भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1062

सातवाँ अध्याय 7/15-27 ] करके कहा,—“ऐसा कैसे हो सकता है? आप अकेले जायेंगे, इसे कौन सहन कर सकता है? हम दो-एक व्यक्तियोंको अपने सङ्ग लेकर चलो, अन्यथा आप किसी ठगके चङ्गुल पड़ जाओगे। आप जिन्हें कहेंगे, वे दो व्यक्ति ही आपके साथ जायेंगे। मैं दक्षिणके सभी तीर्थोंके मार्ग जानता हूँ। प्रभो! आप मुझे आज्ञा दीजिये, मैं आपके साथ जाऊँगा॥”15-17॥ अनुभाष्य—'हठ-रङ्गे'—ठग या जुआ-चोरके चङ्गुलमें॥16॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीनित्यानन्द-जगदानन्द-दामोदर आदि भक्तोंकी कृत्रिम निन्दाके छलसे गुणगान :— प्रभु कहे,—“आमि नर्त्तक, तुमि—सूत्रधार। तुमि यैछे नाचाओ, तैछे नर्त्तन आमार ॥ 18 ॥ संन्यास करिया आमि चलिलाङ वृन्दावन। तुमि आमा लञा आइले अद्वैत-भवन ॥ 19 ॥ नीलाचल आसिते, पथे भाङ्गिला मोर दण्ड। तोमा-सबार गाढ़-स्नेहे आमार कार्य-भङ्ग ॥ 20 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुको लक्ष्य करके कहा,—“मैं नर्तक हूँ और आप सूत्रधार हो। आप जैसे मुझे नचाते हो, मैं वैसे ही नाचता हूँ। संन्यास लेकर जब मैं वृन्दावनकी ओर चला, तब आप मुझे शान्तिपुरमें श्रीअद्वैताचार्यके घर ले आये। नीलाचल आते समय मार्गमें आपने मेरा संन्यास दण्ड तोड़ दिया। आप सबके गाढ़-स्नेहसे मेरे कार्य बिगड़ रहे हैं॥18-20॥ जगदानन्द चाहे आमा विषय भुञाइते। येइ कहे, सेइ भये चाहिये करिते ॥ 21 ॥ कभु यदि इँहार वाक्य करिये अन्यथा। क्रोधे तिनदिन मोरे नाहि कहे कथा ॥ 22 ॥ अनुवाद—(महाप्रभुने श्रीजगदानन्दके विषयमें कहा)—जगदानन्द तो मुझे विषय-भोग करवाना चाहता है। वह जो भी कहता है, उसके भयसे मुझे वह करना पड़ता है। यदि कभी मैं इसकी बात नहीं मानकर कुछ और करता हूँ, तो यह क्रोधित होकर तीन दिन तक मुझसे बात नहीं करता॥21-22॥ मुकुन्द हुयेन दुःखी देखि' संन्यास-धर्म। तिनबारे शीते स्नान, भूमिते शयन ॥ 23 ॥ अन्तरे दुःखी मुकुन्द, नाहि कहे मुखे। इहार दुःख देखि' मोर द्विगुण हुये दुःखे ॥ 24 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥23-24॥ अनुभाष्य—(महाप्रभुने श्रीमुकुन्दको लक्ष्य करके कहा)—संन्यासधर्मका पालन करनेके लिये मैं शीतकालमें भी तीन बार स्नान और बिना शय्याके भूमिपर शयन करता हूँ, ऐसा देखकर मुकुन्द दुःखी होता है। मेरे लिये मुकुन्दके मनमें दुःख होता है, ऐसा जानकर उसके लिये मैं दुगना दुःखी होता हूँ॥23-24॥ दामोदर-ब्रह्मचारीकी निरपेक्षतापर महाप्रभुका कटाक्ष :— आमि त'—संन्यासी, दामोदर—ब्रह्मचारी। सदा रहे आमार उपर शिक्षा-दण्ड धरि' ॥ 25 ॥ इँहार आगे आमि ना जानि व्यवहार। इँहारे ना भाय स्वतन्त्र चरित्र आमार ॥ 26 ॥ लोकापेक्षा नाहि इँहार कृष्णकृपा हैते। आमि कभु लोकापेक्षा ना पारि छाड़िते ॥ 27 ॥ अनुवाद—(अब महाप्रभुने श्रीदामोदर पण्डितको लक्ष्य करके कहा)—यद्यपि मैं संन्यासी हूँ और दामोदर ब्रह्मचारी है, तथापि वह शिक्षा-दण्ड लेकर सदा ही मेरे ऊपर शासन करता है, अर्थात् सदा मुझे उपदेश देता रहता है। इसके विचारसे मैं लोक-व्यवहार नहीं जानता, इसलिये इसे मेरा स्वतन्त्र व्यवहार अच्छा नहीं लगता। इसपर श्रीकृष्णकी कृपा है, इसलिये यह अपेक्षा नहीं रखता कि लोग क्या कहेंगे, परन्तु मैं संन्यासी हूँ, इसलिये कभी भी लोकापेक्षा नहीं छोड़ सकता॥25-27॥ । 213