श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1097, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय 8/64-65 ] अनुवाद-महाप्रभुने कहा,-"यह भी बाहरी है, इससे आगे कुछ और कहो।" श्रीरामानन्द रायने कहा,-"ज्ञानमिश्रा भक्ति सभी साध्योंका सार है॥"64॥ अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुने इस उत्तरको सुनकर इसको (सभी धर्मोंके त्यागको) भी बाहरी कहकर, इसकी अपेक्षा श्रेष्ठ बात कहनेकी आज्ञा दी। उसके उत्तरमें श्रीरायने कहा,-ज्ञानमिश्राभक्तिको 'साध्य-सार' कहा जाता है॥64॥ अनुभाष्य-ब्रह्माण्डसे परे विरजा नदीमें तीनों गुणोंकी प्रबलताका अभाव है, वहाँ उनकी साम्यावस्था अथवा अव्यक्त-अवस्थामात्र है। अन्तरङ्गा शक्तिके द्वारा प्रकटित वैकुण्ठ और बहिरङ्गाशक्तिके द्वारा प्रकटित ब्रह्माण्ड, इन दोनोंके बीच ब्रह्मलोक और विरजा नदी हैं। ये दोनों स्थान (ब्रह्मलोक और विरजा नदी) जड़-जगत्से विरक्त और जड़-निर्विशेष जीवोंकी उपलब्धिका आश्रय हैं, इसलिये ये स्थान वैकुण्ठ नहीं हैं और उससे बाहर स्थित होनेके कारण बाह्य हैं। ब्रह्माण्डके अन्तर्गत सब प्रकारके धर्मोंका त्याग करनेवाले साधकको वैकुण्ठ अथवा गोलोककी अनुभूति नहीं होती। सर्वधर्मत्याग साध्यवृत्तिसे जड़भोगोंका त्याग करनेपर भी वह अचित् निर्विशेषत्वकी ही प्रतिपादक है, इसलिये वह भी बाह्य है। श्रीरामानन्दने तब उस भावको बाह्य साध्यभाव जानकर ज्ञानमिश्रा भक्ति ही उससे उन्नत साध्य है, उस विषयमें प्रमाण बोला॥64॥ अमृताणुकणिका- "इसके पूर्व श्रीरामानन्दने कर्ममिश्रा भक्तिके बारेमें कहा था, अब वे ज्ञानमिश्राभक्तिको साध्य-सार बतला रहे हैं। ज्ञानमिश्राभक्ति अर्थात् 1) ज्ञानसे मिश्रित भक्ति और 2) भक्तिसे प्राप्त होने वाला ज्ञान (यह पूर्व कथितसे उत्तम है)। ज्ञानसे मिश्रित भक्ति सेविका है; वह भक्ति अपना फल देकर अन्तर्धान हो जायेगी। इसमें तीन प्रकारके ज्ञान सम्मिलित हैं-1) तत्-पदार्थका ज्ञान (परतत्त्व अथवा भगवत्-तत्त्वका ज्ञान। 2) त्वं-पदार्थका ज्ञान अर्थात् आत्म-तत्त्वका ज्ञान। जीव और ब्रह्मका परस्पर सम्बन्धज्ञान भी इसीके अन्तर्गत है और 3) जीव-ब्रह्म ऐक्य ज्ञान-यह अङ्ग भक्तिका नितान्त विरोधी है। इसके अन्तर्गत जीवका ब्रह्मके साथ स्वरूपगत सम्बन्ध ही स्फुरित नहीं हो सकता। अतः सेवाकी वासनाका भी उदय नहीं होगा। किन्तु प्रथम दो अङ्ग-भगवद्-तत्त्वका ज्ञान और आत्म-तत्त्वका ज्ञान भक्ति-विरोधी नहीं हैं। पयारमें कहे गये 'ज्ञान' शब्दके व्यापक अर्थको ग्रहण करनेसे इन तीनों अङ्गोंसे मिश्रित भक्तिको ही ज्ञानमिश्रा भक्ति कहा गया है। भगवत्-तत्त्व ज्ञान ऐश्वर्यका बोधक है, जो व्रजभक्तिके प्रतिकूल है, इसमें लौकिक-सद्बन्धुवत् भाव उदित नहीं होता। भक्तिके प्रारम्भमें यह ज्ञान सहायक है, किन्तु भक्तिमें अग्रसर होनेपर सहायक नहीं होगा।"—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥64॥ सम्बन्धज्ञानप्राप्त ब्राह्मण ही श्रीकृष्णभजनफलसे वैष्णव :- श्रीमद्भगवद्गीता (18/54)- ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति। समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥ 65 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 65 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-गीतामें कहा गया है, -अभेद ब्रह्मवादरूपी ज्ञानचर्चाके द्वारा स्वयं प्रसन्नात्माका शोक और कामनारहित होनेपर तथा सभी जीवोंमें समभावयुक्त ब्रह्मता प्राप्त करनेके बाद उसे मेरी पराभक्ति प्राप्त होती है। तात्पर्य यह है कि पहले कर्ममिश्रा-भक्तिका उल्लेख हुआ था, उसकी अपेक्षा ज्ञानमिश्रा भक्ति श्रेष्ठ है॥65॥ अनुभाष्य-अर्जुनके प्रति श्रीभगवान्के वचन- ब्रह्मभूतः (ब्रह्माण्डान्तर्गतबोधमुक्तः निर्विशेषानुभवपरः) प्रसन्नात्मा (अभावधर्मरहितः) शोचति न (जड़ाभावे तस्य शोकः नास्ति) काङ्क्षति न (तस्य जड़भोगे आकाङ्क्षा च न वर्त्तते) सर्वेषु भूतेषु [मत्सेवासम्बन्धयोगं ज्ञात्वा] समः सन्, परां (परमां शुद्धां) मद्भक्तिं लभते। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 65 ॥ । 249