श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1083, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय 8/1-5 ] परिपूर्ण स्वभक्तिकी शोभा अर्थात् मञ्जरीभावको जगत्को प्रदान किया। इसके पूर्व किसीने इसे जगत्में प्रकाशित नहीं किया था। इसी आनुगत्यमयी, परतन्त्रमयी सेवामें जीवका सर्वोच्च अधिकार है। 'गौराब्धिरेतैरमुना वितीर्णैः'—गौराब्धि अर्थात् गौर-समुद्र। समुद्र जलका आधार है। महाप्रभु प्रेमके अनन्त और अगाध समुद्र हैं। परन्तु इस समुद्रमें खारापन नहीं है, अपितु यह अमृतको भी विनिन्दित करने वाला परमानन्द-स्वरूप, परमास्वादनीय और अत्यन्त लोभनीय है। इसमें साधारण समुद्रके समान व्हेल मछलियाँ और उनको भी खा जानेवाले तिमिङ्गिल आदि कर्म, ज्ञान, उपासनादि रूपी हिंसक जन्तु नहीं हैं, अपितु यह रसामृत तत्त्वसे परिपूर्ण है। इसमें भयङ्कर गर्जन नहीं, अपितु परमास्वादनीय, लोभनीय, चमत्कारपूर्ण संयोगात्मक-वियोगात्मक कल्लोल-हिल्लोलें उठती रहती हैं। इसमें 'सर्वात्मस्नपन' (आत्माके सम्पूर्ण स्नान) रूपी करुणाका आह्वान है, कल्लोल है, जो महाप्रभु इस जगत्को प्रदान करना चाहते हैं।”—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 1 ॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥ 2 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो और समस्त गौरभक्तवृन्दकी जय हो॥ 2 ॥ जियड़नृसिंहका दर्शन और नृत्य-स्तुति-गीत :— पूर्व-रीते प्रभु आगे गमन करिला। 'जियड़नृसिंह'-क्षेत्रे कतदिने गेला॥ 3॥ नृसिंह देखिया कैल दण्डवत्-प्रणति। प्रेमावेशे कैल बहु नृत्य-गीत-स्तुति ॥ 4 ॥ “श्रीनृसिंह, जय नृसिंह, जय जय नृसिंह। प्रह्लादेश जय पद्मामुखपद्मभृङ्ग॥” 5॥ अनुवाद—पहलेकी भाँति महाप्रभु सभीको वैष्णव बनाते हुए आगे चले। कुछ दिनोंमें वे 'जियड़ नृसिंह' क्षेत्रमें पहुँचे। श्रीनृसिंह भगवान्का दर्शन करके महाप्रभुने उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया। प्रेमके आवेशमें उन्होंने बहुत नृत्य, गीत और स्तुति कीं,—“श्रीनृसिंह, जय नृसिंह, जय जय नृसिंह। भक्त प्रह्लादके ईश्वरकी जय हो। श्रीलक्ष्मीके मुखकमलके भ्रमरकी जय हो॥” 3-5 ॥ अनुभाष्य—'जियड़ नृसिंहक्षेत्र'—भिजागापटम अथवा विशाखापत्तनसे पाँच मील उत्तरकी ओर 'सिंहाचलम्' नामक स्थान है। 'सिंहाचल'-नामसे रेल स्टेशन भी है। श्रीनृसिंहदेवका मन्दिर पर्वतकी चोटीपर है। भिजागापटममें यह मन्दिर सबसे अधिक प्रसिद्ध एवं समृद्धिसम्पन्न है तथा शिल्पकलाके श्रेष्ठ उदाहरणके रूपमें विराजमान है। एक पत्थरके पटलपर लिखा हुआ देखा जाता है कि राजा तृतीय 'गोङ्गा'की एक भक्त रानीने श्रीविग्रहको स्वर्णमण्डित करा दिया था—(भिजागापटम् गेजेटियार)। मन्दिरके निकट श्रीनृसिंहदेवके सेवकवृन्द और अन्यान्य स्थानीय लोग वास करते हैं। आजकल पर्वतके ऊपर यात्रियोंके ठहरनेके लिये श्रीमन्दिरसे लगी अनेक धर्मशालाएँ और बहुतसे घर हैं। विजय-मूर्ति प्रकाशमय स्थानपर और मूल श्रीनृसिंह-मूर्ति कक्षके अन्दर विराजमान है। कुछ रामानुजीय श्रीवैष्णवगण विजयनगर-राज्यके अधीन श्रीमूर्तिकी सेवा करते हैं। 'पद्मामुखपद्मभृङ्ग'—पद्मा अर्थात् अपने वक्षपर विलास करनेवाली लक्ष्मीदेवीके कान्त। भाः 1/1/1 एवं 10/87/1 श्लोककी टीकामें श्रीधर स्वामी द्वारा रचित श्लोक— “प्रह्लाद-हृदयाह्लादं भक्ताविद्या-विदारणम्। शरदिन्दुरुचिं वन्दे पारीन्द्रवदनं हरिम्॥” “वागीशा यस्य वदने लक्ष्मीर्र्यस्य च वक्षसि। यस्यास्ते हृदये सम्वित् तं नृसिंहमहं भजे॥” श्लोक-भावानुवाद—“प्रह्लादके हृदयको आनन्द प्रदान करनेवाले, भक्तोंकी अविद्याका नाश करनेवाले, शरत्कालीन पूर्ण चन्द्रमाकी कान्तिसे युक्त श्रीनृसिंहदेवकी मैं वन्दना करता हूँ।” “जिनके मुखमें वाणीकी स्वामिनी सरस्वती निवास । 235