भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1114, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1114

[ 8/90–91 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—श्रीकृष्णने पहले सर्वकालके लिये एक दृढ़ प्रतिज्ञा की है कि जो मुझे जिस प्रकार भजता है, मैं भी उसका उसी प्रकारसे भजन करता हूँ। परन्तु भागवतमें कहा गया है कि माधुर्य रसमें जो श्रीकृष्णप्रेम है, उसके अनुरूप श्रीकृष्ण उसका प्रतिदान नहीं दे पाते, इसलिये वे माधुर्य रसके भक्तोंके ऋणी ही रहते हैं॥90-91॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णकी यह साधारण प्रतिज्ञा है कि जो उनका जिस रूपमें भजन करेगा, श्रीकृष्ण भी उसका उस रूपमें भजन करेंगे। अन्यान्य रसोंके भक्तोंके भजनके अनुरूप प्रतिभजन करनेमें श्रीकृष्ण समर्थ हैं; किन्तु मधुररससे उत्फुल्ल प्रेममें भजनके अनुरूप प्रतिभजन न देख पानेके कारण श्रीकृष्णने कहा,—हे व्रजसुन्दिरयों! मैं तुम्हारे ऋणका शोधन नहीं कर पाया अर्थात् चुका नहीं पाया॥90-91॥ अनुभाष्य—प्राकृत लोगोंका विचार—"जो जिस भी भावसे भजन क्यों न करें, वे भगवान्‌को ही प्राप्त करते हैं। कर्म, ज्ञान, योग, तपस्या, जिस किसी भी उपायसे भगवान्‌का भजन किया जाय, उस उपायसे कुछ लेना देना नहीं है। जैसे, किसी स्थानपर जानेके लिये अनेक मार्ग हैं, उसी प्रकार भगवान्‌के निकट जानेके भी विभिन्न मार्ग हैं। भगवान्‌को काली, दुर्गा, शिव, गणेश, राम, हरि, ब्रह्म, जिस किसी भी नामसे क्यों न पुकारा जाय, एक ही बात है। अथवा जैसे एक ही व्यक्तिके अलग-अलग नाम हैं, तो उनमेंसे जिस किसी भी नामसे पुकारनेपर वह उत्तर देता है, उसी प्रकार भगवान्‌के सम्बन्धमें भी ऐसी बात है।" किन्तु यह सब बातें बालकों जैसे मनोधर्मी व्यक्तियोंके लिये मनोरञ्जक होनेपर भी सारग्राही व्यक्ति उसे कुसिद्धान्तपूर्ण ही मानते हैं। जो स्वर्ग आदिकी कामनासे आधिकारिक (भगवान्‌के द्वारा अधिकार प्राप्त) देवताओंकी उपासना करेंगे, भगवान्‌से विमुख करनेवाली मायाशक्ति उनको इन सभी आधिकारिक देवताओंमें ही श्रद्धारूपी फल देकर उन्हें सर्वोत्तम मङ्गलरूपी फलसे वञ्चित कर देंगी और जन्म-मरणरूपी मालाके कर्मचक्रमें कभी स्वर्ग, तो कभी मर्त्यलोकमें भ्रमण करायेंगी। और जो नित्य भगवान्‌की सेवाके लिये प्रार्थना करेंगे, भगवान् उन्हें अपनी नित्य-सेवा प्रदान करेंगे। इसलिये जो जिस प्रकारसे भी भजन क्यों न करें, उन्हें अपने भजनके अनुरूप ही फल प्राप्त होगा, ये बात सत्य है। किन्तु यह विशेष रूपसे लक्ष्य करना उचित है कि सब फल समान नहीं हैं। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष कामी व्यक्तियोंका फल और नित्य-अहैतुकी श्रीकृष्णसेवाकी प्रार्थना करनेवाले व्यक्तियोंको प्राप्त होने वाला फल एक नहीं है। धर्म-अर्थ आदिका फल-नश्वर स्वर्गादि है, सायुज्य- मोक्षादिका फल-आत्माका विनाश आदि है, अहैतुकी हरिसेवाका उत्तम फल-नित्य नवनवायमान हरिसेवाकी प्राप्ति अथवा भगवद्-प्रेम है। इसलिये धर्म-अर्थकामी, निर्विशेष-मुक्तिकामी और हरिसेवामें तत्पर व्यक्तियोंके फलमें 'आकाश-पाताल'का भेद है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। जड़-जगत्‌की अधिष्ठात्री जगत्-जननी महामाया और अन्यान्य आधिकारिक देवता—श्रीभगवान्‌की बहिरङ्गा शक्ति और विरूप (विपरीत) वैभव हैं। वे भगवान्‌के आदेशसे जगत्-सृष्टि-कार्योंके विभिन्न अंशोंकी देख- रेखकर रहे हैं। जगत्-सृष्टि-कार्यमें भगवान्‌की अन्तरङ्गा शक्तिका कोई सम्बन्ध नहीं है। चिद्-धाममें जो सब कार्य होते हैं, वे ही अन्तरङ्गा शक्तिके कार्य हैं, वे सब योगमायाके द्वारा साधित होते हैं। योगमाया-भगवान्‌की अन्तरङ्गा शक्ति या चिद्-शक्ति है; जो चिद्-धाममें भगवान्‌के सेवाप्रार्थी हैं, वे योगमायाकी निष्कपट श्रीकृष्ण-सेवोन्मुखी कृपा प्राप्त करते हैं। और जो जड़-ब्रह्माण्डमें उत्तरोत्तर उन्नतिके लिये धर्म, अर्थ, काम आदि अन्याभिलाषकी इच्छा करते हैं या भगवद्-सेवा- विमुखिनी निर्विशेष-गतिकी इच्छा करते हैं, वे महामाया या रुद्रादि देवताओंकी उपासना करते हैं। इसलिये देखा जाता है,—गोपियोंने नन्दगोपके पुत्रको पतिके रूपमें प्राप्त करनेके लिये अर्थात् चिद्-धाममें उनकी नित्य 266 ।