भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1082

[ 8/1 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला गम्भीर तथा सिद्धान्तोंका रत्नालय है। इसमें महाप्रभु प्रश्न कर रहे हैं और श्रीरामानन्द उत्तर दे रहे हैं, किन्तु श्रीरामानन्दके हृदयमें उन सिद्धान्तोंका सञ्चारण महाप्रभु ही कर रहे हैं। भक्तिके जितने प्रकारके सिद्धान्त हैं, श्रीराधाभावद्युति सुवलित शचीनन्दन श्रीगौरहरि उनके समुद्र हैं। 'संचार्य'—अर्थात् सञ्चरित करके। जैसे—सूर्यकी किरणें जलको वाष्प रूपमें उड़ा देती हैं। तदनन्तर वह वाष्प मेघ रूप धारणकर वर्षाके रूपमें परिणत होकर पुनः समुद्रमें गिरता है। स्वाति नक्षत्रके संयोगसे वह जल समुद्रमें विद्यमान सीपमें गिरनेपर मोती या रत्न बन जाता है। उन अमूल्य रत्नोंको धारण करनेके कारण ही समुद्र 'रत्नालय' कहलाता है। यद्यपि समुद्रमें अवस्थित सीपमें रत्न बनानेकी क्षमता होती है, तथापि स्वाति नक्षत्रके संयोगसे वर्षाकी बूँद ही उसमें रत्न बननेका कारण होती है, समुद्रका जल नहीं। यहाँ श्रीगौरहरि ही भक्तिसिद्धान्त-रत्नालय हैं और श्रीरामानन्द हैं—मेघ। महाप्रभुने भक्ति-तत्त्वरूपी अमृत जलधाराओंके द्वारा अपनी दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर रसमयी, विशेषकर औपपत्य भावकी मेघ-मालाओंका अलक्षित रूपसे अपनी कृपाशक्तिके द्वारा श्रीरामानन्दके हृदयमें सञ्चार किया। श्रीरामानन्दकी भक्ति-सिद्धान्तोंकी व्याख्या ही स्वाति-नक्षत्रकी जलधारा है। इन जलधाराओंको महाप्रभुकी कर्णरूपी सीपके द्वारा ग्रहण किये जानेपर वे धाराएँ सिद्धान्त-रत्न बन गयीं और महाप्रभु सिद्धान्त- रत्नालय बन गये। ये रत्न महाप्रभुके हृदयमें उदित विभिन्न राधाभाव हैं। कृष्णभक्तिके दो आलम्बन हैं—विषय और आश्रय। श्रीकृष्ण प्रेमके विषय और भक्त प्रेमके आश्रय हैं। भक्त ही भक्तिका आधार होते हैं। श्रीकृष्ण प्रेमके विषय होनेके कारण आश्रय-जातीय भक्तिके विषयमें अनभिज्ञ हैं। आश्रय-जातीय भक्तोंमें श्रीराधा सर्वश्रेष्ठ हैं। श्रीराधामें समस्त रसपूर्ण भाव, श्रद्धासे लेकर मादनाख्य-महाभाव तक परिपूर्णतम रूपमें अवस्थित हैं। इन्हीं आश्रयजातीय भावोंका आस्वादन करनेके लिये श्रीकृष्ण श्रीराधाके भाव और अङ्गकान्ति लेकर शचीनन्दन श्रीगौरहरि हुए। परन्तु अनुभूतिके बिना केवल भावके द्वारा उसका आस्वादन सम्भव नहीं है। यद्यपि महाप्रभु समस्त प्रकारके तत्त्वज्ञान और रसकी सीमा हैं। परन्तु श्रीराधा इन भावोंके द्वारा किस प्रकार श्रीकृष्णकी सेवा करती हैं, उनको आनन्द प्रदान करती हैं और स्वयं जिस आनन्दका अनुभव करती हैं—महाप्रभु इस विज्ञानको नहीं जानते थे अर्थात् उन्हें उसका अनुभव नहीं था। यह आश्रय-विज्ञान उन्होंने श्रीरामानन्द अर्थात् विशाखा सखीसे प्राप्त किया। 'रामाभिध-भक्तमेघे'—यहाँ भक्तमेघ श्रीरायरामानन्द हैं। भक्तमात्र ही भक्ति-तत्त्वको धारण कर सकते हैं, अन्य किसीमें यह सामर्थ्य नहीं होता। श्रीरामानन्द चैतन्यलीलामें गौराङ्ग महाप्रभुके नित्य पार्षद हैं और व्रजलीलामें विशाखा सखी हैं। उनमें ही यह विशेष शक्ति है कि वे महाप्रभुके निज-विषयक भक्ति-सिद्धान्तोंको धारणकर पुनः उनकी वर्षा कर सके और इसके द्वारा महाप्रभुको श्रीराधाप्रेम और भावनाओंकी वैचित्रीके अनुभवरूपी अनिर्वचनीय चमत्कारिताका आस्वादन करवा पाये। 'स्वभक्तिसिद्धान्तचयामृतौघानि'—'स्व' अर्थात् श्रीकृष्ण विषयक भक्तिसिद्धान्तसमूह अर्थात् श्रीकृष्णकी भक्ति, विशेषकर सख्य, वात्सल्य, और मधुर (रसमयी भक्ति)। इन आश्रयजातीय भक्तोंकी श्रीकृष्णके प्रति सेवा-भावना या उच्चकोटिकी ममता और इनमें भी मधुर रसका वैशिष्ट्य—मञ्जरियोंकी सेवाकी परिपाटी ही अमृत है। “अनर्पितचरीं चिरात् करुणयावतीर्णः कलौ समर्पयितुमुन्नतोज्ज्वलरसां स्वभक्तिश्रियम्।” 'स्वभक्तिश्रियम्'—श्रीकृष्णकी सेवा-वासनाकी मूर्तिमान- स्वरूप श्रीराधा हैं और उनकी शोभा हैं—मञ्जरी-वृन्द। श्रीकृष्ण रसिक-शेखर हैं और साथ ही परम करुण भी हैं। अपनी अहैतुकी कृपासे श्रीकृष्णने महाप्रभुके रूपमें कलियुगमें अवतीर्ण होकर इस उन्नत उज्ज्वल रससे 234 ।