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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

सातवाँ अध्याय 7/51-63 ] बादमें विस्तारसे वर्णन करूँगा। अब मैं महाप्रभुकी महाप्रभुकी आलालनाथ होते हुए दक्षिणकी यात्रा :- दक्षिण यात्राके विषयमें वर्णन करता हूँ॥ 51-53 ॥ समुद्र-तीरे-तीरे आलालनाथ-पथे। सार्वभौम कहिलेन आचार्य-गोपीनाथे ॥ 59 ॥ पाँच दिनके बाद पुनः विदायीकी प्रार्थना :- श्रीसार्वभौमका घरमें रखे चार कौपीन-बहिर्वास दिन पाँच रहि' प्रभु भट्टाचार्य-स्थाने। श्रीगोपीनाथके द्वारा मँगवाकर महाप्रभुको प्रदान करना :- चलिबार लागि' आज्ञा मागिला आपने ॥ 54 ॥ "चारि कोपीन-बहिर्वास राखियाछि घरे। भट्टाचार्यकी सम्मति :- ताहा, प्रसादान्न, लञा आइस विप्रद्वारे ॥" 60 ॥ प्रभुर आग्रहे भट्ट सम्मत हइला। अनुवाद-महाप्रभु समुद्रके तटके साथ-साथ प्रभु ताँरे लञा जगन्नाथ-मन्दिरे गेला ॥ 55 ॥ आलालनाथ जानेवाले मार्गपर चले। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके घरमें पाँच दिन श्रीगोपीनाथाचार्यसे कहा,-"घरमें चार कौपीन और रहकर महाप्रभुने स्वयं उनसे चलनेकी आज्ञा माँगी। बहिर्वास रखे हैं, उसे और प्रसाद-अन्नको किसी महाप्रभुके यात्रापर जानेका आग्रह करनेपर श्रीसार्वभौम ब्राह्मणकी सहायतासे ले आइये ॥" 59-60 ॥ भट्टाचार्य सहमत हो गये। तब महाप्रभु उनको साथ अमृतप्रवाह भाष्य-समुद्रतटके साथ-साथ होते हुए लेकर श्रीजगन्नाथ मन्दिर गये ॥ 54-55 ॥ दक्षिणकी ओर जानेपर पुरीसे छह कोसकी दूरीपर 'आलालनाथ' ग्राम है। 'आलालनाथ'में-चतुर्भुज-वासुदेव- महाप्रभुके द्वारा श्रीजगन्नाथ मन्दिरमें जाकर उनसे यात्राकी विग्रह है। वनके बीचमें एक छोटेसे गाँवमें उनका आज्ञाकी याचना और प्रसादी-माला प्राप्तकर मन्दिरकी मन्दिर है और उन्हें वहाँ बहुत ही उत्तम खीरका भोग परिक्रमाकर यात्रा आरम्भ :- लगता है। वहाँके पण्डे अभी भी (ठाकुरजीके अङ्गोंपर दर्शन करि' ठाकुर-पाश आज्ञा मागिला। पड़े) गर्म खीरके दाग श्रीविग्रहमें दिखलाते हैं॥ 59 ॥ पूजारी माला-प्रसाद प्रभुरे आनि' दिला ॥ 56 ॥ आज्ञा-माला पाञा हर्षे नमस्कार करि'। रायरामानन्दके साथ मिलनेके लिये श्रीसार्वभौमका महाप्रभुसे अनुरोध :- आनन्दे दक्षिण-देशे चले गौरहरि ॥ 57 ॥ तबे सार्वभौम कहे प्रभुर चरणे। भट्टाचार्य-सङ्गे आर यत निजगण। "अवश्य पालिबे, प्रभु, मोर निवेदने ॥ 61 ॥ जगन्नाथ प्रदक्षिण करि' करिला गमन ॥ 58 ॥ 'रामानन्द राय' आछे गोदावरी-तीरे। अनुवाद-महाप्रभुने श्रीजगन्नाथदेवका दर्शनकर उनसे अधिकारी हयेन तँहो विद्यानगरे ॥ 62 ॥ जानेके लिये आज्ञा माँगी। तब पुजारीने श्रीजगन्नाथदेवकी शूद्र विषयि-ज्ञाने उपेक्षा ना करिबे। माला और प्रसाद लाकर उन्हें प्रदान किया। मालाके आमार वचने ताँरे अवश्य मिलिबे ॥ 63 ॥ रूपमें श्रीजगन्नाथदेवकी आज्ञा पाकर महाप्रभुने हर्षित अनुवाद-तब श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुसे प्रार्थना होकर उन्हें प्रणाम किया। तब महाप्रभु आनन्दसे करते हुए कहा,-"मेरा एक निवेदन आप अवश्य ही दक्षिण देशकी यात्राके लिये तत्पर हुए। महाप्रभु अपने स्वीकार करना, गोदावरी-तटपर स्थित विद्यानगरके भक्तों और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके साथ श्रीजगन्नाथदेवकी अधिकारी 'रामानन्दराय' हैं। मेरी बात मानकर आप प्रदक्षिणा करके यात्राके लिये चल दिये॥ 56-58 ॥ ॥ 217

[ 7/61-69 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला उनसे अवश्य ही मिलना, शूद्र और विषयी जानकर आप उनकी उपेक्षा मत करना ॥ 61-63 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'अधिकारी'—राजाका प्रधान कर्मचारी। विद्यानगरको आजकल 'पोरबन्दर' कहते हैं ॥ 62 ॥ अनुभाष्य—'शूद्र'—उत्कल देश (उड़ीसा)के समाजमें करण-जातिको 'शौक्र-शूद्र' (जन्मके कारण शूद्र) कहा जाता है। श्रीराम force? श्रीरामानन्द करण-जातिमें जन्में थे; इसलिये लौकिक-दृष्टिसे वे शौक्रशूद्र होनेपर भी वास्तवमें ब्राह्मण अथवा ब्राह्मणोंके भी गुरु परमहंस-वैष्णव थे। 'विषयी'—स्त्री-पुत्रादिकी बातोंमें रत अथवा बाह्य-रूप-रस-गन्ध-शब्द-स्पर्श आदि विषयोंमें ज्ञानेन्द्रियोंको युक्त करके उनमें प्रमत्त रहनेवालेको 'विषयी' कहते हैं। श्रीरामानन्द बाहरी दृष्टिसे कौपीनधारी संन्यासी नहीं थे, इसलिये लौकिक दृष्टिसे वे राजाके सेवक होनेके कारण विषयी दिखते थे, किन्तु वास्तवमें वे परम विद्वान अथवा नरोत्तम-संन्यासी थे। सार्वभौम भट्टाचार्यने पहले स्वयं वैष्णव नहीं होनेपर भी श्रीरामानन्द रायको वैष्णव जाना था। और फिर, महाप्रभुकी कृपासे भक्त बननेके बाद श्रीरामानन्दकी बातोंपर विचार करके उनको 'अधिकारी रसिकभक्त'के रूपमें समझा था ॥ 63 ॥ राय-रामानन्दकी प्रशंसा :- तोमार सङ्गेर योग्य तेंहो एकजन। पृथिवीते रसिक भक्त नाहि ताँर सम ॥ 64 ॥ पाण्डित्य आर भक्तिरस, —दुँहेर तेंहो सीमा। सम्भाषिले जानिबे तुमि ताँहार महिमा ॥ 65 ॥ पहले वैष्णवोंको स्मार्त्त व्यक्तियोंकी अपेक्षा छोटा माननेके कारण भट्टाचार्यके द्वारा उनका उपहास :- अलौकिक वाक्य चेष्टा ताँर ना बुझिया। परिहास करियाछि ताँरे 'वैष्णव' जानिया ॥ 66 ॥ बादमें महाप्रभुकी कृपासे चिन्मय-वैष्णवकी महिमाकी उपलब्धि :- तोमार प्रसादे एबे जनिनु ताँर तत्त्व। सम्भाषिले जानिबे ताँर येमन महत्त्व ॥ 67 ॥ अनुवाद—रामानन्दराय ही एकमात्र आपके सङ्ग करने योग्य हैं, पृथ्वीपर उनके समान कोई भी रसिक भक्त नहीं है। वे पाण्डित्य और भक्तिरस—दोनोंकी चरम सीमा हैं। उनसे बातचीत करनेपर आप स्वयं ही उनकी महिमा जान जायेंगे। मैं उनके अलौकिक वचनों और क्रिया-कलापोंको समझ नहीं पाता था तथा मैं उन्हें 'वैष्णव' मानकर उनका उपहास करता था। अब आपकी कृपासे मैं राय रामानन्दकी महिमाको समझ सका हूँ। उनके साथ वार्त्तालाप करके आप भी उनकी महिमाको जान पायेंगे ॥ 64-67 ॥ अनुभाष्य—महाप्रभुसे विमुख प्रकृति-वादी ज्ञानी और कर्मी लोग श्रीचैतन्याश्रित वैष्णवोंका ऐसे ही उपहास किया करते हैं। महाप्रभुसे विमुख लोग—प्रत्यक्ष और अनुमानको ही सर्वस्व माननेवाले जड़ेन्द्रियोंसे प्राप्त ज्ञानमें ही मत्त तर्कपन्थी हैं। श्रीचैतन्याश्रित वैष्णव शब्दप्रमाणको आश्रय माननेवाले अधोक्षज भगवान्के सेवक और श्रौतपन्थी हैं ॥ 66 ॥ महाप्रभुके द्वारा उनके वाक्य-पालनकी सम्मति :- अङ्गीकार करि' प्रभु ताँहार वचन। ताँरे विदाय दिते ताँरे कैल आलिङ्गन ॥ 68 ॥ महाप्रभुके द्वारा गृहस्थ-वैष्णवको सम्मान :- “घरे कृष्ण भजि' मोरे करिह आशीर्वादे। नीलाचले आसिं येन तोमार प्रसादे ॥” 69 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी बातको मानकर उन्हें विदायी देनेके लिये उनका आलिङ्गन करके कहा, —“घरमें श्रीकृष्णका भजन करते समय आप मुझे आशीर्वाद प्रदान करते रहना, जिससे मैं आपकी कृपासे पुनः नीलाचल लौट आऊँ ॥” 68-69 ॥ 218 ।

सातवाँ अध्याय 7/69–77 ] अनुभाष्य—श्रीकृष्णसेवक बाहरी दृष्टिसे गृहस्थ आश्रमको अलङ्कृत (अर्थात् उसे स्वीकार करके उसकी महिमा वर्धित) करनेपर भी, वास्तवमें इन्द्रियोंके दास गृहव्रती या घर-परिवारमें ही आसक्त बुद्धिवाले गृहमेधी व्यक्तियोंके समान नहीं है। “ये दिन गृहे भजन देखि, गृहेते गोलोक भाय” (ठाकुर श्रील भक्तिविनोद द्वारा रचित शरणागतिका कीर्तन)—गृहस्थ-वैष्णव ही इस बातका तन-मन-वचनसे कीर्तन करनेके एकमात्र अधिकारी हैं। इसलिये महाप्रभुके पदाश्रित यथार्थ शुद्धवैष्णव-गृहस्थ संन्यासियोंके भी आदरणीय और गुरु हैं। श्रीकृष्णभजनकी महिमाको नहीं जाननेवाले जीवोंको शिक्षा देनेके लिये महाप्रभुने सार्वभौम भट्टाचार्यसे आशीर्वादकी भिक्षा माँगकर इसे दिखलाया॥ 69 ॥ महाप्रभुकी यात्रा और श्रीसार्वभौमकी मूर्च्छा :— एत बलि' महाप्रभु करिला गमन। मूर्च्छित हञा ताँहा पड़िला सार्वभौम ॥ 70 ॥ अनुवाद—इतना कहकर महाप्रभु आगे चल पड़े। उनके विरहको सहन न कर पानेसे उसी समय श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य मूर्च्छित होकर वहीं गिर पड़े॥ 70 ॥ निरपेक्ष महाप्रभु :— ताँरे उपेक्षिया कैल शीघ्र गमन। के बुझिते पारे महाप्रभुर चित्त-मन ॥ 71 ॥ महानुभावेर चित्तेर स्वभाव एइ हय। पुष्प-सम कोमल, कठिन वज्रमय ॥ 72 ॥ अनुवाद—महाप्रभु उसे अनदेखा करके शीघ्रतासे वहाँसे चले गये। महाप्रभुके चित्त और मनके रहस्यको कौन जान सकता है? महानुभाव व्यक्तियोंके चित्तका स्वभाव ही ऐसा होता है, वे कभी पुष्पके समान कोमल और कभी वज्रके समान कठोर होते हैं॥ 71-72 ॥ अनुभाष्य—'महाप्रभुकी निरपेक्षता'—मध्यलीला 3/212 संख्या देखें॥ 71-72 ॥ परस्पर विरुद्ध-धर्मके समाश्रय भगवान्‌की भाँति भगवद्भक्त भी कोमल और कठोर :— भवभूतिकृत 'उत्तर-रामचरित्र'के तृतीयांकमें 2/7-23वाँ श्लोक वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि। लोकोत्तराणां चेतांसि को हि विज्ञातुमीश्वरः ॥ 73 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 73 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अलौकिक पुरुषोंका चित्त वज्रसे भी कठोर और कुसुमसे भी कोमल होता है; अन्य लोग उसको समझनेके योग्य नहीं होते॥ 73 ॥ अनुभाष्य— वज्रात् अपि कठोराणि, कुसुमात् (पुष्पात्) अपि मृदूनि (कोमलानि); लोकोत्तराणां (असाधारणालौकिकानां) चेतांसि (अन्तःकरणानि) विज्ञातुं (बोद्धुं) कः हि ईश्वरः (समर्थः)? श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 73 ॥ श्रीनिताइके द्वारा श्रीसार्वभौमको घर भेजना :— नित्यानन्दप्रभु भट्टाचार्ये उठाइल। ताँर लोकसङ्गे ताँरे घरे पाठाइल ॥ 74 ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको उठाया और उनके लोगोंके साथ उन्हें घर भेज दिया॥ 74 ॥ भक्तोंके साथ आलालनाथ-आगमन :— भक्तगण शीघ्र आसि' लैल प्रभुर साथ। वस्त्र-प्रसाद लञा तबे आइला गोपीनाथ ॥ 75 ॥ सबा-सङ्गे प्रभु तबे आलालनाथ आइला। नमस्कार करि' तारे बहुस्तुति कैला ॥ 76 ॥ आलालनाथ नारायण-दर्शनसे महाप्रभुका स्तव-नृत्य-गीत :— प्रेमावेशे नृत्यगीत कैल কতক्षण। देखिते आइला ताँहा कैसे यत जन ॥ 77 ॥ अनुवाद—सभी भक्त जल्दीसे आकर महाप्रभुके साथ हो लिये। वस्त्र और प्रसाद लेकर श्रीगोपीनाथाचार्य । 219

[ 7/75-87 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

भी तब वहाँ आ पहुँचे। सबको साथ लेकर महाप्रभु आलालनाथ आ गये और उनको प्रणाम करके उनकी बहुत स्तव-स्तुति की। प्रेमावेशमें महाप्रभुने कुछ देर तक नृत्य-गीत किया और वहाँ रहनेवाले सभी लोग उनके दर्शनके लिये आये॥ 75-77 ॥ अनुभाष्य—'साथ'—सङ्ग या साथ॥ 75॥

महाप्रभुके दर्शनोंके लिये बहुत लोगोंका आगमन और हरि-सङ्कीर्तन :— चौदिकेते सब लोक बले 'हरि' 'हरि'। प्रेमावेशे मध्ये नृत्य करे गौरहरि ॥ 78 ॥ काञ्चन-सदृश देह, अरुण वसन। पुलकाश्रु-कम्प-स्वेद ताहाते भूषण ॥ 79 ॥ देखिते लोकेर मने हैल चमत्कार। यत लोक आइसे, केह नाहि याय घर ॥ 80 ॥ केह नाचे, केह गाय, 'श्रीकृष्ण' 'गोपाल'। प्रेमेते भासिल लोक, स्त्री-वृद्ध-आबाल ॥ 81 ॥ देखि' नित्यानन्द प्रभु कहे भक्तगणे। “एइरूपे नृत्य आगे हबे ग्रामे ग्रामे ॥” 82 ॥

अनुवाद—चारों ओर सब लोक 'हरि' 'हरि' बोलने लगे और उनके बीचमें श्रीगौरहरि प्रेमाविष्ट होकर नृत्य कर रहे थे। स्वर्णके समान महाप्रभुकी देह और उसके ऊपर अरुण वर्णके वस्त्र थे तथा पुलक, अश्रु, कम्प, स्वेदादि अष्ट-सात्त्विकभाव उनके भूषणस्वरूप थे। महाप्रभुके ऐसे अद्भुत रूप और भावोंको देखकर लोगोंका मन चमत्कृत हो रहा था और कोई भी अपने घर लौटना नहीं चाह रहा था। कुछ लोग नृत्य कर रहे थे, कुछ लोग 'श्रीकृष्ण' 'गोपाल' नामका सङ्कीर्तन कर रहे थे। इस प्रकार बालक-स्त्री-वृद्ध, सभी प्रेममें डूब रहे थे। यह देखकर श्रीनित्यानन्द प्रभुने भक्तोंसे कहा कि अब तो गाँव-गाँवमें जहाँ महाप्रभु जायेंगे, इसी प्रकार नृत्य होगा॥” 78-82 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 7/25 संख्या देखें ॥ 81 ॥

महाप्रभुको छोड़नेकी लोगोंमें अनिच्छा देखकर प्रसाद पवानेके छलसे महाप्रभुको वहाँसे हटाना :— अतिकाल हैल, लोक छाड़िया ना याय। तबे नित्यानन्द-गोसाञि सृजिल उपाय ॥ 83 ॥ मध्याह्न करिते गेला प्रभुके लञा। ताहा देखि' लोक आइसे चौदिके धाञा ॥ 84 ॥

भक्तोंका मन्दिरके भीतर प्रवेश :— मध्याह्न करिते आइला देवता-मन्दिरे। निजगण प्रवेशि' कपाट दिल बहिर्द्वारे ॥ 85 ॥

अनुवाद—श्रीनित्यानन्द गोसांईने देखा कि बहुत समय हो गया है, तो उन्होंने एक उपाय निकाला जिससे लोग महाप्रभुको छोड़ दें। वे महाप्रभुको दोपहरका स्नान करानेके लिये ले चले, ऐसा देखकर लोग चारों ओरसे दौड़कर उधर ही आने लगे। दोपहरका स्नान करनेके बाद वे वापिस मन्दिरमें आ गये। श्रीनित्यानन्द प्रभुने अपने साथ आये लोगोंको प्रवेश करवाके बाहरका द्वार बन्द कर दिया ॥ 83-85 ॥ अनुभाष्य—'अतिकाल'—अधिक समय व्यतीत हो जानेपर ॥ 83 ॥

श्रीगोपीनाथके द्वारा महाप्रभुको भिक्षा प्रदान; भक्तोंको महाप्रभुके अवशेषकी प्राप्ति :— तबे दुइ प्रभुरे गोपीनाथ भिक्षा कराइल। प्रभुर शेष प्रसादान्न सबे बाँटि' खाइल ॥ 86 ॥

अनुवाद—तब श्रीगोपीनाथाचार्यने महाप्रभु एवं श्रीनित्यानन्द प्रभु, दोनोंको भोजन कराया और उनके उच्छिष्ट अन्न-प्रसादको सब भक्तोंने बाँटकर खा लिया ॥ 86 ॥

मन्दिरके बाहर महाप्रभुके दर्शनोंके लिये अनेक लोगोंका समागम :— शुनि' शुनि' लोक-सब आसि' बहिर्द्वारे। 'हरि' 'हरि' बलि' लोक कलरव करे ॥ 87 ॥

अनुवाद—महाप्रभुके आगमनकी बातको सुनकर

220 ।

सातवाँ अध्याय 7/87-96 ] सब लोग मन्दिरके बाहिरी द्वारपर एकत्रित हो गये और 'हरि' 'हरि' बोलकर कोलाहल करने लगे॥ 87॥ मन्दिरके द्वारका खुलना और सभीको महाप्रभुका दर्शन प्राप्त :— तबे महाप्रभु द्वार कराइल मोचन। आनन्दे आसिया लोक पाइल दरशन ॥ 88 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने मन्दिरका द्वार खुलवा दिया और सभी लोगोंने आकर आनन्दपूर्वक महाप्रभुके दर्शन किये॥ 88॥ सारा दिन लोगोंको महाप्रभुके दर्शनके फलसे वैष्णवताकी प्राप्ति :— एइमत सन्ध्या पर्यन्त लोक आसे, याय। ‘वैष्णव’ हइल लोक, सबे नाचे, गाय ॥ 89 ॥ अनुवाद—इस प्रकार सायंकाल तक लोग आते-जाते रहे और महाप्रभुकी कृपासे सभी ‘वैष्णव’ भक्त बनकर नाचने-गाने लगे॥ 89 ॥ आलालनाथमें भक्तोंके साथ रात्रिवास :— एइरूपे सेइ ठाञि भक्तगण-सङ्गे। सेइ रात्रि गोङाइल कृष्णकथा-रङ्गे ॥ 90 ॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुने वह रात वहीं बितायी और सारी रात भक्तोंके साथ श्रीकृष्णकथाका आनन्द लेते रहे॥ 90 ॥ प्रातः पुनः यात्रा :— प्रातःकाले स्नान करि’ करिला गमन। भक्तगणे विदाय दिला करि’ आलिङ्गन ॥ 91 ॥ अनुवाद—अगले दिन प्रातःकालमें महाप्रभुने स्नान करके सभी भक्तोंको आलिङ्गन करके विदायी ली और दक्षिण भारतकी यात्रापर चल दिये॥ 91 ॥ महाप्रभुकी निरपेक्षता :— मूर्च्छित हञा सबे भूमते पड़िला। ताँहा-सबा पाने प्रभु फिरि’ ना चाहिला ॥ 92 ॥ अनुवाद—सभी भक्त मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़े, परन्तु महाप्रभुने उन्हें मुड़कर भी नहीं देखा और अपनी यात्रापर अग्रसर हुए॥ 92 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 3/212 संख्याका अनुभाष्य देखें॥ 92 ॥ महाप्रभुके पीछे-पीछे जल-पात्रादि-वाहक कृष्णदास :— विच्छेदे व्याकुल प्रभु चलिला दुःखी हञा। पाछे कृष्णदास याय जलपात्र लञा ॥ 93 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णविरहमें व्याकुल महाप्रभु दुःखी होकर चल रहे थे और उनका सेवक कृष्णदास जलपात्रको हाथमें लेकर उनके पीछे-पीछे चल रहा था॥ 93 ॥ उस दिन भक्तोंका उपवास और बादमें पुरी-गमन :— भक्तगण उपवासी ताँहाइ रहिला। आर दिने दुःखी हञा नीलाचले आइला ॥ 94 ॥ अनुवाद—उस दिन सभी भक्त वहीं आलालानाथमें ही रहे और सबने उपवास किया। अगले दिन दुःखी होकर सभी नीलाचल लौट आये॥ 94 ॥ मत्तसिंह-प्राय प्रभु करिला गमन। प्रेमावेशे याय करि’ नाम-सङ्कीर्त्तन ॥ 95 ॥ अनुवाद—मत्तसिंहकी भाँति महाप्रभु यात्रामें चल दिये। प्रेमाविष्ट होकर नाम-सङ्कीर्तन करते हुए वे चले जा रहे थे॥ 95 ॥ श्रीमुख कीर्त्तित-श्लोक :— कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! हे। कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! हे॥ कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! रक्ष माम्। । 221

[ 7/96-103 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! पाहि माम्॥ राम! राघव! राम! राघव! राम! राघव! रक्ष माम्। कृष्ण! केशव! कृष्ण! केशव! कृष्ण! केशव! पाहि माम् ॥96॥

अनुवाद—महाप्रभु इस प्रकार कीर्तन कर रहे थे— कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! हे। कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! हे॥ कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! मेरी रक्षा करो। कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! मेरा पालन करो॥ राम! राघव! राम! राघव! राम! राघव! मेरी रक्षा करो। कृष्ण! केशव! कृष्ण! केशव! कृष्ण! केशव! मेरा पालन करो॥96॥

अमृतप्रवाह भाष्य—'रक्ष मां'—मेरी रक्षा करो; 'पाहि मां'—मेरा पालन करो॥96॥

लोगोंको हरिनाम दान :- एइ श्लोक पथे पड़ि' चलिला गौरहरि। लोक देखि' पथे कहे,—बल 'हरि' 'हरि' ॥97॥

महाप्रभुके मुखसे नाम-श्रवण करनेसे लोगोंके द्वारा हरिनाम-ग्रहण :- सेइ लोक प्रेममत्त हञा बले 'हरि' 'कृष्ण'। प्रभुर पाछे सङ्गे याय दर्शन-सतृष्ण ॥98॥

महाप्रभुकी शक्तिके सञ्चारसे उस वैष्णवके द्वारा उसके ग्राममें सभीको वैष्णवताकी प्राप्ति :- कतक्षणे रहि' प्रभु तारे आलिङ्गिया। विदाय करिल तारे शक्ति सञ्चारिया ॥99॥

सेइजन निज-ग्रामे करिया गमन। 'कृष्ण' बलि' हासे, कान्दे, नाचे अनुक्षण॥100॥ यारे देखे, तारे कहे,—कह कृष्णनाम। एइमत 'वैष्णव' कैल सब निज-ग्राम ॥101॥

अनुवाद—इस श्लोकका उच्चारण करते-करते श्रीगौरहरि अपने मार्गपर चले जा रहे थे। मार्गमें जिस किसी व्यक्तिको देखते, उसे भी 'हरि' 'हरि' बोलनेके लिये कहते। महाप्रभुको 'हरि' 'हरि' बोलते सुनकर वह व्यक्ति भी प्रेममें उन्मत्त होकर 'हरि' 'कृष्ण' बोलने लगता। इस प्रकार महाप्रभुके दर्शनके लिये उत्कण्ठित होकर वह उनके पीछे-पीछे चलने लगता। कुछ समयके बाद महाप्रभु उसका आलिङ्गन करके उसमें अपनी शक्ति सञ्चार कर देते और उसे अपने घर जानेके लिये विदा कर देते। महाप्रभुसे शक्ति प्राप्तकर वह व्यक्ति अपने ग्राममें जाकर 'श्रीकृष्ण'-नामका कीर्तन करते हुए कभी हँसता, कभी रोता, तो कभी नृत्य करने लगता। वह जिसे भी देखता, उसे श्रीकृष्णनाम कहनेको कहता। इस प्रकार वह अपने सारे ग्रामवासियोंको वैष्णव बना देता॥97-101॥

अमृतप्रवाह भाष्य—'शक्ति सञ्चारिया'—ह्लादिनी-शक्तिका सारभाग और संवित्-शक्तिका सारभाग—दोनों मिलनेपर 'भक्ति-शक्ति' होती है। श्रीकृष्ण या भक्त कृपा करके उस शक्तिका जिसमें सञ्चार करते हैं, वह 'परमभक्त' बन जाता है। महाप्रभु जिसपर कृपा करते थे, उसमें वैसी शक्ति सञ्चार करके वैष्णवधर्मके प्रचारका भार अर्पण करते थे॥99॥

अन्य ग्रामवासियोंकी भी उस वैष्णव-दर्शनके कृपारूपी फलसे वैष्णवताकी प्राप्ति :- ग्रामान्तर हैते देखिते आइल यत जन। ताँर दर्शन-कृपाय हय ताँर सम ॥102॥

इस प्रकार सभी दक्षिण-भारतवासियोंका उद्धार और उन्हें वैष्णवताकी प्राप्ति :- सेइ याइ' ग्रामेर लोक वैष्णव करय। अन्यग्रामी आसि' ताँरे देखि' वैष्णव हय ॥103॥

222 ।

सातवाँ अध्याय [7/102-112 ]

सेइ याइ' अन्य ग्रामे करे उपदेश। एइमत 'वैष्णव' हैल सब दक्षिण-देश॥ 104॥

**अनुवाद—**दूसरे गाँवोंसे भी जो लोग इन महाप्रभुसे शक्ति-प्राप्त वैष्णवके गाँवमें आते, वे भी इसके दर्शनरूपी कृपासे उसके समान वैष्णव बन जाते। जब ये वैष्णव अपने गाँवमें जाते, तो वे भी अपने गाँवके सभी लोगोंको वैष्णव बना देते। इसी प्रकार जब अन्य गाँवोंके लोग इनका दर्शन करने आते, तो वे भी वैष्णव बन जाते। इस प्रकार वैष्णव बन जानेके बाद वे दूसरे गाँवोंमें जाकर श्रीकृष्णनामका उपदेश करने लगते। इस प्रकार होते-होते समस्त दक्षिणवासी वैष्णव बन गये॥ 102-104॥

महाप्रभुके द्वारा बहुत भाग्यवान् जीवोंका उद्धार :- एइमत पथे याइते शत शत जन। 'वैष्णव' करेन ताँरे करि' आलिङ्गन॥ 105॥

**अनुवाद—**इस प्रकार मार्गपर चलते-चलते महाप्रभुने सैकड़ों लोगोंको आलिङ्गन करके वैष्णव बना दिया था॥ 105॥

महाप्रभुको भिक्षा देनेवाले दाताओंके दर्शन करनेवालोंको भी वैष्णवताकी प्राप्ति और बादमें उनके द्वारा आचार्यरूपमें बहुत लोगोंका उद्धार :- येइ ग्रामे रहि' भिक्षा करेन याँर घरे। सेइ ग्रामेर यत लोक आइसे देखिबारे॥ 106॥ प्रभुर कृपाय हय महाभागवत। सेइसब आचार्य हञा तारिल जगत्॥ 107॥

इस प्रकार समस्त दक्षिणदेशका उद्धार :- एइमत कैला यावत् गेला सेतुबन्धे। सर्वदेश 'वैष्णव' हैल प्रभुर सम्बन्धे॥ 108॥

**अनुवाद—**महाप्रभु जिस गाँवमें रहकर भिक्षा ग्रहण करते, उस गाँवके जितने लोग उनका दर्शन करने आते, महाप्रभुकी कृपासे वे सब महाभागवत बन जाते। बादमें उन सबने आचार्य बनकर जगत्‌का उद्धार किया। इस प्रकार सबपर कृपा करते हुए महाप्रभु सेतुबन्ध तक गये और उनके प्रभावसे सम्पूर्ण दक्षिण-देशवासी वैष्णव बन गये॥ 106-108॥

अमृतप्रवाह भाष्य—'सेतुबन्ध'—सेतुबन्ध-रामेश्वर, समुद्रके तटपर, 'राम-नद' की दूसरी ओर भारतवर्षके दक्षिण प्रान्तमें है॥ 108॥

महाप्रभुकी कृपा-महिमा नवद्वीपकी अपेक्षा दक्षिणदेशमें अधिक प्रकाशित :- नवद्वीप येइ शक्ति ना कैला प्रकाशे। सेइ शक्ति प्रकाशि' निस्तारिल दक्षिणदेशे॥ 109॥

**अनुवाद—**नवद्वीपमें भी जिस शक्तिको प्रकाशित नहीं किया था, उस शक्तिको प्रकाशित करके महाप्रभुने दक्षिण भारतका उद्धार किया॥ 109॥

अमृतप्रवाह भाष्य—'नवद्वीप' धाम होनेपर भी वहाँ उस समय न्याय और स्मृति-शास्त्रोंकी विशेष प्रबलता थी। उन-उन शास्त्रोंके अध्यापकोंमें अनेक तो बहिर्मुख लोग थे, परन्तु उनका उद्धार करनेके लिये महाप्रभुने किसी विशेष शक्तिका प्रकाश नहीं किया, इसलिये ग्रन्थकारने ऐसा कहा है॥ 109॥

श्रीचैतन्य-भक्तोंको ही भगवद्-कृपाशक्तिमें विश्वास :- प्रभुके ये भजे, तारे ताँर कृपा हय। सेइ से ए-सब लीला सत्य करि' लय॥ 110॥

अप्राकृत-लीलामें विश्वासके फलस्वरूप ही नित्यकल्याणकी प्राप्ति, अन्यथा अक्षज-ज्ञानके द्वारा सर्वनाश :- अलौकिक-लीलाय यार ना हय विश्वास। इहलोक, परलोक तार हय नाश॥ 111॥ प्रथमेइ कहिल प्रभुर येरूपे गमन। एइमत जानिह यावत् दक्षिण-भ्रमण॥ 112॥

**अनुवाद—**जो व्यक्ति महाप्रभुका भजन करता है, उसीपर उनकी कृपा होती है और वही उनकी इन सब लीलाओंपर विश्वास करता है। महाप्रभुकी इन अलौकिक

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[ 7/110-113 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

लीलाओंपर जिसे विश्वास नहीं होता, उसका इस लोक और परलोक—दोनोंका ही नाश हो जाता है। ऐसा ही जानो कि महाप्रभुने यात्राके प्रारम्भमें जैसे सर्वत्र कृपाका वितरण किया, वैसे ही उन्होंने सम्पूर्ण दक्षिण-भारतका भ्रमण करते हुए किया था॥110-112॥

अनुभाष्य— श्रीकृष्णचैतन्यकी अलौकिक लीला— छलरहित, निरस्तकुहक अर्थात् माया और मायाकी कपटतासे मुक्त, अप्राकृत चिदैश्वर्यमयी—जीवोंके नित्य चरम कल्याणको प्रदान करनेवाली है, इसलिये वह वास्तव वस्तु है। वह मायाबद्ध वञ्चक और वञ्चित जीवोंकी गुणमय-धारणासे उत्पन्न ईर्ष्यामूलक कपटता नहीं है। कपटता या ठगीके द्वारा, वञ्चक और वञ्चित दोनोंका ही श्रीकृष्णसेवासे दूर होनेके फलस्वरूप सर्वनाश होता है॥111॥

श्रीकूर्म स्थानमें जाना और विग्रह-दर्शनकर नृत्य-गीत :— एइमत याइते याइते गेला कूर्मस्थाने। कूर्म देखि' कैल ताँरे स्तवन-प्रणामे॥113॥

अनुवाद— इस प्रकार चलते-चलते महाप्रभु कूर्मस्थानमें पहुँचे। उन्होंने कूर्मदेवके दर्शन करके उन्हें प्रणाम करके उनकी स्तव-स्तुति की॥113॥

अमृतप्रवाह भाष्य— 'कूर्मस्थान'—यह एक तीर्थ है। वहाँ कूर्मदेवका मन्दिर है। 'प्रपन्नामृत'-ग्रन्थमें कहा गया है कि श्रीजगन्नाथदेवने श्रीरामानुज-स्वामीको रात्रिमें श्रीपुरुषोत्तमसे कूर्मतीर्थमें उठाकर फेंक दिया था॥113॥

अनुभाष्य— 'कूर्मस्थान'—गञ्जाम जिलेमें 'चिकाकोल रोड़' स्टेशनसे आठ मील पूर्वकी ओर 'कूर्माचल' अथवा 'श्रीकूर्मम्' हैं; यह तेलगु भाषी लोगोंका सबसे श्रेष्ठ तीर्थ है ('गञ्जाम म्यानुयेल')। वहाँ कूर्ममूर्ति विराजमान है। श्रीरामानुजाचार्य ग्यारहवीं शक-शताब्दीमें जब श्रीजगन्नाथदेवके द्वारा कूर्माचलमें फेंके गये, तब उस कूर्ममूर्तिको शिवमूर्त्ति समझकर उन्होंने उपवास किया, बादमें उसे विष्णु-मूर्ति जानकर उन्होंने कूर्मदेवकी सेवाका प्रकाश किया। जैसा, प्रपन्नामृतके छत्तीसवें अध्यायमें लिखा है—

“तद्रात्रावेव योगीन्द्रं प्रापयामास सत्वरम्। श्रीकूर्मे लक्ष्मणाचार्यं श्रीहरिर्योगमायया॥ प्रभातायां तु शर्वय्यां तस्यां लक्ष्मणदेशिकः। उत्थाय सहसा धीमान् हरिर्हरिरितीरयन्॥ दृष्ट्वा दशदिशः सम्यक् चिन्ता-व्याकुलमानसः। श्रीकूर्ममिति तत्क्षेत्रं ज्ञात्वा विस्मयमागतः। श्रीकूर्मनायकं मत्वा शिवलिङ्गमितीरितम्। उपवासेन तत्रैकं वासरं स्थितवान् गुरुः॥xx स्वप्ने प्रसन्नो भगवान् तस्य श्रीकूर्मनाथकः। व्याजहार शुभं वाक्यं कृपया यति-भूपतिम्॥ यतीन्द्राज्ञान-दोषेण शिवलिङ्गं जना इति। मां वदन्ति मृषा सर्वे मायान्धीकृतलोचनाः॥ वत्स्याम्यत्र स्वरूपेण शङ्खचक्रगदाधरः। लक्ष्मणार्याधुना शीघ्रं त्वं मां सम्यग् विलोकय॥xx अत्रैव पूजयन् मां त्वं दिनानि कतिचिद् वस॥ ततः स्वप्नात् समुत्थाय सन्तुष्टो विस्मयान्वितः। तथा विधाय योगीन्द्रस्तेनोक्तेनैव वर्त्मना॥ कूर्मनाथं समाराध्य तन्निवेदित-भोजनम्। विधाय तस्य पादाग्रे सुखं तत्रावसत्तदा॥ तदा प्रभृति सर्वत्र यतीन्द्रागम-वैभवात्। विष्णुस्थलमिति ख्यासीत् श्रीकूर्मं विदितं महत्॥”

अर्थात् “उसी रात्रिमें ही श्रीहरिने योगमायाके द्वारा योगीन्द्र श्रीलक्ष्मणाचार्य (श्रीरामानुजाचार्य) को श्रीकूर्मक्षेत्रमें स्थानान्तर करवाया। उस रात्रिके बाद प्रभात होनेपर श्रीमान् लक्ष्मणदेशिक (श्रीरामानुजाचार्य) 'हरि' 'हरि' बोलते-बोलते सहसा जाग्रत होकर दसों दिशाओंमें देखते हुए विशेष चिन्तित और व्याकुल हुए। उस स्थानको 'कूर्मक्षेत्र' जानकर वे विस्मित हुए। भगवान् श्रीकूर्मको (श्रीमूर्तिको) वहाँके लोगोंकी मान्यताके अनुसार 'शिवलिङ्ग' मानकर गुरु लक्ष्मणदेशिकने उस स्थानपर एक दिन उपवास किया। क्षेत्रनाथ भगवान् श्रीकूर्मने उनके प्रति प्रसन्न होकर कृपापूर्वक यतिराजको स्वप्नमें मधुर-वाक्य बोले,—“यतीन्द्र! स्थानीय लोग सभी आँखें होते हुए भी अन्धेके समान मायाके द्वारा मुझे मिथ्या

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सातवाँ अध्याय 7/113-117 ] ही 'शिवलिङ्ग'- रूपमें कहते हैं। किन्तु इस स्थानपर मैं अपने 'शङ्ख-चक्र-गदाधर' रूपमें ही वास कर रहा हूँ। आर्य लक्ष्मण ! तुम शीघ्र ही मेरा दर्शन करो और इसी स्थानपर मेरी पूजा करते हुए कुछ दिन वास करो।" ऐसा सुनकर विस्मित और सन्तुष्ट हुए योगीराजने उठकर स्वप्नमें कहे गये उपायके अनुसार श्रीकृष्णनाथकी सभी प्रकारसे आराधना की और उनको निवेदित खाद्य-द्रव्यका भोजन किया। उन्होंने उस स्थानपर उनके चरणकमलोंके सान्निध्यमें सुखपूर्वक कुछ दिन वास किया। तबसे उक्त क्षेत्र यतीन्द्रके आगमनकी महिमाके प्रभावसे 'श्रीकूर्मक्षेत्र'-नामक विष्णुस्थल-रूपमें सर्वत्र विशेषरूपसे जाना जाता है।" बादमें यह मन्दिर श्रीमाध्व-मठकी देख-रेखमें विजयनगरके राजाके अधिकारमें था। उस मन्दिरमें एक पत्थरके पटलके ऊपर लिखित नौ श्लोक लिखे पाये गये हैं। ऐसा कहा जाता है कि श्रीमध्वसम्प्रदायकी गुरु-परम्परामें 1203 शकमें उस समयके गुरु श्रीनरहरि तीर्थके द्वारा वे लिखे गये हैं। उनका हिन्दी-अनुवाद इस प्रकार है- पहला श्लोक-पुण्यश्लोक श्रीपुरुषोत्तम यतिने अनेक विद्वानोंके उपदेष्टाके रूपमें जन्म ग्रहण किया। वे भगवान् विष्णुको बहुत प्रिय थे। दूसरा श्लोक-उनके उपदेशोंको समस्त जगत्में आदरपूर्वक ग्रहण किया गया था। सिंह जैसे हाथीको परास्त कर देता है, वैसे ही उन्होंने अपने सुसिद्धान्तपूर्ण युक्तियोंसे विवाद करनेवालोंके सभी तर्कोंको परास्त कर दिया था। तीसरा श्लोक-उन्होंने आनन्दतीर्थको दीक्षा प्रदान की। अपने द्वारा ग्रहण किये गये संन्यास-दण्डके द्वारा शासन करके व्यासके विपथगामी मूर्ख शिष्योंको वे सुपथपर लाये, अर्थात् उन्हें भी संन्यास प्रदान किया। चौथा श्लोक-उनकी कथाएँ विष्णुको विशेष प्रिय और वैकुण्ठसिद्धि-प्रदान करनेमें समर्थ थीं। पाँचवाँ श्लोक-उनकी भक्तिकी शिक्षाएँ मनुष्योंको भगवान् श्रीहरिके चरणकमलोंको प्रदान करनेमें समर्थ हैं। छठा श्लोक-नरहरितीर्थने उनसे ही दीक्षा ग्रहण की और नरहरितीर्थने कलिङ्ग प्रदेशपर राज्य किया। सातवाँ श्लोक-नरहरितीर्थने शबरोंके साथ युद्ध करके श्रीकूर्म-मन्दिरकी रक्षाकी। आठवाँ श्लोक-नरहरितीर्थ बहुत धार्मिक और शक्तिशाली राजा थे। नौवाँ श्लोक-श्रीमन्दिरके निर्माण और उसे समस्त कल्याणदाता योगानन्द नृसिंहदेवको समर्पित करनेके बाद शुभ 1203 शकके वैशाख मासकी शुक्लपक्षीय एकादशी तिथिपर बुधवारको उन्होंने कामतदेवके सम्मुख आनन्दपूर्वक देह-त्याग किया था। (अध्यापक किल्हूर्णके अनुसार वह दिन) शनिवार 29 मार्च, 1281 ईसवी था॥ 113 ॥ महाप्रभुके नृत्य-गीतके दर्शनसे लोगोंमें चमत्कार :- प्रेमावेशे हासि' कान्दि' नृत्य-गीत कैल। देखि' सर्व लोकेर चित्ते चमत्कार हैल ॥ 114 ॥ आश्चर्य शुनिया लोक आइल देखिবারে। प्रभुर रूप-प्रेम देखि' हैला चमत्कारे ॥ 115 ॥ अनुवाद-कूर्मदेवके दर्शनकर प्रेममें आविष्ट होकर महाप्रभुने कभी हँसते, तो कभी रोते हुए नृत्य-गान किया। जिसे देखकर सब लोगोंके हृदयमें चमत्कार हुआ। इस आश्चर्यको सुनकर बहुतसे लोग महाप्रभुके दर्शन करनेके लिये आये और महाप्रभुके मनमोहक रूप और अद्भुत श्रीकृष्णप्रेमको देखकर वे भी चमत्कृत हो गये॥ 114-115 ॥ महाप्रभुके दर्शनोंसे लोगोंको वैष्णवताकी प्राप्ति :- दर्शने 'वैष्णव' हैल, बले 'कृष्ण' 'हरि'। प्रेमावेशे नाचे लोक ऊर्ध्वबाहु करि' ॥ 116 ॥ उन्हीं लोगोंके द्वारा उस देशका उद्धार :- कृष्णनाम लोकमुखे शुनि' अविराम। सेइ लोक 'वैष्णव' कैल अन्य सब ग्राम ॥ 117 ॥ । 225

[ 7/116–129 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

इस प्रकार समस्त देशका उद्धार :- एइमत परम्पराय देश 'वैष्णव' हैल। कृष्णनामामृत-वन्याय देश भासाइल॥ 118 ॥ अनुवाद—महाप्रभुका दर्शनकर लोग वैष्णव बन गये। वे भी 'कृष्ण' 'हरि' नामका कीर्तन करते-करते प्रेमाविष्ट होकर अपनी भुजाओंको ऊपर उठाकर नृत्य करने लगे। इन लोगोंके मुखसे निरन्तर श्रीकृष्णनामको सुननेवाले व्यक्ति भी 'वैष्णव' बन गये। वे भी अपने गाँवमें जाकर कीर्तन करने लगे और उनके मुखसे नाम सुनकर अन्यान्य सब गाँवके लोगोंको भी वैष्णव बन गये। इस प्रकार परम्परासे सम्पूर्ण दक्षिण भारत 'वैष्णव' हो गया और श्रीकृष्णनामरूपी अमृतकी बाढ़में सारा दक्षिण भारत डूब गया॥ 116-118॥ विग्रहके सेवकोंके द्वारा महाप्रभुका सम्मान :- कतक्षणे प्रभु यदि बाह्य प्रकाशिला। कूर्मेर सेवक बहु सम्मान करिला॥ 119 ॥ अनुवाद—कुछ समयके बाद जब महाप्रभुने अपनी बाहरी चेतनाको प्रकाशित किया, तब श्रीकूर्मदेवके सेवकोंने उनका बहुत सम्मान किया॥ 119 ॥ सभी ग्रामोंमें जाकर महाप्रभुके द्वारा लोगोंका उद्धार :- येइ ग्रामे याय ताँहा एइ व्यवहार। एक ठाञि कहिल, ना कहिब आर बार॥ 120 ॥ अनुवाद—महाप्रभु जिस-जिस गाँवमें जाते, वहाँ भी ऐसा ही होता। (ग्रन्थकार कविराज गोस्वामी कह रहे हैं—) एकबार मैंने इसका वर्णन किया है, अब इसे बार-बार नहीं कहूँगा॥ 120 ॥ 'कूर्म' नामक ब्राह्मणके द्वारा महाप्रभुकी पूजा :- 'कूर्म'-नामे सेइ ग्रामे वैदिक ब्राह्मण। बहु श्रद्धा-भक्त्ये कैल प्रभुर निमन्त्रण॥ 121 ॥ घरे आनि' प्रभुर कैल पाद-प्रक्षालन। सेइ जल वंश-सहित करिल भक्षण॥ 122 ॥ अनेकप्रकार स्नेहे भिक्षा कराइल। गोसाञिर प्रसादान्न सवंशे खाइल॥ 123 ॥ “येइ पादपद्म तोमार ब्रह्मा ध्यान करे। सेइ पादपद्म साक्षात् आइल मोर घरे॥ 124 ॥ मोर भाग्येरे सीमा ना याय कहन। आजि मोर श्लाघ्य हैल जन्म-कुल-धन॥ 125 ॥ महाप्रभुके साथ जानेकी कूर्म ब्राह्मणकी प्रार्थना :- कृपा कर, प्रभु, मोरे, याङ तोमा-सङ्गे। सहिते नारिमु तोमार विरह-तरङ्गे॥" 126 ॥ अनुवाद—कूर्म-नामक एक वैदिक ब्राह्मण उस गाँवमें रहते थे, उन्होंने बहुत श्रद्धा और भक्तिसे महाप्रभुको अपने घरपर निमन्त्रित किया। महाप्रभुको अपने घरमें लाकर उन ब्राह्मणने उनके श्रीचरणोंको धोया और उस चरणामृतका उसने अपने परिवार सहित पान किया। उन ब्राह्मणने बहुत स्नेहसे महाप्रभुको अनेक प्रकारका भोजन कराया और बादमें महाप्रभुके उच्छिष्ट प्रसादको अपने परिवार सहित ग्रहण किया। महाप्रभुकी वन्दना करते हुए वे ब्राह्मण कहने लगे,— “आपके जिन श्रीचरणकमलोंका ब्रह्मा ध्यान करते हैं, वे श्रीचरणकमल आज साक्षात् मेरे घरमें आये हैं। मेरे भाग्यकी सीमा कही नहीं जा सकती। आज मेरा जन्म, कुल और धन, सब कुछ धन्य हो गया है। हे प्रभो! कृपा करके आप मुझे अपने साथ ले चलिये। मैं आपके विरहके तापको सहन नहीं कर पाऊँगा॥” 121-126 ॥ महाप्रभुके द्वारा सभीको ही आचार्यरूपसे कृष्णनाम-भक्ति प्रचार करनेका आदेश :- प्रभु कहे,—“ऐछे बात् कभु ना कहिबा। गृहे रहि' कृष्णनाम निरन्तर लैबा॥ 127 ॥ यारे देख, तारे कह 'कृष्ण'-उपदेश। आमार आज्ञाय गुरु हञा तार' एइ देश॥ 128 ॥ कभु ना बाधिबे तोमार विषय-तरङ्ग। पुनरपि एइ ठाञि पाबे मोर सङ्ग॥” 129 ॥

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सातवाँ अध्याय 7/127–135 ] अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुने कहा,—“ऐसी बात कभी नहीं कहना। घरमें रहकर ही निरन्तर श्रीकृष्णनाम करो। जिसे देखो, उसे ही श्रीकृष्णनाम करनेका उपदेश दो। मेरी आज्ञासे गुरु बनकर तुम इस देशका उद्धार करो। घरमें रहते हुए भी सांसारिक विषय कभी तुम्हारी भक्तिमें बाधा नहीं देंगे और यहीं तुम्हें पुनः मेरा सङ्ग प्राप्त होगा॥” 127–129 ॥ एइ मत याँर घरे करे प्रभु भिक्षा। सेइ ऐछे कहे, ताँरे कराय एइ शिक्षा॥ 130 ॥ अनुवाद—इस प्रकार जिसके घरमें महाप्रभु भिक्षा ग्रहण करते, वह भी इसी प्रकार कहता और महाप्रभु उसे भी यही शिक्षा देते॥ 130 ॥ अनुभाष्य—जिन्होंने अपना सर्वस्व त्यागकर एकान्तिक रूपसे श्रीमन्महाप्रभुका आश्रय लेकर सेवा करनेका सङ्कल्प किया है, भगवान् श्रीगौरसुन्दरने उनके भजनको स्वीकार करके यह शिक्षा दी है— “अपनेमें गृहत्यागियोंके जैसे ‘श्रेष्ठ भजनपरायण’ होनेका अभिमान त्यागकर गृहवासरूपी दीनताके साथ निरन्तर श्रीकृष्णनाम कीर्तन करते हुए शुद्धकृष्णनाम- भजनका प्रचार करो। ‘मैं सर्वोत्तम वैष्णव हूँ, शिष्य करनेसे मेरा भजन नष्ट हो जायेगा’—ऐसा बड़े भक्त होनेका अभिमान त्यागकर दीनतापूर्वक शुद्धनाम-ग्रहणका आचरण और शुद्धनाम-प्रचाररूपी गुरुका कार्य करनेसे जड़-प्रतिष्ठारूपी विषय-तरङ्ग प्रबल नहीं हो पाती। श्रीरूप, श्रीसनातन, श्रीजीव और श्रीरघुनाथदास आदि पार्षद-महात्माओंने ग्रन्थ लिखकर लोगोंको उपदेश दिया तथा श्रीमन् नरोत्तम, श्रीमध्व-रामानुज आदिने बहुतसे शिष्योंको ग्रहण किया। अनेक मूर्ख लोग उनके ऐसे कार्यको भक्तिके अङ्गोंका बाधक और विषय-तरङ्ग समझनेकी कल्पना करके वास्तविक अकिञ्चन भक्तोंके चरणोंमें अपराधी होते हैं। जगद्गुरु आचार्यके रूपमें श्रीगौराङ्गने यह शिक्षा इसलिये प्रदान की है कि वे गृहस्थ भक्त भलीभाँति विचार करके अपने मिथ्या दीन-अभिमानको परित्याग कर दें और हरि-विमुख व्यक्तियोंके प्रति प्रतिशोधकी भावना भी नहीं रखें, इस प्रकार महाप्रभुके आनुगत्यमें अपने भजनकी वृद्धि करें॥ 130 ॥ पुरीमें लौटने तक महाप्रभुके द्वारा सभीको आचार्यरूपमें भक्ति-प्रचार करनेका आदेश :– पथे याइते देवालये रहे येइ ग्रामे। याँर घरे भिक्षा करे, सेइ महाजने॥ 131 ॥ कूर्मे यैछे रीति, तैछे कैल सर्वठानि। नीलाचले पुनः यावत् ना आइला गोसाञि॥ 132 ॥ अतएव इँहा कहिलाङ करिया विस्तार। एइमत जानिबे प्रभुर सर्वत्र व्यवहार॥ 133 ॥ अनुवाद—मार्गमें जाते हुए महाप्रभु जिस गाँवके देवालयमें रहते वहाँ प्रेमावेशमें नृत्य-गान करते तथा जिसके घरमें भिक्षा ग्रहण करते, उस महाजनको, कूर्म ब्राह्मणकी भाँति ही उपदेश प्रदान करते। नीलाचल लौटकर आने तक उन्होंने सर्वत्र यही उपदेश दिया। इसलिये मैंने कूर्म ब्राह्मणकी कथाको विस्तारपूर्वक कहा है। ऐसा ही समझो कि महाप्रभुने भ्रमण करते समय सर्वत्र ऐसा ही किया था॥ 131–133 ॥ उस रात कूर्मगृहमें वास :– एइमत सेइ रात्रि ताँहाइ रहिला। प्रातःकाले प्रभु स्नान करिया चलिला॥ 134 ॥ प्रातःकाल फिरसे यात्रा :– प्रभुर अनुव्रजि’ कूर्म बहु दूर आइला। प्रभु ताँरे यत्न करि’ घरे पाठाइला॥ 135 ॥ अनुवाद—इस प्रकार उस रात महाप्रभु वहीं रहे और अगले दिन प्रातःकालमें स्नान करके वे वहाँसे चल दिये। कूर्म ब्राह्मण बहुत दूर तक महाप्रभुके पीछे-पीछे आये। अन्तमें महाप्रभुने उन्हें बहुत समझा-बुझाकर घर वापिस भेजा॥ 134–135 ॥ । 227

[ 7/136-146 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला कुष्ठरोगी वासुदेव-ब्राह्मणका महाप्रभुके दर्शनोंके लिये कूर्म्मब्राह्मणके गृहमें आगमन :- 'वासुदेव'-नाम एक द्विज महाशय। सर्वाङ्गे गलित कुष्ठ, ताते कीड़ामय ॥ 136 ॥ अङ्ग हैते येइ कीड़ा खसिया पड़य। उठाञा सेइ कीड़ा राखे सेइ ठाञ ॥ 137 ॥ रात्रिते शुनिला तेंहो गोसाञिर आगमन। देखिबारे आइला प्रभाते कूर्मेर भवन ॥ 138 ॥ अनुवाद—कूर्म्म स्थानमें एक ब्राह्मण थे जिनका नाम वासुदेव था, वे बड़े महात्मा थे, परन्तु उनके शरीरमें कोढ़का रोग था। रोगसे उनके अङ्ग गल रहे थे और उनमें भी कीड़े पड़ गये थे। यदि उनके किसी अङ्गसे कोई कीड़ा नीचे गिर जाता, तो वे उसे उठाकर फिर अपने उसी अङ्गमें रख देते। रात्रिमें उन्होंने महाप्रभुके आगमनके बारेमें सुना, सुबह होते ही वे कूर्म्म ब्राह्मणके घर महाप्रभुके दर्शन करने आये॥ 136-138॥ महाप्रभुके कूर्म्मक्षेत्रसे चले जानेकी बातको सुनकर वासुदेवको दुःख और विलापके कारण महाप्रभुका वहाँ आविर्भाव :- प्रभुर गमन कूर्म्म-मुखेते शुनिञा। भूमिते पड़िला दुःखे मूर्च्छित हञा ॥ 139 ॥ अनेकप्रकार विलाप करिते लागिला। सेइक्षणे आसि' प्रभु ताँरे आलिङ्गिला ॥ 140 ॥ महाप्रभुका उनको आलिङ्गन-दान, उसके फलस्वरूप ब्राह्मणकी कुष्ठरोगसे मुक्ति और सौन्दर्य-प्राप्ति :- प्रभु-स्पर्शे दुःख-सङ्गे कुष्ठ दूरे गेल। आनन्द सहित अङ्ग सुन्दर हइल ॥ 141 ॥ अनुवाद—कूर्म्म ब्राह्मणके मुखसे महाप्रभुके चले जानेकी बात सुनकर वे दुःखसे मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़े। फिर चेतना लौटनेपर वे बहुत प्रकारसे विलाप करने लगे। तभी महाप्रभुने वहाँ आकर उनका आलिङ्गन किया। महाप्रभुका स्पर्श पाते ही उनके दुःखके साथ-साथ उनका कोढ़का रोग भी दूर हो गया। उनके सभी अङ्ग सुन्दर हो गये और उनके हृदयमें आनन्दका सञ्चार हुआ॥ 139-141॥ महाप्रभुकी दयाका दर्शनकर वासुदेवका स्तव :- प्रभुर कृपा देखि' ताँर विस्मय हैल मन। श्लोक पड़ि' पाये धरि', करये स्तवन ॥ 142 ॥ अनुवाद—महाप्रभुकी ऐसी कृपाको देखकर उनके मनमें बहुत आश्चर्य हुआ और वे उनके चरणकमलोंको पकड़कर एक श्लोकके द्वारा उनका स्तव करने लगे॥ 142॥ श्रीमद्भागवत (10/81/16) :- क्वाहं दरिद्रः पापीयान् क्व कृष्णः श्रीनिकेतनः। ब्रह्मबन्धुरिति स्माहं बाहुभ्यां परिरम्भितः ॥ 143 ॥ अनुवाद—(सुदामाजीके वचन—) कहाँ मैं अति पापी दरिद्र, कहाँ श्रीनिकेतन (लक्ष्मीके निवासस्थान) श्रीकृष्ण! उन्होंने मुझे अयोग्य ब्राह्मण-पुत्र जानकर मेरा आलिङ्गन किया,—यह अति आश्चर्यका विषय है॥ 143॥ अनुभाष्य—आदिलीला 17/78 संख्या देखें॥ 143॥ बहु स्तुति करि' कहे, —"शुन, दयामय। जीवे एइ गुण नाहि, तोमाते एइ हय ॥ 144 ॥ मोरे देखि' मोर गन्धे पलाय पामर। हेन-मोरे स्पर्श' तुमि,—स्वतन्त्र ईश्वर ॥ 145 ॥ किन्तु आछिलाङ भाल अधम हञा। एबे अहङ्कार मोर जन्मिबे आसिया ॥" 146 ॥ अनुवाद—वासुदेव ब्राह्मणने महाप्रभुकी बहुत स्तुति की और फिर कहने लगे,—"सुनो हे दयामय! जीवोंमें ऐसी कृपाका गुण नहीं हो सकता, जो आपमें है। मुझे देखकर, मेरे शरीरकी दुर्गन्धसे अत्यन्त पापी व्यक्ति भी मुझसे दूर भागते हैं और आपने मेरे जैसे व्यक्तिको स्पर्श किया—आप स्वतन्त्र ईश्वर हैं। किन्तु मैं उस 228 ।

सातवाँ अध्याय 7/144-154 ] अधम अवस्थामें ही अच्छा था, क्योंकि अब मुझमें सुन्दर शरीरका अभिमान आ जायेगा॥"144-146 ॥ महाप्रभुके द्वारा वासुदेवको आचार्य होकर श्रीकृष्णनामका उपदेश करते हुए जीवोंके उद्धार करनेका आदेश :— प्रभु कहे,—"कभु तोमार ना हबे अभिमान। निरन्तर कह तुमि 'कृष्ण' 'कृष्ण' नाम ॥ 147 ॥ कृष्ण उपदेशि' कर जीवेर निस्तार। अचिराते कृष्ण तोमा करिबेन अङ्गीकार ॥"148 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—"तुम निरन्तर 'कृष्ण' 'कृष्ण' नामका कीर्तन करना, तब तुम्हें कभी भी अभिमान नहीं होगा। सभी जीवोंको श्रीकृष्णनामका उपदेश देकर उनका उद्धार करना, श्रीकृष्ण तुम्हें शीघ्र ही अङ्गीकार करेंगे॥"147-148 ॥ महाप्रभुकी कृपाको स्मरण करके कूर्म और वासुदेवका क्रन्दन :— एतेक कहिया प्रभु कैल अन्तर्धाने। दुइ विप्र गलागलि कान्दे प्रभुर गुणे ॥ 149 ॥ अनुवाद—इतना कहकर महाप्रभु वहाँसे अन्तर्धान हो गये। तब कूर्म एवं वासुदेव ब्राह्मण परस्पर आलिङ्गन करके महाप्रभुके गुणोंका गान करते हुए रोने लगे॥ 149 ॥ इस आख्यानका नाम—वासुदेवका उद्धार, महाप्रभुका नाम—'वासुदेवामृतप्रद' :— 'वासुदेवोद्धार' एइ कहिल आख्यान। 'वासुदेवामृतप्रद' हैल प्रभुर नाम ॥ 150 ॥ एइ त' कहिल प्रभुर प्रथम आगमन। कूर्म-दरशन, वासुदेव-विमोचन ॥ 151 ॥ चैतन्यलीला-श्रवण करनेसे अचैतन्य-सेवकको चैतन्यकी प्राप्ति :— श्रद्धा करि' एइ लीला ये करे श्रवण। अचिराते मिलये तारे चैतन्य-चरण ॥ 152 ॥ अनुवाद—इस प्रकार मैंने (ग्रन्थकारने) 'वासुदेव- उद्धार' नामक कथाका वर्णन किया है और इस कारण महाप्रभुका एक नाम 'वासुदेवामृतप्रद' हो गया। यह मैंने महाप्रभुके द्वारा प्रथम यात्राके समय किये गये श्रीकृष्णदेवके दर्शन और वासुदेवके उद्धारका वर्णन किया। जो श्रद्धापूर्वक महाप्रभुकी इन लीलाओंका श्रवण करता है, उसे शीघ्र ही श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंकी प्राप्ति होती है॥ 150-152 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीसार्वभौम-कृत महाप्रभुके सौ नामोंमें यह नाम भी है॥ 150 ॥ सातवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुभाष्य—'एइ लीला'—श्रीकृष्णचैतन्यके द्वारा भक्तिहीन जीवोंको भक्ति दिये जानेपर वे सब श्रीकृष्ण-सेवोन्मुख जीव, पुनः आचार्यके रूपमें अन्य भक्तिहीन जीवोंको भक्ति प्रदान करके उन्हें श्रीकृष्णसेवाोन्मुख कराते रहते हैं। इस प्रकार अच्युत-गोत्रकी वृद्धि अर्थात् श्रौत-पन्था प्रसारके द्वारा यह श्रीगौरसुन्दरकी अवतारवाद-माहात्म्य- प्रदर्शन-लीला है॥ 152 ॥ सातवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। गुरुमुखसे श्रवणके फलस्वरूप अथवा श्रौतपन्थासे ही श्रीचैतन्य-सेवा :— चैतन्यलीलार आदि-अन्त नाहि जानि। सेइ लिखि, येइ महान्तेर मुखे शुनि ॥ 153 ॥ शुद्धभक्तके चरणोंमें शरणागति ही श्रीचैतन्यकी प्राप्तिका उपाय :— इथे अपराध मोर ना लइओ, भक्तगण। तोमा-सबार चरण—मोर एकान्त शरण ॥ 154 ॥ अनुवाद—मैं श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाके आदि-अन्तको नहीं जानता हूँ। मैं तो केवल वही लिख रहा हूँ, जो मैंने महाजनोंके मुखसे श्रवण किया है। इसलिये हे भक्तों! मेरा अपराध मत लेना, आप सभीके चरणकमल ही मेरा एकमात्र आश्रय हैं॥ 153-154॥ । 229

[ 7/155 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 155 ॥ कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस चैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 155 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे दक्षिणयात्रायां 'वासुदेवोद्धारो' नाम सप्तम-परिच्छेदः। श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डके अन्तर्गत दक्षिणयात्रामें 'वासुदेव-उद्धार' नामक सातवाँ अध्याय समाप्त। 230 ।

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आठवाँ अध्याय कथासार-महाप्रभु जियड़-नृसिंहके दर्शन करके गोदावरीके तटपर विद्यानगरमें स्नान करनेके लिये आये। वहाँ उन्होंने श्रीराय रामानन्दके साथ भेंट की। परिचय होनेपर श्रीरामानन्दने उन्हें उसी गाँवमें कुछेक दिन रहनेके लिये अनुरोध किया। उनके अनुरोधपर महाप्रभु किसी वैदिक-वैष्णव-ब्राह्मणके घरमें रहे। सन्ध्याके समय जब श्रीरामानन्द-रायने दीनवेशमें महाप्रभुके निकट आकर दण्डवत् प्रणाम किया, तब महाप्रभुने उन्हें साध्य-निर्णयके लिये श्लोक पढ़नेकी आज्ञा दी। श्रीरामानन्द-रायने सबसे पहले वर्णाश्रमधर्मरूपी सज्जनोंके सामान्य धर्मका उल्लेख करके 'कर्मार्पण', बादमें 'आसक्तिशून्य कर्म', उसके बाद 'ज्ञानमिश्राभक्ति' और अन्तमें 'ज्ञानशून्य शुद्ध-भक्ति'के सम्बन्धमें जब कुछेक श्लोकोंका पाठ किया, तब महाप्रभुने आखिरी (ज्ञानशून्य शुद्ध-भक्ति) को 'साध्यवस्तु'के रूपमें स्वीकार किया। फिर भक्तिके सम्बन्धमें (महाप्रभुने श्रीराय रामानन्दको) उच्च अधिकारका वर्णन करनेके लिये कहा। तब श्रीरायने पहले 'शुद्धा कृष्णरतिरूपा प्रेमभक्ति', उसके बादमें 'दास्यप्रेम', उसके बाद 'सख्यप्रेम' और फिर 'वात्सल्यप्रेम' एवं (अन्तमें) 'कान्तभावगत प्रेम'को 'साध्यसार' कहकर वर्णन किया। कान्तप्रेम, किस प्रकारसे साध्यसार होता है, उसे भी श्रीरायने विविध रूपमें कहा। महाप्रभुने जब उसे साध्यकी सीमाके रूपमें स्वीकार किया, तब श्रीरायके द्वारा राधिकाका प्रेम वर्णित हुआ। बादमें श्रीरायने श्रीकृष्णके स्वरूप, श्रीराधाके स्वरूप, रसत्तत्त्वके स्वरूप और प्रेमतत्त्वका वर्णन किया। उसके बाद महाप्रभुके द्वारा जिज्ञासा करनेपर, श्रीरामानन्द-रायने प्रेमविलास-विवर्तरूप विप्रलम्भगत- अधिरूढ़-भावमय स्वरचित एक गीत बोला। अन्तमें, उन्होंने श्रीराधा-कृष्णकी प्रेमसेवारूपी परम साध्यवस्तुको प्राप्त करनेके उपायस्वरूप ब्रजसखियोंके आनुगत्यका विशेषरूपसे विवरण प्रदान किया। कुछ दिनों तक प्रत्येक रात्रिमें अनेक प्रकारसे श्रीकृष्णकथा करनेके बाद, महाप्रभुके मूलतत्त्व और उनके स्वरूपको देखकर श्रीरामानन्द मूर्च्छित हो गये। कुछ दिनों बाद श्रीरामानन्दको राजकार्य परित्याग करके पुरुषोत्तम जानेकी आज्ञा देकर महाप्रभुने दक्षिणकी यात्रा की। यह समस्त विवरण श्रीकविराज गोस्वामीने श्रीस्वरूप दामोदरके कड़चाके अनुसार लिखा है। -(अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीरामानन्दके द्वारा महाप्रभुका निज भक्तिसिद्धान्त-प्रचार :- सञ्चार्य रामाभिध-भक्तमेघे स्वभक्तिसिद्धान्तचयामृतानि। गौराब्धिरेतैरमुना वितीर्णै- स्तज्ज्ञत्व-रत्नालयतां प्रयाति ॥ 1 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥1॥ अमृतप्रवाह भाष्य-सिद्धान्तामृत-समुद्ररूप श्रीगौराङ्गने श्रीरामानन्द-नामक भक्तमेघमें स्वभक्ति-सिद्धान्तामृतका सञ्चार करके, उनके द्वारा विस्तृत किये गये उन भक्तिसिद्धान्तोंके द्वारा पुनः स्वयं भक्तितत्त्वज्ञता-रूपी समुद्रता प्राप्त की॥1॥ अनुभष्य- गौराब्धिः (श्रीगौराङ्गः एव अब्धिः सिद्धान्तामृतसमुद्रः) रामाभिध-भक्तमेघे (रामानन्द-नामा एव सिद्धान्तामृतवर्षकः मेघः, तस्मिन्) स्वभक्तिसिद्धान्तचयामृतानि सञ्चार्य अमुना (रामानन्द-मेघेन) एतैः (स्वभक्तिसिद्धान्तारमृतैः) वितीर्णैः (व्याप्तैः निविष्ठैः) तज्ज्ञत्व-रत्नालयतां (तानि सिद्धान्तामृतानि जानाति यः सः एव तज्ज्ञः, तस्य भावः तज्ज्ञत्वम् एव रत्नं, तस्य आलयतां सिद्धान्तामृताभिज्ञत्वरूपसमुद्रतां) प्रयाति (प्राप्नोति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥1॥ अमृताणुकणिका-“श्रीराय रामानन्द संवाद अत्यन्त । 233

[ 8/1 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला गम्भीर तथा सिद्धान्तोंका रत्नालय है। इसमें महाप्रभु प्रश्न कर रहे हैं और श्रीरामानन्द उत्तर दे रहे हैं, किन्तु श्रीरामानन्दके हृदयमें उन सिद्धान्तोंका सञ्चारण महाप्रभु ही कर रहे हैं। भक्तिके जितने प्रकारके सिद्धान्त हैं, श्रीराधाभावद्युति सुवलित शचीनन्दन श्रीगौरहरि उनके समुद्र हैं। 'संचार्य'—अर्थात् सञ्चरित करके। जैसे—सूर्यकी किरणें जलको वाष्प रूपमें उड़ा देती हैं। तदनन्तर वह वाष्प मेघ रूप धारणकर वर्षाके रूपमें परिणत होकर पुनः समुद्रमें गिरता है। स्वाति नक्षत्रके संयोगसे वह जल समुद्रमें विद्यमान सीपमें गिरनेपर मोती या रत्न बन जाता है। उन अमूल्य रत्नोंको धारण करनेके कारण ही समुद्र 'रत्नालय' कहलाता है। यद्यपि समुद्रमें अवस्थित सीपमें रत्न बनानेकी क्षमता होती है, तथापि स्वाति नक्षत्रके संयोगसे वर्षाकी बूँद ही उसमें रत्न बननेका कारण होती है, समुद्रका जल नहीं। यहाँ श्रीगौरहरि ही भक्तिसिद्धान्त-रत्नालय हैं और श्रीरामानन्द हैं—मेघ। महाप्रभुने भक्ति-तत्त्वरूपी अमृत जलधाराओंके द्वारा अपनी दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर रसमयी, विशेषकर औपपत्य भावकी मेघ-मालाओंका अलक्षित रूपसे अपनी कृपाशक्तिके द्वारा श्रीरामानन्दके हृदयमें सञ्चार किया। श्रीरामानन्दकी भक्ति-सिद्धान्तोंकी व्याख्या ही स्वाति-नक्षत्रकी जलधारा है। इन जलधाराओंको महाप्रभुकी कर्णरूपी सीपके द्वारा ग्रहण किये जानेपर वे धाराएँ सिद्धान्त-रत्न बन गयीं और महाप्रभु सिद्धान्त- रत्नालय बन गये। ये रत्न महाप्रभुके हृदयमें उदित विभिन्न राधाभाव हैं। कृष्णभक्तिके दो आलम्बन हैं—विषय और आश्रय। श्रीकृष्ण प्रेमके विषय और भक्त प्रेमके आश्रय हैं। भक्त ही भक्तिका आधार होते हैं। श्रीकृष्ण प्रेमके विषय होनेके कारण आश्रय-जातीय भक्तिके विषयमें अनभिज्ञ हैं। आश्रय-जातीय भक्तोंमें श्रीराधा सर्वश्रेष्ठ हैं। श्रीराधामें समस्त रसपूर्ण भाव, श्रद्धासे लेकर मादनाख्य-महाभाव तक परिपूर्णतम रूपमें अवस्थित हैं। इन्हीं आश्रयजातीय भावोंका आस्वादन करनेके लिये श्रीकृष्ण श्रीराधाके भाव और अङ्गकान्ति लेकर शचीनन्दन श्रीगौरहरि हुए। परन्तु अनुभूतिके बिना केवल भावके द्वारा उसका आस्वादन सम्भव नहीं है। यद्यपि महाप्रभु समस्त प्रकारके तत्त्वज्ञान और रसकी सीमा हैं। परन्तु श्रीराधा इन भावोंके द्वारा किस प्रकार श्रीकृष्णकी सेवा करती हैं, उनको आनन्द प्रदान करती हैं और स्वयं जिस आनन्दका अनुभव करती हैं—महाप्रभु इस विज्ञानको नहीं जानते थे अर्थात् उन्हें उसका अनुभव नहीं था। यह आश्रय-विज्ञान उन्होंने श्रीरामानन्द अर्थात् विशाखा सखीसे प्राप्त किया। 'रामाभिध-भक्तमेघे'—यहाँ भक्तमेघ श्रीरायरामानन्द हैं। भक्तमात्र ही भक्ति-तत्त्वको धारण कर सकते हैं, अन्य किसीमें यह सामर्थ्य नहीं होता। श्रीरामानन्द चैतन्यलीलामें गौराङ्ग महाप्रभुके नित्य पार्षद हैं और व्रजलीलामें विशाखा सखी हैं। उनमें ही यह विशेष शक्ति है कि वे महाप्रभुके निज-विषयक भक्ति-सिद्धान्तोंको धारणकर पुनः उनकी वर्षा कर सके और इसके द्वारा महाप्रभुको श्रीराधाप्रेम और भावनाओंकी वैचित्रीके अनुभवरूपी अनिर्वचनीय चमत्कारिताका आस्वादन करवा पाये। 'स्वभक्तिसिद्धान्तचयामृतौघानि'—'स्व' अर्थात् श्रीकृष्ण विषयक भक्तिसिद्धान्तसमूह अर्थात् श्रीकृष्णकी भक्ति, विशेषकर सख्य, वात्सल्य, और मधुर (रसमयी भक्ति)। इन आश्रयजातीय भक्तोंकी श्रीकृष्णके प्रति सेवा-भावना या उच्चकोटिकी ममता और इनमें भी मधुर रसका वैशिष्ट्य—मञ्जरियोंकी सेवाकी परिपाटी ही अमृत है। “अनर्पितचरीं चिरात् करुणयावतीर्णः कलौ समर्पयितुमुन्नतोज्ज्वलरसां स्वभक्तिश्रियम्।” 'स्वभक्तिश्रियम्'—श्रीकृष्णकी सेवा-वासनाकी मूर्तिमान- स्वरूप श्रीराधा हैं और उनकी शोभा हैं—मञ्जरी-वृन्द। श्रीकृष्ण रसिक-शेखर हैं और साथ ही परम करुण भी हैं। अपनी अहैतुकी कृपासे श्रीकृष्णने महाप्रभुके रूपमें कलियुगमें अवतीर्ण होकर इस उन्नत उज्ज्वल रससे 234 ।

आठवाँ अध्याय 8/1-5 ] परिपूर्ण स्वभक्तिकी शोभा अर्थात् मञ्जरीभावको जगत्‌को प्रदान किया। इसके पूर्व किसीने इसे जगत्‌में प्रकाशित नहीं किया था। इसी आनुगत्यमयी, परतन्त्रमयी सेवामें जीवका सर्वोच्च अधिकार है। 'गौराब्धिरेतैरमुना वितीर्णैः'—गौराब्धि अर्थात् गौर-समुद्र। समुद्र जलका आधार है। महाप्रभु प्रेमके अनन्त और अगाध समुद्र हैं। परन्तु इस समुद्रमें खारापन नहीं है, अपितु यह अमृतको भी विनिन्दित करने वाला परमानन्द-स्वरूप, परमास्वादनीय और अत्यन्त लोभनीय है। इसमें साधारण समुद्रके समान व्हेल मछलियाँ और उनको भी खा जानेवाले तिमिङ्गिल आदि कर्म, ज्ञान, उपासनादि रूपी हिंसक जन्तु नहीं हैं, अपितु यह रसामृत तत्त्वसे परिपूर्ण है। इसमें भयङ्कर गर्जन नहीं, अपितु परमास्वादनीय, लोभनीय, चमत्कारपूर्ण संयोगात्मक-वियोगात्मक कल्लोल-हिल्लोलें उठती रहती हैं। इसमें 'सर्वात्मस्नपन' (आत्माके सम्पूर्ण स्नान) रूपी करुणाका आह्वान है, कल्लोल है, जो महाप्रभु इस जगत्‌को प्रदान करना चाहते हैं।”—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 1 ॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥ 2 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो और समस्त गौरभक्तवृन्दकी जय हो॥ 2 ॥ जियड़नृसिंहका दर्शन और नृत्य-स्तुति-गीत :— पूर्व-रीते प्रभु आगे गमन करिला। 'जियड़नृसिंह'-क्षेत्रे कतदिने गेला॥ 3॥ नृसिंह देखिया कैल दण्डवत्-प्रणति। प्रेमावेशे कैल बहु नृत्य-गीत-स्तुति ॥ 4 ॥ “श्रीनृसिंह, जय नृसिंह, जय जय नृसिंह। प्रह्लादेश जय पद्मामुखपद्मभृङ्ग॥” 5॥ अनुवाद—पहलेकी भाँति महाप्रभु सभीको वैष्णव बनाते हुए आगे चले। कुछ दिनोंमें वे 'जियड़ नृसिंह' क्षेत्रमें पहुँचे। श्रीनृसिंह भगवान्‌का दर्शन करके महाप्रभुने उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया। प्रेमके आवेशमें उन्होंने बहुत नृत्य, गीत और स्तुति कीं,—“श्रीनृसिंह, जय नृसिंह, जय जय नृसिंह। भक्त प्रह्लादके ईश्वरकी जय हो। श्रीलक्ष्मीके मुखकमलके भ्रमरकी जय हो॥” 3-5 ॥ अनुभाष्य—'जियड़ नृसिंहक्षेत्र'—भिजागापटम अथवा विशाखापत्तनसे पाँच मील उत्तरकी ओर 'सिंहाचलम्' नामक स्थान है। 'सिंहाचल'-नामसे रेल स्टेशन भी है। श्रीनृसिंहदेवका मन्दिर पर्वतकी चोटीपर है। भिजागापटममें यह मन्दिर सबसे अधिक प्रसिद्ध एवं समृद्धिसम्पन्न है तथा शिल्पकलाके श्रेष्ठ उदाहरणके रूपमें विराजमान है। एक पत्थरके पटलपर लिखा हुआ देखा जाता है कि राजा तृतीय 'गोङ्गा'की एक भक्त रानीने श्रीविग्रहको स्वर्णमण्डित करा दिया था—(भिजागापटम् गेजेटियार)। मन्दिरके निकट श्रीनृसिंहदेवके सेवकवृन्द और अन्यान्य स्थानीय लोग वास करते हैं। आजकल पर्वतके ऊपर यात्रियोंके ठहरनेके लिये श्रीमन्दिरसे लगी अनेक धर्मशालाएँ और बहुतसे घर हैं। विजय-मूर्ति प्रकाशमय स्थानपर और मूल श्रीनृसिंह-मूर्ति कक्षके अन्दर विराजमान है। कुछ रामानुजीय श्रीवैष्णवगण विजयनगर-राज्यके अधीन श्रीमूर्तिकी सेवा करते हैं। 'पद्मामुखपद्मभृङ्ग'—पद्मा अर्थात् अपने वक्षपर विलास करनेवाली लक्ष्मीदेवीके कान्त। भाः 1/1/1 एवं 10/87/1 श्लोककी टीकामें श्रीधर स्वामी द्वारा रचित श्लोक— “प्रह्लाद-हृदयाह्लादं भक्ताविद्या-विदारणम्। शरदिन्दुरुचिं वन्दे पारीन्द्रवदनं हरिम्॥” “वागीशा यस्य वदने लक्ष्मीर्र्यस्य च वक्षसि। यस्यास्ते हृदये सम्वित् तं नृसिंहमहं भजे॥” श्लोक-भावानुवाद—“प्रह्लादके हृदयको आनन्द प्रदान करनेवाले, भक्तोंकी अविद्याका नाश करनेवाले, शरत्कालीन पूर्ण चन्द्रमाकी कान्तिसे युक्त श्रीनृसिंहदेवकी मैं वन्दना करता हूँ।” “जिनके मुखमें वाणीकी स्वामिनी सरस्वती निवास । 235

[ 8/3-5 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला करती हैं, जिनके वक्षस्थलपर लक्ष्मी वास करती हैं और हृदयमें चेतनाकी दैवीशक्ति निवास करती हैं, उन श्रीनृसिंहदेवकी मैं वन्दना करता हूँ॥"३-५॥ अमृताणुकणिका- "'पूर्व्वरीते' अर्थात् (महाप्रभुने) यथापूर्व सबको अपने नृत्य-गीत और विचारोंसे वैष्णव बनाया। "एमन दयालु प्रभु नहे त्रिभुवने। कृष्णप्रेम जन्माय याँर दूर दरशने॥" अर्थात् “महाप्रभुके समान दयालु तीनों जगत्में कोई नहीं है, उनके दूरसे ही दर्शन करनेसे श्रीकृष्णप्रेम हृदयमें उत्पन्न हो जाता है।" यहाँ तक कि उन्होंने झारखण्डके जङ्गलोंमें बाघ- सिंह-भालू आदि हिंसक पशुओंको भी प्रेम प्रदान किया। महाप्रभुका आदेश है (मध्यलीला 7/128)- "यारे देख, तारे कह 'कृष्ण'-उपदेश। आमार आज्ञाय गुरु हञा तार' एइ देश॥" अर्थात् "जिसे देखो, उसे ही श्रीकृष्णनाम करनेका उपदेश दो। मेरी आज्ञासे गुरु बनकर तुम इस देशका उद्धार करो।" (अन्त्यलीला 4/102) में कहा है- "आपने आचारे केह, ना करे प्रचार। प्रचार करेन केह, ना करे आचार॥" अर्थात् “कोई व्यक्ति स्वयं तो आचरण करते हैं, किन्तु प्रचार नहीं करते तथा अन्य कोई व्यक्ति प्रचार तो करते हैं, किन्तु आचरण नहीं करते।" पहले स्वयं आचरण करके उसके बाद प्रचार भी अवश्य करना चाहिये। आचार और प्रचार-दोनों ही आवश्यक हैं। केवल प्रचार करना कर्मकाण्ड है, इसलिये प्रचारके साथ आचरण भी आवश्यक है। प्रचार भी भक्ति है। महाप्रभुके अनुगत श्रीरूप गोस्वामी-सनातन गोस्वामीसे लेकर शिष्य-परम्परामें श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती प्रभुपाद, हमारे गुरुदेव श्रीमद्भक्तिप्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज, श्रीभक्तिवेदान्त स्वामी महाराज आदि सभी आचार्योंने स्वयं आचरण किया और उसीका प्रचार भी किया। ऐसे भक्तोंका ही जीवन उच्च कोटिका है। इन्हींका सङ्ग करना चाहिये। जो संसारमें अनासक्त, निर्मल चरित्रवान्, भगवद्-कथामें निपुण, समस्त संशयोंका छेदन करने वाले हों-ऐसे वैष्णवोंके सङ्गमें उनसे हरिकथा सुननेपर हृदयमें भक्ति प्रकाशित होती है। महाप्रभुने सर्वत्र प्रेमका प्रचार करते हुए विशेष- विशेष लोगोंको 'अनर्पितचरीं चिरात्' का भाव भी दिया और अपने दर्शनसे लोगोंको प्रेम-रसमें निमग्न किया। महाप्रभु चलते हुए 'जियड़ नृसिंह' क्षेत्रमें पहुँचे। यहाँ श्रीनृसिंहदेवका मन्दिर एक पर्वतपर अवस्थित है। ऐसा कहा जाता है कि श्रीनृसिंहदेवके इन श्रीविग्रहने जियड़ नामक एक भक्तपर विशेष कृपा की थी, इसलिये वे 'जियड़ नृसिंह'के नामसे प्रसिद्ध हैं। महाप्रभुने श्रीनृसिंह भगवान्के दर्शन किये और अनेक प्रकारसे नृत्य-गीत-स्तुति आदि की। पूर्वपक्ष यहाँ प्रश्न उठाते हैं कि राधाभावमें आविष्ट महाप्रभु श्रीकृष्णके ही नाम, रूप, गुण, लीला आदिका आस्वादन करना चाहते हैं, परन्तु यहाँ श्रीनृसिंहका जयगान करके स्तुति कर रहे हैं और असाधारण रूपसे प्रेमाविष्ट हो रहे हैं। इसका उत्तर यह है कि श्रीनृसिंहदेव या भगवान्के सभी अवतार श्रीकृष्णसे भिन्न नहीं हैं, श्रीकृष्ण ही हैं। सभी अवतारोंमें एक-एक रस वैचित्री है। श्रीरामचन्द्रमें वात्सल्य और ऐश्वर्य मिश्रित सख्य भी है। उनकी लीला करुण-रससे परिपूर्ण है। श्रीजयदेव गोस्वामीने श्रीगीतगोविन्दमें दशावतार स्तोत्रमें श्रीकृष्णके प्रत्येक रसके अधिष्ठानरूप एक-एक अवतारका जयगान किया है। राधाभावद्युति सुवलित श्रीगौरहरि श्रीकृष्ण ही हैं। वे अखिलरसामृतमूर्ति अपने अन्दर अनन्त रस-वैचित्री धारण किये हुए हैं। ऐसा कोई भी रस नहीं है जिसका महाप्रभु आस्वादन नहीं कर सकते। श्रीनृसिंह प्रह्लादके ईश हैं और अपनी वक्ष-विलासिनी लक्ष्मीदेवी पद्माके मुखकमलका भृङ्गके समान आस्वादन करते हैं। श्रीराधा ही आंशिक रूपमें 236 ।

आठवाँ अध्याय ८/३-१३ ] पद्मा हैं। वे पद्माके रूपमें नृसिंहदेवकी सेवाका वैचित्र्य प्रकाशित कर रही हैं। उसके रसास्वादनकी अभिलाषा महाप्रभुके हृदयमें जाग्रत हो उठी। उसका ही तब महाप्रभुने आस्वादन किया। इस मनोरथके पूर्ण होनेपर वे नृत्य-कीर्तन करने लगे। दक्षिण भारतमें महाप्रभु मीनाक्षी देवी, कन्याकुमारी आदि अनेक देवालयोंमें गये। वहाँ भावावेशमें उन्होंने नृत्य किया। वे अन्य देवी-देवताओंको भगवान्‌के परिकरके रूपमें दर्शन करते थे और भावाविष्ट हो जाते थे।"—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी॥ ३-५॥ श्रीनृसिंह अभक्तोंके लिये कठोर और भक्तोंके लिये कोमल :— भागवत (७/९/१)-टीकामें श्रीधरस्वामि-उद्धृत आगमवचन— उग्रोऽप्यनुग्र एवायं स्वभक्तानां नृकेशरी। केशरीव स्वपोतानामन्येषामुग्रविक्रमः ॥ ६॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ ६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सिंह जिस प्रकार उग्र (हिंसक) होनेपर भी अपनी सन्तानके प्रति हिंसक नहीं होता, उसी प्रकार श्रीनृसिंहदेव हिरण्यकशिपु आदि असुरोंके प्रति उग्र होनेपर भी प्रह्लादादि अपने भक्तोंके प्रति स्नेहपूर्ण होते हैं॥ ६॥ अनुभाष्य— अन्येषां (स्वपाल्यशावकाभिन्नानां गज-व्याघ्रादीनां सम्बन्धे) उग्रविक्रमः (प्रचण्डपराक्रमः) स्वपोतानां (निजशावकानां सम्बन्धे) शान्तः केशरी (सिंह) इव अयं नृकेशरी (नृसिंहदेवः) उग्रं (प्रचण्डविक्रमः) अपि स्वभक्तानां (निजपाल्यदासानां सम्बन्धे) अनुग्रः (शान्तः कोमलः वत्सलः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ ६॥ एइमत नाना श्लोक पड़ि' स्तुति कैल। नृसिंह-सेवक माला-प्रसाद आनि' दिल॥ ७॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुने अनेक श्लोकोंके द्वारा श्रीनृसिंह भगवान्‌की स्तव-स्तुति की। श्रीनृसिंहदेवके सेवकने महाप्रभुके भाव देखकर उन्हें प्रसाद और माला लाकर दी॥ ७॥ सिंहचलमें रात्रिवास :— पूर्ववत् कोन विप्रे कैल निमन्त्रण। सेइ रात्रि ताँहा रहि' करिला गमन॥ ८॥ अनुवाद—पहलेकी भाँति किसी ब्राह्मणने आकर महाप्रभुको निमन्त्रण दिया। उस रात महाप्रभु वहीं रहे और अगले दिन वहाँसे गमन किया॥ ८॥ प्रातःकाल पुनः यात्रा :— प्रभाते उठिया चलिला प्रेमावेशे। दिग्विदिक् नाहि ज्ञान रात्रि-दिवसे॥ ९॥ अनुवाद—प्रभातमें उठकर महाप्रभु प्रेमावेशमें आगे चलने लगे। उन्हें न तो दिशा-विदिशाका और न ही रात-दिनका ज्ञान रहता था॥ ९॥ गोदावरीके तटपर आगमन और यमुनाकी उद्दीपन्ना :— पूर्ववत् 'वैष्णव' करि' सर्व लोकगणे। गोदावरी-तीरे प्रभु आइला कतदिने॥ १०॥ गोदावरी देखि' हइल 'यमुना'-स्मरण। तीरे वन देखि' स्मृति हैल वृन्दावन॥ ११॥ सेइ वने कतक्षण करि' नृत्य-गान। गोदावरी पार हञा ताँहा कैल स्नान॥ १२॥ घाट छाड़ि' कतदूरे जल-सन्निधाने। बसि' प्रभु करे कृष्णनाम-सङ्कीर्त्तने॥ १३॥ अनुवाद—पहलेकी भाँति सभी लोगोंको वैष्णव बनाते हुए महाप्रभु कुछ दिनों बाद गोदावरी नदीके तटपर पहुँचे। गोदावरीको देखकर उन्हें 'यमुना'का स्मरण हो आया और गोदावरीके तटपर स्थित वनको देखकर उन्हें श्रीवृन्दावनकी स्फूर्ति हो आयी। उन्होंने गोदावरीको यमुना और वहाँके वनको वृन्दावन समझा। उस वनमें कुछ समय तक नृत्य-गान करनेके बाद । २३७