भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1060, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1060

सातवाँ अध्याय कथासार—माघमासके शुक्ल पक्षमें महाप्रभुने संन्यास ग्रहण करके फाल्गुन मासमें नीलाचलमें वास किया। फाल्गुनमासमें दोलयात्राका दर्शन करके चैत्रमासमें श्रीसार्वभौमका उद्धार किया। वैशाखमासमें दक्षिणकी ओर यात्रा की। अकेले ही दक्षिणमें भ्रमण करेंगे,—ऐसा प्रस्ताव रखनेपर, श्रीनित्यानन्द प्रभुने उनके साथ 'कृष्णदास' नामक एक ब्राह्मणको भेजा। जानेके समय श्रीसार्वभौमने महाप्रभुको साथ ले जानेके लिये चार कौपीन-बहिर्वास दिये और श्रीरामानन्द रायके साथ गोदावरीके तटपर साक्षात्कार करनेके लिये अनुरोध किया। आलालनाथ तक श्रीनित्यानन्द प्रभु आदि कुछ भक्त महाप्रभुके साथ गये थे। उन सबको वहीं छोड़कर केवल कृष्णदासको साथ ले जाना स्वीकार करके महाप्रभु 'कृष्ण' 'कृष्ण' बोलते-बोलते चलने लगे। जिस गाँवमें वे रात्रिमें वास करते थे, वहाँ शरणागत व्यक्तियोंमें शक्ति सञ्चार करके उसे सम्पूर्ण देशको ही 'वैष्णव' बनानेकी आज्ञा देते। वे सब (महाप्रभुसे शक्ति-प्राप्त लोग) पुनः दूसरे लोगोंकी भक्तिकी शिक्षा देकर अन्यान्य गाँवोंमें भक्तोंकी संख्यामें वृद्धि करने लगे। इस प्रकार सबको वैष्णव बनाते हुए महाप्रभु कूर्मस्थानमें पहुँचे, वहाँ 'कूर्म'-नामक ब्राह्मणपर कृपा की और 'वासुदेव' नामक ब्राह्मणका गलितकुष्ठ (ऐसा कोढ़, जिसमें कीड़े पड़ गये हों, उस) रोगसे उद्धार किया। वासुदेवका उद्धार करके 'वासुदेवामृतप्रद' नामक महाप्रभुका एक नाम हुआ। —(अमृतप्रवाहभाष्य) 'वासुदेवामृतप्रद'-प्रभुको प्रणाम :- धन्यं तं नौमि चैतन्यं वासुदेवं दयार्द्रधीः। नष्टकुष्ठं रूपपुष्टं भक्तितुष्टं चकार यः॥1॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिन्होंने दयार्द्रबुद्धि (दयासे द्रवित बुद्धि) होकर 'वासुदेव'-नामक भक्तको कोढ़-रोगसे मुक्त करके सुन्दर रूपमें पुष्ट किया और उसे भक्ति देकर सन्तुष्ट किया था, उन्हीं धन्य श्रीचैतन्यदेवको मैं प्रणाम करता हूँ॥ 1 ॥ अनुभाष्य— यः दयार्द्रधीः (दयया आर्द्रा धीर्यस्य सः) [कुष्ठ रोगाक्रान्तं] वासुदेवं नष्टकुष्ठं (विगतकुष्ठरोगं) रूपपुष्टं (सौन्दर्यमयं) भक्तितुष्टं चकार, तं धन्यं चैतन्यं नौमि। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ 2 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो और श्रीगौरभक्तवृन्दकी जय हो ॥ 2 ॥ माघ मासमें संन्यास, फाल्गुन मासमें पुरीधाममें वास, चैत्र मासमें श्रीसार्वभौमका उद्धार, वैशाख मासमें दक्षिण भारत जानेकी इच्छा :- एइमते सार्वभौमेर निस्तार करिल। दक्षिण-गमने प्रभुर इच्छा उपजिल ॥ 3 ॥ माघ-शुक्लपक्षे प्रभु करिल संन्यास। फाल्गुने आसिया कैल नीलाचले वास ॥ 4 ॥ फाल्गुनेर शेषे दोलयात्रा से देखिल। प्रेमावेशे बहुविध नृत्यगीत कैल ॥ 5 ॥ चैत्रे रहि' कैल सार्वभौम-विमोचन। वैशाखेर प्रथमे दक्षिण याइते हैल मन ॥ 6 ॥ । 211