भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1063, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1063

[ 7/25-36 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अमृतप्रवाह भाष्य-दामोदर (ब्रह्मचारी) मुझे सदैव इस प्रकार शिक्षादण्ड देता है, जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि इसके सामने मैं एक व्यवहार-ज्ञानशून्य व्यक्ति हूँ। दामोदर पण्डित आदिके प्रति कृष्णकृपा अधिक होनेके कारण, ये लोगोंकी अपेक्षा न करके मुझे अनेक प्रकारके विषय-भोग कराना चाहते हैं। किन्तु मैं दीन संन्यासी हूँ, लोकापेक्षाको नहीं छोड़ सकता, इसलिये अपने संन्यास-धर्मके अनुसार व्यवहार करता हूँ॥ 25-27॥ अनुभाष्य- 'संन्यासी' - ब्रह्मचारीके गुरु होते हैं, इसलिये 'ब्रह्मचारी' होकर संन्यासीको उपदेश देना अनुचित है। 'ना भाय'-अच्छा नहीं लगता ॥ 25-26 ॥ महाप्रभुके द्वारा सभीको अपने वापिस लौटने तक पुरीमें रहनेका अनुरोध :- अतएव तुमि-सब रह नीलाचले। दिन-कत तीर्थ आमि भ्रमिब एकले॥"28॥ अनुवाद-इसलिये तुम सब नीलाचलमें रहो और मैं कुछ दिन अकेले ही तीर्थ भ्रमण करूँगा॥"28॥ अपने भक्तोंके दोष-प्रदर्शनके छलसे गुण-वर्णन :- इँहा-सबार वश प्रभु हुये ये-ये-गुणे। दोषरूप-छले करे गुण आस्वादने ॥ 29 ॥ अनुवाद-महाप्रभु जिन-जिन गुणोंके कारण इन सब भक्तोंके वशीभूत थे, दोषरूप-छलसे उन सभी गुणोंका महाप्रभुने आस्वादन किया॥ 29 ॥ अनुभाष्य-पूर्वकथित भक्तोंके जिन-जिन गुणोंके कारण महाप्रभु वशीभूत हुए थे, उन्हींको ही 'छलपूर्वक दोष' कहकर उल्लेख करके उन्होंने भक्तोंकी महिमा बतलायी ॥ 29 ॥ महाप्रभुका अनुपम भक्तवात्सल्य :- चैतन्येर भक्तवात्सल्य-अकथ्य-कथन। आपने वैराग्य-दुःख करेन सहन ॥ 30 ॥ भक्तोंके लिये महाप्रभुको कष्ट स्वीकार, भक्तोंका उसमें दुःख :- सेइ दुःख देखि' येइ भक्त दुःख पाय। सेइ दुःख ताँर शक्त्ये सहन ना याय॥ 31 ॥ गुण-दोषोद्गार-छले सबा निषेधिया। एकाकी भ्रमिबेन तीर्थ वैराग्य करिया ॥ 32 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके भक्तवात्सल्यको शब्दोंके द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता। अपने संन्यासके वैराग्य दुःखको वे स्वयं सहन कर लेते थे। परन्तु महाप्रभुके उस दुःखको देखकर भक्त दुःखी होते और महाप्रभुमें अपने भक्तोंके इन दुःखोंको सहन करनेकी शक्ति नहीं थी। उनके भक्तोंको कोई दुःख न हो, इसलिये महाप्रभुने भक्तोंके गुणोंको भी दोष कहकर छलसे उनको अपने साथ जानेके लिये मना किया, जिससे वे वैराग्ययुक्त होकर अकेले तीर्थ-भ्रमण कर सकें ॥ 30-32 ॥ स्वतन्त्र ईश्वर महाप्रभु अपने सङ्कल्पपर अटल :- तबे चारिजन बहु मिनति करिल। स्वतन्त्र ईश्वर प्रभु कभु ना मानिल ॥ 33 ॥ अनुवाद-तब उन चारोंने मिलकर बहुत प्रार्थना की, परन्तु महाप्रभु तो स्वतन्त्र ईश्वर हैं, उन्होंने किसीकी भी बात नहीं मानी ॥ 33 ॥ श्रीनित्ताइकी अन्तिम प्रार्थना :- तबे नित्यानन्द कहे, - "ये आज्ञा तोमार। दुःख-सुख ये हउक्, कर्त्तव्य आमार ॥ 34 ॥ किन्तु एक निवेदन करों आर बार। विचार करिया ताहा कर अङ्गीकार ॥ 35 ॥ कौपीन-बहिर्वास और जलपात्रको उठानेके लिये अपने साथ किसीको ले जानेकी प्रार्थना :- कौपीन, बहिर्वास आर जलपात्र। आर किछु नाहि याबे, सबे एइ मात्र ॥ 36 ॥ 214 ।

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