श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 6/270-278 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला सेव्यकी निष्काम-सेवाके अतिरिक्त सेवककी किसी भी मुक्तिकी कामना नहीं :- श्रीमद्भागवत (3/29/13)- सालोक्य-सार्टि-सामीप्य-सारूप्यैकत्वमप्युत। दीयमानं न गृह्णन्ति बिना मत्सेवनं जनाः ॥ २70 ॥ अनुवाद-[मेरे द्वारा] सालोक्य (वैकुण्ठवास), सार्टि (ऐश्वर्यसम्पत्ति), सामीप्य (निकटवास), सारूप्य (चतुर्भुजाकार) और एकत्व (सायुज्य या अभेदगति) प्रदान करनेपर भी भक्त उन्हें ग्रहण नहीं करते, क्योंकि मेरी अप्राकृत सेवाके अतिरिक्त उनकी कोई भी अभिलाषा नहीं है॥ 270 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 4/207 संख्या देखें ॥ 270 ॥ महाप्रभुके द्वारा मुक्तिपदकी व्याख्या :- प्रभु कहे,–“मुक्तिपदे'र आर अर्थ हय। मुक्तिपद-शब्दे 'साक्षात् ईश्वर' कहय ॥ 271 ॥ मुक्ति पदे याँर, सेइ 'मुक्तिपद' हय। किम्वा नवम पदार्थ 'मुक्तिर' समाश्रय ॥ 272 ॥ दुइ-अर्थे 'कृष्ण' कहि, केने पाठ फिरि।” सार्वभौम कहे,-"ओ-पाठ कहिते ना पारि ॥ 273 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "मुक्तिपदके और भी अर्थ हैं। मुक्तिपद-शब्दसे 'साक्षात् ईश्वर'को कहा जाता है। मुक्ति जिनके चरणोंमें रहती है, वे 'मुक्तिपद' हैं। अथवा [भागवतके दस लक्षणोंमेंसे] नौवें पदार्थ मुक्तिके जो सम्पूर्ण आश्रय हैं, वे मुक्तिपद हैं। इसलिये जब ये दोनों अर्थ 'मुक्तिपद'के द्वारा श्रीकृष्णको ही कहते हैं, तब क्यों पाठमें परिवर्तन करते हो?" श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,-"मैं वह पाठ [मुक्तिका उच्चारण] नहीं कर सकता ॥ 271-273 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - जिनके चरणोंमें मुक्ति है, वे-'मुक्तिपद' अर्थात् 'दसवें' पदार्थ श्रीकृष्ण हैं; अथवा नौवाँ पदार्थ जो मुक्ति है, वह जिनको आश्रय करके रहती है, वे-श्रीकृष्ण हैं॥ 272 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 2/91-92 संख्या देखें ॥ 272 ॥ तथापि श्रीसार्वभौमके द्वारा मुक्ति-शब्दके 'सायुज्य' अर्थका अनादर और 'भक्ति'-शब्दका आदर :- यद्यपि तोमार अर्थ एइ शब्दे कय। तथापि 'आश्लिष्य-दोषे' कहन ना याय ॥ 274 ॥ यद्यपि 'मुक्ति'-शब्देर हय पञ्च वृत्ति। 'रूढ़िवृत्यॆ' कहे तबु 'सायुज्ये' प्रतीति ॥ 275 ॥ मुक्ति-शब्द कहिते मने हय घृणा-त्रास। भक्ति-शब्द कहिते मने हय त' उल्लास ॥ २76 ॥ अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा, - यद्यपि आपके अर्थोंमें 'मुक्तिपद' श्रीभगवान् ही हैं, तथापि 'आश्लिष्य-दोष' (संशय) के कारण 'मुक्तिपद' शब्द कहा नहीं जाता। यद्यपि 'मुक्ति' शब्दकी पाँच प्रकारकी वृत्तियाँ हैं, तथापि रूढ़िवृत्तिके द्वारा मुक्ति शब्दसे 'सायुज्य'की ही प्रतीति होती है। मुक्ति-शब्द कहते ही मनमें घृणा होती है और भय लगता है। परन्तु भक्ति-शब्द कहते ही मनमें उल्लास हो जाता है॥ 274-276 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'आश्लिष्य-दोष'-जिसका दो प्रकारसे अर्थ हो सकता है; जिसमें मुख्य अर्थकी कुछ हानि होती है, वह दोष। 'रूढ़िवृत्ति'-मुख्यवृत्ति ॥ 274-275 ॥ छठे अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। श्रीसार्वभौमकी निष्काम भक्तिको देखकर महाप्रभुकी प्रसन्नता :- शुनिय़ा हासेन प्रभु आनन्दित मने। भट्टाचार्य कैल प्रभु दृढ़ आलिङ्गने ॥ 277 ॥ अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके वचनोंको सुनकर महाप्रभु बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने उनका प्रगाढ़ आलिङ्गन किया ॥ 277 ॥ ग्रन्थकारके द्वारा श्रीकृष्णचैतन्यकी कृपाकी महिमाका कीर्तन :- येइ भट्टाचार्य पड़े पड़ाय मायावादे। ताँर ऐछे वाक्य स्फुरे चैतन्य-प्रसादे ॥ 278 ॥ 208 ।