भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1048

छठा अध्याय 6/202-211 ] देखाइल ताँरे आगे चतुर्भुज-रूप। पाछे श्याम-वंशीमुख स्वकीय स्वरूप ॥ 203 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कृपा करके श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको पहले चतुर्भुज रूप प्रकट करके अपना (नारायण) रूप दिखलाया। अपना नारायण रूप दिखलानेके बादमें अपना नित्य श्यामसुन्दर-वंशीधारी श्रीकृष्ण स्वरूप दिखलाया ॥ 202-203 ॥ श्रीसार्वभौमके द्वारा स्तव-स्तुति :- देखि' सार्वभौम दण्डवत् करि' पड़ि'। पुन: उठि' स्तुति करे दुइ कर जुड़ि' ॥ 204 ॥ अनुवाद—महाप्रभुमें श्रीकृष्णके स्वरूपको प्रकाशित देखकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने भूमिपर गिरकर उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया। फिर उठकर हाथ जोड़कर उनकी स्तव-स्तुति करने लगे ॥ 204 ॥ महाप्रभु-कृपासे श्रीसार्वभौमके चित्तमें तत्त्वकी स्फूर्ति :- प्रभुर कृपाय ताँर स्फुरिल सब तत्त्व। नाम-प्रेमदान-आदि वर्णन महत्त्व ॥ 205 ॥ अनुवाद—महाप्रभुकी कृपासे श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके हृदयमें समस्त तत्त्व स्फुरित हो गये और वे महाप्रभुके द्वारा भगवान्‌के नाम और भगवद्-प्रेमके सर्वत्र दानकी महिमाको समझ गये ॥ 205 ॥ अतिशीघ्र रचना करनेकी शक्ति :- शत श्लोक कैल दण्ड एक ना याइते। बृहस्पति तैछे श्लोक ना पारे करिते ॥ 206 ॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने एक दण्ड (चौबीस मिनट) से भी कम समयमें ही सौ श्लोकोंकी रचना करके महाप्रभुकी स्तुति की। देवगुरु बृहस्पति भी इतने कम समयमें इतने श्लोकोंकी रचना नहीं कर सकते ॥ 206 ॥ अनुभाष्य—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके द्वारा रचित इन सौ श्लोकोंके ग्रन्थका नाम ‘सुश्लोक-शतक' है ॥ 206 ॥ महाप्रभुके आलिङ्गनसे श्रीसार्वभौममें सात्त्विक भाव :- शुनि' सुखे प्रभु ताँरे कैल आलिङ्गन। भट्टाचार्य प्रेमावेशे हैल अचेतन ॥ 207 ॥ अश्रु, स्तम्भ, पुलक, स्वेद, कम्प थरहरि। नाचे, गाय, कान्दे, पड़े प्रभु-पद धरि' ॥ 208 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने वे सौ श्लोक सुनकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यका सुखपूर्वक आलिङ्गन किया। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य महाप्रभुके आलिङ्गनसे प्रेमावेशमें आविष्ट होकर मूर्च्छित हो गये। उनके शरीरमें अश्रु, स्तम्भ, पुलक, पसीना, कम्प आदि अष्ट-सात्त्विक भाव उदित हो गये तथा वे नाचने-गाने लगे, कभी रोने लगे और कभी भूमिपर गिरकर महाप्रभुके चरणकमलोंको पकड़ने लगे ॥ 207-208 ॥ श्रीगोपीनाथकी प्रसन्नता :- देखि' गोपीनाथाचार्य हर्षित मन। भट्टाचार्येर नृत्य देखि' हासे प्रभुर गण ॥ 209 ॥ अनुवाद—इसे देखकर श्रीगोपीनाथाचार्य मनमें बहुत प्रसन्न हुए और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके नृत्यको देखकर महाप्रभुके सङ्गी हँसने लगे ॥ 209 ॥ श्रीसार्वभौमकी दशाका दर्शन करनेसे गोपीनाथके द्वारा महाप्रभुकी महिमाका कीर्तन :- गोपीनाथाचार्य कहे महाप्रभुर प्रति। “सेइ भट्टाचार्येर तुमि कैले एइ गति ॥” 210 ॥ अनुवाद—तब श्रीगोपीनाथाचार्यने महाप्रभुसे कहा, — “प्रभो! आपने भट्टाचार्यकी ऐसी गति कर दी ॥” 210 ॥ महाप्रभुके द्वारा भक्तका सम्मान :- प्रभु कहे, —“तुमि भक्त, तोमार सङ्ग हैते। जगन्नाथ इँहारे कृपा कैल भालमते ॥” 211 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने उत्तर दिया, —“आप भक्त हैं, आपके सङ्गके कारण ही श्रीजगन्नाथदेवने इनपर पूर्ण कृपा की है॥” 211 ॥ । 199