भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1058

छठा अध्याय 6/278-286 ] लोहाके यावत् स्पर्शि' हेम नाहि करे। तावत् स्पर्शमणि केह चिनिते ना पारे ॥ 279 ॥ अनुवाद-[ग्रन्थकार श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी कह रहे हैं] जो श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य मायावादको पढ़ते और पढ़ाते थे, आज महाप्रभुकी कृपासे उनके मुखसे ऐसे वाक्य निकल रहे हैं। जब तक अपने स्पर्शसे वह लोहेको सोना नहीं बनाती, तब तक स्पर्शमणिको कोई पहचान नहीं पाता ॥ 278-279 ॥ महाप्रभुका 'परमेश्वर श्रीकृष्ण' होनेमें सभीका विश्वास :- भट्टाचार्येर वैष्णवता देखि' सर्वजन। प्रभुके जानिल,-'साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दन' ॥ 280 ॥ अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी वैष्णवताको देखकर सभी जान गये कि महाप्रभु 'साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दन' श्रीकृष्ण हैं ॥ 280 ॥ काशीमिश्रादिकी महाप्रभुके चरणोंमें शरणागति :- काशीमिश्र-आदि यत नीलाचलवासी। शरण लइल सबे प्रभु-पदे आसि' ॥ 281 ॥ अनुवाद-तदुपरान्त काशीमिश्रादि जितने नीलाचलवासी थे, सभीने आकर महाप्रभुके चरणकमलोंकी शरण ग्रहण की ॥ 281 ॥ इसके बाद महाप्रभुका दक्षिण भारतमें भ्रमण :- सेइ सब कथा आगे करिब वर्णन। एबे कहि प्रभुर दक्षिण-यात्रा-विवरण ॥ 282 ॥ अनुवाद-इन सब कथाओंका मैं बादमें वर्णन करूँगा, अभी मैं महाप्रभुकी दक्षिण-भारतकी यात्राका वर्णन करूँगा ॥ 282 ॥ सार्वभौम करे यैछे प्रभुर सेवन। यैछे परिपाटी करे भिक्षा-निर्वाहण ॥ 283 ॥ विस्तारिया आगे ताहा करिब वर्णन। एइ महाप्रभुर लीला-सार्वभौम-मिलन ॥ 284 ॥ अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने जिस प्रकार भिक्षादि करवाकर अनेक प्रकारसे महाप्रभुकी सेवा की, इन सब लीलाओंका मैं विस्तारपूर्वक बादमें वर्णन करूँगा। यह महाप्रभुकी श्रीसार्वभौम-मिलन लीला है ॥ 283-284 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला पन्द्रहवाँ अध्याय देखें ॥ 284 ॥ छठे अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। श्रीसार्वभौम और चैतन्य महाप्रभुके संवादको श्रवण करनेसे निष्काम भक्तिकी प्राप्ति, यह कर्मकाण्डीय फलश्रुति मात्र नहीं :- इहा येइ श्रद्धा करि' करये श्रवण। ज्ञान-कर्मपाश हैते हय विमोचन ॥ 284 ॥ श्रद्धाय चैतन्यलीला सुने येइजन। अचिरे मिलये ताँरे चैतन्य-चरण ॥ 285 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 286 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे सार्वभौमोद्धारो नाम षष्ठ-परिच्छेदः। अनुवाद-इस लीलाको जो श्रद्धापूर्वक सुनते हैं, वे ज्ञान और कर्मके बन्धनसे छूट जाते हैं। जो श्रद्धापूर्वक श्रीचैतन्यलीलाको सुनते हैं, उन्हें शीघ्र ही महाप्रभुके चरणकमलोंकी प्राप्ति होती है। श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस चैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है ॥ 284-286 ॥ श्रीचैतन्यचरितामृतमें मध्यखण्डमें सार्वभौम-उद्धार नामक छठे अध्यायका अनुवाद समाप्त। । 209