श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 6/232–239 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—उनके दोनोंके अङ्गोंमें स्वेद, कम्प, अश्रु आदि सात्त्विक विकार प्रकट होकर उन्हें आनन्दके समुद्रमें डुबोने लगे। महाप्रभु प्रेममें आविष्ट होकर कहने लगे,—“आज मैंने अनायास ही त्रिभुवनपर विजय प्राप्त कर ली है और वैकुण्ठ प्राप्त किया है। आज मेरी सभी अभिलाषाएँ पूर्ण हो गयी हैं, क्योंकि श्रीसार्वभौमका महाप्रसादमें विश्वास उत्पन्न हुआ है। आज आपने निष्कपट होकर श्रीकृष्णका आश्रय ग्रहण किया है और श्रीकृष्णने भी निष्कपट होकर आपपर कृपा की है। आजसे आपके देहादि-बन्धन टूट गये हैं और आज आपने मायाके बन्धनोंको तोड़ दिया है। आज आपका मन श्रीकृष्णको प्राप्त करनेके योग्य हुआ है, क्योंकि आज आपने वेद-धर्मका उल्लङ्घन करके प्रसादका सेवन किया है॥” 232–234 ॥ श्रीकृष्णके प्रति निष्कपट शरणागत भक्तोंकी ही मायासे मुक्ति :— श्रीमद्भागवत (2/7/42)— येषां स एष भगवान् दययेदनन्तः सर्वात्मनाश्रितपदो यदि निर्व्यलीकम्। ते दुस्तरामतितरन्ति च देवमायां नेषां ममाहमितिधीः श्वशृगालभक्ष्ये ॥ 235 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 235 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अनन्तस्वरूप भगवान् उनपर ही अकपट दया करते हैं, जो सब प्रकारसे उनके श्रीचरणकमलोंका आश्रय ग्रहण करते हैं और वे ही इस दुस्तर दैवी मायाको पार करते हैं। सियार और कुत्तेके आहार इस जड़ शरीरमें जिनकी 'मैं' और 'मेरा' की बुद्धि है, उनपर भगवान् दया नहीं करते॥ 235 ॥ अनुभाष्य—श्रीनारदजीसे भगवान्के लीलावतार-समूहके कर्म, प्रयोजन और विभूतियोंका वर्णन करके ब्रह्माजी भगवान्की माया और भक्तोंके माहात्म्यको बता रहे हैं— स एष अनन्तः भगवान् येषां (एकान्तप्रपन्नानां) दययेत् (अनुकम्पां कुर्यात्) यदि निर्व्यलीकं (निष्कपटं यथा स्यात् तथा) सर्वात्मना (सर्वतोभावेन, न तु अंशेन) आश्रितपदः (कृष्णपादैकप्रपन्नाः) भवन्ति, ते दुस्तरां (तर्तुमशक्यामपि) देवमायां अतितरन्ति। एषां (प्रपन्नानां) श्व-शृगाल-भक्ष्ये (पशुभोजन- योग्ये देहे) अहं-मम-इति-धीः (बुद्धिः) न (नास्ति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 235 ॥ भट्टाचार्यके द्वारा जड़ाभिमानका त्याग :— एत कहि' महाप्रभु आइला निज-स्थाने। सेइ हैते भट्टाचार्येर खण्डिल अभिमाने ॥ 236 ॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु अपने वासस्थानपर आ गये। उसी समयसे ही श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यका पाण्डित्यका अभिमान दूर हो गया ॥ 236 ॥ श्रीसार्वभौमका सब प्रकारसे भक्तिमार्गका आश्रय :— चैतन्य-चरण बिना नाहि जाने आन। भक्ति बिना शास्त्रे अन्य ना करे व्याख्यान ॥ 237 ॥ गोपीनाथका प्रसन्नता-पूर्वक नृत्य :— गोपीनाथाचार्य ताँर वैष्णवता देखिया। 'हरि' 'हरि' बलि' नाचे हाते तालि दिया ॥ 238 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य-चरणोंके अतिरिक्त अब वे और कुछ नहीं जानते थे और तबसे वे शास्त्रोंकी केवल भक्तिपरक व्याख्या ही करते थे। श्रीगोपीनाथाचार्य भी उनकी वैष्णवताको देखकर 'हरि' 'हरि' बोलकर ताली बजाते हुए नाचने लगे॥ 237–238 ॥ भट्टाचार्यकी श्रीजगन्नाथकी अपेक्षा महाप्रभुके प्रति अधिक प्रीति :— आर दिन भट्टाचार्य आइला दर्शने। जगन्नाथ ना देखि' आइला प्रभु-स्थाने ॥ 239 ॥ अनुवाद—अगले दिन श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन करने निकले, परन्तु मन्दिर न जाकर पहले महाप्रभुके दर्शनके लिये उनके वासस्थानपर आ गये॥ 239 ॥ 202 ।