श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय 8/90-92 ]
सेवा प्राप्तिके लिये चिद्-शक्ति योगमायाकी आराधना की थी। और देखा जाता है कि सातवीं शताब्दीमें राजा सुरथ एवं समाधि-नामक वैश्यने अपने आपको वर्णाश्रमके अन्तर्गत कोई अभावग्रस्त जीव मानकर जड़जगत्की अधिष्ठात्री महामायाकी आराधना की थी। इसलिये जहाँ 'योगमाया' और 'जड़माया'को एक ही करके 'मूड़ि और मिश्री'को एक ही भावमें चलानेका प्रयास करनेवालोंके जैसे 'समन्वयवाद'का प्रचार किया जाता है, वहाँ अज्ञानता, मूर्खता और भगवान्के स्वरूपकी उपलब्धिकी अभाव ही जानना होगा। दूसरा, इस जगत्में देखा जाता है, - 'किसीके काने पुत्रका नाम 'पद्मलोचन' (कमलनयन) होता है, किन्तु भगवान्के सम्बन्धमें ऐसा नहीं है। भगवान्के नाम और नामीमें कोई भेद नहीं है, भगवान्का कोई भी नाम निरर्थक अथवा भगवान्की वास्तविक सत्तासे अलग नहीं है। श्रीभगवान्के नाम बहुत प्रकारके हैं, जैसे परमात्मा, ब्रह्म, सृष्टिकर्त्ता, नारायण, रुक्मिणीरमण, गोपीनाथ, कृष्ण आदि। किन्तु जो भगवान्को 'सृष्टिकर्त्ता' कहकर पुकारेंगे, वे नारायणका रसास्वादन नहीं कर पायेंगे, क्योंकि 'सृष्टिकर्त्ता' आदि नामसमूह जगत्के बहिर्मुख जीवोंके द्वारा उनके प्राकृत ज्ञानके द्वारा दिये गये नाम हैं। 'सृष्टिकर्त्ता' कहनेसे भगवान्की परिपूर्ण सत्ताकी उपलब्धि नहीं होती, क्योंकि सृष्टिकार्य भगवान्की स्वरूप शक्तिका कार्य नहीं है, वह-उनकी बहिर्मुखी शक्तिका परिचायक है। और 'ब्रह्म' कहनेसे भगवान्के छह प्रकारके ऐश्वर्योंका परिचय नहीं पाया जाता; क्योंकि, भगवान्का निर्विशेष भाव ही 'ब्रह्म'के नामसे प्रसिद्ध है, इसलिये वह भगवान्के सम्पूर्ण सच्चिदानन्द विग्रहका द्योतक नाम नहीं है। 'परमात्मा' कहनेसे भी भगवान्का सम्पूर्ण परिचय नहीं होता, क्योंकि प्रत्येक जीवके हृदयमें अन्तर्यामीके रूपमें भगवान्का आंशिक परिचय ही 'परमात्मा'के नामसे प्रसिद्ध है। और, नारायणका भजन करनेवाले व्यक्ति भी श्रीकृष्णके माधुर्यकी उपलब्धि नहीं कर पाते। पुनः एक श्रीकृष्णमें ही माधुर्यके द्वारा नारायणके ऐश्वर्यको आच्छादित करके सम्पूर्ण परम-चमत्कारिताको विद्यमान देखकर श्रीकृष्णभक्त नारायणका भजन करनेकी स्पृहा नहीं करते, - गोपियाँ श्रीकृष्णको कभी भी 'रुक्मिणीरमण' कहकर सम्बोधन नहीं करतीं। 'रुक्मिणीरमण' और 'श्रीकृष्ण' जागतिक शब्दकोशके अनुसार प्रति-शब्द या समानार्थक-शब्द होनेपर भी, एकके स्थानपर दूसरा शब्द प्रयोग नहीं हो सकता। यदि मूर्खतावशतः कोई उन्हें एक ही समझकर व्यवहार करे, तो यह 'रसाभास'-दोष होता है। जिन्होंने भगवान्के स्वरूपकी उपलब्धि की है, वे अनजान लोगोंकी भाँति ऐसा रसाभास या सिद्धान्तका विरोध नहीं करते। किन्तु तो भी कलिकी प्रबलताके कारण उच्छ्र ही उदारता अथवा महासमन्वय-वादके नामसे एवं सत्-सिद्धान्त ही मूर्ख लोगोंके द्वारा सङ्कीर्णताके नामसे प्रचारित हो रहे हैं॥ 90 ॥ गोपियोंके प्रेमका ऋण श्रीकृष्ण चुका नहीं सकते :- श्रीमद्भागवत (10/32/22)- न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां स्वसाधुकृत्यं विबुधायुषापि वः। या माभजन् दुर्जय-गेहशृङ्खलाः संवृश्च्य तद्वः प्रतियातु साधुना ॥ 92 ॥ अनुवाद- हे प्यारी गोपियों! मेरे साथ तुम्हारा मिलन सर्वथा निर्दोष और निर्मल-निजसुखकी कामनाके लेशसे भी रहित विशुद्ध प्रेममय है। तुमने घर-गृहस्थीकी दुष्कर बेड़ियोंको तोड़कर तथा लोक-मर्यादाका उल्लङ्घनकर मेरा भजन किया है। मैं देवताओं जैसी लम्बी आयु प्राप्त करके भी तुम्हारे इस प्रेम, त्याग और सेवाका बिन्दुमात्र भी बदला चुकानेमें असमर्थ हूँ। तुम अपने सौम्य-स्वभावसे ही मुझे उऋण कर सकती हो, किन्तु मैं तो तुम्हारे प्रेमका सदा ऋणी ही हूँ और रहूँगा॥ 92 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 4/177-180 संख्या देखें॥ 90-92 ॥
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