भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1117

आठवाँ अध्याय 8/90-93 ] मनमें सदैव जो बात उदित होती है, उसे सुनो। मेरे साथ तुम्हारा यह मिलन निर्मल और निर्दोष है। यह संयोग काममय प्रतीत होनेपर भी वस्तुतः निर्मल प्रेममय होनेके कारण पवित्र और निर्दोष है। इस मिलनकी यदि कोई निन्दा करता है, तो वह स्वयं निन्दनीय है, वह प्रेमका मर्म नहीं जानता।' गोपियोंका प्रेम और संयोग प्रेमका परिपक्व विलास है। इस प्रकार स्मृतिशास्त्रके द्वारा स्वीकृत कामादिका खण्डन हुआ है। श्रीकृष्णने आगे कहा, - 'हे गोपियों! तुम्हारे जो साधुकृत्य हैं, वे असाधारण हैं। मैं वैसा करनेमें समर्थ नहीं हूँ। मैं देवताओं जैसी परम आयु पाकर भी तुम्हारे साधुकृत्यका ऋण-शोधन करनेमें समर्थ नहीं हो पाऊँगा। तुम लोगोंने उचित-अनुचितकी विवेचना न कर लोकधर्मका त्याग किया है, धर्म-अधर्मका विचार न कर वेद-धर्मका विसर्जन किया है, अपने आत्मीय स्वजन, बन्धु-बान्धव सबका परित्यागकर मेरे पास आयी हो, अर्थात् तुम लोगोंने गृहस्थ धर्मकी शृङ्खलाओंमें पति, श्वसुर, पिता, भाई आदिके स्नेह-बन्धनको छिन्न-भिन्नकर मेरा भजन किया है, तुम मेरे प्रति एकनिष्ठ हुई हो। किन्तु मैंने माता-पिता, भाई, बन्धु, बान्धवों सभीके प्रति स्नेह-सम्बन्ध रखते हुए तुम्हारा भजन किया है। मेरा चित्त अनेक-अनेक भक्तोंके प्रति प्रेमयुक्त होनेके कारण बहु-निष्ठ है। किन्तु तुम्हारा चित्त मुझमें एकनिष्ठ है। इसका प्रतिदान करनेमें मैं सफल नहीं हो सकता, यह मेरे सामर्थ्यकी बात नहीं है। तुम लोगोंके सुशीलता गुणके द्वारा ही मैं ऋणमुक्त हो सकता हूँ; किन्तु वास्तवमें मैं तुम लोगोंका ऋणी ही रहना चाहता हूँ।' ब्रज-गोपियोंके भाव-विशेषका परम आश्चर्यपूर्ण माहात्म्य स्वयं श्रीभगवान् अपने मुखसे वर्णन कर रहे हैं। भगवान् गोपियोंके प्रेमसे पराजित हो गये। अपनी प्रतिज्ञापर कटिबद्ध न रहनेके कारण वे गोपियोंके प्रेमके ऋणी हो गये। यह श्रीभगवान्की परम-विनय उक्तिकी माधुरी ही है—ऐसा समझना होगा। श्रीसनातन गोस्वामीके अनुसार मूल श्लोकके 'स्वसाधुकृत्यं' पदका अर्थ है- 'मेरे प्रति तुम्हारा 'सु' अर्थात् सुष्ठु असाधुकृत्य रूप निष्ठुरताका भाव विद्यमान रहनेपर वे कार्य साधुकृत्य किस प्रकार होंगे? तुम लोग मुझसे कहती हो— 'तुम महाधूर्त्त हो! तुम्हारे मुखमें एक बात और मनमें दूसरी, तुम्हारे वचन मन्द-मन्द मुस्कानयुक्त होनेपर भी उनमें नारी-वधकी वासनाका गूढ़ विष रहता है। व्याध जिस प्रकार मधुर वंशीध्वनिके द्वारा हिरणीका चित्त आकर्षणकर फिर उसका वध करता है, तुम्हारी वंशीध्वनि भी उसी प्रकारसे ही मधुर है। तुमने जन्म लेते ही पूतनाका वध किया था, इसलिये जन्मसे ही नारीवध करना तुम्हारे जीवनका व्रत है। तुम महाचोर-चूड़ामणि हो। बाल अवस्थामें तुमने गोपियोंके घर-घरसे मक्खन चुराया, किशोर अवस्थामें तुमने कात्यायनी व्रत करनेवाली कुमारी गोपियोंके वस्त्रहरणके छलसे उनकी लज्जाका हरण किया तथा मर्यादा प्राप्त कुलस्त्रियोंके पातिव्रत्य धर्मका हरण किया। हे दुल्लीलशेखर ! हे कितवेन्द्र धूर्त्तराज ! आदि तुम्हारे ये कठोर वचनरूप महारससिन्धुकी तरङ्गमाला मेरे हृदयको उद्वेलित करती है। इसलिये इन वचनोंके द्वारा तुम्हारे साधुकृत्य किस प्रकार निष्पन्न होंगे?' वास्तवमें ब्रजगोपियोंके साथ निरन्तर क्रीड़ाके लोभसे ही श्रीकृष्ण ये चातुरीपूर्ण वचन कह रहे हैं।"—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 90-92 ॥ गोपियोंके मधुर-प्रेममें ही श्रीकृष्ण-माधुर्य-विलास प्रकटित :- यद्यपि सौन्दर्य कृष्ण-माधुर्यरे धुर्य। व्रजदेवीरे सङ्गे ताँर बाड़ये माधुर्य ॥ 93 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 93 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यद्यपि श्रीकृष्णका असमोध्वं सौन्दर्य ही श्रीकृष्ण-माधुर्यकी पराकाष्ठा है, तथापि ब्रजदेवियोंका सङ्ग होनेसे वह माधुर्य अनन्तगुणा वृद्धि प्राप्त करता है; इसलिये गोपीजन-वल्लभ-प्रेम ही सभी भक्तोंके लिये साध्यसार है। इसमें भक्तको जिस प्रकार । 269