श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1054, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंछठा अध्याय 6/255-261 ] गुप्तभक्ति-व्यक्तकारी श्रीगौरमें निष्ठा :- कालान्नष्टं भक्तियोगं निजं यः प्रादुष्कर्त्तुं कृष्णचैतन्यनामा। आविर्भूतस्तस्य पादारविन्दे गाढं गाढं लीयतां चित्तभृङ्गः॥ 255॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 255॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कालके प्रभावसे निजभक्तियोगको प्राय विनष्ट देखकर जो 'श्रीकृष्णचैतन्य'—नामक पुरुष उसका पुनः प्रचार करनेके लिये आविर्भूत हुए हैं, उनके श्रीचरणकमलोंमें मेरा चित्तरूपी भ्रमर गाढ़रूपसे लीन हो जाय॥ 255॥ अनुभाष्य— कालात् (अन्याभिलाषकर्मज्ञानजड़ासक्तिप्राबल्यात् काल- धर्मवशेन) नष्टं (लुप्तं) निजं (कृष्णनामरूपगुणलीलामयं) भक्तियोगं प्रादुष्कर्तुं (पुनः प्रकटयितुं) यः कृष्णचैतन्यनामा [सन्] आविर्भूतः (प्रकाशितः), तस्य पादारविन्दे (चरण-कमले) चित्तभृङ्गः (चञ्चलमनाभ्रमरः) गाढं गाढं लीयतां (निमज्जतु)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 255॥ दोनों श्लोकोंके द्वारा श्रीसार्वभौमकी महिमाका विस्तार :- एइ दुइ श्लोक—भक्तकण्ठे मणिहार। सार्वभौमेर कीर्त्ति घोषे ढक्कावाद्याकार॥ 256॥ अनुवाद—ये दो श्लोक नगाड़ेके भाँति उच्च स्वरसे श्रीसार्वभौमकी कीर्ति सब समयके लिये घोषित करते रहेंगे, क्योंकि ये सब भक्तोंके कण्ठके मणिमय हार स्वरूप बन गये हैं॥ 256॥ श्रीगौरगत प्राण सार्वभौम :- सार्वभौम हैला प्रभुर भक्त एकजन। महाप्रभुर सेवा-बिना नाहि अन्य मन॥ 257॥ 'श्रीकृष्णचैतन्य शचीसुत गुणधाम।' एइ ध्यान, एइ जप, लय एइ नाम॥ 258॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य महाप्रभुके अनन्य भक्त बन गये। अब वे महाप्रभुकी सेवाके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं जानते थे। 'समस्त गुणोंके सागर शचीनन्दन श्रीकृष्णचैतन्य'के नामका सब समय जप-कीर्तन करते और उन्हींका ध्यान करते॥ 257-258॥ महाप्रभुके निकट श्रीसार्वभौमके द्वारा ब्रह्मस्तुतिके एक श्लोकका पाठान्तरपूर्वक पाठ करना :- एकदिन सार्वभौम प्रभु-आगे आइला। नमस्कार करि' श्लोक पड़िते लागिला॥ 259॥ भागवतेर 'ब्रह्मस्तवे'र श्लोक पड़िला। श्लोक-शेषे दुइ अक्षर-पाठ फिराइला॥ 260॥ अनुवाद—एक दिन श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुके पास आकर उनको प्रणाम करनेके बाद भागवतसे ब्रह्म-स्तुतिका एक श्लोक पढ़ा। पढ़ते हुए उन्होंने श्लोकके अन्तिम चरणके दो अक्षरोंका पाठ बदल दिया॥ 259-260॥ श्रीमद्भागवत (10/14/8) परिवर्तित :- तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्ष्यमाणो भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम्। हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते जीवेत यो भक्तिपदे स दायभाक्॥ 261॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 261॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो आपकी अनुकम्पा प्राप्तिकी उद्देश्यसे अपने कर्मोंके मन्द फलोंको भोग करते-करते मन, वाक्य और शरीरके द्वारा आपके प्रति भक्ति करते हुए जीवन यापन करते हैं, वे 'मुक्तिपदे दायभाक्' अर्थात् वे मुक्तिपदको प्राप्त करते हैं। इस श्लोकका पाठ करते समय श्रीसार्वभौमने “भक्तिपदे स दायभाक्”— ऐसा उच्चारण किया था॥ 261॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णके द्वारा गर्व चूर्ण होनेपर ब्रह्मा एकान्त शरणागत होकर श्रीकृष्णका स्तव कर रहे हैं— तत् (तस्मात्) ते अनुकम्पां (कृपां) सुसमीक्ष्यमाणः (सम्यक् । 205