श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1112, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 8/82-88 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-रसादिके तारतम्यसे पूर्व-पूर्व रसके गुण अगले रसमें विद्यमान रहते हैं। पूर्वका गुण अगलेमें आ जानेसे दूसरेमें दो गुण हो जाते हैं, तीसरेमें तीन और पाँचवें रस तक पाँचों गुण तक वृद्धि हो जाती है। गुणोंकी अधिकतासे प्रत्येक रसका आस्वादन भी बढ़ता जाता है। शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्यके गुण मधुररसमें वर्तमान रहते हैं। इस सिद्धान्तको समझानेके लिये दृष्टान्त देते हुए कहते हैं कि आकाशादिके गुण जैसे अगले-अगले महाभूतोंमें बढ़ते जाते हैं और दो, तीनके क्रमसे पृथ्वीमें पाँचों महाभूत तक बढ़ते जाते हैं, अतः कान्ताप्रेममें पूर्व-पूर्वके चारों रसोंके गुण होनेके कारण कान्ताभाव ही सर्वश्रेष्ठ है। अतः श्रीकृष्ण इस कान्ताप्रेमके ही वशीभूत होते हैं-जैसा कि श्रीमद्भागवतमें भी कहा गया है॥ 85-88 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-प्रभो, मैंने पूर्व-पूर्व साध्योंके अर्थात् श्रीकृष्णप्राप्तिके बहुतसे उपाय बतलाये, उनमें केवलमात्र यही भेद है कि अलग-अलग उपायके अनुसार श्रीकृष्ण-प्राप्तिके तारतम्यका विचार करना होगा। मनुष्य जिन-जिन उपायोंको करनेका अधिकारी है, उन-उन उपायोंको करके ही अपनी अवस्थाके योग्य साध्यवस्तु, जो श्रीकृष्ण-प्राप्ति है, वही उसके लिये कल्याणकारी है। विशेषतः रसको प्राप्त करनेके अधिकारियोंके 'दास्य', 'सख्य', 'वात्सल्य' और 'मधुर'-ये चार प्रकारके रस ही उत्तम हैं। जो जिस रसका अधिकारी है, उसके लिये वही रस ही सर्वोत्तम है। रस-विषयमें जो राग उदय होता है, उसमें आविष्ट होकर चारों रसोंका तारतम्य दिखलायी नहीं देता; किन्तु तटस्थ अर्थात् निरपेक्ष होकर देखनेसे इन रसोंमें तारतम्य है। 'शान्त', 'दास्य', 'सख्य', 'वात्सल्य' और 'मधुर'-इन पाँचों रसोंमें क्रमशः तारतम्य है। 'शान्तरस'में श्रीकृष्णमें ऐकान्तिक निष्ठारूपी गुण दास्यरूपमें ममतासे युक्त होकर अधिक समृद्ध होता है। फिर सख्यरसमें श्रीकृष्णमें ऐकान्तिक निष्ठा और ममता विश्रम्भके साथ युक्त होकर और अधिक प्रफुल्लित होती है; वात्सल्यरसमें फिर शान्त-दास्य-सख्यके तीनों गुण स्नेहाधिक्यके साथ युक्त होकर दिखलायी देते हैं। कान्तभावरूप मधुर-रसमें ये चारों गुण सङ्कोचरहित होकर अतिशय माधुरी प्राप्त करते हैं। इस प्रकार गुणोंकी वृद्धिके कारण आस्वादनकी भी वृद्धि होती है। इसलिये तटस्थ विचारसे मधुर-रस सबकी अपेक्षा श्रेष्ठ है। रसोंका तारतम्य समझानेके लिये एक जागतिक उदाहरण दिया जा रहा है,-'आकाश', 'वायु', 'अग्नि', 'जल' और 'पृथ्वी'-ये पाँच महाभूत हैं। आकाशमें 'शब्द' नामक एक गुण है; वायुमें 'शब्द' और 'स्पर्श'-दो गुण हैं; अग्निमें 'शब्द', 'स्पर्श' और 'रूप'-ये तीन गुण हैं; जलमें 'शब्द', 'स्पर्श', 'रूप' और 'रस'-ये चार गुण हैं; मिट्टीमें 'शब्द', 'स्पर्श', 'रूप', 'रस' और 'गन्ध'-ये पाँच गुण हैं। अब देखें-आकाश आदिमें एकके बाद एक भूतमें क्रमशः गुणोंकी संख्यामें वृद्धि हुई है, -पाँचों गुण ही पृथ्वीमें लक्षित होते हैं। उसी प्रकार शान्त-दास्य-सख्य- वात्सल्य-मधुरमें क्रमशः गुणोंकी वृद्धि होकर मधुररसमें पाँचों गुण ही परिपूर्ण मात्रामें पाये जाते हैं; इसलिये परिपूर्ण-श्रीकृष्णप्राप्ति 'मधुर' अथवा शृङ्गार-रस-रूपी प्रेममें ही होती है। भागवतमें कहा गया है-मधुररससे उत्फुल्ल प्रेमसे श्रीकृष्ण पूर्णतया वशीभूत होते हैं॥ 82-88 ॥ अनुभाष्य-'किन्तु याँर येइ रस, सेइ सर्वोत्तम'-इस वाक्यके द्वारा यह नहीं समझना चाहिये कि जिसका जैसा भी मनोधर्म या विचार होगा, वही सर्वोत्तम है; उच्छ्र “श्रुतिस्मृतिपुराणादि-पञ्चरात्रविधिं बिना। ऐकान्तिकी हरेर्भक्तिरुत्पातायैव केवलम्॥” “श्रुति-स्मृति पुराणादि एवं पञ्चरात्रकी विधिका त्याग करके ऐकान्तिकी हरिभक्ति भी विघ्न ही उत्पादन किया करती है।” गृहस्थमें आसक्त व्यक्तिके लिये भागवतका व्यापार जिसे शास्त्रोंमें निन्दनीय अपराध कहा गया है, मन्त्र 264 ।