भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1113

आठवाँ अध्याय 8/82-91 ] देनेका व्यापार, शिष्य बनानेका व्यापार, कीर्तनका व्यापार, बहिर्मुख-सामाजिकता, लौकिकता आदि अपेक्षाओंसे युक्त मनोधर्म—इन सबको और शुद्धभक्तिको एक समान कहनेका यहाँ उद्देश्य नहीं है। आउल, बाउल, कर्त्ताभजा, नेड़ा, दरवेश, साँई, अतिबाड़ि, चूड़ाधारी, गौराङ्गनागरी, गोस्वामियोंके नये मत अथवा जाति-गोस्वामियोंके मतका प्रचार करनेवाले एवं इन जाति गोस्वामियोंके मतको ही 'षड्गोस्वामियोंका मत' कहकर लोगोंको छलनेवाले, श्रीकृष्णके अभक्त, गौरमन्त्र और गौरनामके विरोधी, नये-नये छड़ा (सिद्धान्तविरोधी कीर्तनों)की रचना करनेवाले, विग्रहके व्यापारी, धन लेकर पाठ करनेवाले आदि, नीचजातिके सङ्गसे उत्पन्न वर्णब्राह्मणताको ही 'वैदिक ब्राह्मणता' कहकर प्रचार करनेवाले, स्मार्त्त, सात्वतपञ्चरात्रके विरोधी, मायावादी, स्त्रीसङ्गी आदि कभी भी निष्किञ्चन, श्रीकृष्णके लिये समस्त चेष्टा करनेवाले, प्रतिक्षण हरिसेवामें रत सर्वस्व-त्यागी, श्रीगुरुगौराङ्गको अपने-आपको बेच देनेवाले, नैष्ठिक ब्रह्मचारी, संयत-गृहस्थ, वानप्रस्थ और त्रिदण्डिवेशधारी लोगोंके साथ एक अथवा समान नहीं हो सकते। जिस प्रसङ्गमें कविराज गोस्वामीने इस वाक्यको उद्धृत किया है, वह सिद्धभावपञ्चक (पाँच भावोंमेंसे किसीमें सिद्धि) की बात है। अर्थात् शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर—इन पाँच प्रकारके भावोंमें इन पाँच रसोंके रसिक सेवा किया करते हैं। अनर्थ निवृत्तिके बाद इन सब सिद्धभावोंमेंसे जो कोई किसीके भी नित्यसिद्ध स्वरूपके स्वभावके अनुसार क्यों न उदित हो, वह उस-उस रसके अधिकारी व्यक्तिके लिये सर्वोत्तम है। इसका कारण यह है कि सभीके विषय श्रीकृष्ण ही है, श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य-अन्य कोई प्राकृत देवतादि नहीं। और दूसरी तरफ तटस्थ अर्थात् मध्यस्थ होकर विचार करनेपर उन पाँच प्रकारके भावोंके रसास्वादनमें तारतम्य अनुभव होता है;—जैसे दास्यरसमें शान्तरस और दास्यरस,—दोनों ही एक साथ वर्तमान हैं, इसलिये वह शान्तरसकी अपेक्षा श्रेष्ठ है। दूसरी ओर, सख्यरसमें शान्त और दास्य वर्तमान हैं; इसलिये वह शान्त और दास्यसे और भी उन्नत है। फिर, वात्सल्य रसमें शान्त, दास्य एवं सख्य अन्तर्भुक्त होनेके कारण उसमें पूर्वोक्त तीनों प्रकारके रसोंसे अधिक चमत्कारिता वर्तमान है। फिर, मधुररसमें पूर्ववर्त्ती चार प्रकारके रस विराजमान होनेसे उसकी चमत्कारिता और माधुर्य सर्वश्रेष्ठ है। वैष्णव और भक्तिसिद्धान्तोंमें निपुण महाजनोंने इस प्रकारके उत्तरोत्तर क्रमसे स्वरूपकी उपलब्धिका सूक्ष्मातिसूक्ष्म तत्त्वसमूह विचार किया है। दुर्भाग्यवशतः दैव-मायाके द्वारा विमूढ़ असत्-सिद्धान्तोंमें निपुण व्यक्ति इन सब सिद्धान्तोंकी कुछ भी उपलब्धि नहीं कर पानेके कारण शुद्धवैष्णव- सिद्धान्तोंपर दोषारोपण करते हैं, —उनका ऐसा करना बालकों जैसी बातें करनेवाले उन सभी व्यक्तियोंके दुर्भाग्यका ही परिचय देता है॥ 82-86॥ श्रीकृष्णमें प्रेमभक्ति ही श्रीकृष्ण-प्रदाता :— श्रीमद्भागवत (10/82/44)— मयि भक्तिर्हि भूतानाममृतत्वाय कल्पते। दिष्ट्या यदासीन्मत्स्नेहो भवतीनां मदापनः ॥ 89 ॥ अनुवाद—मेरे प्रति भक्ति ही जीवोंके लिये अमृत है। हे गोपियों! मेरे प्रति तुम्हारा जो स्नेह है, वही एकमात्र तुम लोगोंका मुझे प्राप्त करनेका कारण है॥ 89 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 4/23 संख्या देखें॥ 89 ॥ भक्तके भजनकी गाढ़ताके तारतम्यसे ही श्रीकृष्णभक्तिकी प्राप्तिमें भी तारतम्य :— कृष्णेर प्रतिज्ञा दृढ़ सर्वकाले आछे। ये यैछे भजे, कृष्ण तारे भजे तैछे॥ 90 ॥ गोपियोंकी मधुर-रसकी सेवाके बदले श्रीकृष्णके द्वारा स्वयंको प्रदान करनेकी असमर्थता हेतु ऋण :— एइ 'प्रेमेर अनुरूप ना पारे भजिते। अतएव 'ऋणी' हय—कहे भागवते॥ 91 ॥ । 265