भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1061, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1061

[ 7/3-17 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद - इस प्रकार श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यका उद्धार करनेके बाद महाप्रभुकी दक्षिण भारत जानेकी इच्छा जाग्रत हुई। माघमासके शुक्लपक्षमें महाप्रभुने संन्यास ग्रहण किया और फाल्गुन मासमें नीलाचलमें आकर वास किया था। फाल्गुन मासके अन्तमें महाप्रभुने डोलयात्राका दर्शन किया और प्रेमावेशमें अनेक प्रकारसे नृत्य-गीत किया। चैत्रमासमें नीलाचलमें रहते हुए महाप्रभुने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यका उद्धार किया तथा वैशाख मासके प्रारम्भमें उन्होंने दक्षिण भारत जानेका निश्चय किया ॥ 3-6॥ भक्तोंके निकट कृतज्ञता-ज्ञापन और विदायी-माँगना :- निजगण आनि' कहे विनय करिया। आलिङ्गन करि' सबाय श्रीहस्ते धरिया॥ 7॥ “तोमा-सबा जानि आमि प्राणाधिक करि' । प्राण छाड़ा याय, तोमा-सबा छाड़िते ना पारि ॥ 8 ॥ तुमि-सब बन्धु मोर बन्धुकृत्य कैले। इँहा आनि' मोरे जगन्नाथ देखाइले ॥ 9 ॥ एबे सबा-स्थाने मुञि मागों एक दाने। सबे मेलि' आज्ञा देह, याइब दक्षिणे ॥ 10 ॥ बड़े भाई विश्वरूपको ढूँढ़नेके छलसे दक्षिण भारतके लोगोंके उद्धारके लिये अकेले जानेकी इच्छा :- विश्वरूप-उद्देशे अवश्य आमि याब। एकाकी याइब, केहो सङ्गे ना लइब॥ 11 ॥ सेतुबन्ध हैते आमि ना आसि यावत्। नीलाचले तुमि-सब रहिबे तावत् ॥" 12 ॥ अनुवाद - महाप्रभुने अपने सभी भक्तोंको बुलाकर उनका आलिङ्गन किया और उनके हाथोंको पकड़कर विनीत भावसे कहने लगे, - "आप सब मुझे मेरे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं। मैं अपने प्राण छोड़ सकता हूँ, परन्तु आप सबको नहीं। आप सब मेरे बन्धु हैं और मुझे यहाँ लाकर श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन कराके वास्तवमें बन्धुका कार्य ही किया है। अब मैं आप सबसे एक दान माँगता हूँ, आप सभी मुझे दक्षिण भारत जानेकी अनुमति प्रदान करो। मुझे अपने भाई श्रीविश्वरूपको खोजनेके लिये अवश्य ही जाना है, परन्तु मैं अकेला ही जाऊँगा और किसीको साथमें नहीं लूँगा। जब तक मैं रामेश्वरम्से लौटकर नहीं आ जाता, तब तक आप सब नीलाचलमें ही रहना ॥ "7-12 ॥ विश्वरूप-सिद्धि-प्राप्ति जानेन सकल। दक्षिण-देश उद्धारिते करेन एइ छल ॥ 13 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 13 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभु तो सर्वज्ञ हैं। विश्वरूपको इससे पूर्व ही सिद्धिप्राप्ति हो चुकी है अर्थात् वे अप्रकट हो चुके हैं, उसे महाप्रभु पूर्णरूपसे जानते थे, परन्तु दक्षिण-भारतके लोगोंका उद्धार करनेके लिये उन्होंने यह छल किया कि मैं विश्वरूपको खोजूँगा ॥ 13 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 9/299-300 संख्या देखें ॥ 13 ॥ भक्तोंका दुःख :- शुनिया सबार मने हैल महादुःख। निःशब्द हइला, सबार शुकाइल मुख ॥ 14 ॥ अनुवाद - महाप्रभुकी बातको सुनकर सभीके मनमें इतना दुःख हुआ कि वे कुछ बोल ही नहीं पाये और सबका मुख सूख गया ॥ 14 ॥ साथमें जानेके लिये श्रीनित्यानन्द प्रभुकी प्रार्थना :- नित्यानन्दप्रभु कहे, - “ऐछे कैछे हय? एकाकी याइबे तुमि, के इहा सहय? ॥ 15 ॥ दुइ-एक सङ्गे चलुक, ना पड़ हठ-रङ्गे। यारे कह, सेइ दुइ चलुक् तोमार सङ्गे ॥ 16 ॥ दक्षिणेर तीर्थपथ आमि सब जानि। आमि सङ्गे याइ, प्रभु, आज्ञा देह तुमि ॥ " 17 ॥ अनुवाद - श्रीनित्यानन्द प्रभुने कुछ धैर्य धारण 212 ।