श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
[ 8/67-68 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला धारण करके खीर बनानेके बहानेसे आकर श्रीरूप और श्रीसनातनकी इष्ट-गोष्ठीके मध्य कृष्णकथाको सुनती हैं। ‘स्थानस्थिताः’ अर्थात् जहाँ साधु हों, वहीं स्थित रहें। साधुजनोंके मुखसे विगलित हरिकथाको श्रवण करनेसे ही भक्तिका क्रम विकास होता है। गुरुपदाश्रयमें हरिकथा श्रवण करते हुए जीव भक्तिके सोपान—निष्ठा, रुचि, आसक्तिपर आरूढ़ होता है। हरिकथा श्रवण करते-करते जब अपराध-शून्य होकर जीवका चित्त निर्मल हो जाता है, तब उसमें कृष्ण-सेवाकी वासना, रति उत्पन्न होती है और उसके द्वारा श्रीकृष्ण वशीभूत हो जाते हैं। माठर-श्रुति-वचन—‘भक्तिवशः पुरुषः’ अर्थात् 'भगवान् भक्तिके द्वारा वशीभूत होते हैं।' भागवत (9/4/63) में स्वयं भगवान्ने दुर्वासा ऋषिके निकट स्वीकार किया है—‘अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज’ अर्थात् 'मैं सर्वथा भक्तोंके अधीन हूँ, मुझमें तनिक भी स्वतन्त्रता नहीं है।' प्रेमके तारतम्यानुसार रति पाँच प्रकारकी मानी गयी है—शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर। भगवान्की वश्यतामें भी प्रेमके अनुरूप तारतम्य है। इसलिये जो ज्ञानके द्वारा मुक्ति लाभ करते हैं, उनके लिये भगवान् अजित ही हैं। शुद्धभक्तोंका सङ्ग जीवको प्रेम तक अवश्य ही ले जाता है। भगवान्की लीलाकथाएँ और उनके भक्तोंके चरित्र भगवद्-वशीकरण मन्त्र हैं।”—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 67 ॥ (ख) साधनकी सिद्धि—प्रेमभक्ति (भाव—प्रेमका अङ्कुर) :- प्रभु कहे,—“एहो हय, आगे कह आर।” राय कहे,—“प्रेमभक्ति—सर्वसाध्यसार ॥”68 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, —“यह साध्य हो सकता है, परन्तु इसके आगे कुछ कहो।” श्रीरामानन्द रायने कहा, —“प्रेमभक्ति सर्वसाध्योंका सार है॥”68॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यह बात सुनकर महाप्रभुने कहा, —अब साध्य निर्णीत हुआ है, इसकी अपेक्षा अधिक जो है, उसे कहो। तात्पर्य यह है कि केवल वर्णाश्रमधर्मके पालनकी अपेक्षा कर्मार्पण श्रेष्ठ है, केवल कर्मार्पणकी अपेक्षा स्वधर्मत्याग अर्थात् अपने वर्णधर्मको त्याग करके संन्यास ग्रहण करना श्रेष्ठ है, उसकी अपेक्षा ब्रह्मानुशीलनरूपी ज्ञानमिश्रा भक्ति श्रेष्ठ होनेपर भी, ये सभी बाह्य हैं, क्योंकि साध्यवस्तु जो शुद्धभक्ति है, वह पूर्वोक्त चारों प्रकारके सिद्धान्तोंमें नहीं है। ‘आरोपसिद्धा’ और ‘सङ्गसिद्धा’ भक्ति कभी भी ‘शुद्धभक्ति’ नहीं कहलाती। ‘स्वरूपसिद्धा भक्ति’—एक पृथक् तत्त्व है। वह कर्म, कर्मार्पण, कर्मत्यागरूपी संन्यास और ज्ञानमिश्रा-भक्तिसे सदा पृथक् है। अन्याभिलाषिताशून्य, ज्ञान-कर्मादिसे अनावृत, अनुकूलभावसे श्रीकृष्णका अनुशीलन—ये शुद्धभक्तिके लक्षण हैं। यही साध्य वस्तु है, क्योंकि साधन-अवस्थामें इसको देख पानेपर भी सिद्धावस्थामें ही यह निर्मलरूपसे लक्षित होती है। महाप्रभुके अन्तिम-प्रश्नके उत्तरमें श्रीरायने कहा, —प्रेमभक्ति ही सभी साध्योंका सार है। शुद्धभक्ति प्रथमावस्थामें शान्त-भक्तिके रूपमें प्रतीत होती है, उसमें श्रीकृष्णके प्रति ममता-बुद्धि नहीं रहती ॥ 68 ॥ अनुभाष्य—“ज्ञाने प्रयास” श्लोक साध्यनिर्णयमें कहे जानेपर महाप्रभुने इस वृत्तिको साध्यवृत्ति कहकर स्वीकार किया। यही ‘साधनभक्ति’के नामसे जानी जाती है। बादमें और भी अग्रसर होनेका आदेश करनेपर श्रीरामानन्द रायने साधनभक्तिके बाद भावभक्ति अर्थात् प्रेमभक्तिकी अङ्कुरावस्था और शान्तरसमें निरपेक्षतारूपी धर्म प्रधान होनेके कारण अन्य चार प्रकारके रसोंसे युक्त प्रेमभक्तिको ही साध्य कहा। ‘साधनभक्ति’ कहनेसे ‘श्रद्धा’, ‘साधुसङ्ग’, ‘भजनानुष्ठान’, ‘अनर्थनिवृत्ति’, ‘निष्ठा’, ‘रुचि’ और ‘आसक्ति’को समझना चाहिये ॥ 68 ॥ अमृताणुकणिका—“श्रीजीव गोस्वामीने भक्ति-सन्दर्भ (श्लोक 217)में भक्तिके तीन विभाग किये हैं—‘आरोप-सिद्धा भक्ति’, ‘सङ्ग-सिद्धा भक्ति’ और ‘स्वरूप-सिद्धा भक्ति।’ 252 ।
आठवाँ अध्याय 8/68 ] 'आरोप-सिद्धा भक्ति'—जिसमें कृष्णकी प्रीति-विषयक कोई क्रिया न हो, परन्तु अपने उद्देश्यकी सिद्धिके लिये भगवान्में कर्मार्पण आदि किये जाँय, वह आरोप-सिद्धा भक्ति है। यह कर्मादि-रूपा है। (1) राजा हरिश्चन्द्रकी सत्यवादिता प्रसिद्ध है, परन्तु उन्होंने देहमें आत्माभिमान होनेके कारण शरीरको ही सत्य और अपने दानको ही भगवद्भक्ति मान लिया था। यही आरोप सिद्धा-भक्ति है। यह वर्णाश्रम धर्मके अन्तर्गत है और इसके द्वारा अधिकाधिक स्वर्गकी प्राप्ति हो सकती है। (2) दधीचि ऋषिने योगबलसे अपनी अस्थियोंका दान दिया, जिससे वज्र बनाया गया। इसमें शुद्धभक्तिकी कोई भी क्रिया नहीं है; योगके द्वारा भक्ति आरोपित हुई है। इसकी गति महर्लोकसे ऊपर नहीं है। (3) महाराज शिविने कबूतरकी रक्षाके लिये अपने मांसका दान किया। इसमें कृष्णसेवाका कोई भाव नहीं है, यह मात्र एक पुण्य कर्म है, यह फलस्वरूप स्वर्ग तक प्रदान कर सकता है। इन सभी उदाहरणोंमें श्रवण, कीर्तन, स्मरणादि भक्तिके अनुष्ठानकी कोई भी क्रिया नहीं है। अपने शरीरको ही श्रेष्ठ मानकर उसकी यातना सहन की गयी है। इन कर्मोंके मध्य जो भक्ति निहित है, उसके द्वारा ही स्वर्गादिकी प्राप्ति सम्भव होती है। यदि कर्ममें भक्ति न हो, तो वह कर्म भी निष्फल होता है, जैसे (मध्यलीला 24/87)— 'भक्ति बिनु कौन साधन दिते नारे फल। सब फल देय भक्ति स्वतन्त्र प्रबल॥' अर्थात् “भक्तिके बिना कोई भी साधन फल प्रदान नहीं कर सकता, किन्तु भक्ति अन्यान्य साधनोंकी अपेक्षासे रहित स्वतन्त्र तथा बहुत बलशाली है।" इन सभी प्रकारकी बिद्धा-भक्तिमें भक्ति मिश्रित अवश्य रहती है, किन्तु उसके परिणाममें भक्ति नहीं होती और न ही भगवत्-सेवा होती है। 'सङ्गसिद्धा भक्ति'—जहाँ भक्ति न होकर भक्तिके अङ्ग-रूपी दान, वैराग्य, ज्ञान आदिकी प्रधानता हो, वह सङ्गसिद्धा भक्ति कहलाती है। अधिकतर लोग इसीको शुद्धभक्ति समझ लेते हैं; विशेषकर स्मार्त्त-सम्प्रदायके अनुयायी इसीका अनुष्ठान करते हैं। भागवत (11/23)में कहा गया है—'सर्वप्रथम देह एवं दैहिक सम्बन्ध यथा—सन्तान आदिसे अनासक्त होना सीखें, फिर भगवान्के भक्तोंसे प्रेम करना सीखें। इसके पश्चात् प्राणियोंसे यथायोग्य मैत्री, दया और विनयकी शिक्षा लें।' ये सब ज्ञान-कर्म आदिके अङ्ग-समूह हैं, भक्ति नहीं है। भक्तिका उदय होनेसे ये सब लक्षण स्वतः ही प्रकट हो जाते हैं, इनका पृथक् रूपसे अनुशीलन करनेसे भक्तिमें कोई लाभ नहीं है। जीवोंपर दया करना सात्त्विक वृत्ति है। भरत महाराज युवावस्थामें राज-पाट, वैभव, परिवारको त्यागकर वनमें भगवद्भजन करने लगे। किन्तु एक हिरण-शावककी रक्षाकर उसका लालन-पालन करनेके कारण उसमें आसक्त हो गये और हिरणका स्मरण करते हुए ही उन्होंने देह-त्याग किया। इस कारण उन्हें अगला जन्म हिरणका मिला। परन्तु पूर्व जन्मकी प्रबल सुकृतिके कारण उन्हें अपना पूर्व इतिहास स्मरण रहा और उससे अगला जन्म जड़ भरतके रूपमें हुआ। सात्त्विक दयाके कारण उनको दो और जन्म ग्रहण करने पड़े। इसके अतिरिक्त केवल श्रीकृष्णके शरणागत होना भी भक्ति नहीं, अपितु वह भक्तिका द्वार-मात्र है। 'स्वरूप-सिद्धा भक्ति'—जिस अनुष्ठानके द्वारा भक्ति स्वतः ही निरूपित हो और उसमें श्रीकृष्णके प्रति अनुकूल रूपमें तैलधारावत् अविच्छिन्न-गतिसे वैष्णवोंके आनुगत्यमें अनुशीलन हो, उसे स्वरूप-सिद्धा भक्ति कहते हैं। भागवत (7/5/23-24)— “श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥ इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेन्नवलक्षणा। क्रियते भगवत्यद्धा तन्मन्येऽधीतमुत्तमम्॥” । 253
[ 8/68 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला इस भक्तिका अनुशीलन श्रवण, कीर्तन आदिके द्वारा किया जाता है। इस भक्तिकी विशेषता यह है कि जीवको उसके स्वरूप 'श्रीकृष्णके नित्यदास' की उपलब्धि करवा देती है। यदि कोई व्यक्ति श्रवण, कीर्तन आदि द्वारा नवधा-भक्तिका अज्ञानवशतः अनुकरण करते हुए भक्तिसे सम्बन्ध प्राप्त कर ले, तो उसे भक्तिका फल प्राप्त हो जाता है। प्रह्लाद महाराजने अपने पूर्व जन्ममें अज्ञानतावश ही श्रीनृसिंह चतुर्दशीका उपवास किया था, उस सुकृतिके बलसे उन्होंने अपने अगले जन्ममें हजारों वर्षों तक माताके गर्भमें महर्षि नारद गोस्वामीका सङ्ग प्राप्तकर उनसे हरिकथा श्रवण की। इसके फलस्वरूप उन्हें उत्तम-महाभागवत प्रह्लाद महाराजका जन्म प्राप्त हुआ। श्रीरूपगोस्वामीने पूर्व आचार्योंके द्वारा दी गयी भक्तिकी सभी परिभाषाओंको क्रोड़ीभूत करके उत्तमाभक्तिकी परिभाषाका एक अद्भुत श्लोक दिया है (भःरःसिः 1/1/11)— “अन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञानकर्माद्यनावृतम्। आनुकूल्येनकृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा॥” अर्थात् “श्रीकृष्णकी सेवाके अतिरिक्त अन्य सभी कामनाओंसे रहित होकर निर्भेद-ज्ञान एवं नित्य-नैमित्तिक कर्म, योग, तपस्यासे अनावृत एवं अनुकूल भावसे श्रीकृष्णका जो अनुशीलन अर्थात् श्रीकृष्ण-सेवा की जाती है, उसे उत्तमा भक्ति कहते हैं।” इस सूत्रमें भक्तिके स्वरूप और तटस्थ—दोनों लक्षणोंका विशद विवेचन किया गया है। अनुकूल भावसे श्रीकृष्णका अनुशीलन अथवा उनकी सेवा—यह भक्तिका स्वरूप-लक्षण है। भक्ति जो अन्याभिलाषाओंसे रहित हो और उसमें ज्ञान-कर्म आदिकी प्रधानता न हो—यह तटस्थ-लक्षण है। इसे उत्तमा भक्ति अथवा शुद्धभक्ति कहा जाता है। इन्द्रियों, मन, वाणीकी समस्त चेष्टाओंके द्वारा और हृदयके समस्त भावोंके द्वारा श्रीकृष्णकी सेवा हो, इसे कृष्णानुशीलन कहते हैं। ये चेष्टाएँ दो प्रकारकी होती हैं—प्रवृत्ति-मूलक और निवृत्ति-मूलक। इन्द्रियोंकी चेष्टाके द्वारा श्रवण, कीर्तन आदि भक्तिके अङ्गोंका पालन प्रवृत्ति-मूलक चेष्टा है। भक्ति-विरोधी-भाव, अपराध, आलस्य, अनर्थ आदिका त्याग निवृत्ति-मूलक चेष्टा है। भक्तिमें ये दोनों ही आवश्यक हैं। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर कहते हैं—अपराधयुक्त नाम-कीर्तन छिद्रयुक्त पात्रमें रखे जलके समान निकल जायेगा, ठहरेगा नहीं। सावधानीपूर्वक अपराध-रहित होकर भक्तिके अङ्गोंका पालनसे सिद्धि होती है। भक्ति आनुगत्यमयी होती है। श्रीकृष्ण हेतु समस्त प्रकारकी चेष्टाएँ अनुकूल भावसे हो, उसमें प्रतिकूल भावना न हो और रसिक-तत्त्वज्ञ गुरु-वैष्णवोंके आनुगत्यमें इसका नित्य-निरन्तर इसका अनुष्ठान होना चाहिये। भक्तिकी सिद्धिके लिये अनुकूल अनुशीलनकी आवश्यकता है, क्योंकि प्रतिकूल आचरणसे सिद्धि नहीं होती। कोई-कोई महानुभाव कहते हैं कि अनुकूलका अर्थ है, जो कृष्णको रुचिकर हो। परन्तु इसमें अतिव्याप्ति और अव्याप्तिके दोष हो सकते हैं। 'अतिव्याप्ति-दोष'—श्रीकृष्ण चाणूर-मुष्टिकके सङ्ग युद्धमें अतिरुचिपूर्वक वीर-रसका आस्वादन कर रहे हैं। इससे असुरोंमें भक्ति व्याप्त लगती है, परन्तु उनमें श्रीकृष्णके प्रति द्वेष-रूप प्रतिकूल भाव होनेके कारण इसे भक्ति नहीं माना जा सकता। 'अव्याप्ति-दोष'—दूसरी ओर, स्तनपानमें श्रीकृष्णको अतृप्त छोड़कर माता यशोदा चूल्हेपर उफनते हुए दूधको उतारनेके लिये चली गयीं। माता यशोदाकी यह क्रिया श्रीकृष्णके लिये रुचिकर नहीं हुई। यहाँ ऐसा प्रतीत होता है, जैसे माता यशोदामें भक्ति अव्याप्त है अर्थात् उनमें भक्ति नहीं है। किन्तु श्रीकृष्णकी सेवामें उपयोग होनेवाली प्रत्येक वस्तुकी रक्षा करना परिपूर्ण भक्ति है; वह माताका श्रीकृष्णके प्रति वात्सल्यका प्रकाश है। श्रीकृष्णका जिसमें मङ्गल हो, वही भाव अनुकूल है। माता यशोदाका विचार है कि उनके दूधसे श्रीकृष्णकी पूर्ति नहीं होगी, उससे दही, मक्खन, छाछ और रबड़ी आदि मिष्ठान नहीं बनेंगे। 254 ।
आठवाँ अध्याय 8/68-70 ] [ बायाँ स्तम्भ ] इसलिये दूधकी रक्षा करनी चाहिये। यह प्रीतिका लक्षण है। श्रीकृष्णकी सेवामें उपयोगमें आनेवाली वस्तुओंमें भक्तोंकी श्रीकृष्णसे भी अधिक प्रीति होती है। केवल प्रातिकूल्य-रहित होना भी भक्ति नहीं है, क्योंकि घड़ेमें श्रीकृष्णके लिये प्रतिकूल भाव नहीं है, परन्तु साथ श्रीकृष्णकी सेवाकी कोई चेष्टा भी नहीं है। भक्ति भक्त-वृत्तिपर निर्भर करती है, श्रीकृष्ण-वृत्तिपर नहीं। ‘आनुकूल्येन कृष्णानुशीलन’—ये दोनों क्रियाएँ आवश्यक हैं। यह भक्तिका स्वरूप-लक्षण है। इसी स्वरूप-सिद्धा भक्तिका अनुष्ठान उत्तमा भक्तिमें पर्यवसित होता है।”—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 68 ॥ भक्तके प्रेमसे ही श्रीकृष्ण वशीभूत :— पद्यावली 11वें अङ्कमें उद्धृत श्रीरामानन्द राय-कृत श्लोक— नानोपचार-कृतपूजनमार्त्तबन्धोः प्रेम्णैव भक्तहृदयं सुखविद्रुतं स्यात्। यावत् क्षुदस्ति जठरे जरठा पिपासा तावत् सुखाय भवतो ननु भक्ष्य-पेये ॥ 69 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 69 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जैसे पेटमें जब तक बहुत जोरकी भूख और प्यास रहती है, तब तक ही खाने-पीने योग्य सब वस्तुएँ सुखदायक होती हैं, उसी प्रकार आर्त्तबन्धुकी (दीनबन्धु श्रीकृष्णकी) नाना उपचारसे पूजा होनेपर भी जब वह प्रेमयुक्त होती है, तभी भक्तोंका हृदय आनन्दसे पिघल जाता है ॥ 69 ॥ अनुभाष्य— यावत् जठरे (उदरे) जरठा (अतिशयिनी) क्षुत् पिपासा च अस्ति, तावत् भक्ष्यपेये [यथा] सुखाय (आनन्दाय) भवतः, [तथा] आर्त्तबन्धोः (दीननाथस्य) नानोपचार-कृतपूजनं (विविध- षोडशोपचारसमन्विताचार्चनादिकम् अनुष्ठितमपि)) भक्तहृदयं प्रेम्णा (कृष्णोन्द्रिय-तोषणमया भक्त्या) एव सुख-विद्रुतम् (आनन्देन द्रवीभूतं) स्यात्। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 69 ॥ [ दायाँ स्तम्भ ] रागमार्गके द्वारा ही श्रीकृष्णप्रेमकी प्राप्ति, सुकृतिसे उत्पन्न वैधभक्तिसे दुर्लभ :— (पद्यावली 12 अंकमें उद्धृत श्रीरामानन्द राय-कृत श्लोक)— कृष्णभक्तिरसभाविता मतिः क्रीयतां यदि कुतोऽपि लभ्यते। तत्र लौल्यमपि मूल्यमेकलं जन्मकोटिसुकृतैर्न लभ्यते ॥ 70 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 70 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—करोड़ों जन्मोंमें की गयी सुकृतियोंके द्वारा जिसे प्राप्त नहीं किया जा सकता, परन्तु लोभरूपी एक मूल्य देकर जिसे प्राप्त किया जा सकता है, ऐसी श्रीकृष्णभक्तिरसभावित मति जहाँसे भी मिले, उसे खरीद लो। उक्त दो श्लोकोंमें, पहला श्रद्धामूलक वैधीभक्तिको सूचित कर रहा है और दूसरा लोभमूलक रागानुगा-भक्तिको सूचित कर रहा है। इसके बाद इसी रागानुगा-भक्तिका अवलम्बन करके ही श्रीराय रामानन्दके द्वारा कहे जानेवाले वचन व्यवहार होंगे। अर्थात् अब यहाँसे वे रागभक्ति-सिद्धान्तका अवलम्बन कर रहे हैं और उन्होंने वैधी-भक्तिकी बातको छोड़ दिया है ॥ 70 ॥ अनुभाष्य— कृष्णभक्तिरसभाविता (कृष्णसेवारस-भावनामयी) मतिः (बुद्धिः) यदि कुतः (यत्र क्वापि देशकालपात्रतः अनुष्ठानात् वा) लभ्यते, तदा [युष्माभिः तादृशी मतिः] क्रीयतां (मूल्यप्रदानेन अवश्यमेव ग्रहणीया)। तत्र (मतिविक्रयवाणिज्ये) एकलं लौल्यं (लोभः) एव हि मूल्यं, [यतः तन्मतिः] जन्मकोटि-सुकृतैः (बहुजन्मजन्मान्तरसञ्चितभाग्यैः) न लभ्यते, [सा परमदुर्लभा एवेत्यर्थः]। श्लोक-भावानुवाद—श्रीकृष्णसेवारस-भावनामयी मति यदि किसी स्थानपर, किसी समय भी, किसी भी व्यक्तिसे मिल रही हो, तो वैसी मति मूल्य देकर खरीद लो। लोभ ही उस मतिको खरीदनेके लिये एकमात्र मूल्य है, बहुत जन्म-जन्मान्तरके सञ्चित भाग्यसे भी । 255
[ 8/70-71 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला वह प्राप्त नहीं की जा सकती; इसका अर्थ यह है कि वह परम दुर्लभा है ॥ 70 ॥ अमृताणुकणिका-“ 'नानोपचार-कृतपूजनमार्त्तबन्धोः' —यहाँ ऐसा लगता है कि दृष्टान्त और दाष्ट्रान्तिककी सङ्गति नहीं है। दृष्टान्त कहता है कि अन्न-जल उसीको सुखदायी होता है, जिसे भूख-प्यास हो; यहाँ भोजनका सुख भोक्ताको प्राप्त हो रहा है, उसे तीव्र भूख-प्यास है। परन्तु दाष्ट्रान्तिकमें देखा जाता है कि है—जो उपचारके साथ पूजा करेंगे, उनके हृदयमें यदि प्रेम रहे, तभी भगवान्का हृदय सुखसे द्रवित हो जाता है। परन्तु यह शङ्का निराधार है, क्योंकि जब भक्तका प्रेम आर्तिकी अवस्थामें पहुँचता है, तब भगवान् आर्त्तबन्धु होकर सेवा ग्रहण करते हैं। उन्हें विदुरानीके प्रेमके कारण भूख लग गयी, तो केलेके छिलके भी स्वाद लेकर खाये। किन्तु वे दुर्योधनका राजमहल और छप्पन भोग परित्याग करके चले आये, क्योंकि दुर्योधनमें प्रेम नहीं था। महाप्रभु श्रीधरकी दुकानसे केला, मोचा छीनकर लाते थे, श्रीरामचन्द्रने शबरीके झूठे बेर भी खाये, वे गोपियोंके घरसे माखन भी चुराकर खाते थे। क्योंकि भगवान् प्रेमके भूखे हैं। श्रीराय रामानन्दका यह उदाहरण वैधीभक्तिके अन्तर्गत है। 'कृष्णभक्तिरसभाविता मतिः'-यह उदाहरण अनुरागमयी रागानुगा भक्तिका है। कोटि जन्मोंकी सुकृतिसे साधुसङ्ग प्राप्त होता है और साधुसङ्गके द्वारा भक्ति होती है। किन्तु लोभमयी रागानुगा भक्ति कोटि जन्मोंकी सुकृतिसे भी नहीं मिलती। केवल साधुसङ्गमें रुचियुक्त हरिकथा श्रवणसे रुचियुक्त सेवा-वासना उदित होती है। उस समय वह कथा हृदय और कानोंके लिये रसायन हो जाती है। निरन्तर श्रवण करते-करते लोभमयी वासना आती है। भगवद्-कथाओंको सुनकर यदि लोभ हो जाय कि माता यशोदा, श्रीदाम, सुबल, गोपियाँ जैसे श्रीकृष्णकी सेवा करते हैं, मैं भी वैसी सेवा करूँ—इस लोभके उदित होनेके साथ ही रागानुगा भक्ति आरम्भ होती है। यह अवस्था रुचिकी है। यहींसे साधकका भक्ति-साधन आरम्भ होता है। इसके पूर्वकी अवस्थाएँ, निष्ठा आदि इसमें अन्तर्निहित हैं। यह दुर्लभ भक्ति श्रीकृष्ण तथा उच्च कोटिके रागानुगा भक्तोंकी कृपासे मिलती है। जैसे-श्रीशुकदेव गोस्वामीके द्वारा परीक्षित महाराजको भागवत श्रवण करवाना। ईश्वर-कृपा महद्-कृपाकी अनुगामिनी होती है। दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर भावयुक्त भक्त रागानुग भक्तोंकी श्रेणीमें आते हैं। और श्रवण यदि किसी रूपानुग भक्तसे हो, तो अधिक लाभ है। रागानुगा भक्तोंमें भी रूपानुग भक्त विशेष हैं। ये श्रीरूप मञ्जरीके अनुगत हैं और मधुर-भावापन्न हैं। रूपानुग भक्त परम दुर्लभ हैं। साधनावस्थाके सभी सोपानोंमें श्रद्धासे आरम्भकर आसक्तिकी दशा तक श्रद्धा हर स्थितिमें रहती है। इसीसे साधक रतिकी अवस्था तक पहुँचता है। यही रति या भाव प्रेमका अङ्कुर है। रतिकी अवस्थाकी श्रद्धा दिव्य है। इस स्थितिको प्राप्त करके साधक एक भूत-ग्रस्त व्यक्तिकी भाँति प्रेम-ग्रस्त हो जाता है और सभी प्रकारकी शास्त्र-युक्तियोंको भूल जाता है; कैसे कृष्णसे मिलूँ-यही विचार प्रधान हो जाता है।”—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 70 ॥ (1) 'दास्य-प्रेम' उत्तम नहीं :- प्रभु कहे,—“एहो हय, आगे कह आर।” राय कहे,—“दास्य-प्रेम—सर्वसाध्यसार॥” 71 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,–“यह ठीक है, इससे आगे और कुछ कहिये।” तब श्रीरामानन्द रायने कहा,—“दास्यप्रेम सब साध्योंका सार है॥” 71 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यहाँ तक सुनकर महाप्रभुने कहा,—यह ठीक है; किन्तु इसके बाद जो है, उसे बताओ। उसके उत्तरमें श्रीरायने कहा,—दास्यप्रेम ही सभी साध्योंका सार है। 'प्रेमलक्षणभक्ति'में 'ममता' जुड़ जानेसे 'दास्यप्रेम' होता है। साधारण प्रेममें भगवान् और 256
आठवाँ अध्याय 8/71-73 ] भक्तमें कोई सम्बन्ध स्थापित नहीं होता। 'भगवान् ही मेरे प्रभु हैं'-इस प्रकारका ममता-भाव उसमें जुड़नेसे साधारण प्रेम 'दास्यप्रेम' हो जाता है, यह साधारण प्रेमकी अपेक्षा ऊँचा है ॥ 71 ॥ अनुभाष्य-ऊपर लिखे दो श्लोकोंमें प्रेमभक्तिको साधारण रूपसे 'साध्य' निर्णय करनेपर श्रीमहाप्रभुने श्रीरामानन्दको और भी अग्रसर होकर इस 'साध्य'की विशेष रूपसे धारावाहिककी भाँति व्याख्या करनेके लिये कहा। तब वे 'दास्यप्रेमभक्ति'को 'साध्य' कहकर प्रमाणित कर रहे हैं ॥ 71 ॥ श्रीकृष्ण-दास ही श्रीकृष्णके सर्व-ऐश्वर्यके अधिकारी :- श्रीमद्भागवत (9/5/16)- यन्नामश्रुतिमात्रेण पुमान् भवति निर्मलः। तस्य तीर्थपदः किंवा दासानामवशिष्यते ॥ 72 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 72 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीमद्भागवतमें कहा गया है,-जिनके नाम-श्रवणमात्रसे ही जीव निर्मल होता है, उन तीर्थपद भगवान्के जो दास हैं, उनके लिये और क्या वस्तु प्राप्त करनी बाकी रहती है? ॥ 72 ॥ अनुभाष्य-स्वयंमें ब्राह्मण होनेका अभिमान और देहाभिमानके कारण दूसरोंमें दोष-दृष्टि रखनेवाले तथा वैष्णव-विरोधरूपी दुर्वासनासे ग्रस्त दुर्वासा, जिन्हें वैष्णवास्त्र श्रीसुदर्शन कष्ट दे रहे थे, उनकी महाभागवत अम्बरीषकी प्रार्थनासे श्रीसुदर्शन चक्रसे रक्षा हुई; ऐसा देखकर दुर्वासाकी जातिबुद्धि दूर हुई, तब उनके द्वारा की गयी शुद्धभक्त और भगवान्की ऐसी स्तुति- यन्नामश्रुतिमात्रेण (यस्य भगवतः नामश्रवणेनैव) पुमान् (जीवः) निर्मलः (शुद्धः) भवति, तस्य तीर्थपदः (तीर्थं पदे यस्य सः तस्य भगवतः) दासानां (किङ्कराणां) किं वा अवशिष्यते? [न किञ्चिदेवेत्यर्थः]। श्लोक-भावानुवाद-जिनका नाम श्रवणमात्रसे ही जीव निर्मल हो जाता है, तब उन भगवान् जिनके चरणकमलोंमें समस्त तीर्थ वास करते हैं, उनके दासोंको क्या पाना शेष रह जाता है, अर्थात् कुछ भी बाकी नहीं रहता है-यह अर्थ है ॥ 72 ॥ भगवान्के दासकी दीनता :- यामुनाचार्यपाद-कृत स्तोत्ररत्न (46)- भवन्तमेवानुचरन्निरन्तरः प्रशान्तनिःशेषमनोरथान्तरः। कदाहमैकान्तिकनित्यकिङ्करः प्रहर्षयिष्यामि स नाथ जीवितम् ॥ 73 ॥ अनुवाद-हे नाथ! आपकी निरन्तर सेवाके द्वारा अन्य मनोरथोंसे सर्वथा रहित होकर प्रशान्तभावसे मैं कब अपनेको आपका नित्यदास कहकर दास्यजीवनके सहित आनन्दसे प्रफुल्लित होऊँगा? ॥ 73 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 1/206 संख्या देखें ॥ 73 ॥ अमृताणुकणिका-“शान्त भावमें निष्ठा है, परन्तु ममता नहीं है, इसलिये उसमें प्रेमका विकास भी नहीं है। शान्त रसके भक्त सनक-सनन्दनादि चार कुमार आदि हैं। ये ज्ञान-दृष्टिसे सभी कुछ जानते हैं। किन्तु उनका अपना रस कौन-सा है, वे किस रूपमें सेवा करते हैं, यह निश्चित नहीं है। उन्हें अपनी सेवाकी परिपाटी भी ज्ञात नहीं है। दास्यभावमें निष्ठाके साथ ममतासे सेवाभाव भी युक्त हो जाता है। सम्भ्रम और विश्रम्भ भावसे दास्य दो प्रकारका होता है। वैकुण्ठमें शुद्ध सम्भ्रमयुक्त दास्य है। अयोध्या तथा द्वारकामें भी गौरव-मिश्रित सम्भ्रम दास्य-रस है। किन्तु वह वैकुण्ठसे कुछ ऊँचा है। केवल व्रजमें ही शुद्ध विश्रम्भ-भावयुक्त दास्य प्रेम अवस्थित है। व्रजके दास्य भक्तोंमें ममतायुक्त सख्य और वात्सल्यका मिश्रण रहता है। दास्य प्रेममें श्रीकृष्ण विषय-आलम्बन हैं और वे भक्त-वात्सल्य आदि गुणोंसे युक्त हैं। श्रीकृष्णके दास आश्रय-आलम्बन हैं। श्रीकृष्णके दासोंमें नित्य-सिद्ध, । 257
[ 8/73-75 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला साधनसिद्ध और साधक—ये तीन प्रकारके भेद हैं। श्रीकृष्णकी कृपा, चरणरज और भुक्तावशेष (महाप्रसाद) आदि उद्दीपन हैं एवं श्रीकृष्णकी आज्ञा पालन करना अनुभाव है। दास्य-भक्तमें यह भावना होती है कि श्रीकृष्ण मेरे प्रभु हैं और मैं उनका दास हूँ।”—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 73 ॥ (2) ‘सख्यप्रेम’—उत्तम :- प्रभु कहे,—“एहो हय, किछु आगे आर।” राय कहे,—“सख्य-प्रेम—सर्वसाध्यसार॥” 74 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“दास्यप्रेम साध्य है, आपका यह कथन ठीक है, परन्तु इससे आगे और कुछ बतलाइये।” श्रीरामानन्द-रायने कहा,—“श्रीकृष्णके प्रति सख्य-प्रेम ही सभी साध्योंका सार है॥” 74 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यह बात सुनकर महाप्रभुने कहा,—और कुछ आगे बढ़ पानेपर ही सर्वसार प्राप्त होगा। श्रीरायने उसके उत्तरमें कहा,—श्रीकृष्णमें ‘सख्यप्रेम’ ही सभी साध्योंका सार है। श्रीरायके कहनेका तात्पर्य यह है कि दास्यप्रेममें ‘ममता’ रहनेपर भी उसमें ‘भगवान्’—‘प्रभु’ हैं, इस प्रकारकी बुद्धि रहनेके कारण एक प्रकारका ‘भय’ और ‘सम्भ्रम’ अर्थात् गौरवका भाव सहज ही उदित होता है। उस ‘भय’ और ‘सम्भ्रम’का परित्याग करके ‘विश्रम्भ’ अर्थात् ‘एकान्त विश्वास’को ग्रहण कर पानेपर वही प्रेम ही ‘सख्यप्रेम’ होता है। इस प्रेममें श्रीकृष्ण और उनके सखाओंके बीचमें एक ‘समता भाव’ उदित होता है ॥ 74 ॥ व्रजके गोपालगणोंकी श्रीकृष्णसख्य-महिमा :- श्रीमद्भागवत (10/12/11)— इत्थं सतां ब्रह्मसुखानुभूत्या दास्यं गतानां परदैवतेन। मायाश्रितानां नरदारकेण सार्द्धं विजह्रुः कृतपुण्यपुञ्जाः ॥ 75 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 75 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीभागवतमें कहा गया है,—जो ज्ञानमार्गमें ब्रह्मसुखानुभूति स्वरूपमें, दास्यरसके भक्तोंको परदेवतारूपमें एवं मायाश्रित व्यक्तियोंको नरबालकके रूपमें प्रतीत होते हैं, उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णके साथ व्रजके गोपबालकोंने बहुत सुकृतिके फलस्वरूप सख्यरसमें विहार किया था ॥ 75 ॥ अनुभाष्य—श्रीशुकदेव गोस्वामी परीक्षितको वन-भोजनके लिये निकले श्रीकृष्णके साथ विश्रम्भ-प्रेमके सूत्रमें बँधे सखा व्रज-गोपबालकोंके अतिशय सौभाग्यका वर्णन कर रहे हैं— इत्थम् (एवम्प्रकारेण) कृतपुण्यपुञ्जाः (कृतः अनुष्ठितः पुण्यानां पुञ्जः समूहः यैः ते गोपबालकाः) सतां (निर्विशेषज्ञानिनां) ब्रह्मसुखानुभूत्या (ब्रह्मानन्दानुभवैकस्वरूपेण), दास्यं गतानां (लब्धभजनानां भक्तानामिति यावत्) परदैवतेन (परमेश्वर-स्वरूपेण) मायाश्रितानां (भगवन्माया-मोहितानां) नरदारकेण (नरबालकरूपेण) [भगवता] सार्द्धं [सख्येन] विजह्रुः (विहाराणि चक्रु भाग्यं कृष्ण-सखानामिति भावः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 75 ॥ अमृताणुकणिका—‘सख्य दो प्रकारका होता है—ऐश्वर्ययुक्त तथा माधुर्य-युक्त। यहाँ श्रीराय रामानन्दका उद्देश्य शुद्ध माधुर्यमय व्रजके सख्यसे है, इसमें शान्तरसकी श्रीकृष्णमें एकनिष्ठता, दास्यकी सेवा तथा विश्रम्भ-सख्य है। प्रस्तुत श्लोकमें इसीका उदाहरण है। इसमें बतलाया है कि विभिन्न भावनावाले भक्त श्रीकृष्णको विभिन्न रूपोंमें देखते हैं। ‘सतां’—निर्विशेषवादी ब्रह्मज्ञानी भगवान्को ‘ब्रह्मसुखानुभूति स्वरूप’में जानते हैं। वे श्रीकृष्णके साथ विहार नहीं कर सकते, क्योंकि ब्रह्मसुखमें कोई अस्तित्व नहीं है, सत्ता नहीं है, वे परतत्त्व रूपमें ब्रह्मकी उपासनाकर ब्रह्मसायुज्यकी कामना करते हैं; निर्विशेष ब्रह्मके साथ क्रीड़ा करना सम्भव नहीं है। ‘दास्यं गतानां’—इनमें आराध्यका भाव है। इस गौरव-बुद्धिके कारण वे न तो श्रीकृष्णके साथ खेल सकते हैं और न अन्य क्रीड़ा ही कर सकते हैं। ‘मायाश्रितानां’—मायामोहित जीव श्रीकृष्णको एक नरबालकके 258 ।
आठवाँ अध्याय 8/75-77 ] रूपमें ही देखते हैं। उनका दृष्टिकोण विपरीत ही है। वे श्रीकृष्णको तुच्छ समझते हैं और उनकी श्रीकृष्णके साथ विहार करनेकी इच्छा भी नहीं होती। 'सार्द्धं विजहु कृतपुण्यपुञ्जाः'—व्रजके सखा हैं। न जाने इन सखाओंने कौन-से कोटि-कोटि पुण्य किये थे, जो वे श्रीकृष्णके साथ अत्यन्त लोभनीय विहार करते हैं। वनमें सखागण पत्र-पुष्पों और गैरिक धातुओंसे श्रीकृष्णका शृङ्गार करते हैं, श्रीकृष्ण भी सखाओंका शृङ्गार करते हैं। कभी वे वेणुको चोरी कर लेते हैं, फिर पीछे-पीछेसे एक-दूसरेको पकड़ा देते हैं। जब श्रीकृष्ण वेणुको खोजते हैं, तो सखा कहते हैं कि हमें कन्धेपर बैठाकर ले चलो, तब वेणु कहाँ है, बतलायेंगे। वे श्रीकृष्णको स्पर्श करनेकी होड़ लगाते हैं कि 'पहले मैं पकड़ूँगा', 'पहले मैं पकड़ूँगा'। कभी सखा श्रीकृष्णके साथ पशुओंकी बोली बोलते हैं; कोयल, मयूरके स्वरकी नकल करते हैं, मेंढकके समान फुदकते हैं, कभी बन्दरकी पूँछ पकड़ लेते हैं और जब बन्दर एक वृक्षसे दूसरे वृक्षपर छलांग लगाते हैं, तो वे भी उनकी पूँछ पकड़े होनेके कारण उनके साथ एक वृक्षसे दूसरे वृक्षपर जाते हैं। श्रीकृष्ण सखाओंके साथ विभिन्न प्रकारकी लीलाएँ करते हुए स्वच्छन्दरूपसे वन-विहार करते हैं। इस प्रकार वे सख्यरसका आनन्द लेते हैं। सखाओंको यह सौभाग्य कोटि-कोटि पुण्य करनेके कारण प्राप्त हुआ है। 'कृतपुण्यपुञ्जाः'—श्रीसनातन गोस्वामीके अनुसार 'पुञ्ज' शब्दका अर्थ है—'अक्षय' और 'पुण्य' शब्द 'भक्ति'का वाचक है, अर्थात् ये गोप-गण ऐसी 'अक्षय भक्ति'से सम्पन्न हैं। लौकिक पूजा-पाठ या तपस्या आदिसे कोई भी श्रीकृष्णका सहचर नहीं बन सकता। श्रीकृष्णके सखागण अक्षय भक्तिसे परिपूर्ण हैं और बलदेव प्रभुसे प्रकटित नित्य परिकर हैं; ये जीव तत्त्व नहीं हैं। इनकी लोभनीय क्रीड़ाओंकी कथाको सुनकर जीव रागानुगा भक्ति साधनके द्वारा श्रीकृष्णके सखा बन सकते हैं। ये जीव-तत्त्व साधन-सिद्ध होते हैं। सख्य रसमें सङ्कोचरहित स्वच्छन्द सेवा है और सेवा वासनाका विकास भी है तथा साथमें ममता भी है। इसलिये महाप्रभुने इसे उत्तम माना है।”—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 75 ॥ (3) 'वात्सल्य-प्रेम' सख्यकी अपेक्षा उत्तम :— प्रभु कहे, — “एहो उत्तम, आगे कह आर।” राय कहे,—“वात्सल्य-प्रेम—सर्वसाध्यसार ॥” 76 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा—“यह तो उत्तम है, परन्तु इससे आगे कुछ और कहिये।” तब श्रीरामानन्द-रायने कहा,—“वात्सल्य प्रेम ही सर्वसाध्यसार है॥” 76 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभुने कहा,—'सख्यरस' यद्यपि 'दास्यरस'की अपेक्षा उत्तम है, तथापि थोड़ा और अग्रसर होनेसे ही साध्यसार प्राप्त होगा। श्रीरायने उसके उत्तरमें कहा,—'वात्सल्य'-भावका प्रेम ही सभी साध्योंका सार है। सख्यरसका जो विश्रम्भात्मक प्रेम है, उसमें और अधिक स्नेहयुक्त होनेपर 'वात्सल्यरस'का उदय होता है ॥ 76 ॥ अनुभाष्य—श्रीरामानन्दके 'सख्यप्रेम'के साध्य-निर्णयको सुनकर महाप्रभुने उसे 'दास्यप्रेम'की अपेक्षा 'उत्तम' कहा एवं और भी अग्रसर होनेके लिये अनुरोध करनेपर श्रीरामानन्दने तब 'वात्सल्य-प्रेम'को साध्य बतलाया ॥ 76 ॥ नन्द-यशोदाके वात्सल्यकी महिमा :— श्रीमद्भागवत (10/8/46)— नन्दः किमकरोद्ब्रह्मन् श्रेय एवं महोदयम्। यशोदा वा महाभागा पपौ यस्याः स्तनं हरिः ॥ 77 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 77 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीमद्भागवतमें कहा गया है,—हे ब्रह्मन्! श्रीनन्द महाराजने ऐसी क्या सुकृति की थी, जिसके फलस्वरूप उन्होंने श्रीकृष्णको पुत्रके रूपमें प्राप्त किया था? महाभागा श्रीयशोदाने ही ऐसी क्या सुकृति की थी, जिससे साक्षात् परब्रह्म श्रीकृष्णने उनको 'माँ' कहकर उनका स्तन पान किया था? ॥ 77 ॥ । 259
[ 8/77-80 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य— श्रीशुकदेवके द्वारा यशोदाजीके श्रीकृष्णवात्सल्यके वर्णनको सुनकर विस्मित राजा परीक्षितकी उक्ति— हे ब्रह्मन्, नन्दः एवं महोदयं (महान् श्रेष्ठः उदयः उत्कर्षः यस्मिन् तत् अपूर्वफलोदयं) श्रेयः (मङ्गलप्रदं कर्म) किम् अकरोत्, महाभागा (अतिशय-सौभाग्यशालिनी) यशोदा वा किम् अकरोत्, हरिः यस्याः (यशोदायाः) स्तनं पपौ? श्लोक-भावानुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 77॥ यशोदाके यशका गान :— श्रीमद्भागवत (10/9/20)— नेमं विरिञ्चो न भवो न श्रीरप्यङ्गसंश्रया। प्रसादं लेभिरे गोपी यत्तत् प्राप विमुक्तिदात् ॥ 78 ॥ अनुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 78॥ अमृतप्रवाह भाष्य— यशोदा गोपीने साधारण जीवोंके मुक्तिदाता श्रीकृष्णसे जिस कृपाको प्राप्त किया था, वह ब्रह्मा, शिव अथवा विष्णुके वक्षःस्थलपर आश्रित लक्ष्मीको भी प्राप्त नहीं हुई॥ 78॥ अनुभाष्य— रस्सी द्वारा बाँधनेके लिये उद्यत माताको असमर्थ और थकी हुई देखकर श्रीकृष्ण स्वयं ही बँध गये; यशोदाजीके इस श्रीकृष्ण-वशकारिता-गुणके दर्शनसे परीक्षितके प्रति शुकदेवकी उक्ति— गोपी (यशोदा) विमुक्तिदात् (श्रीहरेः सान्निध्यात्) यत् प्रसादं प्राप, तत् इमं प्रसादं विरिञ्चः (पुत्रो ब्रह्मापि) न, भवः (आत्मतुल्यः शम्भुः) न, अङ्गसंश्रया (पत्नी) श्रीः (लक्ष्मीः) अपि न लेभिरे। श्लोक-भावानुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 78॥ अमृतानुकणिका— गौड़ीय वेदान्त प्रकाशनसे प्रकाशित श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामीके द्वारा सम्पादित “श्रीरायरामानन्द-संवाद” ग्रन्थ देखें॥ 77-79॥ (4) ‘कान्तभाव’ ही सर्वश्रेष्ठ प्रेमभक्ति :— प्रभु कहे,—“एहो उत्तम, आगे कह आर।” राय कहे,—“कान्तभाव—प्रेमसाध्यसार ॥” 79॥ अनुवाद— महाप्रभुने कहा, — “यह वात्सल्यप्रेम उत्तरोत्तर उत्तम है, पर आगे और जो है, उसे कहिये।” श्रीरामानन्द रायने कहा, — “श्रीकृष्णके प्रति कान्तभाव ही सब साध्योंका सार है॥” 79॥ अमृतप्रवाह भाष्य— महाप्रभुने कहा, — यद्यपि यह उत्तरोत्तर उत्तम हुआ है, तथापि इसको पार करके और एक रस है, जिसको ही 'साध्यसार' कह सकते हो। श्रीरायने उत्तर दिया, — श्रीकृष्णके प्रति 'कान्तभाव' ही प्रेमकी पराकाष्ठा रूप साध्योंका सार है। तात्पर्य यह है, — साधारण-प्रेममें 'ममता'का अभाव, दास्यरसमें 'विश्रम्भ' अथवा 'विश्वास'का अभाव, सख्यरसमें 'स्नेहाधिक्य'का अभाव और वात्सल्यरसमें 'निःसङ्कोच-भाव'का अभाव होनेके कारण साध्यप्रेमकी पूर्णता उन-उन रसोंमें नहीं होती। श्रीकृष्णके प्रति जब कान्तभाव उदित होता है, तभी सभी अभावोंसे शून्य, सभी साध्योंके सार एक अखण्ड प्रेमतत्त्वको प्राप्त किया जा सकता है॥ 79॥ अनुभाष्य— सख्यप्रेमकी अपेक्षा 'वात्सल्यप्रेम' उत्तम है, किन्तु जब महाप्रभुने श्रीरायको और भी अग्रसर होनेके लिये कहा, तब श्रीरामानन्दने 'कान्तभाव'को ही प्रेमका 'साध्यत्व' कहकर उल्लेख किया॥ 79॥ व्रजगोपियोंका माहात्म्य :— (श्रीमद्भागवत 10/47/60)— नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्तरतेः प्रसादः। स्वर्योषितां नलिनगन्धरुचां कुतोऽन्याः। रासोत्सवेऽस्य भुजदण्डगृहीतकण्ठ- लब्धाशिषां य उदगाद्व्रजसुन्दरीणाम्॥ 80 ॥ अनुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 80॥ अमृतप्रवाह भाष्य— श्रीवृन्दावनमें रासोत्सवमें श्रीकृष्णकी भुजाओंके द्वारा आलिङ्गित-कण्ठवाली व्रजसुन्दरियोंके प्रति जो कृपा उदित हुई थी, वह श्रीकृष्णके वक्षःस्थलपर स्थित लक्ष्मी आदि परव्योमकी अत्यन्त अनुगत शक्तियोंको भी प्राप्त नहीं हुई, स्वर्गकी रमणियाँ जिनकी देहसे 260 ।
आठवाँ अध्याय 8/80-81 ] कमलकी सुगन्ध आती है, उनको भी उस प्रकारकी कृपाकी प्राप्ति नहीं हुई, तब अन्य स्त्रियोंके विषयमें तो क्या कहूँ? ॥ 80 ॥ अनुभाष्य-उद्धवजी व्रजमें आकर कुछ महीनों तक रहे। श्रीकृष्णकथा-कीर्तनके द्वारा हर्षोत्पादन करनेपर भी जिनका चित्त ऐकान्तिक रूपसे श्रीकृष्णमें ही आविष्ट था, उन श्रीकृष्ण-विरहसे तप्त गोपियोंके एकमात्र श्रीकृष्णमें तन्मय चित्तकी विकलताके दर्शन करके उद्धवजी उनके परम सौभाग्यकी प्रशंसा कर रहे हैं- रासोत्सवे (रासक्रीड़ाकाले) अस्य (श्रीकृष्णस्य) भुजदण्डगृहीतकण्ठलब्धाशिषां (भुजदण्डाभ्यां बाहुभ्यां गृहीतः आश्लिष्टः कण्ठः गलदेशः येन तस्मात् लब्धाः प्राप्ताः आशिषाः कल्याणमनोरथाः याभिर्गोपीभिस्तासां) व्रजसुन्दरीणां (गोपललनानां) यः (प्रसादः) उदगात् (आविर्बभूव), नलिनगन्धरुचां (नलिनस्य पद्मस्य इव गन्धो रुक् कान्तिश्च यासां तासां) स्वर्योषितां (देवरामाणां) न अभूत्; उ (अहो) अङ्के (वक्षसि) नितान्तरतेः (अनन्यात्यन्ताश्रितायाः) श्रियः (लक्ष्म्याः अपि) अयं प्रसादः न अभूत्; अन्याः (स्त्रियन्तु) कुतः [एवं कृष्णानुग्रहविषयाः भवन्ति ?] श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 80 ॥ व्रजगोपियोंका ही मदनमोहन-विग्रह-दर्शनमें अधिकार :- श्रीमद्भागवत (10/32/2)- तासामाविरभूच्छौरिः स्मयमानमुखाम्बुजः। पीताम्बरधरः स्रग्वी साक्षान्मन्मथमन्मथः ॥ 81 ॥ अनुवाद-उसी समय उन रोदनकारी व्रजदेवियोंके बीचमें शूरवंशके शिरोमणि श्रीकृष्ण प्रकट हो गये। उनका मुखकमल मन्द-मन्द मुस्कानसे खिला हुआ था, वे गलेमें वनमाला और शरीरपर पीताम्बर धारण किये हुए थे। उनका वह रूप-सौन्दर्य सबके मनको मथ डालनेवाले साक्षात् कामदेवके मनको भी मथनेवाला था ॥ 81 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 5/214 संख्या देखें ॥ 81 ॥ अमृताणुकणिका-"कान्त और कान्ताका परस्पर प्रेम ही 'कान्तभाव' है। यहाँ श्रीकृष्णके प्रति 'कान्तभाव' ही प्रेम-पराकाष्ठा रूप साध्योंका सार है। श्रीराय रामानन्दने यहाँ कान्तभावको सर्वश्रेष्ठ न कहकर उसके प्रेमकी पराकाष्ठाको ही सर्वश्रेष्ठ बतलाया है। श्रीकृष्णके प्रति कान्तभावके उदय होनेसे सभी साध्योंके सार, अखण्ड प्रेम-तत्त्वको प्राप्त किया जा सकता है। कान्तभावकी स्थिति शृङ्गार या मधुर रसके अन्तर्गत है। इसमें श्रीकृष्ण ही व्रज गोपियोंके प्राण-प्रियतम विषयालम्बन हैं। मुरली ध्वनि, वसन्त ऋतु, कोकिलकी कूक, मयूर-कण्ठका दर्शन आदि उद्दीपन विभाव हैं। कटाक्ष और हास्यादि अनुभाव हैं, समस्त सात्त्विक भाव सुदीप्त अवस्था तक होते हैं। इस रसमें प्रेम-स्नेह-मान- प्रणय-राग-अनुराग-महाभाव आदि सभी अवस्थाएँ दृष्टिगोचर होती हैं, परन्तु केवल श्रीमती राधिकामें ही महाभावकी सर्वोच्च अवस्था मादन नामक महाभाव अवस्थित है। मधुररस स्वकीया और परकीया भावसे दो प्रकारका होता है। स्वकीया वैकुण्ठ-गत तत्त्व है और परकीया भाव केवल व्रजरमणियोंमें ही देखा जाता है। आदिलीला (4/46-49)- अतएव मधुर रस कहि तार नाम। स्वकीया-परकीया-रूपे द्विविध संस्थान ॥ परकीयभावे अति रसेर उल्लास। व्रज बिना इहार अन्यत्र नाहि वास ॥ व्रजवधूगणेर एइ भाव निरवधि। तार मध्ये श्रीराधार भावेर अवधि॥ प्रौढ़-निर्मलभाव प्रेम सर्वोत्तम। कृष्णेर माधुर्यरस-आस्वाद-कारण॥ इसी कारण व्रजगोपियोंमें श्रीकृष्णको पूर्णतः वशीभूत करनेका सामर्थ्य होता है। विभिन्न अन्य प्रेममें कुछ न कुछ न्यूनता रहती है, जैसे-शान्तप्रेममें ममताका अभाव, दास्यरसमें विश्रम्भ अथवा विश्वासकी कमी, सख्यरसमें स्नेहकी अधिकताकी कमी और वात्सल्यरसमें निःसङ्कोच भावकी न्यूनता होती है। इनके कारण । 261
[ 8/81 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला साध्यप्रेमकी पूर्णता इन रसोंमें नहीं होती। कान्तभावकी नायिकाओं व्रजगोपियोंमें एक अपूर्व भाव है। इन सभी न्यूनताओंकी पूर्ति करते हुए वे निजाङ्ग भी श्रीकृष्णसेवामें देकर श्रीकृष्णका सुख वर्धन करती हैं। यह विशेषता अन्य रसोंमें नहीं है। शान्त, दास्य, सख्य और वात्सल्य-इन चार रसोंके गुण मधुर कान्तरसमें नित्य विद्यमान हैं और उन रसोंमें जो चमत्कारिताका अभाव है, वह मधुररसमें सुन्दर रूपसे प्रतिष्ठित है। व्रजमें दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर, जितनी भी प्रकारकी रति हैं, उन्हें दो भागोंमें विभक्त किया जा सकता है-सम्बन्धानुगा और कामानुगा। दास्य, सख्य और वात्सल्य प्रेमके भक्त अपने सम्बन्धसे बँधे हैं। इनकी अपनी मर्यादा है, जिसका वे उल्लङ्घन नहीं कर सकते। इनकी सेवा सम्बन्धकी अनुगामिनी है और उसीमें सीमित रहती है। द्वारकामें भी रुक्मिणी, सत्यभामा आदिका प्रेम उनके वैवाहिक सम्बन्धके अन्तर्गत है अर्थात् यह भी सम्बन्धानुगा है। उनके प्रेममें अपने सुखकी कुछ वासनाएँ भी सम्मिलित होती हैं; इसलिये वे श्रीकृष्णको पूर्णतया वशीभूत नहीं कर सकतीं। कामानुगा कान्तरतिमें गोपियोंके प्रेममें सम्बन्धकी प्रधानता न होकर सेवा-वासनाकी प्रधानता है जिसके द्वारा वे श्रीकृष्णकी सभी इच्छाओंकी पूर्ति करती हैं। गोपियोंका लोकधर्म, वेदधर्म, आर्यधर्म, गुरु-गौरव, सतीत्व, कुलधर्म-ये सब तृणकी भाँति कान्त-भावमें बह जाते हैं। उनका काम और सेवा तदात्म्यताको प्राप्त हो जाते हैं अर्थात् एक ही हो जाते हैं। गोपियोंकी सेवा, प्रीति और काम- पृथक्-पृथक् नहीं, एक ही हैं। वे श्रीकृष्णकी सेवाके लिये सब कुछ करती हैं। उनके प्रेममें अपनी इन्द्रिय-सुखकी इच्छा नहीं है। श्रीकृष्णसे प्रेम करनेके लिये वे विवाह-बन्धनके द्वारा आबद्ध नहीं हैं। कामानुगा रतिके दो विभाग हैं-सम्भोगेच्छामयी या कामात्मिका और तत्-तत्-भावेच्छात्मिका। सम्भोगेच्छामयी या कामात्मिका रति केलि तात्पर्यमयी होती है। इसकी अवस्थिति विभिन्न यूथेश्वरियोंमें होती है। तत्-तत् भावेच्छात्मिका-व्रजयूथेश्वरियोंका श्रीकृष्णके प्रति जो मधुर भाव होता है, उस मधुर भावकी कामनाका ही यह दूसरा विभाग है; श्रीराधाकी किङ्करियों, मञ्जरियोंमें यह भाव रहता है। जीवके पक्षमें यही भाव सर्वोच्च कोटिका है। 'नायं श्रियोऽङ्ग...'-इस श्लोकके द्वारा उद्धवजी श्रीकृष्ण प्रियाओं, व्रजगोपियोंके प्रेमकी महिमाकी उद्घोषणा करते हुए कह रहे हैं कि ऐसा अपूर्व और अदृष्टपूर्व भगवत्-प्रसाद अन्य किसीने प्राप्त नहीं किया। श्लोकमें 'उ' शब्दके द्वारा उद्धवजीका विस्मय प्रकट होता है। रासोत्सवमें श्रीकृष्णने उल्लसित होकर जिस प्रकार व्रजरमणियोंके कण्ठ-प्रदेशका आलिङ्गनकर उनका मनोरथ पूर्ण किया, वह सौभाग्य उनकी वक्षःस्थित लक्ष्मीदेवीको भी प्राप्त नहीं हुआ। यद्यपि लक्ष्मीदेवी श्रीकृष्णके वक्ष-स्थलपर स्वर्ण-रेखाके रूपमें विराजमान हैं और श्रीकृष्णसे उनका कभी विच्छेद नहीं है, तथापि गोपियाँ ही अधिक प्रशंसनीय हैं। इसका कारण है कि लक्ष्मीदेवी केवल सम्भोग रसमें स्थित हैं, किन्तु गोपियाँ कभी सम्भोग (मिलन) और कभी विप्रलम्भ (विरह)-युक्ता होती हैं। विप्रलम्भ ही सम्भोगकी पुष्टि करके उसमें चमत्कारिता प्रकाशित करता है। लक्ष्मी वक्ष-विलासिनी प्रेयसी हैं, किन्तु गोपियाँ केवल प्रेयसी ही नहीं, वे परकीया-भाव सम्पन्न रास-रङ्गिणी हैं और श्रीकृष्णकी प्रेम माधुरीका अपूर्व रूपमें विस्तार करती हैं। रासलीला महोत्सवमें श्रीकृष्ण अत्यन्त आनन्दपूर्वक प्रेमसमुद्रकी तरङ्गोंमें डूबते-उबरते हैं। इस प्रेमरूपी समुद्रकी गोपियोंके हाव-भाव, कटाक्षरूपी उत्ताल लहरियोंमें अपनेको संरक्षित करनेके लिये वे व्रज-देवियोंके कण्ठको धारण करते हैं। श्रीकृष्णको इस अपूर्व रसका आस्वादन एकमात्र गोपियाँ ही करवानेमें समर्थ हैं। 'तासामाविर्भूच्छौरि...'-प्रेम विवर्धनमें चतुर श्रीकृष्ण राससे अन्तर्धान हो गये। विरह-कातरा गोपियाँ अन्य कोई उपाय न देखकर रोती हुई यमुना पुलिनमें अत्यन्त करुण स्वरसे विलाप करने लगीं। व्रजरमणियाँ 262 ।
आठवाँ अध्याय 8/81–88 ]
विरह-वेदनासे व्याकुल हो निरङ्कुश निरन्तर अश्रुपात कर रही थीं, उस सघन वनके अन्धकारमें उनके विलापमय क्रन्दनको सुनकर अपनी कान्ति प्रकाशित करते हुए श्रीकृष्णचन्द्र उन गोपियोंके मध्य अचानक प्रकट हो गये। विदग्ध चूड़ामणि श्रीकृष्णचन्द्र व्रजदेवियोंके मध्य अपना अपूर्व सौन्दर्य प्रकाश करते हुए प्रकट हुए। तीन विशेषणोंके द्वारा श्रीशुकदेव गोस्वामी रास-रसिक श्रीकृष्णके विलास और वेशकी अपूर्वताका वर्णन कर रहे हैं। 'स्मयमान मुखाम्बुजः'—श्रीकृष्णकी यह मुस्कान उनके स्वाभाविक हास्यसे विलक्षण है; यह गोपियोंको आश्वासन देने और उनका दुःख दूर करनेके लिये थी। विरह-तापसे गोपियोंका हृदय-कमल सन्तप्त था, श्रीकृष्णके अत्यन्त मनोहर मुखारविन्दके दर्शनसे गोपियोंका समस्त दुःख दूर हो गया। 'पीताम्बरधर'—श्रीकृष्णने मानो गोपियोंसे अपने अपराधकी क्षमा-प्रार्थनाके लिये दोनों कन्धोंसे पीताम्बरको लटकाकर अपने हाथोंमें पकड़ रखा था, जैसे कोई अपराधी क्षमा-याचनाके लिये मुखमें तृण दबाकर दीनतापूर्वक वस्त्र गलेमें डालकर आये। 'स्रग्वी'—उन्होंने अपने कमनीय कण्ठमें अम्लान शीतल कमलोंकी पुष्पमाला धारण कर रखी थी। गोपियोंने ही यह माला गूँथकर उन्हें पहनायी थी, इसका आलिङ्गनकर वे गोपियोंके प्रति अपनी चिर-कृतज्ञताको प्रकाशित कर रहे थे। 'साक्षान्मन्मथमन्मथः'—श्रीकृष्णकी छवि अत्यन्त सुन्दर थी और कामदेवके भी मनको मथन करते हुए वे गोपियोंके मध्य सुशोभित हो रहे थे। प्राकृत कन्दर्पका रासादि क्रीड़ाओंमें अधिकार नहीं है। श्रीकृष्णके द्वारा अपने महामोहन माधुर्यमय रूप-लावण्यका आविष्कार विरहिणी गोपियोंके विरहःदुखको विस्मरण करवानेके लिये हुआ था। ऐसा साक्षात् मन्मथ-मन्मथ रूप ही शृङ्गाररसमें परम आलम्बन है। अन्य रसोंमें स्थित भक्तोंके लिये ऐसे रूपके दर्शन सम्भव नहीं है, क्योंकि उनमें वैसा आधार नहीं है।"—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी॥ 81 ॥
कृष्णप्राप्तिर उपाय बहुविध हय। कृष्णप्राप्ति-तारतम्य बहुत आछय ॥ 82 ॥ प्रतिरसकी श्रेष्ठता होनेपर भी परस्परमें तारतम्य वर्तमान :— किन्तु याँर येइ रस, सेइ सर्वोत्तम। तटस्था हञा विचारिले, आछे तर-तम ॥ 83 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण-प्राप्तिके अनेक प्रकारके उपाय हैं। उनके अनुसार श्रीकृष्णप्राप्तिके भी अनेक तारतम्य हैं, किन्तु जिसका जो रस है, उसके लिये वही सर्वोत्तम है। यदि तटस्थ होकर विचार किया जाय, तो उनमें तारतम्य है॥ 82-83 ॥ श्रीभक्तिरसामृतसिन्धु (2/5/38) :— यथोत्तरमसौ स्वादविशेषोल्लासमप्यपि। रतिर्वासनया स्वाद्धी भासते कापि कस्यचित् ॥ 84 ॥ अनुवाद—पाँचों प्रकारकी रतियाँ एक-दूसरेसे उत्तरोत्तर अधिकाधिक आस्वादनीय एवं उल्लासमयी हैं। यही रति वासना विशेषताके क्रमसे विशेष परमास्वादनीय होकर किसी विशेष भक्तके लिये मधुर रसरूपमें प्रकाशित होती है ॥ 84 ॥ अनुभाष्य—आदिलाीला 4/45 संख्या देखें ॥ 84 ॥ मधुर-रसमें ही शान्तादि चारों रस विद्यमान :— पूर्व-पूर्व-रसेर गुण-परे-परे हय। एक-दुइ गणने पञ्च पर्यन्त बाड़य ॥ 85 ॥ गुणाधिक्ये स्वादाधिक्य बाड़े प्रति-रसे। शान्त-दास्य-सख्य-वात्सल्येर गुण मधुरेते वैसे ॥ 86 ॥ जड़ीय दृष्टान्त; पञ्चम महाभूत 'भूमि'में ही अन्य चार भूत विद्यमान :— आकाशादिर गुण येन पर-परभूते। दुइ-तिन-गणने बाड़े पञ्च पृथिवीते ॥ 87 ॥ शृङ्गार-रस-लक्षण प्रेमके वशीभूत श्रीकृष्ण :— परिपूर्ण-कृष्णप्राप्ति एइ 'प्रेमा' हैते। एइ प्रेमार वश कृष्ण,—कहे भागवते ॥ 88 ॥
। 263
[ 8/82-88 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-रसादिके तारतम्यसे पूर्व-पूर्व रसके गुण अगले रसमें विद्यमान रहते हैं। पूर्वका गुण अगलेमें आ जानेसे दूसरेमें दो गुण हो जाते हैं, तीसरेमें तीन और पाँचवें रस तक पाँचों गुण तक वृद्धि हो जाती है। गुणोंकी अधिकतासे प्रत्येक रसका आस्वादन भी बढ़ता जाता है। शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्यके गुण मधुररसमें वर्तमान रहते हैं। इस सिद्धान्तको समझानेके लिये दृष्टान्त देते हुए कहते हैं कि आकाशादिके गुण जैसे अगले-अगले महाभूतोंमें बढ़ते जाते हैं और दो, तीनके क्रमसे पृथ्वीमें पाँचों महाभूत तक बढ़ते जाते हैं, अतः कान्ताप्रेममें पूर्व-पूर्वके चारों रसोंके गुण होनेके कारण कान्ताभाव ही सर्वश्रेष्ठ है। अतः श्रीकृष्ण इस कान्ताप्रेमके ही वशीभूत होते हैं-जैसा कि श्रीमद्भागवतमें भी कहा गया है॥ 85-88 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-प्रभो, मैंने पूर्व-पूर्व साध्योंके अर्थात् श्रीकृष्णप्राप्तिके बहुतसे उपाय बतलाये, उनमें केवलमात्र यही भेद है कि अलग-अलग उपायके अनुसार श्रीकृष्ण-प्राप्तिके तारतम्यका विचार करना होगा। मनुष्य जिन-जिन उपायोंको करनेका अधिकारी है, उन-उन उपायोंको करके ही अपनी अवस्थाके योग्य साध्यवस्तु, जो श्रीकृष्ण-प्राप्ति है, वही उसके लिये कल्याणकारी है। विशेषतः रसको प्राप्त करनेके अधिकारियोंके 'दास्य', 'सख्य', 'वात्सल्य' और 'मधुर'-ये चार प्रकारके रस ही उत्तम हैं। जो जिस रसका अधिकारी है, उसके लिये वही रस ही सर्वोत्तम है। रस-विषयमें जो राग उदय होता है, उसमें आविष्ट होकर चारों रसोंका तारतम्य दिखलायी नहीं देता; किन्तु तटस्थ अर्थात् निरपेक्ष होकर देखनेसे इन रसोंमें तारतम्य है। 'शान्त', 'दास्य', 'सख्य', 'वात्सल्य' और 'मधुर'-इन पाँचों रसोंमें क्रमशः तारतम्य है। 'शान्तरस'में श्रीकृष्णमें ऐकान्तिक निष्ठारूपी गुण दास्यरूपमें ममतासे युक्त होकर अधिक समृद्ध होता है। फिर सख्यरसमें श्रीकृष्णमें ऐकान्तिक निष्ठा और ममता विश्रम्भके साथ युक्त होकर और अधिक प्रफुल्लित होती है; वात्सल्यरसमें फिर शान्त-दास्य-सख्यके तीनों गुण स्नेहाधिक्यके साथ युक्त होकर दिखलायी देते हैं। कान्तभावरूप मधुर-रसमें ये चारों गुण सङ्कोचरहित होकर अतिशय माधुरी प्राप्त करते हैं। इस प्रकार गुणोंकी वृद्धिके कारण आस्वादनकी भी वृद्धि होती है। इसलिये तटस्थ विचारसे मधुर-रस सबकी अपेक्षा श्रेष्ठ है। रसोंका तारतम्य समझानेके लिये एक जागतिक उदाहरण दिया जा रहा है,-'आकाश', 'वायु', 'अग्नि', 'जल' और 'पृथ्वी'-ये पाँच महाभूत हैं। आकाशमें 'शब्द' नामक एक गुण है; वायुमें 'शब्द' और 'स्पर्श'-दो गुण हैं; अग्निमें 'शब्द', 'स्पर्श' और 'रूप'-ये तीन गुण हैं; जलमें 'शब्द', 'स्पर्श', 'रूप' और 'रस'-ये चार गुण हैं; मिट्टीमें 'शब्द', 'स्पर्श', 'रूप', 'रस' और 'गन्ध'-ये पाँच गुण हैं। अब देखें-आकाश आदिमें एकके बाद एक भूतमें क्रमशः गुणोंकी संख्यामें वृद्धि हुई है, -पाँचों गुण ही पृथ्वीमें लक्षित होते हैं। उसी प्रकार शान्त-दास्य-सख्य- वात्सल्य-मधुरमें क्रमशः गुणोंकी वृद्धि होकर मधुररसमें पाँचों गुण ही परिपूर्ण मात्रामें पाये जाते हैं; इसलिये परिपूर्ण-श्रीकृष्णप्राप्ति 'मधुर' अथवा शृङ्गार-रस-रूपी प्रेममें ही होती है। भागवतमें कहा गया है-मधुररससे उत्फुल्ल प्रेमसे श्रीकृष्ण पूर्णतया वशीभूत होते हैं॥ 82-88 ॥ अनुभाष्य-'किन्तु याँर येइ रस, सेइ सर्वोत्तम'-इस वाक्यके द्वारा यह नहीं समझना चाहिये कि जिसका जैसा भी मनोधर्म या विचार होगा, वही सर्वोत्तम है; उच्छ्र “श्रुतिस्मृतिपुराणादि-पञ्चरात्रविधिं बिना। ऐकान्तिकी हरेर्भक्तिरुत्पातायैव केवलम्॥” “श्रुति-स्मृति पुराणादि एवं पञ्चरात्रकी विधिका त्याग करके ऐकान्तिकी हरिभक्ति भी विघ्न ही उत्पादन किया करती है।” गृहस्थमें आसक्त व्यक्तिके लिये भागवतका व्यापार जिसे शास्त्रोंमें निन्दनीय अपराध कहा गया है, मन्त्र 264 ।
आठवाँ अध्याय 8/82-91 ] देनेका व्यापार, शिष्य बनानेका व्यापार, कीर्तनका व्यापार, बहिर्मुख-सामाजिकता, लौकिकता आदि अपेक्षाओंसे युक्त मनोधर्म—इन सबको और शुद्धभक्तिको एक समान कहनेका यहाँ उद्देश्य नहीं है। आउल, बाउल, कर्त्ताभजा, नेड़ा, दरवेश, साँई, अतिबाड़ि, चूड़ाधारी, गौराङ्गनागरी, गोस्वामियोंके नये मत अथवा जाति-गोस्वामियोंके मतका प्रचार करनेवाले एवं इन जाति गोस्वामियोंके मतको ही 'षड्गोस्वामियोंका मत' कहकर लोगोंको छलनेवाले, श्रीकृष्णके अभक्त, गौरमन्त्र और गौरनामके विरोधी, नये-नये छड़ा (सिद्धान्तविरोधी कीर्तनों)की रचना करनेवाले, विग्रहके व्यापारी, धन लेकर पाठ करनेवाले आदि, नीचजातिके सङ्गसे उत्पन्न वर्णब्राह्मणताको ही 'वैदिक ब्राह्मणता' कहकर प्रचार करनेवाले, स्मार्त्त, सात्वतपञ्चरात्रके विरोधी, मायावादी, स्त्रीसङ्गी आदि कभी भी निष्किञ्चन, श्रीकृष्णके लिये समस्त चेष्टा करनेवाले, प्रतिक्षण हरिसेवामें रत सर्वस्व-त्यागी, श्रीगुरुगौराङ्गको अपने-आपको बेच देनेवाले, नैष्ठिक ब्रह्मचारी, संयत-गृहस्थ, वानप्रस्थ और त्रिदण्डिवेशधारी लोगोंके साथ एक अथवा समान नहीं हो सकते। जिस प्रसङ्गमें कविराज गोस्वामीने इस वाक्यको उद्धृत किया है, वह सिद्धभावपञ्चक (पाँच भावोंमेंसे किसीमें सिद्धि) की बात है। अर्थात् शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर—इन पाँच प्रकारके भावोंमें इन पाँच रसोंके रसिक सेवा किया करते हैं। अनर्थ निवृत्तिके बाद इन सब सिद्धभावोंमेंसे जो कोई किसीके भी नित्यसिद्ध स्वरूपके स्वभावके अनुसार क्यों न उदित हो, वह उस-उस रसके अधिकारी व्यक्तिके लिये सर्वोत्तम है। इसका कारण यह है कि सभीके विषय श्रीकृष्ण ही है, श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य-अन्य कोई प्राकृत देवतादि नहीं। और दूसरी तरफ तटस्थ अर्थात् मध्यस्थ होकर विचार करनेपर उन पाँच प्रकारके भावोंके रसास्वादनमें तारतम्य अनुभव होता है;—जैसे दास्यरसमें शान्तरस और दास्यरस,—दोनों ही एक साथ वर्तमान हैं, इसलिये वह शान्तरसकी अपेक्षा श्रेष्ठ है। दूसरी ओर, सख्यरसमें शान्त और दास्य वर्तमान हैं; इसलिये वह शान्त और दास्यसे और भी उन्नत है। फिर, वात्सल्य रसमें शान्त, दास्य एवं सख्य अन्तर्भुक्त होनेके कारण उसमें पूर्वोक्त तीनों प्रकारके रसोंसे अधिक चमत्कारिता वर्तमान है। फिर, मधुररसमें पूर्ववर्त्ती चार प्रकारके रस विराजमान होनेसे उसकी चमत्कारिता और माधुर्य सर्वश्रेष्ठ है। वैष्णव और भक्तिसिद्धान्तोंमें निपुण महाजनोंने इस प्रकारके उत्तरोत्तर क्रमसे स्वरूपकी उपलब्धिका सूक्ष्मातिसूक्ष्म तत्त्वसमूह विचार किया है। दुर्भाग्यवशतः दैव-मायाके द्वारा विमूढ़ असत्-सिद्धान्तोंमें निपुण व्यक्ति इन सब सिद्धान्तोंकी कुछ भी उपलब्धि नहीं कर पानेके कारण शुद्धवैष्णव- सिद्धान्तोंपर दोषारोपण करते हैं, —उनका ऐसा करना बालकों जैसी बातें करनेवाले उन सभी व्यक्तियोंके दुर्भाग्यका ही परिचय देता है॥ 82-86॥ श्रीकृष्णमें प्रेमभक्ति ही श्रीकृष्ण-प्रदाता :— श्रीमद्भागवत (10/82/44)— मयि भक्तिर्हि भूतानाममृतत्वाय कल्पते। दिष्ट्या यदासीन्मत्स्नेहो भवतीनां मदापनः ॥ 89 ॥ अनुवाद—मेरे प्रति भक्ति ही जीवोंके लिये अमृत है। हे गोपियों! मेरे प्रति तुम्हारा जो स्नेह है, वही एकमात्र तुम लोगोंका मुझे प्राप्त करनेका कारण है॥ 89 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 4/23 संख्या देखें॥ 89 ॥ भक्तके भजनकी गाढ़ताके तारतम्यसे ही श्रीकृष्णभक्तिकी प्राप्तिमें भी तारतम्य :— कृष्णेर प्रतिज्ञा दृढ़ सर्वकाले आछे। ये यैछे भजे, कृष्ण तारे भजे तैछे॥ 90 ॥ गोपियोंकी मधुर-रसकी सेवाके बदले श्रीकृष्णके द्वारा स्वयंको प्रदान करनेकी असमर्थता हेतु ऋण :— एइ 'प्रेमेर अनुरूप ना पारे भजिते। अतएव 'ऋणी' हय—कहे भागवते॥ 91 ॥ । 265
[ 8/90–91 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—श्रीकृष्णने पहले सर्वकालके लिये एक दृढ़ प्रतिज्ञा की है कि जो मुझे जिस प्रकार भजता है, मैं भी उसका उसी प्रकारसे भजन करता हूँ। परन्तु भागवतमें कहा गया है कि माधुर्य रसमें जो श्रीकृष्णप्रेम है, उसके अनुरूप श्रीकृष्ण उसका प्रतिदान नहीं दे पाते, इसलिये वे माधुर्य रसके भक्तोंके ऋणी ही रहते हैं॥90-91॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णकी यह साधारण प्रतिज्ञा है कि जो उनका जिस रूपमें भजन करेगा, श्रीकृष्ण भी उसका उस रूपमें भजन करेंगे। अन्यान्य रसोंके भक्तोंके भजनके अनुरूप प्रतिभजन करनेमें श्रीकृष्ण समर्थ हैं; किन्तु मधुररससे उत्फुल्ल प्रेममें भजनके अनुरूप प्रतिभजन न देख पानेके कारण श्रीकृष्णने कहा,—हे व्रजसुन्दिरयों! मैं तुम्हारे ऋणका शोधन नहीं कर पाया अर्थात् चुका नहीं पाया॥90-91॥ अनुभाष्य—प्राकृत लोगोंका विचार—"जो जिस भी भावसे भजन क्यों न करें, वे भगवान्को ही प्राप्त करते हैं। कर्म, ज्ञान, योग, तपस्या, जिस किसी भी उपायसे भगवान्का भजन किया जाय, उस उपायसे कुछ लेना देना नहीं है। जैसे, किसी स्थानपर जानेके लिये अनेक मार्ग हैं, उसी प्रकार भगवान्के निकट जानेके भी विभिन्न मार्ग हैं। भगवान्को काली, दुर्गा, शिव, गणेश, राम, हरि, ब्रह्म, जिस किसी भी नामसे क्यों न पुकारा जाय, एक ही बात है। अथवा जैसे एक ही व्यक्तिके अलग-अलग नाम हैं, तो उनमेंसे जिस किसी भी नामसे पुकारनेपर वह उत्तर देता है, उसी प्रकार भगवान्के सम्बन्धमें भी ऐसी बात है।" किन्तु यह सब बातें बालकों जैसे मनोधर्मी व्यक्तियोंके लिये मनोरञ्जक होनेपर भी सारग्राही व्यक्ति उसे कुसिद्धान्तपूर्ण ही मानते हैं। जो स्वर्ग आदिकी कामनासे आधिकारिक (भगवान्के द्वारा अधिकार प्राप्त) देवताओंकी उपासना करेंगे, भगवान्से विमुख करनेवाली मायाशक्ति उनको इन सभी आधिकारिक देवताओंमें ही श्रद्धारूपी फल देकर उन्हें सर्वोत्तम मङ्गलरूपी फलसे वञ्चित कर देंगी और जन्म-मरणरूपी मालाके कर्मचक्रमें कभी स्वर्ग, तो कभी मर्त्यलोकमें भ्रमण करायेंगी। और जो नित्य भगवान्की सेवाके लिये प्रार्थना करेंगे, भगवान् उन्हें अपनी नित्य-सेवा प्रदान करेंगे। इसलिये जो जिस प्रकारसे भी भजन क्यों न करें, उन्हें अपने भजनके अनुरूप ही फल प्राप्त होगा, ये बात सत्य है। किन्तु यह विशेष रूपसे लक्ष्य करना उचित है कि सब फल समान नहीं हैं। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष कामी व्यक्तियोंका फल और नित्य-अहैतुकी श्रीकृष्णसेवाकी प्रार्थना करनेवाले व्यक्तियोंको प्राप्त होने वाला फल एक नहीं है। धर्म-अर्थ आदिका फल-नश्वर स्वर्गादि है, सायुज्य- मोक्षादिका फल-आत्माका विनाश आदि है, अहैतुकी हरिसेवाका उत्तम फल-नित्य नवनवायमान हरिसेवाकी प्राप्ति अथवा भगवद्-प्रेम है। इसलिये धर्म-अर्थकामी, निर्विशेष-मुक्तिकामी और हरिसेवामें तत्पर व्यक्तियोंके फलमें 'आकाश-पाताल'का भेद है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। जड़-जगत्की अधिष्ठात्री जगत्-जननी महामाया और अन्यान्य आधिकारिक देवता—श्रीभगवान्की बहिरङ्गा शक्ति और विरूप (विपरीत) वैभव हैं। वे भगवान्के आदेशसे जगत्-सृष्टि-कार्योंके विभिन्न अंशोंकी देख- रेखकर रहे हैं। जगत्-सृष्टि-कार्यमें भगवान्की अन्तरङ्गा शक्तिका कोई सम्बन्ध नहीं है। चिद्-धाममें जो सब कार्य होते हैं, वे ही अन्तरङ्गा शक्तिके कार्य हैं, वे सब योगमायाके द्वारा साधित होते हैं। योगमाया-भगवान्की अन्तरङ्गा शक्ति या चिद्-शक्ति है; जो चिद्-धाममें भगवान्के सेवाप्रार्थी हैं, वे योगमायाकी निष्कपट श्रीकृष्ण-सेवोन्मुखी कृपा प्राप्त करते हैं। और जो जड़-ब्रह्माण्डमें उत्तरोत्तर उन्नतिके लिये धर्म, अर्थ, काम आदि अन्याभिलाषकी इच्छा करते हैं या भगवद्-सेवा- विमुखिनी निर्विशेष-गतिकी इच्छा करते हैं, वे महामाया या रुद्रादि देवताओंकी उपासना करते हैं। इसलिये देखा जाता है,—गोपियोंने नन्दगोपके पुत्रको पतिके रूपमें प्राप्त करनेके लिये अर्थात् चिद्-धाममें उनकी नित्य 266 ।
आठवाँ अध्याय 8/90-92 ]
सेवा प्राप्तिके लिये चिद्-शक्ति योगमायाकी आराधना की थी। और देखा जाता है कि सातवीं शताब्दीमें राजा सुरथ एवं समाधि-नामक वैश्यने अपने आपको वर्णाश्रमके अन्तर्गत कोई अभावग्रस्त जीव मानकर जड़जगत्की अधिष्ठात्री महामायाकी आराधना की थी। इसलिये जहाँ 'योगमाया' और 'जड़माया'को एक ही करके 'मूड़ि और मिश्री'को एक ही भावमें चलानेका प्रयास करनेवालोंके जैसे 'समन्वयवाद'का प्रचार किया जाता है, वहाँ अज्ञानता, मूर्खता और भगवान्के स्वरूपकी उपलब्धिकी अभाव ही जानना होगा। दूसरा, इस जगत्में देखा जाता है, - 'किसीके काने पुत्रका नाम 'पद्मलोचन' (कमलनयन) होता है, किन्तु भगवान्के सम्बन्धमें ऐसा नहीं है। भगवान्के नाम और नामीमें कोई भेद नहीं है, भगवान्का कोई भी नाम निरर्थक अथवा भगवान्की वास्तविक सत्तासे अलग नहीं है। श्रीभगवान्के नाम बहुत प्रकारके हैं, जैसे परमात्मा, ब्रह्म, सृष्टिकर्त्ता, नारायण, रुक्मिणीरमण, गोपीनाथ, कृष्ण आदि। किन्तु जो भगवान्को 'सृष्टिकर्त्ता' कहकर पुकारेंगे, वे नारायणका रसास्वादन नहीं कर पायेंगे, क्योंकि 'सृष्टिकर्त्ता' आदि नामसमूह जगत्के बहिर्मुख जीवोंके द्वारा उनके प्राकृत ज्ञानके द्वारा दिये गये नाम हैं। 'सृष्टिकर्त्ता' कहनेसे भगवान्की परिपूर्ण सत्ताकी उपलब्धि नहीं होती, क्योंकि सृष्टिकार्य भगवान्की स्वरूप शक्तिका कार्य नहीं है, वह-उनकी बहिर्मुखी शक्तिका परिचायक है। और 'ब्रह्म' कहनेसे भगवान्के छह प्रकारके ऐश्वर्योंका परिचय नहीं पाया जाता; क्योंकि, भगवान्का निर्विशेष भाव ही 'ब्रह्म'के नामसे प्रसिद्ध है, इसलिये वह भगवान्के सम्पूर्ण सच्चिदानन्द विग्रहका द्योतक नाम नहीं है। 'परमात्मा' कहनेसे भी भगवान्का सम्पूर्ण परिचय नहीं होता, क्योंकि प्रत्येक जीवके हृदयमें अन्तर्यामीके रूपमें भगवान्का आंशिक परिचय ही 'परमात्मा'के नामसे प्रसिद्ध है। और, नारायणका भजन करनेवाले व्यक्ति भी श्रीकृष्णके माधुर्यकी उपलब्धि नहीं कर पाते। पुनः एक श्रीकृष्णमें ही माधुर्यके द्वारा नारायणके ऐश्वर्यको आच्छादित करके सम्पूर्ण परम-चमत्कारिताको विद्यमान देखकर श्रीकृष्णभक्त नारायणका भजन करनेकी स्पृहा नहीं करते, - गोपियाँ श्रीकृष्णको कभी भी 'रुक्मिणीरमण' कहकर सम्बोधन नहीं करतीं। 'रुक्मिणीरमण' और 'श्रीकृष्ण' जागतिक शब्दकोशके अनुसार प्रति-शब्द या समानार्थक-शब्द होनेपर भी, एकके स्थानपर दूसरा शब्द प्रयोग नहीं हो सकता। यदि मूर्खतावशतः कोई उन्हें एक ही समझकर व्यवहार करे, तो यह 'रसाभास'-दोष होता है। जिन्होंने भगवान्के स्वरूपकी उपलब्धि की है, वे अनजान लोगोंकी भाँति ऐसा रसाभास या सिद्धान्तका विरोध नहीं करते। किन्तु तो भी कलिकी प्रबलताके कारण उच्छ्र ही उदारता अथवा महासमन्वय-वादके नामसे एवं सत्-सिद्धान्त ही मूर्ख लोगोंके द्वारा सङ्कीर्णताके नामसे प्रचारित हो रहे हैं॥ 90 ॥ गोपियोंके प्रेमका ऋण श्रीकृष्ण चुका नहीं सकते :- श्रीमद्भागवत (10/32/22)- न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां स्वसाधुकृत्यं विबुधायुषापि वः। या माभजन् दुर्जय-गेहशृङ्खलाः संवृश्च्य तद्वः प्रतियातु साधुना ॥ 92 ॥ अनुवाद- हे प्यारी गोपियों! मेरे साथ तुम्हारा मिलन सर्वथा निर्दोष और निर्मल-निजसुखकी कामनाके लेशसे भी रहित विशुद्ध प्रेममय है। तुमने घर-गृहस्थीकी दुष्कर बेड़ियोंको तोड़कर तथा लोक-मर्यादाका उल्लङ्घनकर मेरा भजन किया है। मैं देवताओं जैसी लम्बी आयु प्राप्त करके भी तुम्हारे इस प्रेम, त्याग और सेवाका बिन्दुमात्र भी बदला चुकानेमें असमर्थ हूँ। तुम अपने सौम्य-स्वभावसे ही मुझे उऋण कर सकती हो, किन्तु मैं तो तुम्हारे प्रेमका सदा ऋणी ही हूँ और रहूँगा॥ 92 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 4/177-180 संख्या देखें॥ 90-92 ॥
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[ 8/90-92 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अमृताणुकणिका—"श्रीकृष्ण अन्यान्य रसोंके भक्तोंके भजनके अनुरूप प्रतिदान करनेमें समर्थ हैं, परन्तु वे ब्रजगोपियोंके प्रेमके अनुरूप प्रतिदान नहीं कर सके, इसलिये उनके ऋणी बन गये। भागवतके उपरोक्त श्लोकमें श्रीकृष्णने स्वयं इस बातको स्वीकार किया है। शरद पूर्णिमाकी रात्रिको श्रीकृष्ण और गोपियोंकी रास-क्रीड़ा हुई, उसमें अन्यान्य गोपियोंको सौभाग्य-मद और श्रीराधाको मान हो गया। यह देखकर श्रीकृष्णने सोचा कि इन परिस्थितियोंमें सुष्ठु रूपसे रास होना सम्भव नहीं है। अतः वे अन्य गोपियोंके सौभाग्य-मदको दूर करनेके लिये और श्रीराधाके मान-प्रसादन हेतु श्रीराधाको लेकर अन्तर्धान हो गये। फिर एकान्तमें श्रृङ्गार, वार्त्तालाप और विहार-विलास आदिके पश्चात् श्रीराधाको भी छोड़कर पुनः अन्तर्धान हो गये। सब गोपियोंने तीव्र विरह-वेदनायुक्त गोपीगीतका अत्यन्त करुण स्वरमें गान किया जिसे सुनकर श्रीकृष्ण अपने मन्मथ-मन्मथ रूपमें पुनः आविर्भूत हुए। गोपियोंने विचार किया—'अहो! प्रेमियोंके शिरोमणि होकर भी इन्होंने हम लोगोंकी ऐसी दुरावस्था की है, इसलिये इनका हमारे प्रति क्या भाव है, क्या यह प्रीतियुक्त है या उदासीन है अथवा द्रोहपूर्ण है?' इसे जाननेके लिये गोपियोंने उनसे तीन प्रश्न किये—हे कृष्ण, एक श्रेणीके लोग केवल प्रेम करनेवालोंसे प्रेम करते हैं, इसके विपरीत एक अन्य श्रेणीके लोग प्रेम न करनेवालोंसे भी प्रेम करते हैं, तथा कुछ लोग ऐसे होते हैं जो प्रेम करनेवाले और न करनेवाले—दोनोंसे ही प्रेम नहीं करते। हे प्रियतम, हम लोगोंके तीन प्रश्नोंका उत्तर यथार्थ रूपमें प्रदान करो। तुम इनमेंसे किसे अच्छा समझते हो?' श्रीकृष्णने कहा—'हे मेरी प्रिय सखियों, जो प्रेम करनेपर ही बदलेमें प्रेम करते हैं, वे प्रेमी नहीं व्यापार करनेवाले बनिये हैं। जो प्रेम नहीं करनेपर भी प्रेम करते हैं, वे करुणाशील व्यक्ति, गुरुजन और माता-पिता हैं। इस श्लोकमें श्रीकृष्णने ब्रजगोपियोंको सुमध्यमा कहकर सम्बोधित किया है। श्लेष भावसे वे यह कह रहे हैं कि 'तुम्हारी शोभा तुम्हारे इस मध्यम प्रश्नमें ही स्थापित है। इस सुशोभन मध्यवर्त्ती प्रश्नके उत्तरकी आधार तो तुम लोग ही हो। प्रेम न करनेवालोंसे भी प्रेम करना—यह गुण तुम लोगोंमें उज्ज्वल रूपसे प्रकाशित हो रहा है। जो लोग प्रीति करनेवालोंसे भी प्रीति नहीं करते, वे चार प्रकारके होते हैं—आत्माराम, आप्तकाम, अकृतज्ञ और गुरुद्रोही। आत्माराम अपनी आत्मामें ही रमणशील होनेके कारण स्वयंमें सम्पूर्ण होते हैं, आप्तकाम जन सभी कामनाएँ पूर्ण रहनेके कारण भोग-इच्छासे रहित होते हैं, अकृतज्ञ दूसरोंके द्वारा किये हुए उपकार आदिको स्मरण नहीं करते और गुरुद्रोही तो उपकारीके प्रति भी द्रोहका आचरण करते हैं।' यदि गोपियाँ कहें कि पहले और दूसरे प्रश्नके उत्तरके उदाहरण तुम नहीं हो, तुम तीसरी श्रेणीके अन्तर्गत दोषी हो। ऐसा कहकर वे एक-दूसरेको आँखोंके इशारेकर मुस्कुराने लगीं। तो श्रीकृष्ण कहने लगे—'हे सखियों, सुनो! क्या तुम मेरे मुखसे मेरी पराजय सुननेकी इच्छा कर रही हो? हे मन्द-मन्द मुस्कानके विलाससे युक्त कटाक्षकी नटन-चातुरीकी चूड़ामणि! तुम लोगोंको अपना दर्शनानन्द प्रदान करनेके कारण मैं गुरुद्रोही नहीं हूँ। हे गोपियों! तुम मेरी अत्यन्त प्रिया हो और मैं तुम्हारा परम प्रियतम हूँ। इसलिये तुम लोगोंके द्वारा मेरे प्रेममें दोष देखना उचित नहीं है। मैं तुम लोगोंका प्रेमालाप श्रवण करनेके लिये अन्तर्हित हो गया था। हे सखियों! मैं तो प्रेम करनेवालोंसे भी वैसा प्रेम नहीं करता जैसा करना चाहिये। मैं ऐसा इसलिये करता हूँ जिससे उनकी चित्तवृत्ति मुझमें लगी रहे। जैसे निर्धन व्यक्तिको कभी बहुत-सा धन मिल जाये और फिर वह खो जाय, तो उसका हृदय खोये हुए धनके चिन्तनमें निमग्न रहता है। वह भूख, प्यास आदि दूसरी वस्तुओंको भूल जाता है। उसी प्रकार मैं भी मिलकर छिप जाता हूँ, जिससे मेरा चिन्तन नित्य-निरन्तर बना रहे। हे प्रियाओं, मेरे 268 ।
आठवाँ अध्याय 8/90-93 ] मनमें सदैव जो बात उदित होती है, उसे सुनो। मेरे साथ तुम्हारा यह मिलन निर्मल और निर्दोष है। यह संयोग काममय प्रतीत होनेपर भी वस्तुतः निर्मल प्रेममय होनेके कारण पवित्र और निर्दोष है। इस मिलनकी यदि कोई निन्दा करता है, तो वह स्वयं निन्दनीय है, वह प्रेमका मर्म नहीं जानता।' गोपियोंका प्रेम और संयोग प्रेमका परिपक्व विलास है। इस प्रकार स्मृतिशास्त्रके द्वारा स्वीकृत कामादिका खण्डन हुआ है। श्रीकृष्णने आगे कहा, - 'हे गोपियों! तुम्हारे जो साधुकृत्य हैं, वे असाधारण हैं। मैं वैसा करनेमें समर्थ नहीं हूँ। मैं देवताओं जैसी परम आयु पाकर भी तुम्हारे साधुकृत्यका ऋण-शोधन करनेमें समर्थ नहीं हो पाऊँगा। तुम लोगोंने उचित-अनुचितकी विवेचना न कर लोकधर्मका त्याग किया है, धर्म-अधर्मका विचार न कर वेद-धर्मका विसर्जन किया है, अपने आत्मीय स्वजन, बन्धु-बान्धव सबका परित्यागकर मेरे पास आयी हो, अर्थात् तुम लोगोंने गृहस्थ धर्मकी शृङ्खलाओंमें पति, श्वसुर, पिता, भाई आदिके स्नेह-बन्धनको छिन्न-भिन्नकर मेरा भजन किया है, तुम मेरे प्रति एकनिष्ठ हुई हो। किन्तु मैंने माता-पिता, भाई, बन्धु, बान्धवों सभीके प्रति स्नेह-सम्बन्ध रखते हुए तुम्हारा भजन किया है। मेरा चित्त अनेक-अनेक भक्तोंके प्रति प्रेमयुक्त होनेके कारण बहु-निष्ठ है। किन्तु तुम्हारा चित्त मुझमें एकनिष्ठ है। इसका प्रतिदान करनेमें मैं सफल नहीं हो सकता, यह मेरे सामर्थ्यकी बात नहीं है। तुम लोगोंके सुशीलता गुणके द्वारा ही मैं ऋणमुक्त हो सकता हूँ; किन्तु वास्तवमें मैं तुम लोगोंका ऋणी ही रहना चाहता हूँ।' ब्रज-गोपियोंके भाव-विशेषका परम आश्चर्यपूर्ण माहात्म्य स्वयं श्रीभगवान् अपने मुखसे वर्णन कर रहे हैं। भगवान् गोपियोंके प्रेमसे पराजित हो गये। अपनी प्रतिज्ञापर कटिबद्ध न रहनेके कारण वे गोपियोंके प्रेमके ऋणी हो गये। यह श्रीभगवान्की परम-विनय उक्तिकी माधुरी ही है—ऐसा समझना होगा। श्रीसनातन गोस्वामीके अनुसार मूल श्लोकके 'स्वसाधुकृत्यं' पदका अर्थ है- 'मेरे प्रति तुम्हारा 'सु' अर्थात् सुष्ठु असाधुकृत्य रूप निष्ठुरताका भाव विद्यमान रहनेपर वे कार्य साधुकृत्य किस प्रकार होंगे? तुम लोग मुझसे कहती हो— 'तुम महाधूर्त्त हो! तुम्हारे मुखमें एक बात और मनमें दूसरी, तुम्हारे वचन मन्द-मन्द मुस्कानयुक्त होनेपर भी उनमें नारी-वधकी वासनाका गूढ़ विष रहता है। व्याध जिस प्रकार मधुर वंशीध्वनिके द्वारा हिरणीका चित्त आकर्षणकर फिर उसका वध करता है, तुम्हारी वंशीध्वनि भी उसी प्रकारसे ही मधुर है। तुमने जन्म लेते ही पूतनाका वध किया था, इसलिये जन्मसे ही नारीवध करना तुम्हारे जीवनका व्रत है। तुम महाचोर-चूड़ामणि हो। बाल अवस्थामें तुमने गोपियोंके घर-घरसे मक्खन चुराया, किशोर अवस्थामें तुमने कात्यायनी व्रत करनेवाली कुमारी गोपियोंके वस्त्रहरणके छलसे उनकी लज्जाका हरण किया तथा मर्यादा प्राप्त कुलस्त्रियोंके पातिव्रत्य धर्मका हरण किया। हे दुल्लीलशेखर ! हे कितवेन्द्र धूर्त्तराज ! आदि तुम्हारे ये कठोर वचनरूप महारससिन्धुकी तरङ्गमाला मेरे हृदयको उद्वेलित करती है। इसलिये इन वचनोंके द्वारा तुम्हारे साधुकृत्य किस प्रकार निष्पन्न होंगे?' वास्तवमें ब्रजगोपियोंके साथ निरन्तर क्रीड़ाके लोभसे ही श्रीकृष्ण ये चातुरीपूर्ण वचन कह रहे हैं।"—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 90-92 ॥ गोपियोंके मधुर-प्रेममें ही श्रीकृष्ण-माधुर्य-विलास प्रकटित :- यद्यपि सौन्दर्य कृष्ण-माधुर्यरे धुर्य। व्रजदेवीरे सङ्गे ताँर बाड़ये माधुर्य ॥ 93 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 93 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यद्यपि श्रीकृष्णका असमोध्वं सौन्दर्य ही श्रीकृष्ण-माधुर्यकी पराकाष्ठा है, तथापि ब्रजदेवियोंका सङ्ग होनेसे वह माधुर्य अनन्तगुणा वृद्धि प्राप्त करता है; इसलिये गोपीजन-वल्लभ-प्रेम ही सभी भक्तोंके लिये साध्यसार है। इसमें भक्तको जिस प्रकार । 269
[ 8/93-94 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (परिपूर्ण-माधुर्यमय) श्रीकृष्णकी प्राप्ति होती है, वैसी अन्य रसकी किसी अवस्थामें नहीं होती ॥ 93 ॥ गोपीके मध्य श्रीकृष्ण-जैसे मणिके बीचमें मरकत :- श्रीमद्भागवत (10/33/6)— तत्रातिशुशुभे ताभिर्भगवान् देवकीसुतः। मध्ये मणीनां हैमानां महामरकतो यथा ॥ 94 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 94 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-देवकीसुत भगवान् समस्त सौन्दर्यके सार होनेपर भी व्रजदेवियोंके साथ वे सोनेकी मणियोंके बीच महा-मरकतके समान अतिशय शोभायमान हुए थे॥ 94 ॥ अनुभाष्य-श्रीशुकदेवके द्वारा परीक्षितको रासलीला करनेवाली गोपियोंके बीचमें श्रीकृष्णके सौन्दर्यका वर्णन- तत्र (वृन्दावने रासमण्डले) हैमानां (सुवर्णखचितानां) मणीनां मध्ये महामरकतः यथा, [तथा इव] ताभिः (व्रजदेवीभिः) [वेष्टितः सन्] भगवान् देवकीसुतः अतिशुशुभे। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 94 ॥ अमृतानुकणिका- "श्रीकृष्णके प्रेमपूर्ण अत्यन्त मनोहर वचनोंको सुनकर गोपियोंका विरहसे उदित सन्ताप दूर हो गया। गोपियों और श्रीकृष्णके प्रश्नोत्तर समाप्त होनेपर गोपियोंका मान शान्त हुआ। तदनन्तर उस मनोहर यमुना पुलिनमें श्रीकृष्णने अपनी प्रीतिपरायण अनुरागी गोपियोंके साथ रासक्रीड़ा आरम्भ की। 'मध्ये मणीनां हेमानां महामरकत यथा'-उस रासमण्डलमें व्रजसुन्दरियोंके मध्य भगवान् श्रीकृष्ण इस प्रकार सुशोभित हो रहे थे जैसे स्वर्णमयी-मणियोंकी मालाके बीचमें ज्योतिर्मयी नीलमणि चमक रही हो। श्रीकृष्णका वर्ण इन्द्रनीलमणिके समान और गोपियोंका वर्ण स्वर्णके समान है। गोपियाँ गोलाकार मण्डलमें थीं, इसलिये उन्हें स्वर्ण मणियोंसे निर्मित हारकी उपमा दी है। गोपियोंकी स्वर्ण कान्तिसे मिलकर श्रीकृष्णकी कान्ति मरकत वर्णकी हुई। गोपियोंके आलिङ्गनसे उनके पीतवर्णसे श्रीकृष्णके श्यामल शरीरकी आभा कुछ ढक गयी, उसपर गोपियोंकी अङ्गकान्तिकी परछाईं पड़ने लगी और वे पीताभा लिये श्यामल वर्णके दिखने लगे। श्रीकृष्णकी शोभा अनेकों गुणा और बढ़ गयी - 'अति शुशुभे' अर्थात् अतुलनीय रूपसे शोभित हुए। वस्तुतः श्रीभगवान् प्रकाशभेदसे अनेकों होकर विराजमान हो रहे थे तथा रासमण्डलीके केन्द्रमें भी श्रीकृष्ण श्रीराधाके साथ वेणुवादनपूर्वक भ्रमण करते-करते विहार कर रहे थे। श्रीराधाकृष्ण युगलका यह प्रकाश सम्पूर्ण रासमण्डलीकी शोभाका अतिशय वर्धन कर रहा था। क्रमदीपिकाके अनुसार 'श्रीकृष्णने अपने दिव्यातिदिव्य विग्रहोंको अनेकों रूपोंमें प्रकाशित किया। दो-दो गोपियोंके मध्य एक-एक रूपमें प्रवेश करके अपनी दोनों भुजाओंको अपनी प्रेयसियोंके गलेमें डालकर विराजमान हुए।' प्रस्तुत श्लोकमें भगवान्को 'देवकीसुत' कहकर सम्बोधित किया है; विष्णुपुराणके अनुसार श्रीनन्द महाराजकी पत्नीके दो नाम हैं-एक यशोदा और दूसरा देवकी। अतः देवकीसुत कहनेसे यशोदानन्दन ही उपलक्षित होते हैं। देवकीसुत एकवचनमें है और गोपियाँ शतकोटि संख्यामें, तो क्या श्रीकृष्ण रासमण्डलमें एक थे या प्रत्येक गोपीके साथ एक-एक? इससे अगले श्लोकमें श्रीशुकदेव गोस्वामी वर्णन कर रहे हैं— 'गायन्त्यस्तं तडित इव ता मेघचक्रे विरेजुः ॥' अर्थात् 'गान करती हुई श्रीकृष्ण-प्रियाएँ मेघमें विद्युतकी भाँति सुशोभित हो रही थीं।' इसकी टीकामें श्रील श्रीधरस्वामी कहते हैं- 'तत्र नानामूर्तिः कृष्णो मेघचक्रमिव' अर्थात् 'श्रीकृष्ण नाना मूर्तियोंमें मेघचक्रकी भाँति प्रकाशित होने लगे।' पूर्ववर्त्ती श्लोक (10/33/3)में भी कहा गया है- 'रासोत्सवः सम्प्रवृत्तो गोपीमण्डलमण्डितः। योगेश्वरेण कृष्णेन तासां मध्ये द्वयोर्द्वयोः।' अर्थात् 'सम्पूर्ण योगके स्वामी भगवान् श्रीकृष्ण दो-दो गोपियोंके बीच प्रकट हो गये और उनके गलेमें अपनी बाहें डाल दीं।' इस प्रकार एक गोपी और एक कृष्ण-इस क्रमके कारण प्रत्येक गोपी ऐसा अनुभव कर रही थीं कि मेरे प्रियतम मेरे पास ही हैं। ऐसा समझकर गोपियाँ 270 ।
आठवाँ अध्याय 8/93-98 ] आनन्दसे ऐसी विह्वल हो गयीं कि वे यह न समझ सकीं कि श्रीकृष्ण उनके दोनों ओर विराजमान हैं। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं- 'श्रीकृष्ण गोपीमण्डलके मध्यमें विराजमान रहते हुए ऐसी तीव्र गतिसे नृत्य कर रहे थे कि एक परमाणु मात्र समयके भीतर ही मध्य-स्थलसे आकर मण्डलस्थ करोड़ों गोपियोंको नृत्य-सहित आलिङ्गन करते हुए पुनः मध्यस्थलमें उपस्थित हो जाते थे। श्रीकृष्णका यह तीव्र गतिसे नृत्य-सञ्चालन अलात-चक्रकी अपेक्षा भी अत्यन्त अधिक तीव्र सूचित हो रहा है, क्योंकि उन समस्त गोपियोंने श्रीकृष्णको अपने समीप ही अनुभव किया था।' इस प्रकारकी अद्भुत क्रियाके सम्पादनका विशेषण है- 'योगेश्वर'। श्रीकृष्ण दुर्घटन-घटन पटीयसी 'योगमाया'के अधीश्वर होनेके कारण 'योगेश्वर' हैं। समस्त गोपियाँ ही श्रीकृष्णके आलिङ्गनकी इच्छाका पोषण करती हैं और श्रीकृष्ण भी उनकी इच्छा पूर्ण करना चाहते हैं। इसलिये योगमायाने जितनी गोपियाँ थीं, उतनी संख्यामें श्रीकृष्णकी प्रकाशमूर्ति प्रकटितकर दोनों पक्षोंकी इच्छा पूर्ण की। ऐसा होनेपर भी श्रीकृष्ण जो प्रत्येक गोपीके निकट देखे जा रहे थे, वह उनकी नाट्य-विद्याका प्रभाव है। साथ ही श्रीकृष्ण श्रीवृषभानुनन्दिनीके साथ आलिङ्गित मध्य-स्थलमें भी सुशोभित हो रहे थे। ये सब क्रीड़ाएँ श्रीभगवान्की भगवत्ता-विशेषके द्वारा नहीं अपितु नृत्य-शक्तिके अपूर्व कौशलके कारण हुईं।"—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी॥ 93-94॥ (ग) गोपियोंका श्रीकृष्णप्रेम साध्यकी सीमा होनेपर भी महाप्रभुके द्वारा पुनः प्रश्न :- प्रभु कहे, - "एइ 'साध्यावधि' सुनिश्चय। कृपा करि' कह, यदि आगे किछु हय॥" 95॥ अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 95॥ अमृतप्रवाह भाष्य - यहाँ तकका सिद्धान्त श्रवण करके महाप्रभुने कहा, - "श्रीगोपीजनवल्लभ-प्रेम ही साध्यतत्त्वकी सीमा है, तथापि यदि और भी कुछ हो, उसे बोलो॥" 95॥ प्रश्नकर्त्ता महाप्रभुका 'असमोध्वैत्व'-रूपमें श्रीरायको ज्ञान :- राय कहे, - "इहार आगे पुछे हेन जने। एतदिन नाहि जानि, आछये भुवने ॥ 96॥ अनुवाद - श्रीराम call? श्रीरामानन्द रायने कहा,- “मैं अब तक नहीं जानता था कि इस त्रिभुवनमें ऐसा कोई व्यक्ति होगा, जो इसके भी आगे कुछ और पूछेगा ॥ 96 ॥ (घ) श्रीराधाका श्रीकृष्णप्रेम ही-साध्यशिरोमणि :- इँहार मध्ये राधार प्रेम-'साध्यशिरोमणि'। याँहार महिमा सर्वशास्त्रेते बाखानि ॥ 97 ॥ अनुवाद-इस कान्ताप्रेमके बीचमें तो बस श्रीराधाका प्रेम ही है, जो 'साध्यशिरोमणि' है और जिसकी महिमा सभी शास्त्रोंमें वर्णन की गयी है॥ 97॥ अमृतप्रवाह भाष्य-साधारण गोपियोंका जो श्रीकृष्णप्रेम है, उसमेंसे श्रीराधाजीका श्रीकृष्णप्रेम ही साध्य- शिरोमणि-तत्त्व है। साधारण जीवोंके लिये इस भाव (श्रीराधाजीके) जैसे भावको ग्रहण करनेका उपदेश नहीं है। किन्तु उस भावके अनुगत अर्थात् उसके अनुरूप श्रीकृष्णप्रेमके अति-उच्च भाव ग्रहण करनेकी जीवोंकी योग्यता सिद्धावस्थामें हो सकती है। साधनावस्थामें राधिकाकी सखी और उनकी परिचारिकाओं (दासियों)का भाव ही अनुसरणीय है। उद्धव-दर्शनसे राधिकाके जो भाव महाप्रभुमें लक्षित होते थे, वे भाव जीवोंके लिये साध्य नहीं है, किन्तु कुछ अन्य प्रकारसे अनुसरणीय हैं॥ 97॥ श्रीराधाके समान श्रीराधाकुण्ड भी श्रीकृष्णको प्रिय :- लघुभागवतामृत (2/45)में उद्धृत पद्मपुराण वाक्य- यथा राधा प्रिया विष्णोस्तस्याः कुण्डं प्रियं तथा। सर्वगोपीषु सैवैका विष्णोरत्यन्तवल्लभा ॥ 98 ॥ । 271