श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 6/212-224 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला स्थिर होकर श्रीभट्टाचार्यके द्वारा महाप्रभुकी स्तुति :- तबे भट्टाचार्ये प्रभु सुस्थिर करिल। स्थिर हञा भट्टाचार्य बहु स्तुति कैल॥ 212 ॥ “जगत् निस्तारिले तुमि, — सेह अल्पकार्य। आमा उद्धारिले तुमि, —ए शक्ति आश्चर्य॥ 213 ॥ तर्क-शास्त्रे जड़ आमि, यैछे लौहपिण्ड। आमा द्रवाइले तुमि, प्रताप प्रचण्ड ॥” 214 ॥ अनुवाद - तब महाप्रभुने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको शान्त किया। स्थिर होकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुकी बहुत स्तुति की। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य कहने लगे, - “जगत्का उद्धार करना तो आपके लिये छोटा सा कार्य है, परन्तु आपने जो मेरा उद्धार किया है, यह वास्तवमें आपकी आश्चर्यमय शक्तिका परिचय है। तर्क-शास्त्रके अध्ययनसे मैं जड़बुद्धि हो गया था। मेरा हृदय लोहेके पिण्डकी भाँति कठोर हो गया था, परन्तु आपने इसे द्रवीभूत कर दिया, आपका प्रभाव अति महान् है॥” 212-214॥ महाप्रभुका अपने स्थानपर आगमन :- स्तुति शुनि' महाप्रभु निज वासा आइला। भट्टाचार्य आचार्य-द्वारे भिक्षा कराइला ॥ 215 ॥ अनुवाद- श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी स्तुति सुनकर महाप्रभु अपने वासस्थानपर लौट आये। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने श्रीगोपीनाथाचार्यके द्वारा महाप्रसाद मँगवाकर महाप्रभुको भोजन करवाया॥ 215 ॥ अगले दिन प्रातःकाल महाप्रभुके द्वारा प्रसादान्न-संग्रह :- आर दिन प्रभु गेला जगन्नाथ-दरशने। दर्शन करिला जगन्नाथ-शय्योत्थाने ॥ 216 ॥ पूजारी आनिया माला-प्रसादान्न दिला। प्रसादान्न-माला पाञा प्रभु हर्ष हैला ॥ 217 ॥ अनुवाद - अगले दिन सूर्योदयसे पहले महाप्रभु श्रीजगन्नाथके दर्शन करने गये और श्रीजगन्नाथदेवके शय्या-उत्थान अर्थात् मङ्गलारतीके दर्शन किये। पुजारीने श्रीजगन्नाथदेवकी प्रसादी-माला और प्रसाद-अन्न लाकर उन्हें दिया। महाप्रभु प्रसाद-अन्न और माला पाकर बहुत प्रसन्न हुए॥ 216-217 ॥ भट्टाचार्यके घरमें आगमन :- सेइ प्रसादान्न-माला अञ्चले बाँधिया। भट्टाचार्येर घरे आइला त्वरायुक्त हञा ॥ 218 ॥ अनुवाद - उस प्रसाद-अन्न और मालाको अपने आँचलमें सावधानीपूर्वक बाँधकर महाप्रभु तेजीसे श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके घर आये ॥ 218 ॥ भट्टाचार्यके द्वारा प्रातःकृत्यसे पहले ही महाप्रभुके द्वारा दिये गये प्रसादका सम्मान :- अरुणोदय-काले हैल प्रभुर आगमन। सेइकाले भट्टाचार्येर हैल जागरण ॥ 219 ॥ 'कृष्ण' 'कृष्ण' स्फुट कहि' भट्टाचार्य जागिला। कृष्णनाम शुनि' प्रभुर आनन्द बाड़िला ॥ 220 ॥ बाहिरे प्रभुर तेंहो पाइल दरशन। आस्ते-व्यस्ते आसि' कैल चरण-वन्दन ॥ 221 ॥ बसिते आसन दिया दुँहे त' बसिला। प्रसादान्न खुलि' प्रभु ताँर हाते दिला ॥ 222 ॥ प्रसादान्न पाञा भट्टाचार्येर आनन्द हैल। स्नान, सन्ध्या, दन्तधावन यद्यपि ना कैल ॥ 223 ॥ श्रीचैतन्य महाप्रभुकी कृपासे जाड्यका नाश :- चैतन्य-प्रसादे मनेर सब जाड्य गेल। एइ श्लोक पड़ि' अन्न भक्षण करिल ॥ 224 ॥ अनुवाद - महाप्रभु अरुणोदयके समय ही श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके घर पहुँच गये। उस समय श्रीभट्टाचार्य अभी नींदसे जागे ही थे और वे उच्च स्वरसे 'कृष्ण' 'कृष्ण' नामका उच्चारण करते हुए उठे थे। उनके मुखसे 'कृष्ण' नाम सुनकर महाप्रभुको बहुत आनन्द हुआ। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने देखा कि महाप्रभु उनके घरके 200 ।