भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1100

[ 8/67-68 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला धारण करके खीर बनानेके बहानेसे आकर श्रीरूप और श्रीसनातनकी इष्ट-गोष्ठीके मध्य कृष्णकथाको सुनती हैं। ‘स्थानस्थिताः’ अर्थात् जहाँ साधु हों, वहीं स्थित रहें। साधुजनोंके मुखसे विगलित हरिकथाको श्रवण करनेसे ही भक्तिका क्रम विकास होता है। गुरुपदाश्रयमें हरिकथा श्रवण करते हुए जीव भक्तिके सोपान—निष्ठा, रुचि, आसक्तिपर आरूढ़ होता है। हरिकथा श्रवण करते-करते जब अपराध-शून्य होकर जीवका चित्त निर्मल हो जाता है, तब उसमें कृष्ण-सेवाकी वासना, रति उत्पन्न होती है और उसके द्वारा श्रीकृष्ण वशीभूत हो जाते हैं। माठर-श्रुति-वचन—‘भक्तिवशः पुरुषः’ अर्थात् 'भगवान् भक्तिके द्वारा वशीभूत होते हैं।' भागवत (9/4/63) में स्वयं भगवान्ने दुर्वासा ऋषिके निकट स्वीकार किया है—‘अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज’ अर्थात् 'मैं सर्वथा भक्तोंके अधीन हूँ, मुझमें तनिक भी स्वतन्त्रता नहीं है।' प्रेमके तारतम्यानुसार रति पाँच प्रकारकी मानी गयी है—शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर। भगवान्की वश्यतामें भी प्रेमके अनुरूप तारतम्य है। इसलिये जो ज्ञानके द्वारा मुक्ति लाभ करते हैं, उनके लिये भगवान् अजित ही हैं। शुद्धभक्तोंका सङ्ग जीवको प्रेम तक अवश्य ही ले जाता है। भगवान्की लीलाकथाएँ और उनके भक्तोंके चरित्र भगवद्-वशीकरण मन्त्र हैं।”—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 67 ॥ (ख) साधनकी सिद्धि—प्रेमभक्ति (भाव—प्रेमका अङ्कुर) :- प्रभु कहे,—“एहो हय, आगे कह आर।” राय कहे,—“प्रेमभक्ति—सर्वसाध्यसार ॥”68 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, —“यह साध्य हो सकता है, परन्तु इसके आगे कुछ कहो।” श्रीरामानन्द रायने कहा, —“प्रेमभक्ति सर्वसाध्योंका सार है॥”68॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यह बात सुनकर महाप्रभुने कहा, —अब साध्य निर्णीत हुआ है, इसकी अपेक्षा अधिक जो है, उसे कहो। तात्पर्य यह है कि केवल वर्णाश्रमधर्मके पालनकी अपेक्षा कर्मार्पण श्रेष्ठ है, केवल कर्मार्पणकी अपेक्षा स्वधर्मत्याग अर्थात् अपने वर्णधर्मको त्याग करके संन्यास ग्रहण करना श्रेष्ठ है, उसकी अपेक्षा ब्रह्मानुशीलनरूपी ज्ञानमिश्रा भक्ति श्रेष्ठ होनेपर भी, ये सभी बाह्य हैं, क्योंकि साध्यवस्तु जो शुद्धभक्ति है, वह पूर्वोक्त चारों प्रकारके सिद्धान्तोंमें नहीं है। ‘आरोपसिद्धा’ और ‘सङ्गसिद्धा’ भक्ति कभी भी ‘शुद्धभक्ति’ नहीं कहलाती। ‘स्वरूपसिद्धा भक्ति’—एक पृथक् तत्त्व है। वह कर्म, कर्मार्पण, कर्मत्यागरूपी संन्यास और ज्ञानमिश्रा-भक्तिसे सदा पृथक् है। अन्याभिलाषिताशून्य, ज्ञान-कर्मादिसे अनावृत, अनुकूलभावसे श्रीकृष्णका अनुशीलन—ये शुद्धभक्तिके लक्षण हैं। यही साध्य वस्तु है, क्योंकि साधन-अवस्थामें इसको देख पानेपर भी सिद्धावस्थामें ही यह निर्मलरूपसे लक्षित होती है। महाप्रभुके अन्तिम-प्रश्नके उत्तरमें श्रीरायने कहा, —प्रेमभक्ति ही सभी साध्योंका सार है। शुद्धभक्ति प्रथमावस्थामें शान्त-भक्तिके रूपमें प्रतीत होती है, उसमें श्रीकृष्णके प्रति ममता-बुद्धि नहीं रहती ॥ 68 ॥ अनुभाष्य—“ज्ञाने प्रयास” श्लोक साध्यनिर्णयमें कहे जानेपर महाप्रभुने इस वृत्तिको साध्यवृत्ति कहकर स्वीकार किया। यही ‘साधनभक्ति’के नामसे जानी जाती है। बादमें और भी अग्रसर होनेका आदेश करनेपर श्रीरामानन्द रायने साधनभक्तिके बाद भावभक्ति अर्थात् प्रेमभक्तिकी अङ्कुरावस्था और शान्तरसमें निरपेक्षतारूपी धर्म प्रधान होनेके कारण अन्य चार प्रकारके रसोंसे युक्त प्रेमभक्तिको ही साध्य कहा। ‘साधनभक्ति’ कहनेसे ‘श्रद्धा’, ‘साधुसङ्ग’, ‘भजनानुष्ठान’, ‘अनर्थनिवृत्ति’, ‘निष्ठा’, ‘रुचि’ और ‘आसक्ति’को समझना चाहिये ॥ 68 ॥ अमृताणुकणिका—“श्रीजीव गोस्वामीने भक्ति-सन्दर्भ (श्लोक 217)में भक्तिके तीन विभाग किये हैं—‘आरोप-सिद्धा भक्ति’, ‘सङ्ग-सिद्धा भक्ति’ और ‘स्वरूप-सिद्धा भक्ति।’ 252 ।