भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1118

[ 8/93-94 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (परिपूर्ण-माधुर्यमय) श्रीकृष्णकी प्राप्ति होती है, वैसी अन्य रसकी किसी अवस्थामें नहीं होती ॥ 93 ॥ गोपीके मध्य श्रीकृष्ण-जैसे मणिके बीचमें मरकत :- श्रीमद्भागवत (10/33/6)— तत्रातिशुशुभे ताभिर्भगवान् देवकीसुतः। मध्ये मणीनां हैमानां महामरकतो यथा ॥ 94 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 94 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-देवकीसुत भगवान् समस्त सौन्दर्यके सार होनेपर भी व्रजदेवियोंके साथ वे सोनेकी मणियोंके बीच महा-मरकतके समान अतिशय शोभायमान हुए थे॥ 94 ॥ अनुभाष्य-श्रीशुकदेवके द्वारा परीक्षितको रासलीला करनेवाली गोपियोंके बीचमें श्रीकृष्णके सौन्दर्यका वर्णन- तत्र (वृन्दावने रासमण्डले) हैमानां (सुवर्णखचितानां) मणीनां मध्ये महामरकतः यथा, [तथा इव] ताभिः (व्रजदेवीभिः) [वेष्टितः सन्] भगवान् देवकीसुतः अतिशुशुभे। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 94 ॥ अमृतानुकणिका- "श्रीकृष्णके प्रेमपूर्ण अत्यन्त मनोहर वचनोंको सुनकर गोपियोंका विरहसे उदित सन्ताप दूर हो गया। गोपियों और श्रीकृष्णके प्रश्नोत्तर समाप्त होनेपर गोपियोंका मान शान्त हुआ। तदनन्तर उस मनोहर यमुना पुलिनमें श्रीकृष्णने अपनी प्रीतिपरायण अनुरागी गोपियोंके साथ रासक्रीड़ा आरम्भ की। 'मध्ये मणीनां हेमानां महामरकत यथा'-उस रासमण्डलमें व्रजसुन्दरियोंके मध्य भगवान् श्रीकृष्ण इस प्रकार सुशोभित हो रहे थे जैसे स्वर्णमयी-मणियोंकी मालाके बीचमें ज्योतिर्मयी नीलमणि चमक रही हो। श्रीकृष्णका वर्ण इन्द्रनीलमणिके समान और गोपियोंका वर्ण स्वर्णके समान है। गोपियाँ गोलाकार मण्डलमें थीं, इसलिये उन्हें स्वर्ण मणियोंसे निर्मित हारकी उपमा दी है। गोपियोंकी स्वर्ण कान्तिसे मिलकर श्रीकृष्णकी कान्ति मरकत वर्णकी हुई। गोपियोंके आलिङ्गनसे उनके पीतवर्णसे श्रीकृष्णके श्यामल शरीरकी आभा कुछ ढक गयी, उसपर गोपियोंकी अङ्गकान्तिकी परछाईं पड़ने लगी और वे पीताभा लिये श्यामल वर्णके दिखने लगे। श्रीकृष्णकी शोभा अनेकों गुणा और बढ़ गयी - 'अति शुशुभे' अर्थात् अतुलनीय रूपसे शोभित हुए। वस्तुतः श्रीभगवान् प्रकाशभेदसे अनेकों होकर विराजमान हो रहे थे तथा रासमण्डलीके केन्द्रमें भी श्रीकृष्ण श्रीराधाके साथ वेणुवादनपूर्वक भ्रमण करते-करते विहार कर रहे थे। श्रीराधाकृष्ण युगलका यह प्रकाश सम्पूर्ण रासमण्डलीकी शोभाका अतिशय वर्धन कर रहा था। क्रमदीपिकाके अनुसार 'श्रीकृष्णने अपने दिव्यातिदिव्य विग्रहोंको अनेकों रूपोंमें प्रकाशित किया। दो-दो गोपियोंके मध्य एक-एक रूपमें प्रवेश करके अपनी दोनों भुजाओंको अपनी प्रेयसियोंके गलेमें डालकर विराजमान हुए।' प्रस्तुत श्लोकमें भगवान्‌को 'देवकीसुत' कहकर सम्बोधित किया है; विष्णुपुराणके अनुसार श्रीनन्द महाराजकी पत्नीके दो नाम हैं-एक यशोदा और दूसरा देवकी। अतः देवकीसुत कहनेसे यशोदानन्दन ही उपलक्षित होते हैं। देवकीसुत एकवचनमें है और गोपियाँ शतकोटि संख्यामें, तो क्या श्रीकृष्ण रासमण्डलमें एक थे या प्रत्येक गोपीके साथ एक-एक? इससे अगले श्लोकमें श्रीशुकदेव गोस्वामी वर्णन कर रहे हैं— 'गायन्त्यस्तं तडित इव ता मेघचक्रे विरेजुः ॥' अर्थात् 'गान करती हुई श्रीकृष्ण-प्रियाएँ मेघमें विद्युतकी भाँति सुशोभित हो रही थीं।' इसकी टीकामें श्रील श्रीधरस्वामी कहते हैं- 'तत्र नानामूर्तिः कृष्णो मेघचक्रमिव' अर्थात् 'श्रीकृष्ण नाना मूर्तियोंमें मेघचक्रकी भाँति प्रकाशित होने लगे।' पूर्ववर्त्ती श्लोक (10/33/3)में भी कहा गया है- 'रासोत्सवः सम्प्रवृत्तो गोपीमण्डलमण्डितः। योगेश्वरेण कृष्णेन तासां मध्ये द्वयोर्द्वयोः।' अर्थात् 'सम्पूर्ण योगके स्वामी भगवान् श्रीकृष्ण दो-दो गोपियोंके बीच प्रकट हो गये और उनके गलेमें अपनी बाहें डाल दीं।' इस प्रकार एक गोपी और एक कृष्ण-इस क्रमके कारण प्रत्येक गोपी ऐसा अनुभव कर रही थीं कि मेरे प्रियतम मेरे पास ही हैं। ऐसा समझकर गोपियाँ 270 ।