भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1081, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1081

आठवाँ अध्याय कथासार-महाप्रभु जियड़-नृसिंहके दर्शन करके गोदावरीके तटपर विद्यानगरमें स्नान करनेके लिये आये। वहाँ उन्होंने श्रीराय रामानन्दके साथ भेंट की। परिचय होनेपर श्रीरामानन्दने उन्हें उसी गाँवमें कुछेक दिन रहनेके लिये अनुरोध किया। उनके अनुरोधपर महाप्रभु किसी वैदिक-वैष्णव-ब्राह्मणके घरमें रहे। सन्ध्याके समय जब श्रीरामानन्द-रायने दीनवेशमें महाप्रभुके निकट आकर दण्डवत् प्रणाम किया, तब महाप्रभुने उन्हें साध्य-निर्णयके लिये श्लोक पढ़नेकी आज्ञा दी। श्रीरामानन्द-रायने सबसे पहले वर्णाश्रमधर्मरूपी सज्जनोंके सामान्य धर्मका उल्लेख करके 'कर्मार्पण', बादमें 'आसक्तिशून्य कर्म', उसके बाद 'ज्ञानमिश्राभक्ति' और अन्तमें 'ज्ञानशून्य शुद्ध-भक्ति'के सम्बन्धमें जब कुछेक श्लोकोंका पाठ किया, तब महाप्रभुने आखिरी (ज्ञानशून्य शुद्ध-भक्ति) को 'साध्यवस्तु'के रूपमें स्वीकार किया। फिर भक्तिके सम्बन्धमें (महाप्रभुने श्रीराय रामानन्दको) उच्च अधिकारका वर्णन करनेके लिये कहा। तब श्रीरायने पहले 'शुद्धा कृष्णरतिरूपा प्रेमभक्ति', उसके बादमें 'दास्यप्रेम', उसके बाद 'सख्यप्रेम' और फिर 'वात्सल्यप्रेम' एवं (अन्तमें) 'कान्तभावगत प्रेम'को 'साध्यसार' कहकर वर्णन किया। कान्तप्रेम, किस प्रकारसे साध्यसार होता है, उसे भी श्रीरायने विविध रूपमें कहा। महाप्रभुने जब उसे साध्यकी सीमाके रूपमें स्वीकार किया, तब श्रीरायके द्वारा राधिकाका प्रेम वर्णित हुआ। बादमें श्रीरायने श्रीकृष्णके स्वरूप, श्रीराधाके स्वरूप, रसत्तत्त्वके स्वरूप और प्रेमतत्त्वका वर्णन किया। उसके बाद महाप्रभुके द्वारा जिज्ञासा करनेपर, श्रीरामानन्द-रायने प्रेमविलास-विवर्तरूप विप्रलम्भगत- अधिरूढ़-भावमय स्वरचित एक गीत बोला। अन्तमें, उन्होंने श्रीराधा-कृष्णकी प्रेमसेवारूपी परम साध्यवस्तुको प्राप्त करनेके उपायस्वरूप ब्रजसखियोंके आनुगत्यका विशेषरूपसे विवरण प्रदान किया। कुछ दिनों तक प्रत्येक रात्रिमें अनेक प्रकारसे श्रीकृष्णकथा करनेके बाद, महाप्रभुके मूलतत्त्व और उनके स्वरूपको देखकर श्रीरामानन्द मूर्च्छित हो गये। कुछ दिनों बाद श्रीरामानन्दको राजकार्य परित्याग करके पुरुषोत्तम जानेकी आज्ञा देकर महाप्रभुने दक्षिणकी यात्रा की। यह समस्त विवरण श्रीकविराज गोस्वामीने श्रीस्वरूप दामोदरके कड़चाके अनुसार लिखा है। -(अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीरामानन्दके द्वारा महाप्रभुका निज भक्तिसिद्धान्त-प्रचार :- सञ्चार्य रामाभिध-भक्तमेघे स्वभक्तिसिद्धान्तचयामृतानि। गौराब्धिरेतैरमुना वितीर्णै- स्तज्ज्ञत्व-रत्नालयतां प्रयाति ॥ 1 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥1॥ अमृतप्रवाह भाष्य-सिद्धान्तामृत-समुद्ररूप श्रीगौराङ्गने श्रीरामानन्द-नामक भक्तमेघमें स्वभक्ति-सिद्धान्तामृतका सञ्चार करके, उनके द्वारा विस्तृत किये गये उन भक्तिसिद्धान्तोंके द्वारा पुनः स्वयं भक्तितत्त्वज्ञता-रूपी समुद्रता प्राप्त की॥1॥ अनुभष्य- गौराब्धिः (श्रीगौराङ्गः एव अब्धिः सिद्धान्तामृतसमुद्रः) रामाभिध-भक्तमेघे (रामानन्द-नामा एव सिद्धान्तामृतवर्षकः मेघः, तस्मिन्) स्वभक्तिसिद्धान्तचयामृतानि सञ्चार्य अमुना (रामानन्द-मेघेन) एतैः (स्वभक्तिसिद्धान्तारमृतैः) वितीर्णैः (व्याप्तैः निविष्ठैः) तज्ज्ञत्व-रत्नालयतां (तानि सिद्धान्तामृतानि जानाति यः सः एव तज्ज्ञः, तस्य भावः तज्ज्ञत्वम् एव रत्नं, तस्य आलयतां सिद्धान्तामृताभिज्ञत्वरूपसमुद्रतां) प्रयाति (प्राप्नोति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥1॥ अमृताणुकणिका-“श्रीराय रामानन्द संवाद अत्यन्त । 233

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