भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1052

छठा अध्याय 6/240-247 ] श्रीसार्वभौमकी दीनता :— दण्डवत् करि' कैल बहुविध स्तुति। दैन्य करि' कहे निज-पूर्वदुर्मति ॥ 240 ॥ श्रीसार्वभौमके द्वारा पूछनेपर कि सर्वश्रेष्ठ साधन क्या है? महाप्रभुके द्वारा नामसङ्कीर्तनकी महिमाका वर्णन :— भक्तिसाधन-श्रेष्ठ शुनिते हैल मन। प्रभु उपदेश कैल नाम-सङ्कीर्त्तन ॥ 241 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 7/76 संख्या देखें ॥ 242 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्लोककी व्याख्याको सुनकर भट्टाचार्य विस्मित :— एइ श्लोकेर अर्थ शुनाइल करिया विस्तार। शुनि' भट्टाचार्य-मने हैल चमत्कार ॥ 243 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने इस श्लोकका विस्तारपूर्वक अर्थ सुनाया, जिसे सुनकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके मनमें चमत्कार हुआ ॥ 243 ॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुको दण्डवत् प्रणामकर उनकी अनेक प्रकारसे स्तुति की। तब उन्होंने दीनतापूर्वक अपनी पहलेकी दुर्मतिकी बात कही और भक्ति-साधनोंमेंसे सर्वश्रेष्ठ साधनको जाननेकी इच्छा प्रकट की। तब महाप्रभुने उनको सर्वश्रेष्ठ साधन श्रीनाम-सङ्कीर्तनका उपदेश दिया ॥ 240-241 ॥ श्रीगोपीनाथकी भविष्यवाणीकी सफलता :— गोपीनाथाचार्य बले,—“आमि पूर्वे ये कहिल। शुन, भट्टाचार्य, तोमार सेइ त' हइल ॥” 244 ॥ अनुवाद—तब श्रीगोपीनाथाचार्यने कहा,—“सुनो भट्टाचार्य ! मैंने आपको पहले जो कहा था, अब आपके साथ वही हुआ न ॥” 244 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके द्वारा प्रश्न करनेपर कि चौंसठ प्रकारकी साधनभक्तिमेंसे कौनसा अङ्ग सर्वश्रेष्ठ है, तो उसके उत्तरमें महाप्रभुने कहा,—नामसङ्कीर्तन ही एकमात्र सर्वश्रेष्ठ है ॥ 241 ॥ श्रीगोपीनाथके साथ सम्बन्ध होनेके कारण श्रीसार्वभौमको महाप्रभुकी कृपाकी प्राप्ति :— भट्टाचार्य कहे ताँरे करि' नमस्कारे। “तोमार सम्बन्धे प्रभु कृपा कैल मोरे ॥ 245 ॥ तुमि—महाभागवत, आमि—तर्क-अन्धे। प्रभु कृपा कैल मोरे तोमार सम्बन्धे ॥” 246 ॥ बृहन्नारदीय-पुराण (38/126) :— हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्। कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा ॥ 242 ॥ अनुवाद—कलियुगमें हरिनाम ही, हरिनाम ही, हरिनाम ही एकमात्र साधन है, इसके अतिरिक्त अन्य कोई गति नहीं है, नहीं है, नहीं है ॥ 242 ॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने श्रीगोपीनाथाचार्यको प्रणाम करके कहा,—“आपके साथ सम्बन्ध होनेके कारण ही महाप्रभुने मुझपर कृपा की है। आप महाभागवत हैं और मैं तर्कका आश्रय करनेवाला अन्धा था। वास्तवमें आपके साथ सम्बन्धके कारण ही महाप्रभुने मुझपर कृपाकी है ॥” 245-246 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— “कृते यद्ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः। द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्त्तनात्॥” अर्थात् “सत्ययुगमें भगवान् विष्णुका ध्यान करनेसे, त्रेतामें बड़े-बड़े यज्ञोंके द्वारा उनकी आराधना करनेसे और द्वापरमें विधिपूर्वक उनका अर्चन करनेसे जो फल मिलता है, वह कलियुगमें केवल भगवन्नामका कीर्तन करनेसे ही प्राप्त हो जाता है ॥” 242 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीभट्टाचार्यको श्रीजगन्नाथके दर्शनकी अनुमति :— विनय शुनि' तुष्ट्ये प्रभु कैल आलिङ्गन। कहिल, —“करह याञा ईश्वर दरशन ॥” 247 ॥ । 203