श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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सातवाँ अध्याय 7/34–42 ] महाप्रभुके द्वारा संख्या नाम-जप :- तोमार दुइ हस्त बद्ध नाम-गणने। जलपात्र-बहिर्वास वहिबे केमने ॥ 37 ॥ प्रेमावेशे पथे तुमि हबे अचेतन। ए-सब सामग्री तोमार के करे रक्षण ॥ 38 ॥ अनुवाद—तब श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा,—“आपकी जैसी आज्ञा। उसका पालन करना हमारा कर्तव्य है, चाहे हमें दुःख हो या सुख हो। परन्तु एक बार मैं फिरसे कुछ निवेदन करता हूँ, कृपया उसपर विचार करके उसे स्वीकार कीजिये। यदि और कुछ भी आप साथ नहीं ले जायेंगे, तो भी कौपीन, बहिर्वास और जलपात्र तो आप अवश्य ही साथ ले जायेंगे। आपके दोनों हाथ तो नाम करने और संख्या गिननेमें बँधे रहेंगे, फिर आप जलपात्र और बहिर्वास कैसे उठायेंगे? प्रेमाविष्ट होकर जब आप मार्गमें अचेतन हो जायेंगे, तब आपकी इन सब वस्तुओंकी रक्षा कौन करेगा ? ॥ 34-38 ॥ अनुभाष्य—नाम-संख्या गिननेके लिये महाप्रभुके दोनों हाथ बँधे रहते, इसलिये यदि कोई दूसरा व्यक्ति कमण्डलु और बहिर्वासादिको (कौपीन-धोती आदिको) नहीं उठायेगा, तो आवश्यकताके समय महाप्रभुको ये व्यवहार करनेवाली वस्तुएँ नहीं मिलेंगी। प्रेमावेशमें अचेतन होनेपर उस समय इन वस्तुओंकी रक्षाके लिये किसी व्यक्तिकी आवश्यकता है। श्रीमन्महाप्रभुके द्वारा किये गये नाम-संख्याकी गणनाके सम्बन्धमें श्रीचैतन्यचन्द्रामृतमें कहा गया है—“वध्नन् प्रेमभरप्रकम्पितकरो ग्रन्थीन् कटीडोरकैः संख्यातुं निजलोकमङ्गल-हरेकृष्णेति नाम्नां जपन्” अर्थात् “समस्त जगत्का मङ्गल करनेवाले अपने पवित्र नाम—हरे कृष्ण महामन्त्रका जप करते हुए नाम संख्या गणना करनेके लिये जब वे गाँठयुक्त कटिडोरीका स्पर्श करते हैं, तो उनके हाथ प्रेमावेशमें काँपते हैं।” आदि वाक्य, और स्तवमालामें—“हरे कृष्णेत्युच्चैः स्फुरितरसनो नामगणनाकृत-ग्रन्थिश्रेणी- सुभगकटिसूत्रोज्ज्वलकरः” अर्थात् “उच्च स्वरसे हरे कृष्ण नाम उच्चारण करते हुए उनकी रसना नृत्य करती है और उच्चारित नामकी गणनाके लिये गाँठयुक्त कटि-सूत्रमें उनका सुन्दर बायाँ हाथ सुशोभित हो रहा है॥” आदि चैतन्याष्टक श्लोक आलोच्य हैं॥ 37-38 ॥ कृष्णदास-ब्राह्मणको साथ लेनेके लिये अनुरोध :- ‘कृष्णदास’-नामे एइ सरल ब्राह्मण। इँहो सङ्गे करि’ लह, धर निवेदन ॥ 39 ॥ जलपात्र-वस्त्र वहि’ तोमा-सङ्गे याबे। ये तोमार इच्छा कर, किछु ना बलिबे ॥” 40 ॥ अनुवाद—'कृष्णदास'-नामका यह एक सरल ब्राह्मण है। इसे अपने साथ ले जाइये, यही मेरी प्रार्थना है। यह आपके जलपात्र और वस्त्र उठाकर आपके साथ चलेगा। आपकी जैसी इच्छा हो वैसा ही करना, यह आपको कुछ भी नहीं कहेगा॥” 39-40 ॥ अनुभाष्य—यह कालाकृष्णदास ब्राह्मण और आदिलीला 11/37 संख्यामें वर्णित नित्यसिद्ध व्रजसखा द्वादश गोपालोंमें अन्यतम, श्रीनित्यानन्द प्रभु जिनके प्राण स्वरूप हैं,—वे कालाकृष्णदास, ये दोनों पृथक् व्यक्ति हैं। पहलेवाले ब्राह्मण बादमें गौड़देश (बङ्गालमें) गये थे, इस विषयमें मध्यलीला 10/62-74 संख्या देखें॥ 39 ॥ महाप्रभुके द्वारा स्वीकार :- तबे ताँर वाक्य प्रभु करि’ अङ्गीकारे। ताहा-सबा लञा गेला सार्वभौम-घरे ॥ 41 ॥ श्रीसार्वभौमके घरमें गमन :- नमस्करि’ सार्वभौम आसन निवेदिल। सबाकारे मिलि’ तबे आसने बसिल ॥ 42 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुकी बातको मान लिया और उन सबको साथ लेकर वे श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके घर गये। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने प्रणाम करके महाप्रभुको बैठनेके लिये आसन प्रदान किया । 215