श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1065, कुल 2549 में से
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[ 7/41–53 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला और फिर बाकी सबको आसन देकर वे स्वयं भी बैठ गये॥ 41-42॥ भट्टाचार्यसे विदायीकी याचना :— नाना कृष्णवार्त्ता प्रभु कहिल ताँहारे। “तोमार ठाञि आइलाङ आज्ञा मागिबारे॥ 43॥ विश्वरूपको ढूँढ़नेका छल :— संन्यास करि' विश्वरूप गियाछे दक्षिणे। अवश्य करिब आमि ताँर अन्वेषणे॥ 44॥ आज्ञा देह, अवश्य आमि दक्षिणे चलिब। तोमार आज्ञाते शुभे लेउटि' आसिब॥”45॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीसार्वभौमके साथ बहुतसी श्रीकृष्ण विषयक चर्चा की और तब उनसे कहा,—“मैं आपके पास एक आज्ञा माँगने आया हूँ। मेरे ज्येष्ठ भ्राता विश्वरूप संन्यास लेकर दक्षिण भारतमें गये थे, मुझे उन्हें ढूँढ़ने अवश्य ही जाना है। आप मुझे आज्ञा दीजिये कि मैं उन्हें ढूँढ़ने दक्षिण भारतमें जाऊँ। आपकी आज्ञासे सफल होकर वापिस लौट आऊँगा॥”43-45॥ अनुभाष्य—‘लेउटि'—पश्चिम भारतीय (हिन्दी भाषाका) शब्द ‘लौटना’ या वापिस आना॥ 45॥ भट्टाचार्यकी विरह-दुःखपूर्ण उक्ति :— शुनि' सार्वभौम हैला अत्यन्त कातर। चरणे धरिया कहे विषाद-उत्तर॥ 46॥ “बहुजन्मरे पुण्यफले पाइ तोमार सङ्ग। हेन-सङ्ग विधि मोर करितेक भङ्ग॥ 47॥ शिरे वज्र पड़े यदि, पुत्र मरि' याय। ताहा सहि, तोमार विच्छेद सहन ना याय॥ 48॥ महाप्रभुको कुछ दिन रुकनेके लिये अनुरोध :— स्वतन्त्र-ईश्वर तुमि करिबे गमन। दिन-कथो रह, देखि तोमार चरण॥”49॥ अनुवाद—महाप्रभुकी बात सुनकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य अत्यन्त दुःखी हुए और उनके चरण पकड़कर बड़े दुःखसे कहने लगे,—“बहुत जन्मोंके पुण्योंके फलस्वरूप मुझे आपका सङ्ग प्राप्त हुआ है, परन्तु इस सङ्गको विधाता अब भङ्ग कर रहे हैं। यदि मेरे मस्तकपर वज्रपात हो अथवा मेरा पुत्र मर जाय, मैं उसे सहन कर सकता हूँ, परन्तु आपका वियोग सहन नहीं कर सकता। आप स्वतन्त्र ईश्वर हैं, इसलिये आपने जानेका निश्चय किया है, तो आप अवश्य ही जायेंगे। परन्तु कृपा करके आप कुछ दिन और यहाँ रुक जाँय, जिससे मैं आपके चरणोंका दर्शन कर सकूँ॥”46-49॥ महाप्रभुकी सम्मति :— ताहार विनये प्रभुर शिथिल हैल मन। रहिल दिवस-कथो, ना कैल गमन॥ 50॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी विनती सुनकर महाप्रभुके मनका सङ्कल्प शिथिल हो गया और वे उसी समय न जाकर कुछ दिनोंके लिये वहीं रह गये॥ 50॥ भट्टाचार्यके द्वारा महाप्रभुको निमन्त्रण और उनकी गृहिणीके द्वारा रसोई बनाना :— भट्टाचार्य आग्रह करि' करेन निमन्त्रण। गृहे पाक करि' प्रभुके करा'न भोजन॥ 51॥ ताँहार ब्राह्मणी, ताँर नाम—‘षाठीर माता’। रान्धि' भिक्षा देन तेंहो, आश्चर्य ताँर कथा॥ 52॥ आगे त' कहिब ताहा करिया विस्तार। एबे कहि प्रभुर दक्षिण-यात्रा-समाचार॥ 53॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने आग्रह करके महाप्रभुको अपने घर आनेका निमन्त्रण दिया और तब अपने घरमें ही रसोई बनाकर महाप्रभुको भोजन कराया। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी पत्नी जिनको ‘षाठीकी माता’ भी कहते थे, महाप्रभुको भोजन बनाकर देती थीं। उनकी भी एक आश्चर्यमय कथा है, जिसका मैं 216 ।