श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 8/65-66 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अमृतानुकणिका—'‘ब्रह्मभूत’ अर्थात् जिनका सर्दी- गर्मी, मान-अपमान, सुख-दुःखादिमें समभाव है। सत्त्व, रज और तमोगुणकी उपाधिसे अनावृत होनेपर साधक जीव ब्रह्मभूत हो जाते हैं। अनावृत चैतन्य प्राप्त करके वे 'प्रसन्नात्मा' हो जाते हैं। वे नष्ट-विषयोंके लिये शोक नहीं करते और ‘न कांक्षति’—न ही अप्राप्त वस्तुकी अकाङ्क्षा करते हैं। 'समः सर्वभूतेषु’—वे भद्र-अभद्र सभी भूतोंमें बालकके समान समदर्शी हो जाते हैं। कोई लंगड़ा है, लूला है, गोरा है अथवा काला है—वे यह सब विचार नहीं करते, वह केवल आत्मदृष्टि रखते हैं।
एक समय अष्टावक्र ऋषि अपने हिमालयके आसनसे जनकपुरीमें महाज्ञानी जनकजीके दरबारमें आये। उनका टेढ़े शरीरको देखकर सब लोग हँसने लगे। जनकजी सबको हँसते हुए देखकर हँस दिये। तो अष्टावक्र भी लाठी रखकर बड़े ज़ोरसे हँसने लगे। तब राजा जनकने पूछा कि ये लोग तो आपके अङ्गके टेढ़ेपन, कुबड़ेपनपर हँस रहे हैं, किन्तु आप किसलिये हँस रहे हैं? अष्टावक्र बोले—मैं यह सुनकर महाराज जनकके दरबारमें आया था कि यहाँ बड़े-बड़े पण्डित लोग हैं, ब्रह्मतत्त्वको जाननेवाले हैं, सब प्राणियोंमें सम हैं। किन्तु मैं देखता हूँ कि यहाँ सब चमार-मोची हैं। वे लोग यह देखते हैं कि अच्छा चमड़ा है या खराब चमड़ा है। आत्म-तत्त्वका किसीको ज्ञान नहीं है, इसलिये मैं हँस रहा था।
यह ब्रह्मभूत ज्ञान उच्च-कोटिका साधन नहीं है। किन्तु यदि साधुसङ्ग प्राप्त हो जाय और अपराध न हों, तब पराभक्ति अर्थात् प्रेमाभक्ति प्राप्त होनेकी सम्भावना है। 'लभते' का तात्पर्य है कि साधकने पूर्वकालमें मोक्ष-सिद्धिके लिये ज्ञान-वैराग्यका अवलम्बन तो किया, परन्तु उसमें भक्ति आंशिक भावसे थी, उसकी उपलब्धि नहीं थी। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्त्ती ठाकुर एक उदाहरण देते हैं—मूँग-उड़द दाल आदिमें यदि स्वर्ण-कणिका मिल जाय, तो दालमें आग लग जानेपर भी स्वर्ण-कणिका नष्ट नहीं होती। ज्ञानरूपी दालमें यह स्वर्ण कणिका संवित्-ह्लादिनीकी वृत्ति भक्ति है। यह कभी विनष्ट नहीं होती। कोई अपराध हो जानेपर अन्तर्धान हो जाती है। किन्तु यदि अपराध न हो तो साधुओंके सङ्गमें हरिकथा श्रवण करनेसे प्रेमाभक्ति प्राप्त होनेकी सम्भावना रहती है। कृष्णकी लीला-कथाओंका श्रवण, भागवत, भगवद्भक्तोंके चरित्र श्रवण करनेसे उनकी वह स्वर्ण-कणिकारूपी भक्ति विकसित हो उठती है, साथमें उनका ब्रह्म-ऐक्य ज्ञान नष्ट हो जाता है। सत्सङ्ग ही एकमात्र भक्तिप्रद सुकृति है। साधुजनोंके मुखसे निकली हरिकथाको श्रवण करनेसे ही भक्तिका क्रम विकास होता है। शुद्ध भक्तोंका सङ्ग जीवको प्रेम तक अवश्य ले जायेगा। शुद्ध गुरु और वैष्णवोंके सङ्गसे ज्ञानरूपी दाल श्रवण-कीर्तनरूपी आगमें जलकर भस्म हो जाती है और शुद्धभक्तिरूपी स्वर्ण-कणिका प्राप्त हो जाती है। किन्तु महाप्रभुने इसे भी बाह्य बतलाया, क्योंकि साधुसङ्ग सभीको मिलेगा—यह आवश्यक नहीं है।” —श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी॥ 65 ॥
(5) ज्ञानशून्य भक्ति ही शुद्धभक्ति-शब्दवाच्य :— प्रभु कहे,—“एहो बाह्य, आगे कह आर।” राय कहे,—“ज्ञानशून्या भक्ति—साध्यसार॥”66 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 66 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—ज्ञानमिश्राभक्तिकी बात सुनकर महाप्रभुने कहा,–“यह भी बाह्य है; इसके परे जो है, उसे बोलो।” श्रीरायने कहा,—“ज्ञानशून्या भक्ति ही साध्योंका सार है॥”66॥
अनुभाष्य—इस (ज्ञानमिश्राभक्ति) अवस्थामें भी अस्मिता और उसकी वृत्ति शुद्ध-वैकुण्ठवाली अथवा वैकुण्ठको उद्देश्य नहीं करनेवाली होनेके कारण, यह भी बाह्य है। इस स्थितिमें साधक जड़से बाध्य नहीं रहनेपर अथवा उसको जड़से अतिरिक्त निर्मल अनुभव होनेपर भी उसे वास्तव सत्य-वस्तुकी (सविशेष भगवान्की) स्वतन्त्र
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