श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1110, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 8/81 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला साध्यप्रेमकी पूर्णता इन रसोंमें नहीं होती। कान्तभावकी नायिकाओं व्रजगोपियोंमें एक अपूर्व भाव है। इन सभी न्यूनताओंकी पूर्ति करते हुए वे निजाङ्ग भी श्रीकृष्णसेवामें देकर श्रीकृष्णका सुख वर्धन करती हैं। यह विशेषता अन्य रसोंमें नहीं है। शान्त, दास्य, सख्य और वात्सल्य-इन चार रसोंके गुण मधुर कान्तरसमें नित्य विद्यमान हैं और उन रसोंमें जो चमत्कारिताका अभाव है, वह मधुररसमें सुन्दर रूपसे प्रतिष्ठित है। व्रजमें दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर, जितनी भी प्रकारकी रति हैं, उन्हें दो भागोंमें विभक्त किया जा सकता है-सम्बन्धानुगा और कामानुगा। दास्य, सख्य और वात्सल्य प्रेमके भक्त अपने सम्बन्धसे बँधे हैं। इनकी अपनी मर्यादा है, जिसका वे उल्लङ्घन नहीं कर सकते। इनकी सेवा सम्बन्धकी अनुगामिनी है और उसीमें सीमित रहती है। द्वारकामें भी रुक्मिणी, सत्यभामा आदिका प्रेम उनके वैवाहिक सम्बन्धके अन्तर्गत है अर्थात् यह भी सम्बन्धानुगा है। उनके प्रेममें अपने सुखकी कुछ वासनाएँ भी सम्मिलित होती हैं; इसलिये वे श्रीकृष्णको पूर्णतया वशीभूत नहीं कर सकतीं। कामानुगा कान्तरतिमें गोपियोंके प्रेममें सम्बन्धकी प्रधानता न होकर सेवा-वासनाकी प्रधानता है जिसके द्वारा वे श्रीकृष्णकी सभी इच्छाओंकी पूर्ति करती हैं। गोपियोंका लोकधर्म, वेदधर्म, आर्यधर्म, गुरु-गौरव, सतीत्व, कुलधर्म-ये सब तृणकी भाँति कान्त-भावमें बह जाते हैं। उनका काम और सेवा तदात्म्यताको प्राप्त हो जाते हैं अर्थात् एक ही हो जाते हैं। गोपियोंकी सेवा, प्रीति और काम- पृथक्-पृथक् नहीं, एक ही हैं। वे श्रीकृष्णकी सेवाके लिये सब कुछ करती हैं। उनके प्रेममें अपनी इन्द्रिय-सुखकी इच्छा नहीं है। श्रीकृष्णसे प्रेम करनेके लिये वे विवाह-बन्धनके द्वारा आबद्ध नहीं हैं। कामानुगा रतिके दो विभाग हैं-सम्भोगेच्छामयी या कामात्मिका और तत्-तत्-भावेच्छात्मिका। सम्भोगेच्छामयी या कामात्मिका रति केलि तात्पर्यमयी होती है। इसकी अवस्थिति विभिन्न यूथेश्वरियोंमें होती है। तत्-तत् भावेच्छात्मिका-व्रजयूथेश्वरियोंका श्रीकृष्णके प्रति जो मधुर भाव होता है, उस मधुर भावकी कामनाका ही यह दूसरा विभाग है; श्रीराधाकी किङ्करियों, मञ्जरियोंमें यह भाव रहता है। जीवके पक्षमें यही भाव सर्वोच्च कोटिका है। 'नायं श्रियोऽङ्ग...'-इस श्लोकके द्वारा उद्धवजी श्रीकृष्ण प्रियाओं, व्रजगोपियोंके प्रेमकी महिमाकी उद्घोषणा करते हुए कह रहे हैं कि ऐसा अपूर्व और अदृष्टपूर्व भगवत्-प्रसाद अन्य किसीने प्राप्त नहीं किया। श्लोकमें 'उ' शब्दके द्वारा उद्धवजीका विस्मय प्रकट होता है। रासोत्सवमें श्रीकृष्णने उल्लसित होकर जिस प्रकार व्रजरमणियोंके कण्ठ-प्रदेशका आलिङ्गनकर उनका मनोरथ पूर्ण किया, वह सौभाग्य उनकी वक्षःस्थित लक्ष्मीदेवीको भी प्राप्त नहीं हुआ। यद्यपि लक्ष्मीदेवी श्रीकृष्णके वक्ष-स्थलपर स्वर्ण-रेखाके रूपमें विराजमान हैं और श्रीकृष्णसे उनका कभी विच्छेद नहीं है, तथापि गोपियाँ ही अधिक प्रशंसनीय हैं। इसका कारण है कि लक्ष्मीदेवी केवल सम्भोग रसमें स्थित हैं, किन्तु गोपियाँ कभी सम्भोग (मिलन) और कभी विप्रलम्भ (विरह)-युक्ता होती हैं। विप्रलम्भ ही सम्भोगकी पुष्टि करके उसमें चमत्कारिता प्रकाशित करता है। लक्ष्मी वक्ष-विलासिनी प्रेयसी हैं, किन्तु गोपियाँ केवल प्रेयसी ही नहीं, वे परकीया-भाव सम्पन्न रास-रङ्गिणी हैं और श्रीकृष्णकी प्रेम माधुरीका अपूर्व रूपमें विस्तार करती हैं। रासलीला महोत्सवमें श्रीकृष्ण अत्यन्त आनन्दपूर्वक प्रेमसमुद्रकी तरङ्गोंमें डूबते-उबरते हैं। इस प्रेमरूपी समुद्रकी गोपियोंके हाव-भाव, कटाक्षरूपी उत्ताल लहरियोंमें अपनेको संरक्षित करनेके लिये वे व्रज-देवियोंके कण्ठको धारण करते हैं। श्रीकृष्णको इस अपूर्व रसका आस्वादन एकमात्र गोपियाँ ही करवानेमें समर्थ हैं। 'तासामाविर्भूच्छौरि...'-प्रेम विवर्धनमें चतुर श्रीकृष्ण राससे अन्तर्धान हो गये। विरह-कातरा गोपियाँ अन्य कोई उपाय न देखकर रोती हुई यमुना पुलिनमें अत्यन्त करुण स्वरसे विलाप करने लगीं। व्रजरमणियाँ 262 ।