भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1096, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1096

[ 8/63-64 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीमद्भगवद्गीता (18/66)— सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥63॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥63॥ अमृतप्रवाह भाष्य—समस्त धर्मोंका परित्याग करके एकमात्र, मैं जो भगवान् हूँ, मेरे शरणागत होओ। ऐसा करनेपर मैं तुम्हें समस्त पापोंसे मुक्त करूँगा। तुम शोक मत करो॥63॥ अनुभाष्य—श्रीभगवान्‌का अर्जुनको गुह्य उपदेश,— सर्वधर्मान् (ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्रादि-ब्रह्माण्डान्तर्गतवर्णधर्मान् ब्रह्मचारि-गृहस्थ-वानप्रस्थतुर्याश्रमादिब्रह्माण्डान्तर्गताश्रमधर्मांश्च) परित्यज्य (दूरे विहाय) एकं (तदतीतम् अद्वयज्ञानम्) [अव्यभिचारिण्या मत्या] मां (सविशेषतत्त्वं भगवन्तं कृष्णं) शरणं व्रज (गच्छ); अहं त्वां सर्वपापेभ्यः (ब्रह्माण्डान्तर्गतेभ्यः प्राकृत-नित्यवैदिक-कर्मानुष्ठानपरित्यागजनिताधर्मेभ्यः) मोक्षयिष्यामि (उद्धारयामि)। मा शुचः (अनित्यधर्मजन्य-शोकं मा कुरु)। श्लोक-भावानुवाद—ब्रह्माण्डके अन्तर्गत वर्णाश्रमधर्म (ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्रादि वर्णधर्म और ब्रह्मचारी- गृहस्थ-वानप्रस्थ-संन्यासादि आश्रमधर्म) का दूरसे ही त्याग करके अव्यभिचारिणी मतिसे एक मुझ अद्वयज्ञान सविशेष-तत्त्व भगवान् कृष्णकी शरणमें आ जाओ। मैं तुम्हें समस्त पापोंसे अर्थात् नित्य वैदिक अनुष्ठानरूपी धर्मके त्यागसे उत्पन्न पापोंसे मुक्त कर दूँगा। तुम अपने अनित्य धर्मोंको (लौकिक कर्त्तव्यको) त्याग करनेका शोक मत करो। श्रीरघुनाथ दासगोस्वामी प्रभुने स्वरचित 'मनःशिक्षा'में— “न धर्मं नाधर्मं श्रुतिगणनिरुक्तं किल कुरु, व्रजे राधाकृष्णप्रचुरपरिचर्यामिह तनु” आदि कहा है। भाः 4/29/46—“यदा यमनुगृह्णाति भगवान्आत्मभावितः। स जहाति मतिं लोके वेदे च परिनिष्ठिताम्॥” इस प्रसङ्गमें भाः 1/5/17 श्लोक भी देखें। हे मेरे प्यारे मन! श्रुतियोंमें कथित धर्म और अधर्म (पुण्यजनक धर्म और पापमूलक अधर्म) कुछ भी मत करो, बल्कि श्रुतियोंने जिन्हें सर्वोपरि परमतत्त्व निर्धारित किया है, उन श्रीश्रीराधाकृष्ण-युगलकी व्रजमें प्रेममयी प्रचुर सेवा करो। जिस समय परिपूर्ण ऐश्वर्यशाली भगवान् किसी भी जीवात्माको आत्म-समर्पण करते देखकर उसपर प्रसन्न होकर अथवा उसकी आत्मवृत्तिके द्वारा सेवित होकर उसपर कृपा करते हैं, उस समय वह भक्त लौकिक-व्यवहार और वैदिक कर्मकाण्डमें अत्यधिक आसक्तिका परित्याग कर देता है॥63॥ अमृतानुकणिका—“महाप्रभुने भी इन दोनों प्रमाणोंको बाह्य बताया, क्योंकि धर्मका बुद्धिपूर्वक त्याग और षड्विधा शरणागतिमें श्रीकृष्ण-सेवाका कोई विचार नहीं है। यह जीवके स्वरूपसे सम्बन्धित नहीं है। यह भक्तिके लिये एक सीढ़ी मात्र है। वेद-विहित कर्मोंका त्याग तीन प्रकारके लोग करते हैं—1) मूर्ख, अज्ञानी— जिन्हें कर्त्तव्य-अकर्त्तव्यका कोई ज्ञान नहीं है। 2) नास्तिक—जिन्हें भगवान् और शास्त्रोंमें विश्वास नहीं है। 3) जिन्हें शास्त्र-वचनोंपर विश्वास है कि श्रीकृष्णभक्ति करनेसे ही सभी कर्म हो जाते हैं, जैसे मध्यलीला (22/62) में कहा गया है, 'कृष्णे भक्ति कैले सर्वकर्म कृत हय' अर्थात् 'कृष्ण भक्ति करनेसे सब कार्य करना हो जाता है।' परन्तु इसमें भी एक विचार है, जैसा भागवत (11/20/9) में कहा है 'तावत् कर्माणि कुर्वीत' अर्थात् जब तक कर्मसे निर्वेद न हो जाय, तब तक कर्म करो, अथवा अकस्मात् किसी महत् पुरुषकी कृपासे भगवत्-कथा श्रवण-कीर्तनमें आत्यन्तिक श्रद्धा हो जाय कि कृष्णभक्ति ही एकमात्र श्रेय है, तभी स्वधर्म-त्यागका अधिकार प्राप्त होता है।”—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी॥63॥ (4) ज्ञानमिश्रा भक्ति शुद्धभक्ति नहीं :— प्रभु कहे,—“एहो बाह्य, आगे कह आर।” राय कहे,—“ज्ञानमिश्रा भक्ति—साध्यसार॥”64॥ 248 ।

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