श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1066, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंसातवाँ अध्याय 7/51-63 ] बादमें विस्तारसे वर्णन करूँगा। अब मैं महाप्रभुकी महाप्रभुकी आलालनाथ होते हुए दक्षिणकी यात्रा :- दक्षिण यात्राके विषयमें वर्णन करता हूँ॥ 51-53 ॥ समुद्र-तीरे-तीरे आलालनाथ-पथे। सार्वभौम कहिलेन आचार्य-गोपीनाथे ॥ 59 ॥ पाँच दिनके बाद पुनः विदायीकी प्रार्थना :- श्रीसार्वभौमका घरमें रखे चार कौपीन-बहिर्वास दिन पाँच रहि' प्रभु भट्टाचार्य-स्थाने। श्रीगोपीनाथके द्वारा मँगवाकर महाप्रभुको प्रदान करना :- चलिबार लागि' आज्ञा मागिला आपने ॥ 54 ॥ "चारि कोपीन-बहिर्वास राखियाछि घरे। भट्टाचार्यकी सम्मति :- ताहा, प्रसादान्न, लञा आइस विप्रद्वारे ॥" 60 ॥ प्रभुर आग्रहे भट्ट सम्मत हइला। अनुवाद-महाप्रभु समुद्रके तटके साथ-साथ प्रभु ताँरे लञा जगन्नाथ-मन्दिरे गेला ॥ 55 ॥ आलालनाथ जानेवाले मार्गपर चले। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके घरमें पाँच दिन श्रीगोपीनाथाचार्यसे कहा,-"घरमें चार कौपीन और रहकर महाप्रभुने स्वयं उनसे चलनेकी आज्ञा माँगी। बहिर्वास रखे हैं, उसे और प्रसाद-अन्नको किसी महाप्रभुके यात्रापर जानेका आग्रह करनेपर श्रीसार्वभौम ब्राह्मणकी सहायतासे ले आइये ॥" 59-60 ॥ भट्टाचार्य सहमत हो गये। तब महाप्रभु उनको साथ अमृतप्रवाह भाष्य-समुद्रतटके साथ-साथ होते हुए लेकर श्रीजगन्नाथ मन्दिर गये ॥ 54-55 ॥ दक्षिणकी ओर जानेपर पुरीसे छह कोसकी दूरीपर 'आलालनाथ' ग्राम है। 'आलालनाथ'में-चतुर्भुज-वासुदेव- महाप्रभुके द्वारा श्रीजगन्नाथ मन्दिरमें जाकर उनसे यात्राकी विग्रह है। वनके बीचमें एक छोटेसे गाँवमें उनका आज्ञाकी याचना और प्रसादी-माला प्राप्तकर मन्दिरकी मन्दिर है और उन्हें वहाँ बहुत ही उत्तम खीरका भोग परिक्रमाकर यात्रा आरम्भ :- लगता है। वहाँके पण्डे अभी भी (ठाकुरजीके अङ्गोंपर दर्शन करि' ठाकुर-पाश आज्ञा मागिला। पड़े) गर्म खीरके दाग श्रीविग्रहमें दिखलाते हैं॥ 59 ॥ पूजारी माला-प्रसाद प्रभुरे आनि' दिला ॥ 56 ॥ आज्ञा-माला पाञा हर्षे नमस्कार करि'। रायरामानन्दके साथ मिलनेके लिये श्रीसार्वभौमका महाप्रभुसे अनुरोध :- आनन्दे दक्षिण-देशे चले गौरहरि ॥ 57 ॥ तबे सार्वभौम कहे प्रभुर चरणे। भट्टाचार्य-सङ्गे आर यत निजगण। "अवश्य पालिबे, प्रभु, मोर निवेदने ॥ 61 ॥ जगन्नाथ प्रदक्षिण करि' करिला गमन ॥ 58 ॥ 'रामानन्द राय' आछे गोदावरी-तीरे। अनुवाद-महाप्रभुने श्रीजगन्नाथदेवका दर्शनकर उनसे अधिकारी हयेन तँहो विद्यानगरे ॥ 62 ॥ जानेके लिये आज्ञा माँगी। तब पुजारीने श्रीजगन्नाथदेवकी शूद्र विषयि-ज्ञाने उपेक्षा ना करिबे। माला और प्रसाद लाकर उन्हें प्रदान किया। मालाके आमार वचने ताँरे अवश्य मिलिबे ॥ 63 ॥ रूपमें श्रीजगन्नाथदेवकी आज्ञा पाकर महाप्रभुने हर्षित अनुवाद-तब श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुसे प्रार्थना होकर उन्हें प्रणाम किया। तब महाप्रभु आनन्दसे करते हुए कहा,-"मेरा एक निवेदन आप अवश्य ही दक्षिण देशकी यात्राके लिये तत्पर हुए। महाप्रभु अपने स्वीकार करना, गोदावरी-तटपर स्थित विद्यानगरके भक्तों और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके साथ श्रीजगन्नाथदेवकी अधिकारी 'रामानन्दराय' हैं। मेरी बात मानकर आप प्रदक्षिणा करके यात्राके लिये चल दिये॥ 56-58 ॥ ॥ 217