श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1053, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 6/247-254 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके ऐसे दीनतापूर्वक वचनोंको सुनकर महाप्रभु बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें आलिङ्गनकर कहने लगे, - "अब जाकर श्रीजगन्नाथदेवका दर्शन करो ॥ "247 ॥ घर आकर प्रसाद और महाप्रभुके महिमासूचक श्लोकको भेजना :- जगदानन्द-दामोदर,- दुइ सङ्गे लञा। घरे आइल भट्टाचार्य जगन्नाथ देखिया ॥ 248 ॥ उत्तम उत्तम प्रसाद बहुत आनिला। निजविप्र-हाते दुइ जना सङ्गे दिला ॥ 249 ॥ निज-कृत दुइ श्लोक लिखिया तालपाते। 'प्रभुके दिह' बलि' दिल जगदानन्द-हाते ॥ 250 ॥ अनुवाद—श्रीजगन्नाथदेवका दर्शन करनेके बाद श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य श्रीजगदानन्द और श्रीदामोदरको साथ लेकर अपने घर लौट आये। मन्दिरसे वे अपने साथ बहुतसा उत्तम-उत्तम प्रसाद भी लाये। उस प्रसादको अपने एक ब्राह्मण और श्रीजगदानन्द तथा श्रीदामोदरके हाथोंमें दिया। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने अपने द्वारा रचित दो श्लोकोंको तालपत्रपर लिखकर श्रीजगदानन्द पण्डितके हाथमें देकर कहा, - 'इसे महाप्रभुको दे देना ॥ '248-250 ॥ महाप्रभुके द्वारा पत्रकी प्राप्तिसे पहले श्रीमुकुन्दके द्वारा दोनों श्लोकोंकी नकलके द्वारा रक्षा :- प्रभु-स्थाने आइला दुँहे प्रसाद-पत्री लञा। मुकुन्द दत्त पत्र निल तार हाते पाञा ॥ 251 ॥ श्रीजगदानन्दका महाप्रभुको श्रीभट्टाचार्यके श्लोकवाला पत्र देना :- दुइ श्लोक बाहिर-भिते लिखिया राखिल। तबे जगदानन्द पत्री प्रभुके लञा दिल ॥ 252 ॥ प्रभु श्लोक पड़ि' पत्र छिण्डिया फेलिल। भित्ते देखि' भक्त सब श्लोक कण्ठे कैल ॥ 253 ॥ अनुवाद-श्रीजगदानन्द और श्रीदामोदर, प्रसाद और पत्रीको लेकर महाप्रभुके पास आये। भीतर जानेसे पहले श्रीमुकुन्द दत्तने श्रीजगदानन्दके हाथसे वह पत्री ले ली और उन दो श्लोकोंको बाहर दीवारपर लिख दिया। तब श्रीजगदानन्दने भीतर जाकर महाप्रभुको वह पत्री दी। महाप्रभुने उन श्लोकोंको पढ़ते ही पत्रीको फाड़कर फेंक दिया। परन्तु भक्तोंने दीवारपर लिखे उन दोनों श्लोकोंको देखकर कण्ठस्थ कर लिया था। वे दो श्लोक इस प्रकार हैं ॥ 251-253 ॥ ज्ञान-वैराग्य-भक्ति-वितरणकारी श्रीगौरको प्रणाम :- श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटक (6/74)- वैराग्यविद्या-निजभक्तियोग- शिक्षार्थमेकः पुरुषः पुराणः। श्रीकृष्णचैतन्यशरीरधारी कृपाम्बुधिर्यस्तमहं प्रपद्ये ॥ 254 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 254 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-वैराग्य, विद्या और निजभक्तियोगकी शिक्षा देनेके लिये श्रीकृष्णचैतन्यरूपधारी एक सनातन पुरुष-जो सर्वदा कृपाके समुद्र हैं, उनके प्रति मैं शरणागत होता हूँ ॥ 254 ॥ अनुभाष्य- वैराग्यविद्यानिज-भक्तियोगशिक्षार्थं (कृष्णेतरवस्तुविरक्ति- परेशानुभूति-निजनाम-रूप-गुण-लीला-सेवनयोग्योपदेशार्थम्) एकः पुराणः (सनातनः) कृपाम्बुधिः (जड़ासक्तजनेष्वपि परमोत्तम-मुक्त- जनोचित-व्रजप्रेमदानरूप-दयार्णवः) पुरुषः श्रीकृष्णचैतन्यशरीरधारी (श्रीकृष्णचैतन्य एव शरीरं धर्तुं शीलमस्य सः) अहं तं प्रपद्ये (आश्रयामि)। श्लोक-भावानुवाद-जड़ विषयोंमें आसक्त लोगोंको भी मुक्तजनोंके लिये उचित परम-उत्तम व्रजप्रेमदानरूप दयाके समुद्र; श्रीकृष्णसे इतर वस्तुओंसे विरक्ति, पर-ईशकी अनुभूति और निज नाम-रूप-गुण-लीला-सेवाके योग्य उपदेश देनेके लिये श्रीकृष्णचैतन्य-शरीरधारी एक सनातन पुरुषके मैं शरणागत होता हूँ ॥ 254 ॥ 204 |