श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1109, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय 8/80-81 ] कमलकी सुगन्ध आती है, उनको भी उस प्रकारकी कृपाकी प्राप्ति नहीं हुई, तब अन्य स्त्रियोंके विषयमें तो क्या कहूँ? ॥ 80 ॥ अनुभाष्य-उद्धवजी व्रजमें आकर कुछ महीनों तक रहे। श्रीकृष्णकथा-कीर्तनके द्वारा हर्षोत्पादन करनेपर भी जिनका चित्त ऐकान्तिक रूपसे श्रीकृष्णमें ही आविष्ट था, उन श्रीकृष्ण-विरहसे तप्त गोपियोंके एकमात्र श्रीकृष्णमें तन्मय चित्तकी विकलताके दर्शन करके उद्धवजी उनके परम सौभाग्यकी प्रशंसा कर रहे हैं- रासोत्सवे (रासक्रीड़ाकाले) अस्य (श्रीकृष्णस्य) भुजदण्डगृहीतकण्ठलब्धाशिषां (भुजदण्डाभ्यां बाहुभ्यां गृहीतः आश्लिष्टः कण्ठः गलदेशः येन तस्मात् लब्धाः प्राप्ताः आशिषाः कल्याणमनोरथाः याभिर्गोपीभिस्तासां) व्रजसुन्दरीणां (गोपललनानां) यः (प्रसादः) उदगात् (आविर्बभूव), नलिनगन्धरुचां (नलिनस्य पद्मस्य इव गन्धो रुक् कान्तिश्च यासां तासां) स्वर्योषितां (देवरामाणां) न अभूत्; उ (अहो) अङ्के (वक्षसि) नितान्तरतेः (अनन्यात्यन्ताश्रितायाः) श्रियः (लक्ष्म्याः अपि) अयं प्रसादः न अभूत्; अन्याः (स्त्रियन्तु) कुतः [एवं कृष्णानुग्रहविषयाः भवन्ति ?] श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 80 ॥ व्रजगोपियोंका ही मदनमोहन-विग्रह-दर्शनमें अधिकार :- श्रीमद्भागवत (10/32/2)- तासामाविरभूच्छौरिः स्मयमानमुखाम्बुजः। पीताम्बरधरः स्रग्वी साक्षान्मन्मथमन्मथः ॥ 81 ॥ अनुवाद-उसी समय उन रोदनकारी व्रजदेवियोंके बीचमें शूरवंशके शिरोमणि श्रीकृष्ण प्रकट हो गये। उनका मुखकमल मन्द-मन्द मुस्कानसे खिला हुआ था, वे गलेमें वनमाला और शरीरपर पीताम्बर धारण किये हुए थे। उनका वह रूप-सौन्दर्य सबके मनको मथ डालनेवाले साक्षात् कामदेवके मनको भी मथनेवाला था ॥ 81 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 5/214 संख्या देखें ॥ 81 ॥ अमृताणुकणिका-"कान्त और कान्ताका परस्पर प्रेम ही 'कान्तभाव' है। यहाँ श्रीकृष्णके प्रति 'कान्तभाव' ही प्रेम-पराकाष्ठा रूप साध्योंका सार है। श्रीराय रामानन्दने यहाँ कान्तभावको सर्वश्रेष्ठ न कहकर उसके प्रेमकी पराकाष्ठाको ही सर्वश्रेष्ठ बतलाया है। श्रीकृष्णके प्रति कान्तभावके उदय होनेसे सभी साध्योंके सार, अखण्ड प्रेम-तत्त्वको प्राप्त किया जा सकता है। कान्तभावकी स्थिति शृङ्गार या मधुर रसके अन्तर्गत है। इसमें श्रीकृष्ण ही व्रज गोपियोंके प्राण-प्रियतम विषयालम्बन हैं। मुरली ध्वनि, वसन्त ऋतु, कोकिलकी कूक, मयूर-कण्ठका दर्शन आदि उद्दीपन विभाव हैं। कटाक्ष और हास्यादि अनुभाव हैं, समस्त सात्त्विक भाव सुदीप्त अवस्था तक होते हैं। इस रसमें प्रेम-स्नेह-मान- प्रणय-राग-अनुराग-महाभाव आदि सभी अवस्थाएँ दृष्टिगोचर होती हैं, परन्तु केवल श्रीमती राधिकामें ही महाभावकी सर्वोच्च अवस्था मादन नामक महाभाव अवस्थित है। मधुररस स्वकीया और परकीया भावसे दो प्रकारका होता है। स्वकीया वैकुण्ठ-गत तत्त्व है और परकीया भाव केवल व्रजरमणियोंमें ही देखा जाता है। आदिलीला (4/46-49)- अतएव मधुर रस कहि तार नाम। स्वकीया-परकीया-रूपे द्विविध संस्थान ॥ परकीयभावे अति रसेर उल्लास। व्रज बिना इहार अन्यत्र नाहि वास ॥ व्रजवधूगणेर एइ भाव निरवधि। तार मध्ये श्रीराधार भावेर अवधि॥ प्रौढ़-निर्मलभाव प्रेम सर्वोत्तम। कृष्णेर माधुर्यरस-आस्वाद-कारण॥ इसी कारण व्रजगोपियोंमें श्रीकृष्णको पूर्णतः वशीभूत करनेका सामर्थ्य होता है। विभिन्न अन्य प्रेममें कुछ न कुछ न्यूनता रहती है, जैसे-शान्तप्रेममें ममताका अभाव, दास्यरसमें विश्रम्भ अथवा विश्वासकी कमी, सख्यरसमें स्नेहकी अधिकताकी कमी और वात्सल्यरसमें निःसङ्कोच भावकी न्यूनता होती है। इनके कारण । 261