भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1116, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1116

[ 8/90-92 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अमृताणुकणिका—"श्रीकृष्ण अन्यान्य रसोंके भक्तोंके भजनके अनुरूप प्रतिदान करनेमें समर्थ हैं, परन्तु वे ब्रजगोपियोंके प्रेमके अनुरूप प्रतिदान नहीं कर सके, इसलिये उनके ऋणी बन गये। भागवतके उपरोक्त श्लोकमें श्रीकृष्णने स्वयं इस बातको स्वीकार किया है। शरद पूर्णिमाकी रात्रिको श्रीकृष्ण और गोपियोंकी रास-क्रीड़ा हुई, उसमें अन्यान्य गोपियोंको सौभाग्य-मद और श्रीराधाको मान हो गया। यह देखकर श्रीकृष्णने सोचा कि इन परिस्थितियोंमें सुष्ठु रूपसे रास होना सम्भव नहीं है। अतः वे अन्य गोपियोंके सौभाग्य-मदको दूर करनेके लिये और श्रीराधाके मान-प्रसादन हेतु श्रीराधाको लेकर अन्तर्धान हो गये। फिर एकान्तमें श्रृङ्गार, वार्त्तालाप और विहार-विलास आदिके पश्चात् श्रीराधाको भी छोड़कर पुनः अन्तर्धान हो गये। सब गोपियोंने तीव्र विरह-वेदनायुक्त गोपीगीतका अत्यन्त करुण स्वरमें गान किया जिसे सुनकर श्रीकृष्ण अपने मन्मथ-मन्मथ रूपमें पुनः आविर्भूत हुए। गोपियोंने विचार किया—'अहो! प्रेमियोंके शिरोमणि होकर भी इन्होंने हम लोगोंकी ऐसी दुरावस्था की है, इसलिये इनका हमारे प्रति क्या भाव है, क्या यह प्रीतियुक्त है या उदासीन है अथवा द्रोहपूर्ण है?' इसे जाननेके लिये गोपियोंने उनसे तीन प्रश्न किये—हे कृष्ण, एक श्रेणीके लोग केवल प्रेम करनेवालोंसे प्रेम करते हैं, इसके विपरीत एक अन्य श्रेणीके लोग प्रेम न करनेवालोंसे भी प्रेम करते हैं, तथा कुछ लोग ऐसे होते हैं जो प्रेम करनेवाले और न करनेवाले—दोनोंसे ही प्रेम नहीं करते। हे प्रियतम, हम लोगोंके तीन प्रश्नोंका उत्तर यथार्थ रूपमें प्रदान करो। तुम इनमेंसे किसे अच्छा समझते हो?' श्रीकृष्णने कहा—'हे मेरी प्रिय सखियों, जो प्रेम करनेपर ही बदलेमें प्रेम करते हैं, वे प्रेमी नहीं व्यापार करनेवाले बनिये हैं। जो प्रेम नहीं करनेपर भी प्रेम करते हैं, वे करुणाशील व्यक्ति, गुरुजन और माता-पिता हैं। इस श्लोकमें श्रीकृष्णने ब्रजगोपियोंको सुमध्यमा कहकर सम्बोधित किया है। श्लेष भावसे वे यह कह रहे हैं कि 'तुम्हारी शोभा तुम्हारे इस मध्यम प्रश्नमें ही स्थापित है। इस सुशोभन मध्यवर्त्ती प्रश्नके उत्तरकी आधार तो तुम लोग ही हो। प्रेम न करनेवालोंसे भी प्रेम करना—यह गुण तुम लोगोंमें उज्ज्वल रूपसे प्रकाशित हो रहा है। जो लोग प्रीति करनेवालोंसे भी प्रीति नहीं करते, वे चार प्रकारके होते हैं—आत्माराम, आप्तकाम, अकृतज्ञ और गुरुद्रोही। आत्माराम अपनी आत्मामें ही रमणशील होनेके कारण स्वयंमें सम्पूर्ण होते हैं, आप्तकाम जन सभी कामनाएँ पूर्ण रहनेके कारण भोग-इच्छासे रहित होते हैं, अकृतज्ञ दूसरोंके द्वारा किये हुए उपकार आदिको स्मरण नहीं करते और गुरुद्रोही तो उपकारीके प्रति भी द्रोहका आचरण करते हैं।' यदि गोपियाँ कहें कि पहले और दूसरे प्रश्नके उत्तरके उदाहरण तुम नहीं हो, तुम तीसरी श्रेणीके अन्तर्गत दोषी हो। ऐसा कहकर वे एक-दूसरेको आँखोंके इशारेकर मुस्कुराने लगीं। तो श्रीकृष्ण कहने लगे—'हे सखियों, सुनो! क्या तुम मेरे मुखसे मेरी पराजय सुननेकी इच्छा कर रही हो? हे मन्द-मन्द मुस्कानके विलाससे युक्त कटाक्षकी नटन-चातुरीकी चूड़ामणि! तुम लोगोंको अपना दर्शनानन्द प्रदान करनेके कारण मैं गुरुद्रोही नहीं हूँ। हे गोपियों! तुम मेरी अत्यन्त प्रिया हो और मैं तुम्हारा परम प्रियतम हूँ। इसलिये तुम लोगोंके द्वारा मेरे प्रेममें दोष देखना उचित नहीं है। मैं तुम लोगोंका प्रेमालाप श्रवण करनेके लिये अन्तर्हित हो गया था। हे सखियों! मैं तो प्रेम करनेवालोंसे भी वैसा प्रेम नहीं करता जैसा करना चाहिये। मैं ऐसा इसलिये करता हूँ जिससे उनकी चित्तवृत्ति मुझमें लगी रहे। जैसे निर्धन व्यक्तिको कभी बहुत-सा धन मिल जाये और फिर वह खो जाय, तो उसका हृदय खोये हुए धनके चिन्तनमें निमग्न रहता है। वह भूख, प्यास आदि दूसरी वस्तुओंको भूल जाता है। उसी प्रकार मैं भी मिलकर छिप जाता हूँ, जिससे मेरा चिन्तन नित्य-निरन्तर बना रहे। हे प्रियाओं, मेरे 268 ।