भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1107

आठवाँ अध्याय 8/75-77 ] रूपमें ही देखते हैं। उनका दृष्टिकोण विपरीत ही है। वे श्रीकृष्णको तुच्छ समझते हैं और उनकी श्रीकृष्णके साथ विहार करनेकी इच्छा भी नहीं होती। 'सार्द्धं विजहु कृतपुण्यपुञ्जाः'—व्रजके सखा हैं। न जाने इन सखाओंने कौन-से कोटि-कोटि पुण्य किये थे, जो वे श्रीकृष्णके साथ अत्यन्त लोभनीय विहार करते हैं। वनमें सखागण पत्र-पुष्पों और गैरिक धातुओंसे श्रीकृष्णका शृङ्गार करते हैं, श्रीकृष्ण भी सखाओंका शृङ्गार करते हैं। कभी वे वेणुको चोरी कर लेते हैं, फिर पीछे-पीछेसे एक-दूसरेको पकड़ा देते हैं। जब श्रीकृष्ण वेणुको खोजते हैं, तो सखा कहते हैं कि हमें कन्धेपर बैठाकर ले चलो, तब वेणु कहाँ है, बतलायेंगे। वे श्रीकृष्णको स्पर्श करनेकी होड़ लगाते हैं कि 'पहले मैं पकड़ूँगा', 'पहले मैं पकड़ूँगा'। कभी सखा श्रीकृष्णके साथ पशुओंकी बोली बोलते हैं; कोयल, मयूरके स्वरकी नकल करते हैं, मेंढकके समान फुदकते हैं, कभी बन्दरकी पूँछ पकड़ लेते हैं और जब बन्दर एक वृक्षसे दूसरे वृक्षपर छलांग लगाते हैं, तो वे भी उनकी पूँछ पकड़े होनेके कारण उनके साथ एक वृक्षसे दूसरे वृक्षपर जाते हैं। श्रीकृष्ण सखाओंके साथ विभिन्न प्रकारकी लीलाएँ करते हुए स्वच्छन्दरूपसे वन-विहार करते हैं। इस प्रकार वे सख्यरसका आनन्द लेते हैं। सखाओंको यह सौभाग्य कोटि-कोटि पुण्य करनेके कारण प्राप्त हुआ है। 'कृतपुण्यपुञ्जाः'—श्रीसनातन गोस्वामीके अनुसार 'पुञ्ज' शब्दका अर्थ है—'अक्षय' और 'पुण्य' शब्द 'भक्ति'का वाचक है, अर्थात् ये गोप-गण ऐसी 'अक्षय भक्ति'से सम्पन्न हैं। लौकिक पूजा-पाठ या तपस्या आदिसे कोई भी श्रीकृष्णका सहचर नहीं बन सकता। श्रीकृष्णके सखागण अक्षय भक्तिसे परिपूर्ण हैं और बलदेव प्रभुसे प्रकटित नित्य परिकर हैं; ये जीव तत्त्व नहीं हैं। इनकी लोभनीय क्रीड़ाओंकी कथाको सुनकर जीव रागानुगा भक्ति साधनके द्वारा श्रीकृष्णके सखा बन सकते हैं। ये जीव-तत्त्व साधन-सिद्ध होते हैं। सख्य रसमें सङ्कोचरहित स्वच्छन्द सेवा है और सेवा वासनाका विकास भी है तथा साथमें ममता भी है। इसलिये महाप्रभुने इसे उत्तम माना है।”—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 75 ॥ (3) 'वात्सल्य-प्रेम' सख्यकी अपेक्षा उत्तम :— प्रभु कहे, — “एहो उत्तम, आगे कह आर।” राय कहे,—“वात्सल्य-प्रेम—सर्वसाध्यसार ॥” 76 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा—“यह तो उत्तम है, परन्तु इससे आगे कुछ और कहिये।” तब श्रीरामानन्द-रायने कहा,—“वात्सल्य प्रेम ही सर्वसाध्यसार है॥” 76 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभुने कहा,—'सख्यरस' यद्यपि 'दास्यरस'की अपेक्षा उत्तम है, तथापि थोड़ा और अग्रसर होनेसे ही साध्यसार प्राप्त होगा। श्रीरायने उसके उत्तरमें कहा,—'वात्सल्य'-भावका प्रेम ही सभी साध्योंका सार है। सख्यरसका जो विश्रम्भात्मक प्रेम है, उसमें और अधिक स्नेहयुक्त होनेपर 'वात्सल्यरस'का उदय होता है ॥ 76 ॥ अनुभाष्य—श्रीरामानन्दके 'सख्यप्रेम'के साध्य-निर्णयको सुनकर महाप्रभुने उसे 'दास्यप्रेम'की अपेक्षा 'उत्तम' कहा एवं और भी अग्रसर होनेके लिये अनुरोध करनेपर श्रीरामानन्दने तब 'वात्सल्य-प्रेम'को साध्य बतलाया ॥ 76 ॥ नन्द-यशोदाके वात्सल्यकी महिमा :— श्रीमद्भागवत (10/8/46)— नन्दः किमकरोद्ब्रह्मन् श्रेय एवं महोदयम्। यशोदा वा महाभागा पपौ यस्याः स्तनं हरिः ॥ 77 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 77 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीमद्भागवतमें कहा गया है,—हे ब्रह्मन्! श्रीनन्द महाराजने ऐसी क्या सुकृति की थी, जिसके फलस्वरूप उन्होंने श्रीकृष्णको पुत्रके रूपमें प्राप्त किया था? महाभागा श्रीयशोदाने ही ऐसी क्या सुकृति की थी, जिससे साक्षात् परब्रह्म श्रीकृष्णने उनको 'माँ' कहकर उनका स्तन पान किया था? ॥ 77 ॥ । 259