भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1056

छठा अध्याय 6/263-269 ] प्रकारकी ब्रह्मचिन्ताके द्वारा जिनके लिङ्गदेहका आवरण दूर हो गया है-वे 'वसन्ति' अर्थात् लय प्राप्त करते हैं। किन्तु जो भगवान्‌के श्रीचरणोंकी अवज्ञा करनेवाले हैं, उनका (भाः 10/2/32)-“येऽन्योरविन्दाक्ष” श्लोकके अनुसार जो सामान्य ज्ञान पहले सहारा था, वह भी भगवान्‌की अवज्ञा करनेके फलस्वरूप सम्पूर्ण रूपसे नष्ट हो जाता है, इसलिये उनका अधःपतन होता है अर्थात् उनको नरककी प्राप्ति होती है ॥ "263-265 ॥ पाँच प्रकारकी मुक्ति :- यद्यपि मुक्ति हय एइ पञ्च-प्रकार । सालोक्य-सामीप्य-सारूप्य-सार्ष्टि-सायुज्य आर ॥ 266 ॥ सायुज्यके अतिरिक्त चार प्रकारकी मुक्तियाँ भक्तिकी आनुषङ्गिक :- 'सालोक्यादि' चारि यदि हय सेवा-द्वार। तबु कदाचित् भक्त करे अङ्गीकार ॥ 267 ॥ नरक-सदृश सायुज्य 'भक्तिविनाशक' होनेके कारण सर्वथा परित्याज्य :- 'सायुज्य' शुनिते भक्तेर हय घृणा-भय। 'नरक' वाञ्छये, तबु सायुज्य ना लय ॥ 268 ॥ अनुवाद-यद्यपि मुक्ति 'सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सार्ष्टि और सायुज्य'-पाँच प्रकारकी होती है, तथापि सालोक्यादि चार प्रकारकी मुक्तियाँ यदि भगवद्-सेवाका द्वार हों, तो कदाचित् भक्त उन्हें स्वीकार करते हैं। 'सायुज्य' मुक्तिका नाम सुनते ही भक्तोंको उससे घृणा और भय होता है। भक्त सायुज्य मुक्तिको अङ्गीकार करनेके स्थानपर नरक जाना श्रेयस्कर समझते हैं॥ 266-268 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सार्ष्टि और सायुज्य, - इन पाँच प्रकारकी मुक्तियोंमेंसे पहली सालोक्यादि चार इतनी निन्दनीय नहीं हैं, क्योंकि वे भगवत्सेवाके द्वार-स्वरूप हैं। तथापि श्रीकृष्णभक्त उपरोक्त चार प्रकारकी मुक्तियोंको भी स्वीकार नहीं करते, क्योंकि वे जन्म-जन्मान्तर श्रीकृष्णभक्तिकी ही अभिलाषा करते हैं। 'सायुज्य'-शब्द सुनने मात्रसे भक्तमें उसको तुच्छ समझकर घृणा और 'भक्तिविरोधिकारी अपराध' जानकर भय होता है ॥ 267-268 ॥ दो प्रकारके सायुज्य :- ब्रह्मे, ईश्वरे सायुज्य दुइ त' प्रकार। ब्रह्म-सायुज्य हैते ईश्वर-सायुज्य धिक्कार ॥ 269 ॥ अनुवाद-सायुज्य मुक्ति दो प्रकारकी है- 'ब्रह्म-सायुज्य' और 'ईश्वर-सायुज्य'। ब्रह्म-सायुज्यसे ईश्वर-सायुज्य और भी अधिक धिक्कारके योग्य है॥269॥ अमृतप्रवाह भाष्य-सायुज्य दो प्रकारका होता है—ब्रह्मसायुज्य और ईश्वरसायुज्य। मायावादी वेदान्तियोंके मतानुसार जीवका चरमफल—ब्रह्मसायुज्य है; पातञ्जलके मतानुसार, कैवल्य-अवस्थामें ईश्वर-सायुज्य है। इन दोनों प्रकारके सायुज्योंमेंसे ईश्वरसायुज्य ही अधिक घृणित है। ब्रह्मसायुज्यमें निर्विशेषज्ञानके द्वारा निर्विशेष गति प्राप्त होती है; किन्तु सविशेष-ईश्वरका ही ध्यान करके जो कैवल्यरूपी ईश्वरसायुज्य प्राप्त होता है, वही वासनादोषके कारण और अधिक पतनरूपी फल है। “क्लेशकर्मविपाकाशयैर परामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः ।” अर्थात् “क्लेशों और कर्मफलकी वासनाओंसे अस्पृष्ट विशेष पुरुष ही ईश्वर है।", “स पूर्वेषामपि गुरुः कालेनावच्छेदात् ।” अर्थात् “वह सनत् कुमारादिसे भी पूर्व विद्यमान है और कालसे कभी भी ढका या प्रभावित नहीं होता।” इसके द्वारा सविशेष-ईश्वरका नित्यत्व देखा जाता है। पुनः इस पातञ्जलमें कैवल्यपादमें “पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति” अर्थात् “प्रकृतिके तीनों गुणोंके प्रभाव दूर होनेपर शुद्ध आत्मा अपने चिद्-स्वरूपमें कैवल्य-मुक्तिको प्राप्त होती है।” इस सूत्रके द्वारा साधककी सिद्धावस्थामें अन्य पुरुष-ईश्वरके अवस्थानका अभाव है। सविशेषतत्त्वके आश्रयके छलसे योगमार्ग अत्यन्त तुच्छ है। तात्पर्य यह है कि (योगपन्थामें) सविशेष तत्त्वकी उपासनासे सविशेष-फल ना होकर अत्यन्त सुदूरवर्ती धिक्कारयोग्य फल प्राप्त होता है ॥ 269 ॥ । 207