ 193-195 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्लोकके ग्यारह शब्दोंके ग्यारह अर्थ हैं और श्लोकमें 'मुनयः', 'निर्ग्रन्थाः', 'उरुक्रम', 'अहैतुकी', 'भक्ति', 'गुण' और 'हरि'—इन सात प्रधान पदोंमें 'आत्माराम'-पद जोड़कर और सात अर्थ होते हैं—अर्थात् कुल मिलाकर अठारह अर्थ हैं ॥ 194-195 ॥ अनुभाष्य— 'एकादशपद'- 1) आत्मारामः, 2) च, 3) मुनयः, 4) निर्ग्रन्थाः, 5) अपि, 6) उरुक्रमे, 7) कुर्वन्ति, 8) अहैतुकीं, 9) भक्तिं, 10) इत्थम्भूतगुणः, 11) हरिः ॥ 194 ॥ भगवद्गुणशक्ति अचिन्त्य और आत्माराम-आकर्षिणी :- भगवान्, ताँर शक्ति, ताँर गुणगण। अचिन्त्य प्रभाव तिनेर ना याय कथन ॥ 196 ॥ अन्य यत साध्य-साधन करि' आच्छादन। एइ तिने हरे सिद्ध-साधकेर मन ॥ 197 ॥ सनकादि-शुकदेव ताहाते प्रमाण। एइमत नाना अर्थ करेन व्याख्यान ॥ 198 ॥ अनुवाद—श्रीभगवान्, उनकी शक्ति और उनके गुणसमूह—इन तीनोंका ही प्रभाव अचिन्त्य है, इनका । 197