श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
आठवाँ अध्याय 8/1-5 ] परिपूर्ण स्वभक्तिकी शोभा अर्थात् मञ्जरीभावको जगत्को प्रदान किया। इसके पूर्व किसीने इसे जगत्में प्रकाशित नहीं किया था। इसी आनुगत्यमयी, परतन्त्रमयी सेवामें जीवका सर्वोच्च अधिकार है। 'गौराब्धिरेतैरमुना वितीर्णैः'—गौराब्धि अर्थात् गौर-समुद्र। समुद्र जलका आधार है। महाप्रभु प्रेमके अनन्त और अगाध समुद्र हैं। परन्तु इस समुद्रमें खारापन नहीं है, अपितु यह अमृतको भी विनिन्दित करने वाला परमानन्द-स्वरूप, परमास्वादनीय और अत्यन्त लोभनीय है। इसमें साधारण समुद्रके समान व्हेल मछलियाँ और उनको भी खा जानेवाले तिमिङ्गिल आदि कर्म, ज्ञान, उपासनादि रूपी हिंसक जन्तु नहीं हैं, अपितु यह रसामृत तत्त्वसे परिपूर्ण है। इसमें भयङ्कर गर्जन नहीं, अपितु परमास्वादनीय, लोभनीय, चमत्कारपूर्ण संयोगात्मक-वियोगात्मक कल्लोल-हिल्लोलें उठती रहती हैं। इसमें 'सर्वात्मस्नपन' (आत्माके सम्पूर्ण स्नान) रूपी करुणाका आह्वान है, कल्लोल है, जो महाप्रभु इस जगत्को प्रदान करना चाहते हैं।”—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 1 ॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥ 2 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो और समस्त गौरभक्तवृन्दकी जय हो॥ 2 ॥ जियड़नृसिंहका दर्शन और नृत्य-स्तुति-गीत :— पूर्व-रीते प्रभु आगे गमन करिला। 'जियड़नृसिंह'-क्षेत्रे कतदिने गेला॥ 3॥ नृसिंह देखिया कैल दण्डवत्-प्रणति। प्रेमावेशे कैल बहु नृत्य-गीत-स्तुति ॥ 4 ॥ “श्रीनृसिंह, जय नृसिंह, जय जय नृसिंह। प्रह्लादेश जय पद्मामुखपद्मभृङ्ग॥” 5॥ अनुवाद—पहलेकी भाँति महाप्रभु सभीको वैष्णव बनाते हुए आगे चले। कुछ दिनोंमें वे 'जियड़ नृसिंह' क्षेत्रमें पहुँचे। श्रीनृसिंह भगवान्का दर्शन करके महाप्रभुने उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया। प्रेमके आवेशमें उन्होंने बहुत नृत्य, गीत और स्तुति कीं,—“श्रीनृसिंह, जय नृसिंह, जय जय नृसिंह। भक्त प्रह्लादके ईश्वरकी जय हो। श्रीलक्ष्मीके मुखकमलके भ्रमरकी जय हो॥” 3-5 ॥ अनुभाष्य—'जियड़ नृसिंहक्षेत्र'—भिजागापटम अथवा विशाखापत्तनसे पाँच मील उत्तरकी ओर 'सिंहाचलम्' नामक स्थान है। 'सिंहाचल'-नामसे रेल स्टेशन भी है। श्रीनृसिंहदेवका मन्दिर पर्वतकी चोटीपर है। भिजागापटममें यह मन्दिर सबसे अधिक प्रसिद्ध एवं समृद्धिसम्पन्न है तथा शिल्पकलाके श्रेष्ठ उदाहरणके रूपमें विराजमान है। एक पत्थरके पटलपर लिखा हुआ देखा जाता है कि राजा तृतीय 'गोङ्गा'की एक भक्त रानीने श्रीविग्रहको स्वर्णमण्डित करा दिया था—(भिजागापटम् गेजेटियार)। मन्दिरके निकट श्रीनृसिंहदेवके सेवकवृन्द और अन्यान्य स्थानीय लोग वास करते हैं। आजकल पर्वतके ऊपर यात्रियोंके ठहरनेके लिये श्रीमन्दिरसे लगी अनेक धर्मशालाएँ और बहुतसे घर हैं। विजय-मूर्ति प्रकाशमय स्थानपर और मूल श्रीनृसिंह-मूर्ति कक्षके अन्दर विराजमान है। कुछ रामानुजीय श्रीवैष्णवगण विजयनगर-राज्यके अधीन श्रीमूर्तिकी सेवा करते हैं। 'पद्मामुखपद्मभृङ्ग'—पद्मा अर्थात् अपने वक्षपर विलास करनेवाली लक्ष्मीदेवीके कान्त। भाः 1/1/1 एवं 10/87/1 श्लोककी टीकामें श्रीधर स्वामी द्वारा रचित श्लोक— “प्रह्लाद-हृदयाह्लादं भक्ताविद्या-विदारणम्। शरदिन्दुरुचिं वन्दे पारीन्द्रवदनं हरिम्॥” “वागीशा यस्य वदने लक्ष्मीर्र्यस्य च वक्षसि। यस्यास्ते हृदये सम्वित् तं नृसिंहमहं भजे॥” श्लोक-भावानुवाद—“प्रह्लादके हृदयको आनन्द प्रदान करनेवाले, भक्तोंकी अविद्याका नाश करनेवाले, शरत्कालीन पूर्ण चन्द्रमाकी कान्तिसे युक्त श्रीनृसिंहदेवकी मैं वन्दना करता हूँ।” “जिनके मुखमें वाणीकी स्वामिनी सरस्वती निवास । 235
[ 8/3-5 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला करती हैं, जिनके वक्षस्थलपर लक्ष्मी वास करती हैं और हृदयमें चेतनाकी दैवीशक्ति निवास करती हैं, उन श्रीनृसिंहदेवकी मैं वन्दना करता हूँ॥"३-५॥ अमृताणुकणिका- "'पूर्व्वरीते' अर्थात् (महाप्रभुने) यथापूर्व सबको अपने नृत्य-गीत और विचारोंसे वैष्णव बनाया। "एमन दयालु प्रभु नहे त्रिभुवने। कृष्णप्रेम जन्माय याँर दूर दरशने॥" अर्थात् “महाप्रभुके समान दयालु तीनों जगत्में कोई नहीं है, उनके दूरसे ही दर्शन करनेसे श्रीकृष्णप्रेम हृदयमें उत्पन्न हो जाता है।" यहाँ तक कि उन्होंने झारखण्डके जङ्गलोंमें बाघ- सिंह-भालू आदि हिंसक पशुओंको भी प्रेम प्रदान किया। महाप्रभुका आदेश है (मध्यलीला 7/128)- "यारे देख, तारे कह 'कृष्ण'-उपदेश। आमार आज्ञाय गुरु हञा तार' एइ देश॥" अर्थात् "जिसे देखो, उसे ही श्रीकृष्णनाम करनेका उपदेश दो। मेरी आज्ञासे गुरु बनकर तुम इस देशका उद्धार करो।" (अन्त्यलीला 4/102) में कहा है- "आपने आचारे केह, ना करे प्रचार। प्रचार करेन केह, ना करे आचार॥" अर्थात् “कोई व्यक्ति स्वयं तो आचरण करते हैं, किन्तु प्रचार नहीं करते तथा अन्य कोई व्यक्ति प्रचार तो करते हैं, किन्तु आचरण नहीं करते।" पहले स्वयं आचरण करके उसके बाद प्रचार भी अवश्य करना चाहिये। आचार और प्रचार-दोनों ही आवश्यक हैं। केवल प्रचार करना कर्मकाण्ड है, इसलिये प्रचारके साथ आचरण भी आवश्यक है। प्रचार भी भक्ति है। महाप्रभुके अनुगत श्रीरूप गोस्वामी-सनातन गोस्वामीसे लेकर शिष्य-परम्परामें श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती प्रभुपाद, हमारे गुरुदेव श्रीमद्भक्तिप्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज, श्रीभक्तिवेदान्त स्वामी महाराज आदि सभी आचार्योंने स्वयं आचरण किया और उसीका प्रचार भी किया। ऐसे भक्तोंका ही जीवन उच्च कोटिका है। इन्हींका सङ्ग करना चाहिये। जो संसारमें अनासक्त, निर्मल चरित्रवान्, भगवद्-कथामें निपुण, समस्त संशयोंका छेदन करने वाले हों-ऐसे वैष्णवोंके सङ्गमें उनसे हरिकथा सुननेपर हृदयमें भक्ति प्रकाशित होती है। महाप्रभुने सर्वत्र प्रेमका प्रचार करते हुए विशेष- विशेष लोगोंको 'अनर्पितचरीं चिरात्' का भाव भी दिया और अपने दर्शनसे लोगोंको प्रेम-रसमें निमग्न किया। महाप्रभु चलते हुए 'जियड़ नृसिंह' क्षेत्रमें पहुँचे। यहाँ श्रीनृसिंहदेवका मन्दिर एक पर्वतपर अवस्थित है। ऐसा कहा जाता है कि श्रीनृसिंहदेवके इन श्रीविग्रहने जियड़ नामक एक भक्तपर विशेष कृपा की थी, इसलिये वे 'जियड़ नृसिंह'के नामसे प्रसिद्ध हैं। महाप्रभुने श्रीनृसिंह भगवान्के दर्शन किये और अनेक प्रकारसे नृत्य-गीत-स्तुति आदि की। पूर्वपक्ष यहाँ प्रश्न उठाते हैं कि राधाभावमें आविष्ट महाप्रभु श्रीकृष्णके ही नाम, रूप, गुण, लीला आदिका आस्वादन करना चाहते हैं, परन्तु यहाँ श्रीनृसिंहका जयगान करके स्तुति कर रहे हैं और असाधारण रूपसे प्रेमाविष्ट हो रहे हैं। इसका उत्तर यह है कि श्रीनृसिंहदेव या भगवान्के सभी अवतार श्रीकृष्णसे भिन्न नहीं हैं, श्रीकृष्ण ही हैं। सभी अवतारोंमें एक-एक रस वैचित्री है। श्रीरामचन्द्रमें वात्सल्य और ऐश्वर्य मिश्रित सख्य भी है। उनकी लीला करुण-रससे परिपूर्ण है। श्रीजयदेव गोस्वामीने श्रीगीतगोविन्दमें दशावतार स्तोत्रमें श्रीकृष्णके प्रत्येक रसके अधिष्ठानरूप एक-एक अवतारका जयगान किया है। राधाभावद्युति सुवलित श्रीगौरहरि श्रीकृष्ण ही हैं। वे अखिलरसामृतमूर्ति अपने अन्दर अनन्त रस-वैचित्री धारण किये हुए हैं। ऐसा कोई भी रस नहीं है जिसका महाप्रभु आस्वादन नहीं कर सकते। श्रीनृसिंह प्रह्लादके ईश हैं और अपनी वक्ष-विलासिनी लक्ष्मीदेवी पद्माके मुखकमलका भृङ्गके समान आस्वादन करते हैं। श्रीराधा ही आंशिक रूपमें 236 ।
आठवाँ अध्याय ८/३-१३ ] पद्मा हैं। वे पद्माके रूपमें नृसिंहदेवकी सेवाका वैचित्र्य प्रकाशित कर रही हैं। उसके रसास्वादनकी अभिलाषा महाप्रभुके हृदयमें जाग्रत हो उठी। उसका ही तब महाप्रभुने आस्वादन किया। इस मनोरथके पूर्ण होनेपर वे नृत्य-कीर्तन करने लगे। दक्षिण भारतमें महाप्रभु मीनाक्षी देवी, कन्याकुमारी आदि अनेक देवालयोंमें गये। वहाँ भावावेशमें उन्होंने नृत्य किया। वे अन्य देवी-देवताओंको भगवान्के परिकरके रूपमें दर्शन करते थे और भावाविष्ट हो जाते थे।"—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी॥ ३-५॥ श्रीनृसिंह अभक्तोंके लिये कठोर और भक्तोंके लिये कोमल :— भागवत (७/९/१)-टीकामें श्रीधरस्वामि-उद्धृत आगमवचन— उग्रोऽप्यनुग्र एवायं स्वभक्तानां नृकेशरी। केशरीव स्वपोतानामन्येषामुग्रविक्रमः ॥ ६॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ ६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सिंह जिस प्रकार उग्र (हिंसक) होनेपर भी अपनी सन्तानके प्रति हिंसक नहीं होता, उसी प्रकार श्रीनृसिंहदेव हिरण्यकशिपु आदि असुरोंके प्रति उग्र होनेपर भी प्रह्लादादि अपने भक्तोंके प्रति स्नेहपूर्ण होते हैं॥ ६॥ अनुभाष्य— अन्येषां (स्वपाल्यशावकाभिन्नानां गज-व्याघ्रादीनां सम्बन्धे) उग्रविक्रमः (प्रचण्डपराक्रमः) स्वपोतानां (निजशावकानां सम्बन्धे) शान्तः केशरी (सिंह) इव अयं नृकेशरी (नृसिंहदेवः) उग्रं (प्रचण्डविक्रमः) अपि स्वभक्तानां (निजपाल्यदासानां सम्बन्धे) अनुग्रः (शान्तः कोमलः वत्सलः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ ६॥ एइमत नाना श्लोक पड़ि' स्तुति कैल। नृसिंह-सेवक माला-प्रसाद आनि' दिल॥ ७॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुने अनेक श्लोकोंके द्वारा श्रीनृसिंह भगवान्की स्तव-स्तुति की। श्रीनृसिंहदेवके सेवकने महाप्रभुके भाव देखकर उन्हें प्रसाद और माला लाकर दी॥ ७॥ सिंहचलमें रात्रिवास :— पूर्ववत् कोन विप्रे कैल निमन्त्रण। सेइ रात्रि ताँहा रहि' करिला गमन॥ ८॥ अनुवाद—पहलेकी भाँति किसी ब्राह्मणने आकर महाप्रभुको निमन्त्रण दिया। उस रात महाप्रभु वहीं रहे और अगले दिन वहाँसे गमन किया॥ ८॥ प्रातःकाल पुनः यात्रा :— प्रभाते उठिया चलिला प्रेमावेशे। दिग्विदिक् नाहि ज्ञान रात्रि-दिवसे॥ ९॥ अनुवाद—प्रभातमें उठकर महाप्रभु प्रेमावेशमें आगे चलने लगे। उन्हें न तो दिशा-विदिशाका और न ही रात-दिनका ज्ञान रहता था॥ ९॥ गोदावरीके तटपर आगमन और यमुनाकी उद्दीपन्ना :— पूर्ववत् 'वैष्णव' करि' सर्व लोकगणे। गोदावरी-तीरे प्रभु आइला कतदिने॥ १०॥ गोदावरी देखि' हइल 'यमुना'-स्मरण। तीरे वन देखि' स्मृति हैल वृन्दावन॥ ११॥ सेइ वने कतक्षण करि' नृत्य-गान। गोदावरी पार हञा ताँहा कैल स्नान॥ १२॥ घाट छाड़ि' कतदूरे जल-सन्निधाने। बसि' प्रभु करे कृष्णनाम-सङ्कीर्त्तने॥ १३॥ अनुवाद—पहलेकी भाँति सभी लोगोंको वैष्णव बनाते हुए महाप्रभु कुछ दिनों बाद गोदावरी नदीके तटपर पहुँचे। गोदावरीको देखकर उन्हें 'यमुना'का स्मरण हो आया और गोदावरीके तटपर स्थित वनको देखकर उन्हें श्रीवृन्दावनकी स्फूर्ति हो आयी। उन्होंने गोदावरीको यमुना और वहाँके वनको वृन्दावन समझा। उस वनमें कुछ समय तक नृत्य-गान करनेके बाद । २३७
[ 8/10-24 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला उन्होंने गोदावरीको पार करके उस पार तटपर स्नान किया। स्नान करनेके बाद घाटसे कुछ दूर जलके निकट ही बैठकर महाप्रभु श्रीकृष्णनामका सङ्कीर्तन करने लगे॥ 10-13॥ स्नानके लिये श्रीराय-रामानन्दका वहाँपर आगमन :- हेनकाले दोलाय चड़ि' रामानन्द राय। स्नान करिबारे आइला, बाजना बाजाय॥ 14॥ ताँर सङ्गे बहु आइला वैदिक ब्राह्मण। विधिमते कैल तेंहो स्नानादि-तर्पण॥ 15॥ अनुवाद—उसी समय पालकीपर चढ़कर स्नान करनेके लिये श्रीरामानन्द राय वहाँ आये। साथमें उनके आगमनकी सूचना देनेके लिये बाजे बज रहे थे। उनके साथ बहुतसे वैदिक ब्राह्मण भी आये थे। श्रीरामानन्द रायने विधिपूर्वक स्नान-तर्पणादि किया॥ 14-15॥ श्रीरामानन्दके साथ मिलनके लिये महाप्रभुकी व्यग्रता :- प्रभु ताँरे देखि' जानिल—एइ रामराय। ताँहारे मिलिते प्रभुर मन उठि' धाय॥ 16॥ अनुवाद—उन्हें देखते ही महाप्रभु समझ गये कि ये श्रीरामानन्द राय हैं। उनसे मिलनेके लिये महाप्रभुका मन अति उत्कण्ठित हो उठा॥ 16॥ महाप्रभुके पास श्रीरामानन्दका आना :- तथापि धैर्य धरि' प्रभु रहिला बसिया। रामानन्द आइला अपूर्व संन्यासी देखिया॥ 17॥ अनुवाद—महाप्रभु हृदयमें मिलनेके लिये उत्कण्ठित होनेपर भी धैर्य धारण करके वहीं बैठे रहे। तब श्रीरामानन्द राय घाटसे कुछ दूर एक अद्भुत और अति सुन्दर संन्यासीको देखकर उनके निकट आये॥ 17॥ महाप्रभुके रूपदर्शनसे श्रीरायका विस्मय और दण्डवत्-प्रणाम :- सूर्यशत-सम कान्ति, अरुण वसन। सुवलित प्रकाण्ड देह, कमल-लोचन॥ 18॥ देखिया ताँहार मने हैल चमत्कार। आसिया करिल दण्डवत् नमस्कार॥ 19॥ अनुवाद—महाप्रभुकी अङ्गकान्ति सैकड़ों सूर्योंके समान देदीप्यमान थी। उन्होंने अरुण (गेरुआ) वस्त्र धारण कर रखा था। उनका सुगठित और विशाल शरीर था तथा नेत्र कमलके समान थे। उन्हें देखकर श्रीरामानन्द रायके मनमें बड़ा ही चमत्कार हुआ और उन्होंने निकट आकर महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम किया॥ 18-19॥ आलिङ्गनके लिये उत्सुक महाप्रभुका धैर्य, श्रीरायको उठाना और नाम जिज्ञासा :- उठि' प्रभु कहे,—उठ, कह 'कृष्ण' 'कृष्ण'। तारे आलिङ्गिते प्रभुर हृदय सतृष्ण॥ 20॥ तथापि पूछिल,—“तुमि राय रामानन्द?” तेंहो कहे,—“हङ मुञि दास शूद्र मन्द॥” 21॥ अनुवाद—उनको प्रणाम करते देख महाप्रभु उठ खड़े हुए और कहने लगे—उठिये, उठिये, 'कृष्ण' 'कृष्ण' कहिये। महाप्रभुका हृदय उनका आलिङ्गन करनेके लिये आतुर हो रहा था। यद्यपि महाप्रभुने उनको पहचान लिया था, तथापि उन्होंने उनसे पूछा,—“क्या आप राय रामानन्द हैं?” श्रीरामानन्द रायने दीनतापूर्वक उत्तर दिया,—“हाँ, मैं दुर्भागा शूद्र आपका दास हूँ॥” 20-21॥ परिचय सुनने मात्रसे महाप्रभुके द्वारा श्रीरायका आलिङ्गन और दोनोंका प्रेम :- तबे तारे कैल प्रभु दृढ़ आलिङ्गन। प्रेमावेशे प्रभु-भृत्य, दोँहे अचेतन॥ 22॥ स्वाभाविक प्रेम दोँहार उदय करिला। दुँहाके आलिङ्गिया दुँहे भूमिते पड़िला॥ 23॥ स्तम्भ, स्वेद, अश्रु, कम्प, पुलक, वैवर्ण। दुँहार मुखेते शुनि' गदगद 'कृष्ण' वर्ण॥ 24॥ 238 ।
आठवाँ अध्याय 8/22-33 ]
अनुवाद—तब महाप्रभुने श्रीरामानन्द रायका दृढ़तापूर्वक आलिङ्गन किया। दोनों ही अर्थात् स्वामी और दास प्रेमावेशमें मूर्च्छित हो गये। दोनोंके हृदयमें स्वाभाविक प्रेम उदित हो गया। दोनों ही एक-दूसरेको आलिङ्गन करके पृथ्वीपर गिर पड़े। दोनोंके ही श्रीअङ्गोंमें स्तम्भ, स्वेद, अश्रु, कम्प, पुलक और वैवर्ण्य आदि प्रेमके अष्ट-सात्त्विक विकार उदित होने लगे। दोनोंकी वाणी गद्गद हो गयी। दोनों ही 'कृष्ण-कृष्ण' उच्चारण करने लगे॥ 22-24॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीराधाकृष्णका विशाखा-सखीके प्रति और विशाखा-सखीका श्रीराधाकृष्णके प्रति जो स्वाभाविक प्रेम है, वही उदित हुआ॥ 23॥
उनके दर्शनसे ब्राह्मणोंका विस्मय और उनका विचार :- देखिया ब्राह्मणगणेर हैल चमत्कार। वैदिक ब्राह्मण सब करेन विचार॥ 25॥ 'एइ त' संन्यासीर तेज देखि' ब्रह्मसम। शूद्रे आलिङ्गिया केने करेन क्रन्दन॥ 26॥ एइ महाराज-पात्र पण्डित, गम्भीर। संन्यासीर स्पर्शे मत्त हइला अस्थिर॥' 27॥
अनुवाद—श्रीरामानन्द रायके साथ आये हुए वैदिक ब्राह्मणोंको इस मिलनको देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ और वे मनमें विचार करने लगे,—'इन संन्यासीका तेज तो ब्रह्मके समान है, परन्तु ये इस शूद्रका आलिङ्गन करके रो क्यों रहे हैं? और दूसरी ओर ये महाराज (श्रीरामानन्द राय) महापण्डित एवं गम्भीर होनेपर भी संन्यासीके स्पर्शसे उन्मत्तकी भाँति चञ्चल क्यों हो गये हैं?' यही उन ब्राह्मणोंके विस्मयका कारण था॥ 25-27॥
महाप्रभुके द्वारा भाव-वेगका सम्वरण :- एइमत विप्रगण भावे मने मन। विजातीय लोक देखि' प्रभु कैल सम्वरण॥ 28॥
अनुवाद—इस प्रकार वे ब्राह्मण मनमें महाप्रभु और श्रीराय रामानन्दके बारेमें चिन्तन करने लगे। महाप्रभुने उन ब्राह्मणोंको विजातीय जानकर अपने भावोंको सम्वरण कर लिया॥ 28॥
अनुभाष्य—'विजातीय लोक'—श्रीरामानन्द महाप्रभुके स्वजातीय आशय (अन्तःकरण) वाले अन्तरङ्ग-भक्त थे, किन्तु श्रीरामानन्दके साथ आये हुए ब्राह्मणादि कर्ममें निष्ठा रखनेवाले थे। अन्तरङ्ग-भक्त होनेकी बात तो दूर, वे शुद्धभक्त भी नहीं थे, इसलिये वे विजातीय अर्थात् अभक्त थे। परस्परकी प्रीति प्रकाशित होनेपर भी कर्मियोंको बहिर्मुख जानकर उन्होंने अपने भावोंको छिपा लिया॥ 28॥
महाप्रभुके द्वारा अपने आनेके कारणका वर्णन :- सुस्थ हञा दुँहे सेइ स्थानेते बसिला। तबे हासि' महाप्रभु कहिते लागिला॥ 29॥ "सार्वभौम भट्टाचार्य कहिल तोमार गुणे। तोमारे मिलिते मोरे करिल यतने॥ 30॥ तोमा मिलिबारे मोर एथा आगमन। भाल हैल, अनायासे पाइलुँ दरशन॥" 31॥
अनुवाद—तब दोनों अपने-अपने भावोंको सम्वरण करके बाह्यावस्थामें आकर सुस्थिर होकर उसी स्थान पर बैठ गये। तब महाप्रभु मुस्कुराते हुए कहने लगे,—"सार्वभौम भट्टाचार्यने मुझे आपके गुणोंके विषयमें बतलाया था और आपसे मिलनेके लिये उन्होंने बहुत आग्रह किया था। मैं आपसे मिलनेके लिये ही यहाँ आया हूँ। बहुत अच्छा हुआ, जो अनायास ही आपका दर्शन प्राप्त हो गया॥" 29-31॥
श्रीरायकी दीनता और उनके द्वारा महाप्रभुकी स्तुति :- राय कहे,—"सार्वभौम करे भृत्य-ज्ञान। परोक्षेह मोर हिते हय सावधान॥ 32॥ ताँर कृपाय पाइनु तोमार दरशन। आजि सफल हैल मोर मनुष्यजनम॥ 33॥
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[ 8/32-40 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
सार्वभौमे तोमार कृपा,—तार एइ चिह्न। अस्पृश्य स्पर्शिले हञा ताँर प्रेमाधीन ॥ 34 ॥ काँहा तुमि—साक्षात् ईश्वर नारायण। काँहा मुजि—राजसेवक विषयी शूद्राधम ॥ 35 ॥ मोर स्पर्शे ना करिले घृणा, वेदभय। मोर दर्शन तोमा वेदे निषेधय ॥ 36 ॥ तोमार कृपाय तोमाय कराय निन्द्यकर्म। साक्षात् ईश्वर तुमि, के जाने तोमार मर्म ॥ 37 ॥ आमा निस्तारिते तोमार इँहा आगमन। परम दयालु तुमि पतित-पावन ॥ 38 ॥ महन्त-स्वभाव एइ तारिते पामर। निज कार्य नाहि तबु यान तार घर ॥ 39 ॥
**अनुवाद—**श्रीरामानन्द रायने कहा,—“श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य प्रत्यक्ष रूपसे मुझे अपना एक दास मानते हैं और परोक्ष रूपसे अर्थात् पीछेसे मेरे हितके लिये सजग रहते हैं। उनकी कृपासे ही आज मैंने आपके चरणोंका दर्शन पाया है। आपका दर्शनकर आज मेरा मनुष्य-जन्म सार्थक हो गया। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यपर आपकी कितनी कृपा है, यह उसका ही प्रमाण है कि उनके प्रेमके अधीन होकर आपने मुझ जैसे अस्पृश्यको भी स्पर्श किया है। कहाँ तो आप साक्षात् ईश्वर नारायण हैं और कहाँ मैं राजसी वस्तुओंका उपभोगी, विषयोंका भोग करनेवाला अधम शूद्र। मुझ जैसे व्यक्तिका तो दर्शन भी आप जैसे संन्यासियोंके लिये निषिद्ध है, परन्तु आपको वेद-आज्ञा भङ्ग करनेका भय नहीं हुआ और मुझे स्पर्श करनेमें कोई घृणाका अनुभव भी नहीं किया। आपकी कृपा ही आपसे ऐसा निन्दित कार्य करवाती है। आप साक्षात् ईश्वर हैं, किन्तु भक्तिके वशमें हैं, आपके मर्मको भला कौन जान सकता है? आप परम-दयालु तथा पतित-पावन हैं, इसलिये मेरा उद्धार करनेके लिये ही आपका यहाँ आगमन हुआ है। आप अपने महान् स्वभावसे ही पतितोंका उद्धार करते रहते हैं। आपका अपना कोई कार्य अर्थात् स्वार्थ नहीं रहनेपर भी जीव-कल्याणके लिये आप घर-घर घूमते रहते हैं॥ 32-39 ॥
**अमृतप्रवाह भाष्य—**श्रीरामानन्द रायने कहा,— श्रीसार्वभौम मुझे अपना दास समझकर परोक्षमें भी अर्थात् मेरी अनुपस्थितिमें भी मेरे हितकी चेष्टा करते हैं॥ 32 ॥
अनुभाष्य—'सावधान'—उद्योगी (चेष्टा करनेवाले)। श्रील राय रामानन्दके द्वारा स्वाभाविक दीनतावशतः 'विषयी', 'शूद्राधम' आदि निकृष्ट विशेषणोंसे अपनेको सम्बोधित करनेपर भी एवं शौक्रविप्रकुलमें (ब्राह्मण परिवारमें) जन्म न लेनेपर भी, वे प्रकटलीलामें अकिञ्चन शुद्धभागवत-परमहंस थे। इसलिये उन्हें वैदिक-एकायन-शाखास्थित' (*आदिलीला भूमिकामें पृष्ठ संख्या xiv देखें) अप्राकृत दीक्षित-ब्राह्मण कहनेसे उनकी सामान्य महिमा ही व्यक्त होगी। महाकुलमें उत्पन्न, सब प्रकारके यज्ञोंमें दीक्षित, सहस्र-वैदिक शाखाध्यायी व्यक्ति भी यदि उन्हें अन्य शूद्रकुलमें जन्में व्यक्तियोंके समान शूद्र-जातिका मानेंगे, तो वे निश्चय ही नरकगामी होंगे, जैसा कि पद्मपुराणमें कहा गया है—“वीक्ष्यते जातिसामान्यात् स याति नरकं ध्रुवम्।” जो परमार्थके अभिलाषी हैं, उनका तो चिरकल्याण श्रीराय रामानन्दके दासानुदास होनेमें ही है। 'निन्द्यकर्म'—संन्यासीके लिये विषयीका दर्शन और शूद्रका सङ्ग अनुचित है, इसलिये निन्दनीय है; तथापि आपने अपनी असीम कृपाके कारण मेरे लिये उसे भी स्वीकार किया है॥ 32-37 ॥
अहैतुकी कृपा करना ही भगवान् और भक्तोंका धर्म :- श्रीमद्भागवत (10/8/4)— महद्विचलनं नृणां गृहिणां दीनचेतसाम्। निःश्रेयसाय भगवन्नान्यथा कल्पते क्वचित् ॥ 40 ॥
**अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 40 ॥
240 ।
आठवाँ अध्याय 8/40-46 ]
अमृतप्रवाह भाष्य—हे भगवन्! दयनीय गृहस्थ लोगोंका नित्यमङ्गल करनेके लिये महापुरुष उनके घरमें जाते हैं, वे अन्य किसी कारणसे नहीं जाते ॥ 40 ॥ अनुभाष्य—श्रीवसुदेवके द्वारा भेजे गये महर्षि गर्गके अपने घरमें आनेपर श्रीनन्द महाराजने उनसे कहा— हे भगवन् (मुने) महद्विचलनं (महतां निरहंस्तम्भानां सर्वमदैर्मुक्तानां निजाश्रमात् कुत्रापि विचलनं गमनं न स्यात्, यदि क्वचित् विचलनं भवति, तदा) दीनचेतसां (कृपणानां) गृहिणां (गृहतापक्लिष्टानां गृहव्रतानां, गृहं त्यक्तु नृणां निःश्रेयसाय (चरम-कल्याणार्थाय) एव, क्वचित् अन्यथा न कल्पते (निजस्वार्थाय न घटते)। श्लोक-भावानुवाद—हे मुने! [आप जैसे] सर्वाभिमानसे मुक्त महान् पुरुष अपने आश्रमसे कहीं नहीं जाते। यदि कभी जाते भी हैं, तो जो लोग गृहकार्योंमें ऐसे उलझे हैं कि साधुसङ्गके लिये उनके आश्रम तक जानेमें असमर्थ हैं, ऐसे दीनहीन गृहस्थ लोगोंके चरम-कल्याणके लिये ही वे उनके पास जाते हैं, अन्य किसी उद्देश्यसे नहीं ॥ 40 ॥ महाप्रभुके रूप दर्शन और आचरणके फलस्वरूप अपने साथियोंमें श्रीकृष्णप्रेमको देखकर श्रीरायका महाप्रभुके प्रति श्रीकृष्ण-ज्ञान :— आमार सङ्गे ब्राह्मणादि सहस्रेक जन। तोमार दर्शने सबार द्रवीभूत मन ॥ 41 ॥ 'कृष्ण' 'हरि' नाम शुनि सबार वदने। सबार अङ्ग-पुलकित, अश्रु-नयने ॥ 42 ॥ आकृत्ये-प्रकृत्ये तोमार ईश्वर-लक्षण। जीवे ना सम्भवे एइ अप्राकृत गुण ॥” 43 ॥ अनुवाद—[श्रीरायने कहा—] मेरे साथ ब्राह्मणादि हजारों लोग हैं और देखिये आपके दर्शन करते ही सभीका हृदय द्रवीभूत हो गया है। मैं सभीके मुखसे 'कृष्ण', 'हरि' नाम सुन रहा हूँ। सबके अङ्ग पुलकित हो रहे हैं और उनके नेत्रोंसे अश्रुधारा प्रवाहित हो रही है। आपकी आकृति और स्वभावमें ईश्वरके समस्त लक्षण दिखायी दे रहे हैं। जीवोंमें ये अप्राकृत गुण होना सम्भव नहीं है ॥” 41-43 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'आकृति'ते—अर्थात् 'न्यग्रोधपरिमण्डल'*-आकारसे, 'प्रकृति'ते—अर्थात् परम दयालु स्वभावसे, आपमें 'ईश्वर'के लक्षण दिखायी दे रहे हैं ॥ 43 ॥ 'आदिलीला 3/43 का अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ अनुभाष्य—'अप्राकृत गुण'—श्रीकृष्णभजन विषयमें सभीमें ही चैतन्य-सम्पादन करना अर्थात् सभीको प्रेमभक्ति प्रदान करना ॥ 43 ॥ महाप्रभुका दैन्य और श्रीरायकी प्रशंसाके छलसे आत्मगोपनकी चेष्टा :— प्रभु कहे,—“तुमि महाभागवतोत्तम। तोमार दर्शने सबार द्रव हैल मन ॥ 44 ॥ अन्येर कि कथा, आमि—'मायावादी संन्यासी'। आमिह तोमार स्पर्शे कृष्ण-प्रेमे भासि ॥ 45 ॥ एइ जानि' कठिन मोर हृदय शोधिते। सार्वभौम कहिलेन तोमारे मिलिते ॥” 46 ॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुने कहा,—“आप उत्तम महाभागवत हैं। मेरे नहीं, आपके दर्शनसे ही इन सबका हृदय द्रवीभूत हुआ है। दूसरोंकी तो बात ही क्या, एक मायावादी संन्यासी होनेपर भी मैं आपके स्पर्शसे श्रीकृष्ण-प्रेममें निमग्न हो रहा हूँ। मेरे कठोर (शुष्क, नीरस) हृदयको पवित्र करनेके लिये ही श्रीसार्वभौमने मुझे आपसे मिलनेके लिये कहा था ॥” 44-46 ॥ अनुभाष्य—महाभागवतके लक्षण—(अर्चनमार्गमें) जैसे, पद्मपुराणमें— “तापादिपञ्चसंस्कारी नवेज्या-कर्मकारकः। अर्थपञ्चकविद्विप्रः महाभागवतोत्तमः ॥” (भाव मार्गमें) यथा, श्रीमद्भागवतम् (11/2/45)में— “सर्वभूतेषु यः पश्येद्भगवद्भावमात्मनः। भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः ॥”
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[ 8/44-54 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अर्थात् “तापादि-पञ्चसंस्कार-विशिष्ट नवेज्याकर्म (अर्चन, मन्त्रपाठ, योग, याग, वन्दन, नाम-सङ्कीर्तन, सेवा, चिह्नके द्वारा अर्चन और वैष्णवाराधन) करनेवाले एवं अर्थपञ्चकको जाननेवाले ब्राह्मण ही महाभागवत हैं।” जो समस्त वस्तुओंको सभी जीवोंके हृदयमें नियन्ताके रूपमें स्थित परमात्मा श्रीहरिके विभूतिके रूपमें दर्शन करते हैं, वे उत्तम भागवत हैं॥44॥
अमृतानुकणिका— 'पञ्चसंस्कार'—ताप, पुण्ड्र मन्त्र और याग—इन पाँचोंको 'पञ्चसंस्कार' कहते हैं। इन 'पञ्चसंस्कार' अर्चनमार्गीय पाञ्चरात्रिक विधिमें विश्वास होना—यह मध्यम वैष्णवोंके लक्षण हैं। 'अर्थ-पञ्चक'—अर्थात् जानने योग्य पाँच विषय। पहला—प्राप्य अर्थात् जिसे प्राप्त करना है, वे भगवान्, दूसरा—प्राप्त करनेवाला स्वयं जीवात्मा, तीसरा—प्राप्त करनेका उपाय, चौथा—प्राप्तिके मार्गमें आनेवाली बाधाएँ और पाँचवाँ—प्राप्तिका फल॥44॥
महाप्रभु और भक्तके द्वारा परस्परकी स्तुति :— एइमत दुँहे स्तुति करे दुँहार गुणे। दुँहे दुँहार दरशने आनन्दित मने॥47॥
अनुवाद— इस प्रकार दोनों ही एक-दूसरेके गुणोंकी स्तुति करने लगे और एक-दूसरेके दर्शनसे दोनोंका मन बहुत आनन्दित हुआ॥47॥
वैष्णव-ब्राह्मणके घरमें महाप्रभुके द्वारा भिक्षा; महाप्रभुके निमन्त्रणमें अवैष्णव-ब्राह्मणब्रुवका अनाधिकार :— हेनकाले वैदिक एक वैष्णव ब्राह्मण। दण्डवत् करि’ कैल प्रभुरे निमन्त्रण॥48॥ निमन्त्रण मानिल ताँरे वैष्णव जानिया। रामानन्दे कहे प्रभु ईषत् हासिया॥49॥ श्रीरायके साथ महाप्रभुकी पुनः साक्षात्कारकी इच्छा :— “तोमार मुखे कृष्णकथा शुनिते हय मन। पुनरपि पाइ येन तोमार दरशन॥”50॥
अनुवाद— उसी समय एक वैदिक वैष्णव ब्राह्मण वहाँ आया और उसने महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम करके अपने घरमें भिक्षाके लिये निमन्त्रण दिया। महाप्रभुने उस ब्राह्मणको वैष्णव जानकर उसका निमन्त्रण स्वीकार किया। तब थोड़ा मुस्कुराते हुए श्रीरामानन्दसे कहने लगे,—“आपके श्रीमुखसे श्रीकृष्णकथा श्रवण करनेकी अत्यन्त उत्कण्ठा हो रही है। मैं आपका पुनः दर्शन करना चाहता हूँ॥”48-50॥
श्रीरायका दैन्य और सम्भ्रमसे महाप्रभुसे उपदेशकाङ्क्षा :— राय कहे,—“आइला यदि पामर शोधिते। दर्शनमात्रे शुद्ध नहे मोर दुष्ट चित्ते॥51॥ दिन पाँच-सात रहि’ करह मार्जन। तबे शुद्ध हय मोर एइ दुष्ट मन॥”52॥
अनुवाद— यह सुनकर श्रीरामानन्द रायने कहा,—“यदि आप मेरे जैसे पतितके चित्तको पवित्र करनेके लिये आये हैं, तो मेरा यह कलुषित चित्त आपके दर्शनमात्रसे शुद्ध नहीं हो सकता। आप कृपा करके कम-से-कम पाँच-सात दिन यहाँ रहकर इसका मार्जन कीजिये, तभी मेरा दुष्ट मन शुद्ध हो सकेगा॥”51-52॥
विदायीके समय भक्त और भगवान्, दोनोंके लिये परस्परका विरह असहनीय :— यद्यपि विच्छेद दोँहार सहन ना याय। तथापि दण्डवत् करि’ चलिला रामराय॥53॥ प्रभु याइ’ सेइ विप्रघरे भिक्षा कैल। दुइ जनार उत्कण्ठाय आसि’ सन्ध्या हैल॥54॥
अनुवाद— यद्यपि दोनोंको एक-दूसरेका विरह असहनीय हो रहा था, तथापि श्रीरामानन्द राय महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम करके चल दिये। महाप्रभु भी उस ब्राह्मणके साथ उसके घरमें पधारे और वहाँ भिक्षा ग्रहण की अर्थात् प्रसाद सेवन किया। दोनों मिलनेके लिये उत्कण्ठित हो रहे थे, तभी सन्ध्याका समय उपस्थित हुआ॥53-54॥
242 ।
आठवाँ अध्याय 8/55-57 ] महाप्रभुका प्रतिदिन तीन बार स्नान और सन्ध्याके समय महाप्रभुका श्रीरायके साथ मिलन :- प्रभु स्नान-कृत्य करि' आछेन बसिया। एकभृत्य-सङ्गे राय मिलिला आसिया ॥ 55 ॥ अनुवाद-महाप्रभु जब स्नान और सन्ध्या करनेके बाद आसनपर बैठकर हरिनाम कर रहे थे और श्रीरामानन्द रायकी प्रतिक्षा कर रहे थे, तभी साधारण वेशमें श्रीरामानन्द राय एक सेवकके साथ उनसे मिलनेके लिये पधारे॥ 55॥ अमृतप्रवाह भाष्य-संन्यासी तीनों सन्ध्याओंमें स्नान करते हैं। उसी विधिके अनुसार महाप्रभु सन्ध्याके समय स्नान करके बैठे थे॥ 55॥ श्रीरायका प्रणाम और महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन :- नमस्कार कैल राय, प्रभु कैल आलिङ्गने। दुइ जने कृष्ण-कथा कय सेइस्थाने ॥ 56 ॥ अनुवाद-श्रीरामानन्द रायने आते ही महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम किया और महाप्रभुने उठकर बड़े प्रेमसे उनका आलिङ्गन किया। इसके बाद दोनों एक निर्जन स्थानपर बैठकर परस्पर श्रीकृष्णकथा कहने-सुनने लगे॥ 56॥ महाप्रभु-रामानन्द संवाद; महाप्रभुके द्वारा साध्य-साधन जिज्ञासा; श्रीरायके उत्तर-(क) साधन (अभिधेय) स्तर- (1) सर्वप्रथम दैववर्णाश्रमरूप स्वधर्मके पालनसे सेश्वर-नैतिक अथवा धर्मजीवन-आरम्भ :- प्रभु कहे, -"पड़ श्लोक साध्येर निर्णय।" राय कहे,-"स्वधर्माचरणे विष्णुभक्ति हय ॥" 57 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 57॥ अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुने कहा, - "हे रामानन्दराय, साध्यतत्त्व-निर्णय करनेवाले शास्त्रके श्लोकोंका पाठ करो।" श्रीरायने कहा, - "मनुष्योंके द्वारा स्वधर्मका आचरण करनेसे विष्णुभक्ति होती है॥" 57॥ अनुभाष्य-श्रीरामानुजपादने 'वेदार्थ संग्रह'में कहा है- "एवंविध-परभक्तिरूप-ज्ञानविशेषस्योत्पादकः पूर्वोक्ता हरहरुपचीयमानज्ञानपूर्वक-कर्मानुगृहीत-भक्तियोग एव; यथोक्तं भगवता पराशरेण-'वर्णाश्रम" इति। निखिलजगदुद्धारणाया-वनितलेऽवतीर्णः परब्रह्मभूतः पुरुषोत्तमः स्वयमेतदुक्तवान्- "स्वकर्म निरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु। यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्। स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥" (गी० 18/45-46) इति यथोदितक्रमपरिणत-भक्त्येकलभ्य एव, भगवद्बोधायन-टङ्क-द्रविड़-गुहदेव-कपर्दि-भारुचि-प्रभृत्य-विगीत-शिष्टपरिगृहीत-पुरातन-वेद-वेदान्त-व्याख्यान-सुव्यक्तार्थ-श्रुतिनिकर-निदर्शिताेऽयं पन्थाः॥" मानवमात्रके लिये भक्ति ही अतिशय प्रिय और एकमात्र प्रयोजनीय है। इसके अतिरिक्त सभी कुछ अनपेक्षित एवं वितृष्णामय है। भक्तियुक्त आत्माके द्वारा ही श्रीभगवान् वरणीय हैं और भक्तोंको प्राप्त होते हैं। निरन्तर समृद्धिशील ज्ञानपूर्वक-कर्मानुगृहीत भक्तियोग ही धीरे-धीरे परम-भक्तिरूप विशेषज्ञानको उत्पन्न करता है। भगवान् पराशरने “वर्णाश्रमाचारवता" श्लोकमें इसी प्रकार कहा है। समस्त जगत्का उद्धार करनेके उद्देश्यसे पृथ्वीपर अवतीर्ण होकर परब्रह्मभूत पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने स्वयं ही गीतामें कहा है, - "मनुष्य अपने-अपने कर्मानुष्ठानमें लगे रहनेसे जिस प्रकार सिद्धि प्राप्त करेंगे, उसे श्रवण करो - जिन भगवान्से प्राणी उत्पन्न हुए हैं, जिन भगवान्के द्वारा यह जगत् विस्तृत हुआ है, मानव अपने कर्मके द्वारा उनका ही विशेष रूपसे अर्चन करके सिद्धि प्राप्त करेंगे।" यह सिद्धिका पथ कर्मानुगृहीत है, यथोचित-क्रमसे इसीके द्वारा भक्तिकी प्राप्ति होती है। भगवान् बोधायन, टङ्क, द्रविड़, गुहदेव, कपर्दि, भारुचि आदि सज्जनोंने भी इस प्रशंसनीय पथका ही अनुमोदन किया है। पुरातन वेद-वेदान्त-व्याख्या एवं सुन्दर रूपसे प्रकाशित (सुस्पष्ट) अर्थके द्वारा श्रुतियों भी इसी पन्थाका निर्देश करती हैं। रामानुजीय साम्प्रदायिक आचार्यगण कहते हैं, - "ब्रह्मप्राप्त्युपायश्च शास्त्राधिगत-तत्त्वज्ञानपूर्वक-स्वकर्मानुगृहीत-भक्तिनिष्ठासाध्यानवधिकातिशयप्रिय-विशदतममप्रत्यक्ष-तापन्नानुध्यान-रूप-परभक्तिरेव। वर्णाश्रमाचारवतेत्युक्तरीत्या न । 243
[ 8/57-58 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला संन्यासनीयता, नापि यत्किञ्चिदेकवर्ण-नियता, किन्तु ही तुम्हारे लिये प्रमाण हैं। इस कर्त्तव्य-विषयमें शास्त्रमें स्व-स्व-वर्णाश्रमनीयता। कर्माङ्गकं ज्ञानमेव, ज्ञानं न तु उपदिष्ट कर्मसे अवगत होकर उसे करनेके निमित्त नैष्कर्म्यं, नापि ज्ञानकर्मणोः सम-समुच्चयः।” योग्य होओ।” अर्थात् “शास्त्रोंका अध्ययनसे प्राप्त होनेवाले तत्त्वज्ञानके 'साध्य'का अर्थ है अभीष्ट वस्तु। इस अभीष्ट द्वारा वर्णाश्रम धर्मका पालन करते हुए भक्तिनिष्ठासे वस्तुको प्राप्त करनेकी चेष्टा साधन कहलाती है। साध्य होनेवाले असमोर्द्ध अतिशय प्रिय विभु-तत्त्वकी साध्य-तत्त्व अप्राकृत वस्तु है। यह तर्कादिसे परे है। प्रत्यक्ष निरन्तर ध्यानरूप पराभक्ति ही ब्रह्म-प्राप्तिका अप्राकृत विषयसे सम्बन्धित न होनेके कारण बद्धजीव उपाय है। 'वर्णाश्रमाचारवत्'-इस उक्ति के अनुसार भक्तिके इसका निर्णय नहीं कर सकता कि उसके लिये क्या लिये न तो संन्यासकी अनिवार्यता है और न ही भक्ति कल्याणकारी है। एकमात्र शास्त्रोंके द्वारा ही इसका किसी एक विशेष वर्णको ही प्राप्त होती है, अपितु निर्णय हो सकता है। (महाभारत, भीष्मपर्व 5/22)- अपने-अपने वर्णाश्रममें स्थित सभीके लिये प्राप्य है। “अचिन्त्या खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत्। कर्मके अङ्ग ज्ञान अथवा ज्ञानके द्वारा प्राप्त नैष्कर्म्य प्रकृतिभ्यः परं यच्च तदचिन्त्यस्य लक्षणम्॥” अथवा कर्म-ज्ञानके एकत्रित होनेसे भी भक्ति प्राप्त नहीं अर्थात् “जो भाव अचिन्त्य है, उसमें तर्क करना होती, क्योंकि भक्ति परम स्वतन्त्र है।” उचित नहीं होता। अचिन्त्यका लक्षण यही है कि वह 'साध्य'-जिसकी साधनके द्वारा सिद्धि होती है। प्रकृतिसे अतीत है।” भाः 1/2/13 श्लोक देखें॥ 57 ॥ इसलिये महाप्रभुने श्रीरामानन्दको शास्त्रके आधारपर अमृतानुकणिका-महाप्रभुने श्रीराय रामानन्दसे ही साध्य-तत्त्व निरूपित करनेके लिये कहा।” कहा-‘शास्त्रानुसार साध्यका निर्णय करो।' केवल शास्त्रके -श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 57 ॥ द्वारा प्रमाणित साध्य ही मान्य है। शास्त्र भगवान्की दैववर्णाश्रमरूप स्वधर्मके पालनसे विष्णुकी सन्तुष्टि :- निज वाणी है। वेद, वेदान्त, उपनिषद्, पुराणादि अनेक विष्णुपुराण (3/8/9) में पराशरकी उक्ति- शास्त्र हैं और इनमें अमल-पुराण श्रीमद्भागवतम् ही वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण परः पुमान्। सर्वश्रेष्ठ है। इन शास्त्रोंका अनादर करके जो व्यक्ति विष्णुराराध्यते पन्था नान्यत्तत्तोषकारणम्॥ 58 ॥ हरिभक्तिका कोई नया पथ आविष्कार करते हैं, वे अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 58 ॥ जगत्के लिये उत्पात-स्वरूप हैं। नारद पञ्चरात्रमें कहा अमृतप्रवाह भाष्य-परमेश्वर विष्णु वर्णधर्म और गया है- आश्रमधर्मके आचरणसे युक्त पुरुषके द्वारा आराधित “श्रुति स्मृति पुराणादिपञ्चरात्रविधिं विना। होते हैं। वर्णाश्रमके आचरणके बिना उन्हें पूर्णरूपसे ऐकान्तिकी हरेर्भक्तिरुत्पातायैव कल्पते॥” सन्तुष्ट करनेका अन्य कोई कारण (उपाय) नहीं है। अर्थात् “श्रुति-स्मृति-पुराणादि और पञ्चरात्रकी विधिका तात्पर्य यह है कि भगवान्को परितुष्ट करना ही त्याग करके की गयी ऐकान्तिकी हरिभक्ति भी विघ्न साध्यतत्त्व है। मनुष्यके द्वारा अपने-अपने स्वभावके ही उत्पादन करती है।” अनुसार निर्णीत वर्ण-धर्म और अवस्थाके अनुसार श्रीकृष्णने गीता (16/24) में कहा है- निर्णीत आश्रमधर्मका पालन करनेसे भगवान् विष्णु “तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। सन्तुष्ट होते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र-ये ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥” अर्थात् “कार्य-अकार्यकी व्यवस्थाके विषयमें शास्त्र 244 ।
आठवाँ अध्याय 8/58-59 ] चार वर्ण हैं। प्रत्येक वर्णके लिये जो धर्मशास्त्रोंमें (2) भगवान्में कर्मार्पणरूपी कर्ममिश्रा निर्णीत है, वैसा ही आचरण करके मनुष्य जीवनयात्रा भक्ति शुद्धभक्ति नहीं :– निर्वाह करेंगे। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास,–ये प्रभु कहे,–“एहो बाह्य, आगे कह आर।” चार आश्रम हैं। मनुष्य अपने-अपने आश्रमके लिये राय कहे,–“कृष्ण-कर्मार्पण—सर्वसाध्य-सार॥”59॥ कहे गये धर्मका आचरण करके भगवान्को सन्तुष्ट करेंगे। इसमें व्यभिचार होने अर्थात् शास्त्रकी आज्ञाका अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुने कहा,–“यह तो उल्लङ्घन करनेसे मनुष्यको प्रत्यवाय (दोष) लगता है बाहरकी बात है, इससे आगे कुछ और कहो।” तब तथा नरककी प्राप्ति होती है। परमार्थ-पथपर चलनेके श्रीरामानन्दने कहा,–“श्रीकृष्णको समस्त कर्मोंका अर्पण लिये सर्वप्रथम धर्ममय जीवनकी आवश्यकता है। ही साध्यसार है॥”59॥ जीवन निर्वाहकारी धर्म भिन्न-भिन्न स्वभाववाले व्यक्तियोंके लिये स्वाभाविक रूपसे भिन्न-भिन्न है। अनुभाष्य—साध्य अर्थात् साधनयोग्य अथवा साधनीय भक्तिका निर्णय करनेमें प्रवृत्त होकर श्रीरामानन्दने सबसे मनुष्यका जन्म, सङ्ग और शिक्षासे स्वभावका पहले ब्रह्माण्डमें अवस्थित साधकों जैसी बुद्धि धारण उदय होता है। स्वभावके अनुसार वर्ण स्वीकार न की। उन्होंने अन्याभिलाषिताका (शुद्धभक्तिके लक्षणका) करनेसे कोई भी जीवन-यात्रामें चतुर नहीं हो सकता। खण्डन करके नीतिवादियोंका पक्ष लेते हुए वर्णधर्म स्वभाव बहुत प्रकारके होनेपर भी मूल विभागसे चार और आश्रमधर्म पालनके द्वारा ही विष्णुकी प्रसन्नता प्रकारके हैं–(1) ईश्वर और विद्या ही जिनका होती है,—इसे 'साध्य' प्रमाण बतलाया। ऐसे 'साध्य' स्वाभाविक विषय है, वे 'ब्राह्मण' हैं; (2) शौर्य और निर्णयकारीको अस्मिताके (मैं यह शरीर हूँ और राज्यशासन ही जिनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति है, वे 'क्षत्रिय' शरीरसे सम्बन्धित सब वस्तुएँ मेरी हैं, ऐसे अभिमानके) हैं; (3) कृषि, पशुपालन और वाणिज्य (व्यापार) क्रिया कारण जिस सम्बन्धकी उपलब्धि होती है, वह ब्रह्माण्डके ही जिनका स्वभावगत कर्म है, वे 'वैश्य' हैं; (4) तीनों अन्तर्गत है, इसलिये बाह्य (बाहरी) है। इसे बाहरी वर्णोंकी सेवामात्र ही जिनका स्वभाव है, वे 'शूद्र' हैं। कहनेका कारण यह है कि श्रीभगवान् गौरहरिने अपने अपने-अपने वर्णधर्म एवं अवस्था क्रमसे आराधना धाम वैकुण्ठ या गोलोकके बाहरी स्थानोंपर रहनेवाले करते-करते मानवकी स्वाभाविक उन्नति होती है; व्यक्तियोंकी बाहरी अनुभूतिको 'बाह्य साध्य' कहकर विपरीत आचरण करनेसे स्वाभाविक पतन होता है। उसका परित्याग करते हुए आगे कुछ और कहनेके इसलिये धर्मजीवन ही मानवके सभी उत्कर्षका मूल लिये कहा। श्रीरामानन्दने इस साध्यके विषयमें जो है॥ 58 ॥ श्लोक प्रमाण रूपमें कहा, उसमें विष्णुके 'सविशेष' या 'निर्विशेष' होनेका निर्देश नहीं किया। इसलिये इस अनुभाष्य— वर्णाश्रमाचारवता (ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्रवर्णाचारपालनर्तेन श्रेणीके साधक कर्ममार्गमें 'निर्विशेष' और 'सविशेष' ब्रह्मचारि-गृहस्थ-वानप्रस्थ-भिक्ष्वाश्रमाचारपालनपरेण च दोनों प्रकारकी विष्णु-आराधनाको लक्ष्य कर सकते हैं। स्व-स्व-वर्णाश्रमधर्माचारवता) पुरुषेण परः पुमान् (पुरुषोत्तमः (श्रीरामानन्द रायने इस बातको समझकर) कर्म-उद्देश्यका विष्णुः) आराध्यते। तत् (तस्य विष्णोः) अन्यः (वर्णाश्रमधर्मविनाशी तात्पर्य निर्विशेष-तत्त्वके विचारको त्यागकर सविशेष-तत्त्व कोऽपि) पन्थाः (मार्गः) तोषकारणं (प्रीत्यर्थं) न भवति। ही है, उसके अनुरूप अगले श्लोकमें प्रमाण दिया॥ 59 ॥ श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 58॥ अमृताणुकणिका—“श्रीरामानन्दने कहा कि श्रीकृष्णको अपने समस्त कर्मोंका अर्पण ही साध्यसार है। परन्तु । 245
[ 8/59-60 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीकृष्णको कर्मार्पण करना—यह तो साधन दिखता है। कर्त्ताने कुछ कर्म करके उन्हें अर्पण किया—यह तो क्रिया है, साधन है। किन्तु यहाँ श्रीकृष्णके प्रति समस्त कर्मोंके अर्पणको 'सर्वसाध्य सार' कहा है, क्योंकि गीता (3/9) में कहा है— “यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः। तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर॥” अर्थात् “हे कुन्तीनन्दन! श्रीविष्णुके लिये अर्पित निष्काम कर्मके अतिरिक्त अन्य कर्मोंके द्वारा मनुष्यको कर्मबन्धन प्राप्त होता है। अतः तुम फलाकाङ्क्षारहित होकर भगवान् विष्णुके उद्देश्यसे कर्मका भली-भाँति आचरण करो।” विष्णुके लिये किये गये कर्मके अतिरिक्त अन्यान्य सभी कर्म लोक-बन्धक हैं अर्थात् उन कर्मोंसे लोग बद्ध हो जाते हैं। इसलिये उन कर्मोंसे जन्म-मरणके चक्रसे मुक्ति नहीं होती। इसके विपरीत परमेश्वरके लिये अर्पित कर्म बन्धनका कारण नहीं हैं। इसलिये कह रहे हैं—'यज्ञार्थात्'। श्रुतियोंमें यज्ञको ही विष्णु कहा गया है—'यज्ञो वै विष्णु'। भागवत (11/19/39)में भगवान्ने स्वयं उद्धवजीको कहा है—'यज्ञोऽहं भगवत्तमः' अर्थात् मैं वसुदेवनन्दन ही यज्ञ हूँ। श्रीविष्णुके लिये अर्पित निष्काम कर्म ही यज्ञ कहलाता है। परन्तु श्रीविष्णुको अर्पित धर्म भी यदि कामनाके साथ किया जाय, तो वह बन्धनकारी होगा। इसके लिये ही कहते हैं—'मुक्तसङ्गः' अर्थात् फलाकाङ्क्षारहित। 'तदर्थम् कर्म कौन्तेय' अर्थात् कर्म और सांसारिक वस्तुओंके प्रति आसक्तिको काटकर। भव-बन्धनसे मुक्ति ही श्रीकृष्ण-कर्मार्पणका फल है—यह साध्य है और श्रीकृष्ण-कर्मार्पण साधन है।”—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी॥59॥ भोगलिप्त कर्मोंको श्रीकृष्णको कर्मार्पणका आदेश :— श्रीमद्भगवद्गीता (9/27)— यत् करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत् कुरुष्व मदर्पणम्॥60॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥60॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गीतामें कहा गया है, —“हे कौन्तेय! तुम जो कुछ भी करो, जो कुछ भी खाओ, जो कोई भी यज्ञ करो, जो कुछ भी दान करो और जो भी तपस्या करो, वह सभी मुझ कृष्णको अर्पण करो। श्रीरायके प्रथम उत्तरमें वर्णाश्रम-धर्मके अन्तर्गत की जानेवाली श्रीकृष्ण-आराधनाको 'साध्य' निर्दिष्ट करनेपर महाप्रभुने उसको 'बाह्य' कहकर अपने प्रश्नके यथार्थ उत्तरको प्रदान करनेके लिये सामान्य वर्णाश्रम- धर्मकी अपेक्षा जो श्रेष्ठ है, उसे बतानेकी आज्ञा दी। उसे सुनकर श्रीरायने उत्तर दिया, —उस वर्णाश्रमके अन्तर्गत किये जानेवाले सभी कर्मोंको श्रीकृष्णमें अर्पण करना ही 'सभी साध्योंका सार' कहा गया है॥59-60॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा— हे कौन्तेय (अर्जुन) यत् कर्म करोषि, यत् अश्नासि, यत् ददासि, यत् जुहोषि, यत् तपस्यसि, तत् सर्वं मदर्पणं कुरुष्व। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। इस सन्दर्भमें भाः 11/2/36 श्लोक भी देखें॥60॥ अमृतानुकणिका—'नारद पञ्चरात्रमें कहा है— 'लौकिकी वैदिकी वापि या क्रिया क्रियते मुने। हरिसेवानुकूलैव सा कार्या भक्तिमिच्छता॥' अर्थात् हे मुने! मनुष्य लौकिक और वैदिक जिन समस्त कर्मोंको करते हैं, भक्त्याभिलाषी व्यक्ति वे सब कर्म जो हरिसेवाके अनुकूल हैं, उन्हींको करेंगे।' यहाँ कर्मोंमें लौकिक और वैदिक—दोनों ही कर्म कहे गये हैं। लौकिक कर्म हैं—भोजन-पान आदि और वैदिक कर्म हैं—दान, तप, होम आदि। भगवान् कह रहे हैं कि लौकिकी-वैदिकी सभी क्रियाएँ मुझे अर्पण करो। इसका यह अर्थ नहीं है कि हम जो कुछ करें, जो कुछ खायें-पीयें, सभी कुछ भगवान्के चरणोंमें समर्पण करनेसे दोष नहीं होगा। अथवा ऐसा भी नहीं 246 ।
आठवाँ अध्याय 8/60-62 ] समझना चाहिये कि वैदिक कर्म भी जिस किसी भी देवता या सङ्कल्पके साथ क्यों न हो, केवल स्मार्त्तोंकी भाँति 'श्रीकृष्णाय समर्पणमस्तु'– यह मन्त्र पढ़नेसे ही समर्पण हो जायेगा। दुर्योधनकी भाँति आसुरी बुद्धिवाले कहते हैं कि 'मेरे पाप इत्यादि जो भी हैं, आप करवानेवाले हैं। मैं निमित्त मात्र हूँ और आप मूल हैं।' यह ठीक नहीं है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्त्ती ठाकुर 'यत्करोषि' श्लोककी टीकामें कहते हैं—कर्मी केवल वैदिक कर्मोंको भगवान्को अर्पित करते हैं, वह भी इसलिये कि उनकी कर्मकी कामना विफल न हो जाय। किन्तु भक्तगण 'भगवान् ही मेरे प्रभु हैं'– ऐसी भावनाकर अपने लौकिक, वैदिक, दैहिकादि समस्त कर्मोंको भगवान्की प्रीतिके लिये ही उनके चरणोंमें समर्पित करते हैं। दोनोंमें यही महान पार्थक्य है। इसलिये महाप्रभुने इसे बाह्य कहा है।"- श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 60 ॥ (3) केवल फलभोग-त्याग या नैष्कर्म्य शुद्धभक्ति नहीं :– प्रभु कहे, - "एहो बाह्य, आगे कह आर।" राय कहे, - "स्वधर्म-त्याग, - एइ साध्य-सार ॥" 61 ॥ अनुवाद–कर्मार्पणकी बात सुनकर महाप्रभुने कहा, - "यह भी बाहरकी बात है, इससे आगे कुछ और बतलाओ।" तब श्रीरामानन्द रायने कहा, - "स्वधर्मका त्याग ही सभी साध्योंका सार है॥" 61 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कर्मार्पणकी बात सुनकर भी महाप्रभुने कहा, - यह भी बाहरी है, मेरे प्रश्नका उत्तर इसके भी आगे है, उसे बोलो। उसके उत्तरमें श्रीरायने कहा, - स्वधर्म-त्याग ही साध्यसार है, अर्थात् चारों वर्णोंमेंसे ब्राह्मण अपने (गृह) धर्मको त्याग करके संन्यास ग्रहण करता है एवं अन्य सब वर्ण उसके अनुसार वैराग्य-लक्षण ग्रहण करके गृहत्याग करते हैं। इस संन्यासका नाम स्वधर्मत्याग अथवा कर्मत्याग है। त्यागधर्मसे हरिको प्रसन्नता प्राप्त होती है ॥ 61 ॥ अनुभाष्य– 'मदर्पण'-शब्दसे यद्यपि जड़-निर्विशेषको छोड़कर स्वतन्त्र सविशेषतत्त्व-स्वरूप श्रीकृष्णको ही अर्पण करना समझा जाता है, तथापि साधककी मैं और मेरेपनकी उपलब्धि ब्रह्माण्डके अन्तर्गत है एवं साधनकी वृत्ति भी ब्रह्माण्डके अन्तर्गत है, इसलिये यह भी बाहरी है। अर्थात् कर्मी जीव अपनी बाहरी-अनुभूतिसे किये गये बाहरी-कर्मोंको श्रीकृष्णको प्रदान करनेका उपदेश-मात्र प्राप्त कर रहे हैं। तब श्रीरामानन्द इस भावका शोधन करके कर्मोन्नत जीवको जिस प्रकारकी उन्नति करनी होती है, उसी भावके अनुरूप होकर स्वधर्म त्यागके द्वारा जो साध्य प्राप्त होता है, ऐसा प्रमाण कहा ॥ 61 ॥ वर्णाश्रमरूप स्वधर्म-त्याग करके हरिभजन :– श्रीमद्भागवत (11/11/32) – आज्ञायैवं गुणान् दोषान्मयादिष्टानपि स्वकान्। धर्मान् संत्यज्य यः सर्वान् मां भजेत् स सत्तमः ॥ 62 ॥ अनुवाद–अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 62 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-धर्मशास्त्रोंमें मुझ भगवान्ने जिनको 'धर्म' कहकर आदेश किया है, उनके गुण-दोषका विचार करके, उन सभी प्रकारके धर्मोंकी प्रवृत्तिको छोड़कर जो मेरा भजन करते हैं, वे ही सबसे श्रेष्ठ (साधु) हैं ॥ 62 ॥ अनुभाष्य–जब उद्धवजीने भगवान्के प्रिय साधुओंके लक्षण जाननेकी अभिलाषा दिखलायी, तब उसके उत्तरमें श्रीभगवान्ने कहा– यः (साधकः) गुणान दोषान् (प्राकृत-सदसद्भावादीन्) आज्ञाय (ज्ञात्वा) अपि मया (वैदिककर्मोपदेशकेन) [कर्मरतान्] आदिष्टान् (उपदिष्टान्) सर्वान् स्वकान् धर्मान् (लौकिक- विप्रक्षत्रियवैश्यशूद्र-वर्णधर्मान् ब्रह्मचारिगृहस्थवानप्रस्थ- संन्यासाद्याश्रमधर्मांश्च) संत्यज्य (दूरे सम्यक् विहाय) मां (विशेषतत्त्वाश्रयं स्वतन्त्रं भगवन्तं कृष्णं) भजेत्, स तु सत्तमः (साधूनां श्रेष्ठः)। श्लोक-भावानुवाद–अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 62 ॥ । 247
[ 8/63-64 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीमद्भगवद्गीता (18/66)— सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥63॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥63॥ अमृतप्रवाह भाष्य—समस्त धर्मोंका परित्याग करके एकमात्र, मैं जो भगवान् हूँ, मेरे शरणागत होओ। ऐसा करनेपर मैं तुम्हें समस्त पापोंसे मुक्त करूँगा। तुम शोक मत करो॥63॥ अनुभाष्य—श्रीभगवान्का अर्जुनको गुह्य उपदेश,— सर्वधर्मान् (ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्रादि-ब्रह्माण्डान्तर्गतवर्णधर्मान् ब्रह्मचारि-गृहस्थ-वानप्रस्थतुर्याश्रमादिब्रह्माण्डान्तर्गताश्रमधर्मांश्च) परित्यज्य (दूरे विहाय) एकं (तदतीतम् अद्वयज्ञानम्) [अव्यभिचारिण्या मत्या] मां (सविशेषतत्त्वं भगवन्तं कृष्णं) शरणं व्रज (गच्छ); अहं त्वां सर्वपापेभ्यः (ब्रह्माण्डान्तर्गतेभ्यः प्राकृत-नित्यवैदिक-कर्मानुष्ठानपरित्यागजनिताधर्मेभ्यः) मोक्षयिष्यामि (उद्धारयामि)। मा शुचः (अनित्यधर्मजन्य-शोकं मा कुरु)। श्लोक-भावानुवाद—ब्रह्माण्डके अन्तर्गत वर्णाश्रमधर्म (ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्रादि वर्णधर्म और ब्रह्मचारी- गृहस्थ-वानप्रस्थ-संन्यासादि आश्रमधर्म) का दूरसे ही त्याग करके अव्यभिचारिणी मतिसे एक मुझ अद्वयज्ञान सविशेष-तत्त्व भगवान् कृष्णकी शरणमें आ जाओ। मैं तुम्हें समस्त पापोंसे अर्थात् नित्य वैदिक अनुष्ठानरूपी धर्मके त्यागसे उत्पन्न पापोंसे मुक्त कर दूँगा। तुम अपने अनित्य धर्मोंको (लौकिक कर्त्तव्यको) त्याग करनेका शोक मत करो। श्रीरघुनाथ दासगोस्वामी प्रभुने स्वरचित 'मनःशिक्षा'में— “न धर्मं नाधर्मं श्रुतिगणनिरुक्तं किल कुरु, व्रजे राधाकृष्णप्रचुरपरिचर्यामिह तनु” आदि कहा है। भाः 4/29/46—“यदा यमनुगृह्णाति भगवान्आत्मभावितः। स जहाति मतिं लोके वेदे च परिनिष्ठिताम्॥” इस प्रसङ्गमें भाः 1/5/17 श्लोक भी देखें। हे मेरे प्यारे मन! श्रुतियोंमें कथित धर्म और अधर्म (पुण्यजनक धर्म और पापमूलक अधर्म) कुछ भी मत करो, बल्कि श्रुतियोंने जिन्हें सर्वोपरि परमतत्त्व निर्धारित किया है, उन श्रीश्रीराधाकृष्ण-युगलकी व्रजमें प्रेममयी प्रचुर सेवा करो। जिस समय परिपूर्ण ऐश्वर्यशाली भगवान् किसी भी जीवात्माको आत्म-समर्पण करते देखकर उसपर प्रसन्न होकर अथवा उसकी आत्मवृत्तिके द्वारा सेवित होकर उसपर कृपा करते हैं, उस समय वह भक्त लौकिक-व्यवहार और वैदिक कर्मकाण्डमें अत्यधिक आसक्तिका परित्याग कर देता है॥63॥ अमृतानुकणिका—“महाप्रभुने भी इन दोनों प्रमाणोंको बाह्य बताया, क्योंकि धर्मका बुद्धिपूर्वक त्याग और षड्विधा शरणागतिमें श्रीकृष्ण-सेवाका कोई विचार नहीं है। यह जीवके स्वरूपसे सम्बन्धित नहीं है। यह भक्तिके लिये एक सीढ़ी मात्र है। वेद-विहित कर्मोंका त्याग तीन प्रकारके लोग करते हैं—1) मूर्ख, अज्ञानी— जिन्हें कर्त्तव्य-अकर्त्तव्यका कोई ज्ञान नहीं है। 2) नास्तिक—जिन्हें भगवान् और शास्त्रोंमें विश्वास नहीं है। 3) जिन्हें शास्त्र-वचनोंपर विश्वास है कि श्रीकृष्णभक्ति करनेसे ही सभी कर्म हो जाते हैं, जैसे मध्यलीला (22/62) में कहा गया है, 'कृष्णे भक्ति कैले सर्वकर्म कृत हय' अर्थात् 'कृष्ण भक्ति करनेसे सब कार्य करना हो जाता है।' परन्तु इसमें भी एक विचार है, जैसा भागवत (11/20/9) में कहा है 'तावत् कर्माणि कुर्वीत' अर्थात् जब तक कर्मसे निर्वेद न हो जाय, तब तक कर्म करो, अथवा अकस्मात् किसी महत् पुरुषकी कृपासे भगवत्-कथा श्रवण-कीर्तनमें आत्यन्तिक श्रद्धा हो जाय कि कृष्णभक्ति ही एकमात्र श्रेय है, तभी स्वधर्म-त्यागका अधिकार प्राप्त होता है।”—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी॥63॥ (4) ज्ञानमिश्रा भक्ति शुद्धभक्ति नहीं :— प्रभु कहे,—“एहो बाह्य, आगे कह आर।” राय कहे,—“ज्ञानमिश्रा भक्ति—साध्यसार॥”64॥ 248 ।
आठवाँ अध्याय 8/64-65 ] अनुवाद-महाप्रभुने कहा,-"यह भी बाहरी है, इससे आगे कुछ और कहो।" श्रीरामानन्द रायने कहा,-"ज्ञानमिश्रा भक्ति सभी साध्योंका सार है॥"64॥ अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुने इस उत्तरको सुनकर इसको (सभी धर्मोंके त्यागको) भी बाहरी कहकर, इसकी अपेक्षा श्रेष्ठ बात कहनेकी आज्ञा दी। उसके उत्तरमें श्रीरायने कहा,-ज्ञानमिश्राभक्तिको 'साध्य-सार' कहा जाता है॥64॥ अनुभाष्य-ब्रह्माण्डसे परे विरजा नदीमें तीनों गुणोंकी प्रबलताका अभाव है, वहाँ उनकी साम्यावस्था अथवा अव्यक्त-अवस्थामात्र है। अन्तरङ्गा शक्तिके द्वारा प्रकटित वैकुण्ठ और बहिरङ्गाशक्तिके द्वारा प्रकटित ब्रह्माण्ड, इन दोनोंके बीच ब्रह्मलोक और विरजा नदी हैं। ये दोनों स्थान (ब्रह्मलोक और विरजा नदी) जड़-जगत्से विरक्त और जड़-निर्विशेष जीवोंकी उपलब्धिका आश्रय हैं, इसलिये ये स्थान वैकुण्ठ नहीं हैं और उससे बाहर स्थित होनेके कारण बाह्य हैं। ब्रह्माण्डके अन्तर्गत सब प्रकारके धर्मोंका त्याग करनेवाले साधकको वैकुण्ठ अथवा गोलोककी अनुभूति नहीं होती। सर्वधर्मत्याग साध्यवृत्तिसे जड़भोगोंका त्याग करनेपर भी वह अचित् निर्विशेषत्वकी ही प्रतिपादक है, इसलिये वह भी बाह्य है। श्रीरामानन्दने तब उस भावको बाह्य साध्यभाव जानकर ज्ञानमिश्रा भक्ति ही उससे उन्नत साध्य है, उस विषयमें प्रमाण बोला॥64॥ अमृताणुकणिका- "इसके पूर्व श्रीरामानन्दने कर्ममिश्रा भक्तिके बारेमें कहा था, अब वे ज्ञानमिश्राभक्तिको साध्य-सार बतला रहे हैं। ज्ञानमिश्राभक्ति अर्थात् 1) ज्ञानसे मिश्रित भक्ति और 2) भक्तिसे प्राप्त होने वाला ज्ञान (यह पूर्व कथितसे उत्तम है)। ज्ञानसे मिश्रित भक्ति सेविका है; वह भक्ति अपना फल देकर अन्तर्धान हो जायेगी। इसमें तीन प्रकारके ज्ञान सम्मिलित हैं-1) तत्-पदार्थका ज्ञान (परतत्त्व अथवा भगवत्-तत्त्वका ज्ञान। 2) त्वं-पदार्थका ज्ञान अर्थात् आत्म-तत्त्वका ज्ञान। जीव और ब्रह्मका परस्पर सम्बन्धज्ञान भी इसीके अन्तर्गत है और 3) जीव-ब्रह्म ऐक्य ज्ञान-यह अङ्ग भक्तिका नितान्त विरोधी है। इसके अन्तर्गत जीवका ब्रह्मके साथ स्वरूपगत सम्बन्ध ही स्फुरित नहीं हो सकता। अतः सेवाकी वासनाका भी उदय नहीं होगा। किन्तु प्रथम दो अङ्ग-भगवद्-तत्त्वका ज्ञान और आत्म-तत्त्वका ज्ञान भक्ति-विरोधी नहीं हैं। पयारमें कहे गये 'ज्ञान' शब्दके व्यापक अर्थको ग्रहण करनेसे इन तीनों अङ्गोंसे मिश्रित भक्तिको ही ज्ञानमिश्रा भक्ति कहा गया है। भगवत्-तत्त्व ज्ञान ऐश्वर्यका बोधक है, जो व्रजभक्तिके प्रतिकूल है, इसमें लौकिक-सद्बन्धुवत् भाव उदित नहीं होता। भक्तिके प्रारम्भमें यह ज्ञान सहायक है, किन्तु भक्तिमें अग्रसर होनेपर सहायक नहीं होगा।"—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥64॥ सम्बन्धज्ञानप्राप्त ब्राह्मण ही श्रीकृष्णभजनफलसे वैष्णव :- श्रीमद्भगवद्गीता (18/54)- ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति। समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥ 65 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 65 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-गीतामें कहा गया है, -अभेद ब्रह्मवादरूपी ज्ञानचर्चाके द्वारा स्वयं प्रसन्नात्माका शोक और कामनारहित होनेपर तथा सभी जीवोंमें समभावयुक्त ब्रह्मता प्राप्त करनेके बाद उसे मेरी पराभक्ति प्राप्त होती है। तात्पर्य यह है कि पहले कर्ममिश्रा-भक्तिका उल्लेख हुआ था, उसकी अपेक्षा ज्ञानमिश्रा भक्ति श्रेष्ठ है॥65॥ अनुभाष्य-अर्जुनके प्रति श्रीभगवान्के वचन- ब्रह्मभूतः (ब्रह्माण्डान्तर्गतबोधमुक्तः निर्विशेषानुभवपरः) प्रसन्नात्मा (अभावधर्मरहितः) शोचति न (जड़ाभावे तस्य शोकः नास्ति) काङ्क्षति न (तस्य जड़भोगे आकाङ्क्षा च न वर्त्तते) सर्वेषु भूतेषु [मत्सेवासम्बन्धयोगं ज्ञात्वा] समः सन्, परां (परमां शुद्धां) मद्भक्तिं लभते। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 65 ॥ । 249
[ 8/65-66 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अमृतानुकणिका—'‘ब्रह्मभूत’ अर्थात् जिनका सर्दी- गर्मी, मान-अपमान, सुख-दुःखादिमें समभाव है। सत्त्व, रज और तमोगुणकी उपाधिसे अनावृत होनेपर साधक जीव ब्रह्मभूत हो जाते हैं। अनावृत चैतन्य प्राप्त करके वे 'प्रसन्नात्मा' हो जाते हैं। वे नष्ट-विषयोंके लिये शोक नहीं करते और ‘न कांक्षति’—न ही अप्राप्त वस्तुकी अकाङ्क्षा करते हैं। 'समः सर्वभूतेषु’—वे भद्र-अभद्र सभी भूतोंमें बालकके समान समदर्शी हो जाते हैं। कोई लंगड़ा है, लूला है, गोरा है अथवा काला है—वे यह सब विचार नहीं करते, वह केवल आत्मदृष्टि रखते हैं।
एक समय अष्टावक्र ऋषि अपने हिमालयके आसनसे जनकपुरीमें महाज्ञानी जनकजीके दरबारमें आये। उनका टेढ़े शरीरको देखकर सब लोग हँसने लगे। जनकजी सबको हँसते हुए देखकर हँस दिये। तो अष्टावक्र भी लाठी रखकर बड़े ज़ोरसे हँसने लगे। तब राजा जनकने पूछा कि ये लोग तो आपके अङ्गके टेढ़ेपन, कुबड़ेपनपर हँस रहे हैं, किन्तु आप किसलिये हँस रहे हैं? अष्टावक्र बोले—मैं यह सुनकर महाराज जनकके दरबारमें आया था कि यहाँ बड़े-बड़े पण्डित लोग हैं, ब्रह्मतत्त्वको जाननेवाले हैं, सब प्राणियोंमें सम हैं। किन्तु मैं देखता हूँ कि यहाँ सब चमार-मोची हैं। वे लोग यह देखते हैं कि अच्छा चमड़ा है या खराब चमड़ा है। आत्म-तत्त्वका किसीको ज्ञान नहीं है, इसलिये मैं हँस रहा था।
यह ब्रह्मभूत ज्ञान उच्च-कोटिका साधन नहीं है। किन्तु यदि साधुसङ्ग प्राप्त हो जाय और अपराध न हों, तब पराभक्ति अर्थात् प्रेमाभक्ति प्राप्त होनेकी सम्भावना है। 'लभते' का तात्पर्य है कि साधकने पूर्वकालमें मोक्ष-सिद्धिके लिये ज्ञान-वैराग्यका अवलम्बन तो किया, परन्तु उसमें भक्ति आंशिक भावसे थी, उसकी उपलब्धि नहीं थी। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्त्ती ठाकुर एक उदाहरण देते हैं—मूँग-उड़द दाल आदिमें यदि स्वर्ण-कणिका मिल जाय, तो दालमें आग लग जानेपर भी स्वर्ण-कणिका नष्ट नहीं होती। ज्ञानरूपी दालमें यह स्वर्ण कणिका संवित्-ह्लादिनीकी वृत्ति भक्ति है। यह कभी विनष्ट नहीं होती। कोई अपराध हो जानेपर अन्तर्धान हो जाती है। किन्तु यदि अपराध न हो तो साधुओंके सङ्गमें हरिकथा श्रवण करनेसे प्रेमाभक्ति प्राप्त होनेकी सम्भावना रहती है। कृष्णकी लीला-कथाओंका श्रवण, भागवत, भगवद्भक्तोंके चरित्र श्रवण करनेसे उनकी वह स्वर्ण-कणिकारूपी भक्ति विकसित हो उठती है, साथमें उनका ब्रह्म-ऐक्य ज्ञान नष्ट हो जाता है। सत्सङ्ग ही एकमात्र भक्तिप्रद सुकृति है। साधुजनोंके मुखसे निकली हरिकथाको श्रवण करनेसे ही भक्तिका क्रम विकास होता है। शुद्ध भक्तोंका सङ्ग जीवको प्रेम तक अवश्य ले जायेगा। शुद्ध गुरु और वैष्णवोंके सङ्गसे ज्ञानरूपी दाल श्रवण-कीर्तनरूपी आगमें जलकर भस्म हो जाती है और शुद्धभक्तिरूपी स्वर्ण-कणिका प्राप्त हो जाती है। किन्तु महाप्रभुने इसे भी बाह्य बतलाया, क्योंकि साधुसङ्ग सभीको मिलेगा—यह आवश्यक नहीं है।” —श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी॥ 65 ॥
(5) ज्ञानशून्य भक्ति ही शुद्धभक्ति-शब्दवाच्य :— प्रभु कहे,—“एहो बाह्य, आगे कह आर।” राय कहे,—“ज्ञानशून्या भक्ति—साध्यसार॥”66 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 66 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—ज्ञानमिश्राभक्तिकी बात सुनकर महाप्रभुने कहा,–“यह भी बाह्य है; इसके परे जो है, उसे बोलो।” श्रीरायने कहा,—“ज्ञानशून्या भक्ति ही साध्योंका सार है॥”66॥
अनुभाष्य—इस (ज्ञानमिश्राभक्ति) अवस्थामें भी अस्मिता और उसकी वृत्ति शुद्ध-वैकुण्ठवाली अथवा वैकुण्ठको उद्देश्य नहीं करनेवाली होनेके कारण, यह भी बाह्य है। इस स्थितिमें साधक जड़से बाध्य नहीं रहनेपर अथवा उसको जड़से अतिरिक्त निर्मल अनुभव होनेपर भी उसे वास्तव सत्य-वस्तुकी (सविशेष भगवान्की) स्वतन्त्र
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आठवाँ अध्याय 8/66-67 ] और विशेष उपलब्धि नहीं होती। इसलिये उसकी अपनी अनुभूति और अपने मनकी वृत्ति-बहिर्मुखिनी है। वास्तवमें, वह भी शुद्धजीवका साध्य नहीं है। निर्विशेषत्वकी कल्पनामें सच्चिदानन्द-विशेष-समूह सुप्त रहता है। उससे पहले काल्पनिक विचारवाले वाक्योंका तात्पर्य भी निर्विशेषध्यान है, इसलिये वैसी भगवद्- सेवावृत्तिरहित काल्पनिक निर्विशेषपरक मुक्त अवस्था भी बाह्य है॥66॥ श्रीकृष्णके सम्पूर्ण शरणागतजन ही श्रीकृष्णवशकारी शुद्धभक्त :- श्रीमद्भागवत (10/14/3)- ज्ञाने प्रयासमुदपास्य नमन्त एव जीवन्ति सन्मुखरितां भवदीयवार्त्ताम्। स्थानेस्थिताः श्रुतिगतां तनुवाङ्मनोभि- र्ये प्रायशोऽजित जितोऽप्यसि तैस्त्रिलोक्याम्॥67॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥67॥ अमृतप्रवाह भाष्य-भागवतमें ब्रह्माने भगवान्को कहा,-“हे भगवन्! निर्भेद-ब्रह्मचिन्तारूपी ज्ञानचेष्टाको सम्पूर्णरूपसे दूर करके जो भक्तगण साधुओंके मुखसे निकली आपकी कथाका श्रवण करते हैं और काय-मन-वाक्यसे साधुपथमें स्थित होकर जीवनयात्रा निर्वाह करते हैं, त्रिलोकीमें आप दुर्लभ होनेपर भी उनके लिये सुलभ हो जाते हैं॥67॥ अनुभाष्य-बछड़ों-ग्वालबालोंको हरण करनेके फलस्वरूप श्रीकृष्णके द्वारा ब्रह्माका गर्व चूर्ण होनेपर ब्रह्माजी श्रीकृष्णके एकान्त शरणागत होकर स्तव कर रहे हैं- ज्ञाने (ज्ञानार्थं) प्रयासं (चेष्टाजन्यक्लेशादिकम्) उदपास्य (दूरे विहाय) सन्मुखरितां (सद्भिः महाभागवतैः मुखरितां निसर्गप्रकटितां) श्रुतिगतां (कर्णकुहर प्राप्तां) भवदीयवार्त्तां (हरि- नामरूपगुणलीलामयीं कथां) ये स्थानेस्थिताः (स्वस्थाने साधुमार्गे स्थिताः सन्तः) तनुवाङ्मनोभिः (कायमनोवाक्यैः) नमन्तः (सर्वतोभावेन आत्मनिवेदनं कुर्वन्तः) एव जीवन्ति, हे अजित, (अधोक्षजत्वात् अभक्तैः अनभिभाव्य, अपराधीन, अपरिमेय) अपि त्रिलोक्यां तैः (त्वद्भक्तैरेव) प्रायशः [त्वं] जितः (वशीकृतः) असि। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥67॥ अमृतानुक्रमणिका-“श्रीरामानन्द रायने कहा ज्ञानशून्य भक्ति साध्यसार है। प्रमाणके रूपमें उन्होंने ब्रह्माजीके वचनको उद्धृत करते हुए कहा- 'ज्ञाने प्रयासमुदपास्य' अर्थात् जो साधुओंके मुखसे आपकी और आपके परिकरोंकी मधुर कथाओंको उनके पास रहकर श्रवण करते हैं, तन-मनसे विनम्र भावसे अवनत होकर (उन कथाओंका) सेवन करते-करते जीवन धारण करते हैं, त्रिलोकीमें अन्यान्य व्यक्तियोंके द्वारा अजित आपको ये भक्त जीतकर वशीभूत कर लेते हैं। परन्तु श्रुतिमें कहा गया है 'तमेव विदित्वा अतिमृत्युमेति' अर्थात् परमेश्वरको जानकर ही जीव संसारसे मुक्त होता है; श्रीचैतन्यचरितामृत आदिलीला (2/117)में कहा गया है- 'सिद्धान्त बलिया चित्ते न कर अलस', भक्तिरसामृतसिन्धुमें कहा गया है-'शास्त्रे युक्तौ च निपुण' अर्थात् शास्त्र सिद्धान्त जानना आवश्यक है। ऐसे अनेक शास्त्र-वाक्य ज्ञानकी आवश्यकतापर बल देते हैं। दोनों विचारोंमें विरोध दिखनेपर भी इसका सामञ्जस्य करते हुए श्रीजीव गोस्वामी कहते हैं कि भगवान्की कथाओं और लीलाओंमें अनेक गम्भीर तत्त्व निहित हैं। जैसे दाम-बन्धन लीला, ब्रह्म-विमोहन लीला आदि। जितने तत्त्व-ज्ञानकी आवश्यकता है, वह सब इन सब लीलाओंमें विद्यमान है; पृथक् रूपसे तत्त्व-ज्ञानके लिये प्रयास करनेकी आवश्यकता नहीं है। श्रीजीव गोस्वामीने क्रम-सन्दर्भमें कहा है-जो तत्त्व-ज्ञानमें ही फँसे रहते हैं, उनका लोभमयी भक्तिमें प्रवेश नहीं होता। भगवान्की लीला-कथाएँ भागवतके प्रत्येक श्लोकमें निबद्ध हैं, उनमें आनन्द है, रस है और वैष्णव लोग उनका आस्वादन करते हैं। हरिकथा हरिका ही स्वरूप है। अपनी कथा सुननेके लिये हरि सदैव उत्सुक रहते हैं। श्रवणके लोभसे स्वयं राधारानी एक बालिकाका रूप । 251
[ 8/67-68 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला धारण करके खीर बनानेके बहानेसे आकर श्रीरूप और श्रीसनातनकी इष्ट-गोष्ठीके मध्य कृष्णकथाको सुनती हैं। ‘स्थानस्थिताः’ अर्थात् जहाँ साधु हों, वहीं स्थित रहें। साधुजनोंके मुखसे विगलित हरिकथाको श्रवण करनेसे ही भक्तिका क्रम विकास होता है। गुरुपदाश्रयमें हरिकथा श्रवण करते हुए जीव भक्तिके सोपान—निष्ठा, रुचि, आसक्तिपर आरूढ़ होता है। हरिकथा श्रवण करते-करते जब अपराध-शून्य होकर जीवका चित्त निर्मल हो जाता है, तब उसमें कृष्ण-सेवाकी वासना, रति उत्पन्न होती है और उसके द्वारा श्रीकृष्ण वशीभूत हो जाते हैं। माठर-श्रुति-वचन—‘भक्तिवशः पुरुषः’ अर्थात् 'भगवान् भक्तिके द्वारा वशीभूत होते हैं।' भागवत (9/4/63) में स्वयं भगवान्ने दुर्वासा ऋषिके निकट स्वीकार किया है—‘अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज’ अर्थात् 'मैं सर्वथा भक्तोंके अधीन हूँ, मुझमें तनिक भी स्वतन्त्रता नहीं है।' प्रेमके तारतम्यानुसार रति पाँच प्रकारकी मानी गयी है—शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर। भगवान्की वश्यतामें भी प्रेमके अनुरूप तारतम्य है। इसलिये जो ज्ञानके द्वारा मुक्ति लाभ करते हैं, उनके लिये भगवान् अजित ही हैं। शुद्धभक्तोंका सङ्ग जीवको प्रेम तक अवश्य ही ले जाता है। भगवान्की लीलाकथाएँ और उनके भक्तोंके चरित्र भगवद्-वशीकरण मन्त्र हैं।”—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 67 ॥ (ख) साधनकी सिद्धि—प्रेमभक्ति (भाव—प्रेमका अङ्कुर) :- प्रभु कहे,—“एहो हय, आगे कह आर।” राय कहे,—“प्रेमभक्ति—सर्वसाध्यसार ॥”68 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, —“यह साध्य हो सकता है, परन्तु इसके आगे कुछ कहो।” श्रीरामानन्द रायने कहा, —“प्रेमभक्ति सर्वसाध्योंका सार है॥”68॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यह बात सुनकर महाप्रभुने कहा, —अब साध्य निर्णीत हुआ है, इसकी अपेक्षा अधिक जो है, उसे कहो। तात्पर्य यह है कि केवल वर्णाश्रमधर्मके पालनकी अपेक्षा कर्मार्पण श्रेष्ठ है, केवल कर्मार्पणकी अपेक्षा स्वधर्मत्याग अर्थात् अपने वर्णधर्मको त्याग करके संन्यास ग्रहण करना श्रेष्ठ है, उसकी अपेक्षा ब्रह्मानुशीलनरूपी ज्ञानमिश्रा भक्ति श्रेष्ठ होनेपर भी, ये सभी बाह्य हैं, क्योंकि साध्यवस्तु जो शुद्धभक्ति है, वह पूर्वोक्त चारों प्रकारके सिद्धान्तोंमें नहीं है। ‘आरोपसिद्धा’ और ‘सङ्गसिद्धा’ भक्ति कभी भी ‘शुद्धभक्ति’ नहीं कहलाती। ‘स्वरूपसिद्धा भक्ति’—एक पृथक् तत्त्व है। वह कर्म, कर्मार्पण, कर्मत्यागरूपी संन्यास और ज्ञानमिश्रा-भक्तिसे सदा पृथक् है। अन्याभिलाषिताशून्य, ज्ञान-कर्मादिसे अनावृत, अनुकूलभावसे श्रीकृष्णका अनुशीलन—ये शुद्धभक्तिके लक्षण हैं। यही साध्य वस्तु है, क्योंकि साधन-अवस्थामें इसको देख पानेपर भी सिद्धावस्थामें ही यह निर्मलरूपसे लक्षित होती है। महाप्रभुके अन्तिम-प्रश्नके उत्तरमें श्रीरायने कहा, —प्रेमभक्ति ही सभी साध्योंका सार है। शुद्धभक्ति प्रथमावस्थामें शान्त-भक्तिके रूपमें प्रतीत होती है, उसमें श्रीकृष्णके प्रति ममता-बुद्धि नहीं रहती ॥ 68 ॥ अनुभाष्य—“ज्ञाने प्रयास” श्लोक साध्यनिर्णयमें कहे जानेपर महाप्रभुने इस वृत्तिको साध्यवृत्ति कहकर स्वीकार किया। यही ‘साधनभक्ति’के नामसे जानी जाती है। बादमें और भी अग्रसर होनेका आदेश करनेपर श्रीरामानन्द रायने साधनभक्तिके बाद भावभक्ति अर्थात् प्रेमभक्तिकी अङ्कुरावस्था और शान्तरसमें निरपेक्षतारूपी धर्म प्रधान होनेके कारण अन्य चार प्रकारके रसोंसे युक्त प्रेमभक्तिको ही साध्य कहा। ‘साधनभक्ति’ कहनेसे ‘श्रद्धा’, ‘साधुसङ्ग’, ‘भजनानुष्ठान’, ‘अनर्थनिवृत्ति’, ‘निष्ठा’, ‘रुचि’ और ‘आसक्ति’को समझना चाहिये ॥ 68 ॥ अमृताणुकणिका—“श्रीजीव गोस्वामीने भक्ति-सन्दर्भ (श्लोक 217)में भक्तिके तीन विभाग किये हैं—‘आरोप-सिद्धा भक्ति’, ‘सङ्ग-सिद्धा भक्ति’ और ‘स्वरूप-सिद्धा भक्ति।’ 252 ।
आठवाँ अध्याय 8/68 ] 'आरोप-सिद्धा भक्ति'—जिसमें कृष्णकी प्रीति-विषयक कोई क्रिया न हो, परन्तु अपने उद्देश्यकी सिद्धिके लिये भगवान्में कर्मार्पण आदि किये जाँय, वह आरोप-सिद्धा भक्ति है। यह कर्मादि-रूपा है। (1) राजा हरिश्चन्द्रकी सत्यवादिता प्रसिद्ध है, परन्तु उन्होंने देहमें आत्माभिमान होनेके कारण शरीरको ही सत्य और अपने दानको ही भगवद्भक्ति मान लिया था। यही आरोप सिद्धा-भक्ति है। यह वर्णाश्रम धर्मके अन्तर्गत है और इसके द्वारा अधिकाधिक स्वर्गकी प्राप्ति हो सकती है। (2) दधीचि ऋषिने योगबलसे अपनी अस्थियोंका दान दिया, जिससे वज्र बनाया गया। इसमें शुद्धभक्तिकी कोई भी क्रिया नहीं है; योगके द्वारा भक्ति आरोपित हुई है। इसकी गति महर्लोकसे ऊपर नहीं है। (3) महाराज शिविने कबूतरकी रक्षाके लिये अपने मांसका दान किया। इसमें कृष्णसेवाका कोई भाव नहीं है, यह मात्र एक पुण्य कर्म है, यह फलस्वरूप स्वर्ग तक प्रदान कर सकता है। इन सभी उदाहरणोंमें श्रवण, कीर्तन, स्मरणादि भक्तिके अनुष्ठानकी कोई भी क्रिया नहीं है। अपने शरीरको ही श्रेष्ठ मानकर उसकी यातना सहन की गयी है। इन कर्मोंके मध्य जो भक्ति निहित है, उसके द्वारा ही स्वर्गादिकी प्राप्ति सम्भव होती है। यदि कर्ममें भक्ति न हो, तो वह कर्म भी निष्फल होता है, जैसे (मध्यलीला 24/87)— 'भक्ति बिनु कौन साधन दिते नारे फल। सब फल देय भक्ति स्वतन्त्र प्रबल॥' अर्थात् “भक्तिके बिना कोई भी साधन फल प्रदान नहीं कर सकता, किन्तु भक्ति अन्यान्य साधनोंकी अपेक्षासे रहित स्वतन्त्र तथा बहुत बलशाली है।" इन सभी प्रकारकी बिद्धा-भक्तिमें भक्ति मिश्रित अवश्य रहती है, किन्तु उसके परिणाममें भक्ति नहीं होती और न ही भगवत्-सेवा होती है। 'सङ्गसिद्धा भक्ति'—जहाँ भक्ति न होकर भक्तिके अङ्ग-रूपी दान, वैराग्य, ज्ञान आदिकी प्रधानता हो, वह सङ्गसिद्धा भक्ति कहलाती है। अधिकतर लोग इसीको शुद्धभक्ति समझ लेते हैं; विशेषकर स्मार्त्त-सम्प्रदायके अनुयायी इसीका अनुष्ठान करते हैं। भागवत (11/23)में कहा गया है—'सर्वप्रथम देह एवं दैहिक सम्बन्ध यथा—सन्तान आदिसे अनासक्त होना सीखें, फिर भगवान्के भक्तोंसे प्रेम करना सीखें। इसके पश्चात् प्राणियोंसे यथायोग्य मैत्री, दया और विनयकी शिक्षा लें।' ये सब ज्ञान-कर्म आदिके अङ्ग-समूह हैं, भक्ति नहीं है। भक्तिका उदय होनेसे ये सब लक्षण स्वतः ही प्रकट हो जाते हैं, इनका पृथक् रूपसे अनुशीलन करनेसे भक्तिमें कोई लाभ नहीं है। जीवोंपर दया करना सात्त्विक वृत्ति है। भरत महाराज युवावस्थामें राज-पाट, वैभव, परिवारको त्यागकर वनमें भगवद्भजन करने लगे। किन्तु एक हिरण-शावककी रक्षाकर उसका लालन-पालन करनेके कारण उसमें आसक्त हो गये और हिरणका स्मरण करते हुए ही उन्होंने देह-त्याग किया। इस कारण उन्हें अगला जन्म हिरणका मिला। परन्तु पूर्व जन्मकी प्रबल सुकृतिके कारण उन्हें अपना पूर्व इतिहास स्मरण रहा और उससे अगला जन्म जड़ भरतके रूपमें हुआ। सात्त्विक दयाके कारण उनको दो और जन्म ग्रहण करने पड़े। इसके अतिरिक्त केवल श्रीकृष्णके शरणागत होना भी भक्ति नहीं, अपितु वह भक्तिका द्वार-मात्र है। 'स्वरूप-सिद्धा भक्ति'—जिस अनुष्ठानके द्वारा भक्ति स्वतः ही निरूपित हो और उसमें श्रीकृष्णके प्रति अनुकूल रूपमें तैलधारावत् अविच्छिन्न-गतिसे वैष्णवोंके आनुगत्यमें अनुशीलन हो, उसे स्वरूप-सिद्धा भक्ति कहते हैं। भागवत (7/5/23-24)— “श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥ इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेन्नवलक्षणा। क्रियते भगवत्यद्धा तन्मन्येऽधीतमुत्तमम्॥” । 253
[ 8/68 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला इस भक्तिका अनुशीलन श्रवण, कीर्तन आदिके द्वारा किया जाता है। इस भक्तिकी विशेषता यह है कि जीवको उसके स्वरूप 'श्रीकृष्णके नित्यदास' की उपलब्धि करवा देती है। यदि कोई व्यक्ति श्रवण, कीर्तन आदि द्वारा नवधा-भक्तिका अज्ञानवशतः अनुकरण करते हुए भक्तिसे सम्बन्ध प्राप्त कर ले, तो उसे भक्तिका फल प्राप्त हो जाता है। प्रह्लाद महाराजने अपने पूर्व जन्ममें अज्ञानतावश ही श्रीनृसिंह चतुर्दशीका उपवास किया था, उस सुकृतिके बलसे उन्होंने अपने अगले जन्ममें हजारों वर्षों तक माताके गर्भमें महर्षि नारद गोस्वामीका सङ्ग प्राप्तकर उनसे हरिकथा श्रवण की। इसके फलस्वरूप उन्हें उत्तम-महाभागवत प्रह्लाद महाराजका जन्म प्राप्त हुआ। श्रीरूपगोस्वामीने पूर्व आचार्योंके द्वारा दी गयी भक्तिकी सभी परिभाषाओंको क्रोड़ीभूत करके उत्तमाभक्तिकी परिभाषाका एक अद्भुत श्लोक दिया है (भःरःसिः 1/1/11)— “अन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञानकर्माद्यनावृतम्। आनुकूल्येनकृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा॥” अर्थात् “श्रीकृष्णकी सेवाके अतिरिक्त अन्य सभी कामनाओंसे रहित होकर निर्भेद-ज्ञान एवं नित्य-नैमित्तिक कर्म, योग, तपस्यासे अनावृत एवं अनुकूल भावसे श्रीकृष्णका जो अनुशीलन अर्थात् श्रीकृष्ण-सेवा की जाती है, उसे उत्तमा भक्ति कहते हैं।” इस सूत्रमें भक्तिके स्वरूप और तटस्थ—दोनों लक्षणोंका विशद विवेचन किया गया है। अनुकूल भावसे श्रीकृष्णका अनुशीलन अथवा उनकी सेवा—यह भक्तिका स्वरूप-लक्षण है। भक्ति जो अन्याभिलाषाओंसे रहित हो और उसमें ज्ञान-कर्म आदिकी प्रधानता न हो—यह तटस्थ-लक्षण है। इसे उत्तमा भक्ति अथवा शुद्धभक्ति कहा जाता है। इन्द्रियों, मन, वाणीकी समस्त चेष्टाओंके द्वारा और हृदयके समस्त भावोंके द्वारा श्रीकृष्णकी सेवा हो, इसे कृष्णानुशीलन कहते हैं। ये चेष्टाएँ दो प्रकारकी होती हैं—प्रवृत्ति-मूलक और निवृत्ति-मूलक। इन्द्रियोंकी चेष्टाके द्वारा श्रवण, कीर्तन आदि भक्तिके अङ्गोंका पालन प्रवृत्ति-मूलक चेष्टा है। भक्ति-विरोधी-भाव, अपराध, आलस्य, अनर्थ आदिका त्याग निवृत्ति-मूलक चेष्टा है। भक्तिमें ये दोनों ही आवश्यक हैं। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर कहते हैं—अपराधयुक्त नाम-कीर्तन छिद्रयुक्त पात्रमें रखे जलके समान निकल जायेगा, ठहरेगा नहीं। सावधानीपूर्वक अपराध-रहित होकर भक्तिके अङ्गोंका पालनसे सिद्धि होती है। भक्ति आनुगत्यमयी होती है। श्रीकृष्ण हेतु समस्त प्रकारकी चेष्टाएँ अनुकूल भावसे हो, उसमें प्रतिकूल भावना न हो और रसिक-तत्त्वज्ञ गुरु-वैष्णवोंके आनुगत्यमें इसका नित्य-निरन्तर इसका अनुष्ठान होना चाहिये। भक्तिकी सिद्धिके लिये अनुकूल अनुशीलनकी आवश्यकता है, क्योंकि प्रतिकूल आचरणसे सिद्धि नहीं होती। कोई-कोई महानुभाव कहते हैं कि अनुकूलका अर्थ है, जो कृष्णको रुचिकर हो। परन्तु इसमें अतिव्याप्ति और अव्याप्तिके दोष हो सकते हैं। 'अतिव्याप्ति-दोष'—श्रीकृष्ण चाणूर-मुष्टिकके सङ्ग युद्धमें अतिरुचिपूर्वक वीर-रसका आस्वादन कर रहे हैं। इससे असुरोंमें भक्ति व्याप्त लगती है, परन्तु उनमें श्रीकृष्णके प्रति द्वेष-रूप प्रतिकूल भाव होनेके कारण इसे भक्ति नहीं माना जा सकता। 'अव्याप्ति-दोष'—दूसरी ओर, स्तनपानमें श्रीकृष्णको अतृप्त छोड़कर माता यशोदा चूल्हेपर उफनते हुए दूधको उतारनेके लिये चली गयीं। माता यशोदाकी यह क्रिया श्रीकृष्णके लिये रुचिकर नहीं हुई। यहाँ ऐसा प्रतीत होता है, जैसे माता यशोदामें भक्ति अव्याप्त है अर्थात् उनमें भक्ति नहीं है। किन्तु श्रीकृष्णकी सेवामें उपयोग होनेवाली प्रत्येक वस्तुकी रक्षा करना परिपूर्ण भक्ति है; वह माताका श्रीकृष्णके प्रति वात्सल्यका प्रकाश है। श्रीकृष्णका जिसमें मङ्गल हो, वही भाव अनुकूल है। माता यशोदाका विचार है कि उनके दूधसे श्रीकृष्णकी पूर्ति नहीं होगी, उससे दही, मक्खन, छाछ और रबड़ी आदि मिष्ठान नहीं बनेंगे। 254 ।