श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय 8/81–88 ]
विरह-वेदनासे व्याकुल हो निरङ्कुश निरन्तर अश्रुपात कर रही थीं, उस सघन वनके अन्धकारमें उनके विलापमय क्रन्दनको सुनकर अपनी कान्ति प्रकाशित करते हुए श्रीकृष्णचन्द्र उन गोपियोंके मध्य अचानक प्रकट हो गये। विदग्ध चूड़ामणि श्रीकृष्णचन्द्र व्रजदेवियोंके मध्य अपना अपूर्व सौन्दर्य प्रकाश करते हुए प्रकट हुए। तीन विशेषणोंके द्वारा श्रीशुकदेव गोस्वामी रास-रसिक श्रीकृष्णके विलास और वेशकी अपूर्वताका वर्णन कर रहे हैं। 'स्मयमान मुखाम्बुजः'—श्रीकृष्णकी यह मुस्कान उनके स्वाभाविक हास्यसे विलक्षण है; यह गोपियोंको आश्वासन देने और उनका दुःख दूर करनेके लिये थी। विरह-तापसे गोपियोंका हृदय-कमल सन्तप्त था, श्रीकृष्णके अत्यन्त मनोहर मुखारविन्दके दर्शनसे गोपियोंका समस्त दुःख दूर हो गया। 'पीताम्बरधर'—श्रीकृष्णने मानो गोपियोंसे अपने अपराधकी क्षमा-प्रार्थनाके लिये दोनों कन्धोंसे पीताम्बरको लटकाकर अपने हाथोंमें पकड़ रखा था, जैसे कोई अपराधी क्षमा-याचनाके लिये मुखमें तृण दबाकर दीनतापूर्वक वस्त्र गलेमें डालकर आये। 'स्रग्वी'—उन्होंने अपने कमनीय कण्ठमें अम्लान शीतल कमलोंकी पुष्पमाला धारण कर रखी थी। गोपियोंने ही यह माला गूँथकर उन्हें पहनायी थी, इसका आलिङ्गनकर वे गोपियोंके प्रति अपनी चिर-कृतज्ञताको प्रकाशित कर रहे थे। 'साक्षान्मन्मथमन्मथः'—श्रीकृष्णकी छवि अत्यन्त सुन्दर थी और कामदेवके भी मनको मथन करते हुए वे गोपियोंके मध्य सुशोभित हो रहे थे। प्राकृत कन्दर्पका रासादि क्रीड़ाओंमें अधिकार नहीं है। श्रीकृष्णके द्वारा अपने महामोहन माधुर्यमय रूप-लावण्यका आविष्कार विरहिणी गोपियोंके विरहःदुखको विस्मरण करवानेके लिये हुआ था। ऐसा साक्षात् मन्मथ-मन्मथ रूप ही शृङ्गाररसमें परम आलम्बन है। अन्य रसोंमें स्थित भक्तोंके लिये ऐसे रूपके दर्शन सम्भव नहीं है, क्योंकि उनमें वैसा आधार नहीं है।"—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी॥ 81 ॥
कृष्णप्राप्तिर उपाय बहुविध हय। कृष्णप्राप्ति-तारतम्य बहुत आछय ॥ 82 ॥ प्रतिरसकी श्रेष्ठता होनेपर भी परस्परमें तारतम्य वर्तमान :— किन्तु याँर येइ रस, सेइ सर्वोत्तम। तटस्था हञा विचारिले, आछे तर-तम ॥ 83 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण-प्राप्तिके अनेक प्रकारके उपाय हैं। उनके अनुसार श्रीकृष्णप्राप्तिके भी अनेक तारतम्य हैं, किन्तु जिसका जो रस है, उसके लिये वही सर्वोत्तम है। यदि तटस्थ होकर विचार किया जाय, तो उनमें तारतम्य है॥ 82-83 ॥ श्रीभक्तिरसामृतसिन्धु (2/5/38) :— यथोत्तरमसौ स्वादविशेषोल्लासमप्यपि। रतिर्वासनया स्वाद्धी भासते कापि कस्यचित् ॥ 84 ॥ अनुवाद—पाँचों प्रकारकी रतियाँ एक-दूसरेसे उत्तरोत्तर अधिकाधिक आस्वादनीय एवं उल्लासमयी हैं। यही रति वासना विशेषताके क्रमसे विशेष परमास्वादनीय होकर किसी विशेष भक्तके लिये मधुर रसरूपमें प्रकाशित होती है ॥ 84 ॥ अनुभाष्य—आदिलाीला 4/45 संख्या देखें ॥ 84 ॥ मधुर-रसमें ही शान्तादि चारों रस विद्यमान :— पूर्व-पूर्व-रसेर गुण-परे-परे हय। एक-दुइ गणने पञ्च पर्यन्त बाड़य ॥ 85 ॥ गुणाधिक्ये स्वादाधिक्य बाड़े प्रति-रसे। शान्त-दास्य-सख्य-वात्सल्येर गुण मधुरेते वैसे ॥ 86 ॥ जड़ीय दृष्टान्त; पञ्चम महाभूत 'भूमि'में ही अन्य चार भूत विद्यमान :— आकाशादिर गुण येन पर-परभूते। दुइ-तिन-गणने बाड़े पञ्च पृथिवीते ॥ 87 ॥ शृङ्गार-रस-लक्षण प्रेमके वशीभूत श्रीकृष्ण :— परिपूर्ण-कृष्णप्राप्ति एइ 'प्रेमा' हैते। एइ प्रेमार वश कृष्ण,—कहे भागवते ॥ 88 ॥
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