श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय 8/66-67 ] और विशेष उपलब्धि नहीं होती। इसलिये उसकी अपनी अनुभूति और अपने मनकी वृत्ति-बहिर्मुखिनी है। वास्तवमें, वह भी शुद्धजीवका साध्य नहीं है। निर्विशेषत्वकी कल्पनामें सच्चिदानन्द-विशेष-समूह सुप्त रहता है। उससे पहले काल्पनिक विचारवाले वाक्योंका तात्पर्य भी निर्विशेषध्यान है, इसलिये वैसी भगवद्- सेवावृत्तिरहित काल्पनिक निर्विशेषपरक मुक्त अवस्था भी बाह्य है॥66॥ श्रीकृष्णके सम्पूर्ण शरणागतजन ही श्रीकृष्णवशकारी शुद्धभक्त :- श्रीमद्भागवत (10/14/3)- ज्ञाने प्रयासमुदपास्य नमन्त एव जीवन्ति सन्मुखरितां भवदीयवार्त्ताम्। स्थानेस्थिताः श्रुतिगतां तनुवाङ्मनोभि- र्ये प्रायशोऽजित जितोऽप्यसि तैस्त्रिलोक्याम्॥67॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥67॥ अमृतप्रवाह भाष्य-भागवतमें ब्रह्माने भगवान्को कहा,-“हे भगवन्! निर्भेद-ब्रह्मचिन्तारूपी ज्ञानचेष्टाको सम्पूर्णरूपसे दूर करके जो भक्तगण साधुओंके मुखसे निकली आपकी कथाका श्रवण करते हैं और काय-मन-वाक्यसे साधुपथमें स्थित होकर जीवनयात्रा निर्वाह करते हैं, त्रिलोकीमें आप दुर्लभ होनेपर भी उनके लिये सुलभ हो जाते हैं॥67॥ अनुभाष्य-बछड़ों-ग्वालबालोंको हरण करनेके फलस्वरूप श्रीकृष्णके द्वारा ब्रह्माका गर्व चूर्ण होनेपर ब्रह्माजी श्रीकृष्णके एकान्त शरणागत होकर स्तव कर रहे हैं- ज्ञाने (ज्ञानार्थं) प्रयासं (चेष्टाजन्यक्लेशादिकम्) उदपास्य (दूरे विहाय) सन्मुखरितां (सद्भिः महाभागवतैः मुखरितां निसर्गप्रकटितां) श्रुतिगतां (कर्णकुहर प्राप्तां) भवदीयवार्त्तां (हरि- नामरूपगुणलीलामयीं कथां) ये स्थानेस्थिताः (स्वस्थाने साधुमार्गे स्थिताः सन्तः) तनुवाङ्मनोभिः (कायमनोवाक्यैः) नमन्तः (सर्वतोभावेन आत्मनिवेदनं कुर्वन्तः) एव जीवन्ति, हे अजित, (अधोक्षजत्वात् अभक्तैः अनभिभाव्य, अपराधीन, अपरिमेय) अपि त्रिलोक्यां तैः (त्वद्भक्तैरेव) प्रायशः [त्वं] जितः (वशीकृतः) असि। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥67॥ अमृतानुक्रमणिका-“श्रीरामानन्द रायने कहा ज्ञानशून्य भक्ति साध्यसार है। प्रमाणके रूपमें उन्होंने ब्रह्माजीके वचनको उद्धृत करते हुए कहा- 'ज्ञाने प्रयासमुदपास्य' अर्थात् जो साधुओंके मुखसे आपकी और आपके परिकरोंकी मधुर कथाओंको उनके पास रहकर श्रवण करते हैं, तन-मनसे विनम्र भावसे अवनत होकर (उन कथाओंका) सेवन करते-करते जीवन धारण करते हैं, त्रिलोकीमें अन्यान्य व्यक्तियोंके द्वारा अजित आपको ये भक्त जीतकर वशीभूत कर लेते हैं। परन्तु श्रुतिमें कहा गया है 'तमेव विदित्वा अतिमृत्युमेति' अर्थात् परमेश्वरको जानकर ही जीव संसारसे मुक्त होता है; श्रीचैतन्यचरितामृत आदिलीला (2/117)में कहा गया है- 'सिद्धान्त बलिया चित्ते न कर अलस', भक्तिरसामृतसिन्धुमें कहा गया है-'शास्त्रे युक्तौ च निपुण' अर्थात् शास्त्र सिद्धान्त जानना आवश्यक है। ऐसे अनेक शास्त्र-वाक्य ज्ञानकी आवश्यकतापर बल देते हैं। दोनों विचारोंमें विरोध दिखनेपर भी इसका सामञ्जस्य करते हुए श्रीजीव गोस्वामी कहते हैं कि भगवान्की कथाओं और लीलाओंमें अनेक गम्भीर तत्त्व निहित हैं। जैसे दाम-बन्धन लीला, ब्रह्म-विमोहन लीला आदि। जितने तत्त्व-ज्ञानकी आवश्यकता है, वह सब इन सब लीलाओंमें विद्यमान है; पृथक् रूपसे तत्त्व-ज्ञानके लिये प्रयास करनेकी आवश्यकता नहीं है। श्रीजीव गोस्वामीने क्रम-सन्दर्भमें कहा है-जो तत्त्व-ज्ञानमें ही फँसे रहते हैं, उनका लोभमयी भक्तिमें प्रवेश नहीं होता। भगवान्की लीला-कथाएँ भागवतके प्रत्येक श्लोकमें निबद्ध हैं, उनमें आनन्द है, रस है और वैष्णव लोग उनका आस्वादन करते हैं। हरिकथा हरिका ही स्वरूप है। अपनी कथा सुननेके लिये हरि सदैव उत्सुक रहते हैं। श्रवणके लोभसे स्वयं राधारानी एक बालिकाका रूप । 251