श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
आठवाँ अध्याय 8/75-77 ] रूपमें ही देखते हैं। उनका दृष्टिकोण विपरीत ही है। वे श्रीकृष्णको तुच्छ समझते हैं और उनकी श्रीकृष्णके साथ विहार करनेकी इच्छा भी नहीं होती। 'सार्द्धं विजहु कृतपुण्यपुञ्जाः'—व्रजके सखा हैं। न जाने इन सखाओंने कौन-से कोटि-कोटि पुण्य किये थे, जो वे श्रीकृष्णके साथ अत्यन्त लोभनीय विहार करते हैं। वनमें सखागण पत्र-पुष्पों और गैरिक धातुओंसे श्रीकृष्णका शृङ्गार करते हैं, श्रीकृष्ण भी सखाओंका शृङ्गार करते हैं। कभी वे वेणुको चोरी कर लेते हैं, फिर पीछे-पीछेसे एक-दूसरेको पकड़ा देते हैं। जब श्रीकृष्ण वेणुको खोजते हैं, तो सखा कहते हैं कि हमें कन्धेपर बैठाकर ले चलो, तब वेणु कहाँ है, बतलायेंगे। वे श्रीकृष्णको स्पर्श करनेकी होड़ लगाते हैं कि 'पहले मैं पकड़ूँगा', 'पहले मैं पकड़ूँगा'। कभी सखा श्रीकृष्णके साथ पशुओंकी बोली बोलते हैं; कोयल, मयूरके स्वरकी नकल करते हैं, मेंढकके समान फुदकते हैं, कभी बन्दरकी पूँछ पकड़ लेते हैं और जब बन्दर एक वृक्षसे दूसरे वृक्षपर छलांग लगाते हैं, तो वे भी उनकी पूँछ पकड़े होनेके कारण उनके साथ एक वृक्षसे दूसरे वृक्षपर जाते हैं। श्रीकृष्ण सखाओंके साथ विभिन्न प्रकारकी लीलाएँ करते हुए स्वच्छन्दरूपसे वन-विहार करते हैं। इस प्रकार वे सख्यरसका आनन्द लेते हैं। सखाओंको यह सौभाग्य कोटि-कोटि पुण्य करनेके कारण प्राप्त हुआ है। 'कृतपुण्यपुञ्जाः'—श्रीसनातन गोस्वामीके अनुसार 'पुञ्ज' शब्दका अर्थ है—'अक्षय' और 'पुण्य' शब्द 'भक्ति'का वाचक है, अर्थात् ये गोप-गण ऐसी 'अक्षय भक्ति'से सम्पन्न हैं। लौकिक पूजा-पाठ या तपस्या आदिसे कोई भी श्रीकृष्णका सहचर नहीं बन सकता। श्रीकृष्णके सखागण अक्षय भक्तिसे परिपूर्ण हैं और बलदेव प्रभुसे प्रकटित नित्य परिकर हैं; ये जीव तत्त्व नहीं हैं। इनकी लोभनीय क्रीड़ाओंकी कथाको सुनकर जीव रागानुगा भक्ति साधनके द्वारा श्रीकृष्णके सखा बन सकते हैं। ये जीव-तत्त्व साधन-सिद्ध होते हैं। सख्य रसमें सङ्कोचरहित स्वच्छन्द सेवा है और सेवा वासनाका विकास भी है तथा साथमें ममता भी है। इसलिये महाप्रभुने इसे उत्तम माना है।”—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 75 ॥ (3) 'वात्सल्य-प्रेम' सख्यकी अपेक्षा उत्तम :— प्रभु कहे, — “एहो उत्तम, आगे कह आर।” राय कहे,—“वात्सल्य-प्रेम—सर्वसाध्यसार ॥” 76 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा—“यह तो उत्तम है, परन्तु इससे आगे कुछ और कहिये।” तब श्रीरामानन्द-रायने कहा,—“वात्सल्य प्रेम ही सर्वसाध्यसार है॥” 76 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभुने कहा,—'सख्यरस' यद्यपि 'दास्यरस'की अपेक्षा उत्तम है, तथापि थोड़ा और अग्रसर होनेसे ही साध्यसार प्राप्त होगा। श्रीरायने उसके उत्तरमें कहा,—'वात्सल्य'-भावका प्रेम ही सभी साध्योंका सार है। सख्यरसका जो विश्रम्भात्मक प्रेम है, उसमें और अधिक स्नेहयुक्त होनेपर 'वात्सल्यरस'का उदय होता है ॥ 76 ॥ अनुभाष्य—श्रीरामानन्दके 'सख्यप्रेम'के साध्य-निर्णयको सुनकर महाप्रभुने उसे 'दास्यप्रेम'की अपेक्षा 'उत्तम' कहा एवं और भी अग्रसर होनेके लिये अनुरोध करनेपर श्रीरामानन्दने तब 'वात्सल्य-प्रेम'को साध्य बतलाया ॥ 76 ॥ नन्द-यशोदाके वात्सल्यकी महिमा :— श्रीमद्भागवत (10/8/46)— नन्दः किमकरोद्ब्रह्मन् श्रेय एवं महोदयम्। यशोदा वा महाभागा पपौ यस्याः स्तनं हरिः ॥ 77 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 77 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीमद्भागवतमें कहा गया है,—हे ब्रह्मन्! श्रीनन्द महाराजने ऐसी क्या सुकृति की थी, जिसके फलस्वरूप उन्होंने श्रीकृष्णको पुत्रके रूपमें प्राप्त किया था? महाभागा श्रीयशोदाने ही ऐसी क्या सुकृति की थी, जिससे साक्षात् परब्रह्म श्रीकृष्णने उनको 'माँ' कहकर उनका स्तन पान किया था? ॥ 77 ॥ । 259
[ 8/77-80 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य— श्रीशुकदेवके द्वारा यशोदाजीके श्रीकृष्णवात्सल्यके वर्णनको सुनकर विस्मित राजा परीक्षितकी उक्ति— हे ब्रह्मन्, नन्दः एवं महोदयं (महान् श्रेष्ठः उदयः उत्कर्षः यस्मिन् तत् अपूर्वफलोदयं) श्रेयः (मङ्गलप्रदं कर्म) किम् अकरोत्, महाभागा (अतिशय-सौभाग्यशालिनी) यशोदा वा किम् अकरोत्, हरिः यस्याः (यशोदायाः) स्तनं पपौ? श्लोक-भावानुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 77॥ यशोदाके यशका गान :— श्रीमद्भागवत (10/9/20)— नेमं विरिञ्चो न भवो न श्रीरप्यङ्गसंश्रया। प्रसादं लेभिरे गोपी यत्तत् प्राप विमुक्तिदात् ॥ 78 ॥ अनुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 78॥ अमृतप्रवाह भाष्य— यशोदा गोपीने साधारण जीवोंके मुक्तिदाता श्रीकृष्णसे जिस कृपाको प्राप्त किया था, वह ब्रह्मा, शिव अथवा विष्णुके वक्षःस्थलपर आश्रित लक्ष्मीको भी प्राप्त नहीं हुई॥ 78॥ अनुभाष्य— रस्सी द्वारा बाँधनेके लिये उद्यत माताको असमर्थ और थकी हुई देखकर श्रीकृष्ण स्वयं ही बँध गये; यशोदाजीके इस श्रीकृष्ण-वशकारिता-गुणके दर्शनसे परीक्षितके प्रति शुकदेवकी उक्ति— गोपी (यशोदा) विमुक्तिदात् (श्रीहरेः सान्निध्यात्) यत् प्रसादं प्राप, तत् इमं प्रसादं विरिञ्चः (पुत्रो ब्रह्मापि) न, भवः (आत्मतुल्यः शम्भुः) न, अङ्गसंश्रया (पत्नी) श्रीः (लक्ष्मीः) अपि न लेभिरे। श्लोक-भावानुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 78॥ अमृतानुकणिका— गौड़ीय वेदान्त प्रकाशनसे प्रकाशित श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामीके द्वारा सम्पादित “श्रीरायरामानन्द-संवाद” ग्रन्थ देखें॥ 77-79॥ (4) ‘कान्तभाव’ ही सर्वश्रेष्ठ प्रेमभक्ति :— प्रभु कहे,—“एहो उत्तम, आगे कह आर।” राय कहे,—“कान्तभाव—प्रेमसाध्यसार ॥” 79॥ अनुवाद— महाप्रभुने कहा, — “यह वात्सल्यप्रेम उत्तरोत्तर उत्तम है, पर आगे और जो है, उसे कहिये।” श्रीरामानन्द रायने कहा, — “श्रीकृष्णके प्रति कान्तभाव ही सब साध्योंका सार है॥” 79॥ अमृतप्रवाह भाष्य— महाप्रभुने कहा, — यद्यपि यह उत्तरोत्तर उत्तम हुआ है, तथापि इसको पार करके और एक रस है, जिसको ही 'साध्यसार' कह सकते हो। श्रीरायने उत्तर दिया, — श्रीकृष्णके प्रति 'कान्तभाव' ही प्रेमकी पराकाष्ठा रूप साध्योंका सार है। तात्पर्य यह है, — साधारण-प्रेममें 'ममता'का अभाव, दास्यरसमें 'विश्रम्भ' अथवा 'विश्वास'का अभाव, सख्यरसमें 'स्नेहाधिक्य'का अभाव और वात्सल्यरसमें 'निःसङ्कोच-भाव'का अभाव होनेके कारण साध्यप्रेमकी पूर्णता उन-उन रसोंमें नहीं होती। श्रीकृष्णके प्रति जब कान्तभाव उदित होता है, तभी सभी अभावोंसे शून्य, सभी साध्योंके सार एक अखण्ड प्रेमतत्त्वको प्राप्त किया जा सकता है॥ 79॥ अनुभाष्य— सख्यप्रेमकी अपेक्षा 'वात्सल्यप्रेम' उत्तम है, किन्तु जब महाप्रभुने श्रीरायको और भी अग्रसर होनेके लिये कहा, तब श्रीरामानन्दने 'कान्तभाव'को ही प्रेमका 'साध्यत्व' कहकर उल्लेख किया॥ 79॥ व्रजगोपियोंका माहात्म्य :— (श्रीमद्भागवत 10/47/60)— नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्तरतेः प्रसादः। स्वर्योषितां नलिनगन्धरुचां कुतोऽन्याः। रासोत्सवेऽस्य भुजदण्डगृहीतकण्ठ- लब्धाशिषां य उदगाद्व्रजसुन्दरीणाम्॥ 80 ॥ अनुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 80॥ अमृतप्रवाह भाष्य— श्रीवृन्दावनमें रासोत्सवमें श्रीकृष्णकी भुजाओंके द्वारा आलिङ्गित-कण्ठवाली व्रजसुन्दरियोंके प्रति जो कृपा उदित हुई थी, वह श्रीकृष्णके वक्षःस्थलपर स्थित लक्ष्मी आदि परव्योमकी अत्यन्त अनुगत शक्तियोंको भी प्राप्त नहीं हुई, स्वर्गकी रमणियाँ जिनकी देहसे 260 ।
आठवाँ अध्याय 8/80-81 ] कमलकी सुगन्ध आती है, उनको भी उस प्रकारकी कृपाकी प्राप्ति नहीं हुई, तब अन्य स्त्रियोंके विषयमें तो क्या कहूँ? ॥ 80 ॥ अनुभाष्य-उद्धवजी व्रजमें आकर कुछ महीनों तक रहे। श्रीकृष्णकथा-कीर्तनके द्वारा हर्षोत्पादन करनेपर भी जिनका चित्त ऐकान्तिक रूपसे श्रीकृष्णमें ही आविष्ट था, उन श्रीकृष्ण-विरहसे तप्त गोपियोंके एकमात्र श्रीकृष्णमें तन्मय चित्तकी विकलताके दर्शन करके उद्धवजी उनके परम सौभाग्यकी प्रशंसा कर रहे हैं- रासोत्सवे (रासक्रीड़ाकाले) अस्य (श्रीकृष्णस्य) भुजदण्डगृहीतकण्ठलब्धाशिषां (भुजदण्डाभ्यां बाहुभ्यां गृहीतः आश्लिष्टः कण्ठः गलदेशः येन तस्मात् लब्धाः प्राप्ताः आशिषाः कल्याणमनोरथाः याभिर्गोपीभिस्तासां) व्रजसुन्दरीणां (गोपललनानां) यः (प्रसादः) उदगात् (आविर्बभूव), नलिनगन्धरुचां (नलिनस्य पद्मस्य इव गन्धो रुक् कान्तिश्च यासां तासां) स्वर्योषितां (देवरामाणां) न अभूत्; उ (अहो) अङ्के (वक्षसि) नितान्तरतेः (अनन्यात्यन्ताश्रितायाः) श्रियः (लक्ष्म्याः अपि) अयं प्रसादः न अभूत्; अन्याः (स्त्रियन्तु) कुतः [एवं कृष्णानुग्रहविषयाः भवन्ति ?] श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 80 ॥ व्रजगोपियोंका ही मदनमोहन-विग्रह-दर्शनमें अधिकार :- श्रीमद्भागवत (10/32/2)- तासामाविरभूच्छौरिः स्मयमानमुखाम्बुजः। पीताम्बरधरः स्रग्वी साक्षान्मन्मथमन्मथः ॥ 81 ॥ अनुवाद-उसी समय उन रोदनकारी व्रजदेवियोंके बीचमें शूरवंशके शिरोमणि श्रीकृष्ण प्रकट हो गये। उनका मुखकमल मन्द-मन्द मुस्कानसे खिला हुआ था, वे गलेमें वनमाला और शरीरपर पीताम्बर धारण किये हुए थे। उनका वह रूप-सौन्दर्य सबके मनको मथ डालनेवाले साक्षात् कामदेवके मनको भी मथनेवाला था ॥ 81 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 5/214 संख्या देखें ॥ 81 ॥ अमृताणुकणिका-"कान्त और कान्ताका परस्पर प्रेम ही 'कान्तभाव' है। यहाँ श्रीकृष्णके प्रति 'कान्तभाव' ही प्रेम-पराकाष्ठा रूप साध्योंका सार है। श्रीराय रामानन्दने यहाँ कान्तभावको सर्वश्रेष्ठ न कहकर उसके प्रेमकी पराकाष्ठाको ही सर्वश्रेष्ठ बतलाया है। श्रीकृष्णके प्रति कान्तभावके उदय होनेसे सभी साध्योंके सार, अखण्ड प्रेम-तत्त्वको प्राप्त किया जा सकता है। कान्तभावकी स्थिति शृङ्गार या मधुर रसके अन्तर्गत है। इसमें श्रीकृष्ण ही व्रज गोपियोंके प्राण-प्रियतम विषयालम्बन हैं। मुरली ध्वनि, वसन्त ऋतु, कोकिलकी कूक, मयूर-कण्ठका दर्शन आदि उद्दीपन विभाव हैं। कटाक्ष और हास्यादि अनुभाव हैं, समस्त सात्त्विक भाव सुदीप्त अवस्था तक होते हैं। इस रसमें प्रेम-स्नेह-मान- प्रणय-राग-अनुराग-महाभाव आदि सभी अवस्थाएँ दृष्टिगोचर होती हैं, परन्तु केवल श्रीमती राधिकामें ही महाभावकी सर्वोच्च अवस्था मादन नामक महाभाव अवस्थित है। मधुररस स्वकीया और परकीया भावसे दो प्रकारका होता है। स्वकीया वैकुण्ठ-गत तत्त्व है और परकीया भाव केवल व्रजरमणियोंमें ही देखा जाता है। आदिलीला (4/46-49)- अतएव मधुर रस कहि तार नाम। स्वकीया-परकीया-रूपे द्विविध संस्थान ॥ परकीयभावे अति रसेर उल्लास। व्रज बिना इहार अन्यत्र नाहि वास ॥ व्रजवधूगणेर एइ भाव निरवधि। तार मध्ये श्रीराधार भावेर अवधि॥ प्रौढ़-निर्मलभाव प्रेम सर्वोत्तम। कृष्णेर माधुर्यरस-आस्वाद-कारण॥ इसी कारण व्रजगोपियोंमें श्रीकृष्णको पूर्णतः वशीभूत करनेका सामर्थ्य होता है। विभिन्न अन्य प्रेममें कुछ न कुछ न्यूनता रहती है, जैसे-शान्तप्रेममें ममताका अभाव, दास्यरसमें विश्रम्भ अथवा विश्वासकी कमी, सख्यरसमें स्नेहकी अधिकताकी कमी और वात्सल्यरसमें निःसङ्कोच भावकी न्यूनता होती है। इनके कारण । 261
[ 8/81 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला साध्यप्रेमकी पूर्णता इन रसोंमें नहीं होती। कान्तभावकी नायिकाओं व्रजगोपियोंमें एक अपूर्व भाव है। इन सभी न्यूनताओंकी पूर्ति करते हुए वे निजाङ्ग भी श्रीकृष्णसेवामें देकर श्रीकृष्णका सुख वर्धन करती हैं। यह विशेषता अन्य रसोंमें नहीं है। शान्त, दास्य, सख्य और वात्सल्य-इन चार रसोंके गुण मधुर कान्तरसमें नित्य विद्यमान हैं और उन रसोंमें जो चमत्कारिताका अभाव है, वह मधुररसमें सुन्दर रूपसे प्रतिष्ठित है। व्रजमें दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर, जितनी भी प्रकारकी रति हैं, उन्हें दो भागोंमें विभक्त किया जा सकता है-सम्बन्धानुगा और कामानुगा। दास्य, सख्य और वात्सल्य प्रेमके भक्त अपने सम्बन्धसे बँधे हैं। इनकी अपनी मर्यादा है, जिसका वे उल्लङ्घन नहीं कर सकते। इनकी सेवा सम्बन्धकी अनुगामिनी है और उसीमें सीमित रहती है। द्वारकामें भी रुक्मिणी, सत्यभामा आदिका प्रेम उनके वैवाहिक सम्बन्धके अन्तर्गत है अर्थात् यह भी सम्बन्धानुगा है। उनके प्रेममें अपने सुखकी कुछ वासनाएँ भी सम्मिलित होती हैं; इसलिये वे श्रीकृष्णको पूर्णतया वशीभूत नहीं कर सकतीं। कामानुगा कान्तरतिमें गोपियोंके प्रेममें सम्बन्धकी प्रधानता न होकर सेवा-वासनाकी प्रधानता है जिसके द्वारा वे श्रीकृष्णकी सभी इच्छाओंकी पूर्ति करती हैं। गोपियोंका लोकधर्म, वेदधर्म, आर्यधर्म, गुरु-गौरव, सतीत्व, कुलधर्म-ये सब तृणकी भाँति कान्त-भावमें बह जाते हैं। उनका काम और सेवा तदात्म्यताको प्राप्त हो जाते हैं अर्थात् एक ही हो जाते हैं। गोपियोंकी सेवा, प्रीति और काम- पृथक्-पृथक् नहीं, एक ही हैं। वे श्रीकृष्णकी सेवाके लिये सब कुछ करती हैं। उनके प्रेममें अपनी इन्द्रिय-सुखकी इच्छा नहीं है। श्रीकृष्णसे प्रेम करनेके लिये वे विवाह-बन्धनके द्वारा आबद्ध नहीं हैं। कामानुगा रतिके दो विभाग हैं-सम्भोगेच्छामयी या कामात्मिका और तत्-तत्-भावेच्छात्मिका। सम्भोगेच्छामयी या कामात्मिका रति केलि तात्पर्यमयी होती है। इसकी अवस्थिति विभिन्न यूथेश्वरियोंमें होती है। तत्-तत् भावेच्छात्मिका-व्रजयूथेश्वरियोंका श्रीकृष्णके प्रति जो मधुर भाव होता है, उस मधुर भावकी कामनाका ही यह दूसरा विभाग है; श्रीराधाकी किङ्करियों, मञ्जरियोंमें यह भाव रहता है। जीवके पक्षमें यही भाव सर्वोच्च कोटिका है। 'नायं श्रियोऽङ्ग...'-इस श्लोकके द्वारा उद्धवजी श्रीकृष्ण प्रियाओं, व्रजगोपियोंके प्रेमकी महिमाकी उद्घोषणा करते हुए कह रहे हैं कि ऐसा अपूर्व और अदृष्टपूर्व भगवत्-प्रसाद अन्य किसीने प्राप्त नहीं किया। श्लोकमें 'उ' शब्दके द्वारा उद्धवजीका विस्मय प्रकट होता है। रासोत्सवमें श्रीकृष्णने उल्लसित होकर जिस प्रकार व्रजरमणियोंके कण्ठ-प्रदेशका आलिङ्गनकर उनका मनोरथ पूर्ण किया, वह सौभाग्य उनकी वक्षःस्थित लक्ष्मीदेवीको भी प्राप्त नहीं हुआ। यद्यपि लक्ष्मीदेवी श्रीकृष्णके वक्ष-स्थलपर स्वर्ण-रेखाके रूपमें विराजमान हैं और श्रीकृष्णसे उनका कभी विच्छेद नहीं है, तथापि गोपियाँ ही अधिक प्रशंसनीय हैं। इसका कारण है कि लक्ष्मीदेवी केवल सम्भोग रसमें स्थित हैं, किन्तु गोपियाँ कभी सम्भोग (मिलन) और कभी विप्रलम्भ (विरह)-युक्ता होती हैं। विप्रलम्भ ही सम्भोगकी पुष्टि करके उसमें चमत्कारिता प्रकाशित करता है। लक्ष्मी वक्ष-विलासिनी प्रेयसी हैं, किन्तु गोपियाँ केवल प्रेयसी ही नहीं, वे परकीया-भाव सम्पन्न रास-रङ्गिणी हैं और श्रीकृष्णकी प्रेम माधुरीका अपूर्व रूपमें विस्तार करती हैं। रासलीला महोत्सवमें श्रीकृष्ण अत्यन्त आनन्दपूर्वक प्रेमसमुद्रकी तरङ्गोंमें डूबते-उबरते हैं। इस प्रेमरूपी समुद्रकी गोपियोंके हाव-भाव, कटाक्षरूपी उत्ताल लहरियोंमें अपनेको संरक्षित करनेके लिये वे व्रज-देवियोंके कण्ठको धारण करते हैं। श्रीकृष्णको इस अपूर्व रसका आस्वादन एकमात्र गोपियाँ ही करवानेमें समर्थ हैं। 'तासामाविर्भूच्छौरि...'-प्रेम विवर्धनमें चतुर श्रीकृष्ण राससे अन्तर्धान हो गये। विरह-कातरा गोपियाँ अन्य कोई उपाय न देखकर रोती हुई यमुना पुलिनमें अत्यन्त करुण स्वरसे विलाप करने लगीं। व्रजरमणियाँ 262 ।
आठवाँ अध्याय 8/81–88 ]
विरह-वेदनासे व्याकुल हो निरङ्कुश निरन्तर अश्रुपात कर रही थीं, उस सघन वनके अन्धकारमें उनके विलापमय क्रन्दनको सुनकर अपनी कान्ति प्रकाशित करते हुए श्रीकृष्णचन्द्र उन गोपियोंके मध्य अचानक प्रकट हो गये। विदग्ध चूड़ामणि श्रीकृष्णचन्द्र व्रजदेवियोंके मध्य अपना अपूर्व सौन्दर्य प्रकाश करते हुए प्रकट हुए। तीन विशेषणोंके द्वारा श्रीशुकदेव गोस्वामी रास-रसिक श्रीकृष्णके विलास और वेशकी अपूर्वताका वर्णन कर रहे हैं। 'स्मयमान मुखाम्बुजः'—श्रीकृष्णकी यह मुस्कान उनके स्वाभाविक हास्यसे विलक्षण है; यह गोपियोंको आश्वासन देने और उनका दुःख दूर करनेके लिये थी। विरह-तापसे गोपियोंका हृदय-कमल सन्तप्त था, श्रीकृष्णके अत्यन्त मनोहर मुखारविन्दके दर्शनसे गोपियोंका समस्त दुःख दूर हो गया। 'पीताम्बरधर'—श्रीकृष्णने मानो गोपियोंसे अपने अपराधकी क्षमा-प्रार्थनाके लिये दोनों कन्धोंसे पीताम्बरको लटकाकर अपने हाथोंमें पकड़ रखा था, जैसे कोई अपराधी क्षमा-याचनाके लिये मुखमें तृण दबाकर दीनतापूर्वक वस्त्र गलेमें डालकर आये। 'स्रग्वी'—उन्होंने अपने कमनीय कण्ठमें अम्लान शीतल कमलोंकी पुष्पमाला धारण कर रखी थी। गोपियोंने ही यह माला गूँथकर उन्हें पहनायी थी, इसका आलिङ्गनकर वे गोपियोंके प्रति अपनी चिर-कृतज्ञताको प्रकाशित कर रहे थे। 'साक्षान्मन्मथमन्मथः'—श्रीकृष्णकी छवि अत्यन्त सुन्दर थी और कामदेवके भी मनको मथन करते हुए वे गोपियोंके मध्य सुशोभित हो रहे थे। प्राकृत कन्दर्पका रासादि क्रीड़ाओंमें अधिकार नहीं है। श्रीकृष्णके द्वारा अपने महामोहन माधुर्यमय रूप-लावण्यका आविष्कार विरहिणी गोपियोंके विरहःदुखको विस्मरण करवानेके लिये हुआ था। ऐसा साक्षात् मन्मथ-मन्मथ रूप ही शृङ्गाररसमें परम आलम्बन है। अन्य रसोंमें स्थित भक्तोंके लिये ऐसे रूपके दर्शन सम्भव नहीं है, क्योंकि उनमें वैसा आधार नहीं है।"—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी॥ 81 ॥
कृष्णप्राप्तिर उपाय बहुविध हय। कृष्णप्राप्ति-तारतम्य बहुत आछय ॥ 82 ॥ प्रतिरसकी श्रेष्ठता होनेपर भी परस्परमें तारतम्य वर्तमान :— किन्तु याँर येइ रस, सेइ सर्वोत्तम। तटस्था हञा विचारिले, आछे तर-तम ॥ 83 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण-प्राप्तिके अनेक प्रकारके उपाय हैं। उनके अनुसार श्रीकृष्णप्राप्तिके भी अनेक तारतम्य हैं, किन्तु जिसका जो रस है, उसके लिये वही सर्वोत्तम है। यदि तटस्थ होकर विचार किया जाय, तो उनमें तारतम्य है॥ 82-83 ॥ श्रीभक्तिरसामृतसिन्धु (2/5/38) :— यथोत्तरमसौ स्वादविशेषोल्लासमप्यपि। रतिर्वासनया स्वाद्धी भासते कापि कस्यचित् ॥ 84 ॥ अनुवाद—पाँचों प्रकारकी रतियाँ एक-दूसरेसे उत्तरोत्तर अधिकाधिक आस्वादनीय एवं उल्लासमयी हैं। यही रति वासना विशेषताके क्रमसे विशेष परमास्वादनीय होकर किसी विशेष भक्तके लिये मधुर रसरूपमें प्रकाशित होती है ॥ 84 ॥ अनुभाष्य—आदिलाीला 4/45 संख्या देखें ॥ 84 ॥ मधुर-रसमें ही शान्तादि चारों रस विद्यमान :— पूर्व-पूर्व-रसेर गुण-परे-परे हय। एक-दुइ गणने पञ्च पर्यन्त बाड़य ॥ 85 ॥ गुणाधिक्ये स्वादाधिक्य बाड़े प्रति-रसे। शान्त-दास्य-सख्य-वात्सल्येर गुण मधुरेते वैसे ॥ 86 ॥ जड़ीय दृष्टान्त; पञ्चम महाभूत 'भूमि'में ही अन्य चार भूत विद्यमान :— आकाशादिर गुण येन पर-परभूते। दुइ-तिन-गणने बाड़े पञ्च पृथिवीते ॥ 87 ॥ शृङ्गार-रस-लक्षण प्रेमके वशीभूत श्रीकृष्ण :— परिपूर्ण-कृष्णप्राप्ति एइ 'प्रेमा' हैते। एइ प्रेमार वश कृष्ण,—कहे भागवते ॥ 88 ॥
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[ 8/82-88 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-रसादिके तारतम्यसे पूर्व-पूर्व रसके गुण अगले रसमें विद्यमान रहते हैं। पूर्वका गुण अगलेमें आ जानेसे दूसरेमें दो गुण हो जाते हैं, तीसरेमें तीन और पाँचवें रस तक पाँचों गुण तक वृद्धि हो जाती है। गुणोंकी अधिकतासे प्रत्येक रसका आस्वादन भी बढ़ता जाता है। शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्यके गुण मधुररसमें वर्तमान रहते हैं। इस सिद्धान्तको समझानेके लिये दृष्टान्त देते हुए कहते हैं कि आकाशादिके गुण जैसे अगले-अगले महाभूतोंमें बढ़ते जाते हैं और दो, तीनके क्रमसे पृथ्वीमें पाँचों महाभूत तक बढ़ते जाते हैं, अतः कान्ताप्रेममें पूर्व-पूर्वके चारों रसोंके गुण होनेके कारण कान्ताभाव ही सर्वश्रेष्ठ है। अतः श्रीकृष्ण इस कान्ताप्रेमके ही वशीभूत होते हैं-जैसा कि श्रीमद्भागवतमें भी कहा गया है॥ 85-88 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-प्रभो, मैंने पूर्व-पूर्व साध्योंके अर्थात् श्रीकृष्णप्राप्तिके बहुतसे उपाय बतलाये, उनमें केवलमात्र यही भेद है कि अलग-अलग उपायके अनुसार श्रीकृष्ण-प्राप्तिके तारतम्यका विचार करना होगा। मनुष्य जिन-जिन उपायोंको करनेका अधिकारी है, उन-उन उपायोंको करके ही अपनी अवस्थाके योग्य साध्यवस्तु, जो श्रीकृष्ण-प्राप्ति है, वही उसके लिये कल्याणकारी है। विशेषतः रसको प्राप्त करनेके अधिकारियोंके 'दास्य', 'सख्य', 'वात्सल्य' और 'मधुर'-ये चार प्रकारके रस ही उत्तम हैं। जो जिस रसका अधिकारी है, उसके लिये वही रस ही सर्वोत्तम है। रस-विषयमें जो राग उदय होता है, उसमें आविष्ट होकर चारों रसोंका तारतम्य दिखलायी नहीं देता; किन्तु तटस्थ अर्थात् निरपेक्ष होकर देखनेसे इन रसोंमें तारतम्य है। 'शान्त', 'दास्य', 'सख्य', 'वात्सल्य' और 'मधुर'-इन पाँचों रसोंमें क्रमशः तारतम्य है। 'शान्तरस'में श्रीकृष्णमें ऐकान्तिक निष्ठारूपी गुण दास्यरूपमें ममतासे युक्त होकर अधिक समृद्ध होता है। फिर सख्यरसमें श्रीकृष्णमें ऐकान्तिक निष्ठा और ममता विश्रम्भके साथ युक्त होकर और अधिक प्रफुल्लित होती है; वात्सल्यरसमें फिर शान्त-दास्य-सख्यके तीनों गुण स्नेहाधिक्यके साथ युक्त होकर दिखलायी देते हैं। कान्तभावरूप मधुर-रसमें ये चारों गुण सङ्कोचरहित होकर अतिशय माधुरी प्राप्त करते हैं। इस प्रकार गुणोंकी वृद्धिके कारण आस्वादनकी भी वृद्धि होती है। इसलिये तटस्थ विचारसे मधुर-रस सबकी अपेक्षा श्रेष्ठ है। रसोंका तारतम्य समझानेके लिये एक जागतिक उदाहरण दिया जा रहा है,-'आकाश', 'वायु', 'अग्नि', 'जल' और 'पृथ्वी'-ये पाँच महाभूत हैं। आकाशमें 'शब्द' नामक एक गुण है; वायुमें 'शब्द' और 'स्पर्श'-दो गुण हैं; अग्निमें 'शब्द', 'स्पर्श' और 'रूप'-ये तीन गुण हैं; जलमें 'शब्द', 'स्पर्श', 'रूप' और 'रस'-ये चार गुण हैं; मिट्टीमें 'शब्द', 'स्पर्श', 'रूप', 'रस' और 'गन्ध'-ये पाँच गुण हैं। अब देखें-आकाश आदिमें एकके बाद एक भूतमें क्रमशः गुणोंकी संख्यामें वृद्धि हुई है, -पाँचों गुण ही पृथ्वीमें लक्षित होते हैं। उसी प्रकार शान्त-दास्य-सख्य- वात्सल्य-मधुरमें क्रमशः गुणोंकी वृद्धि होकर मधुररसमें पाँचों गुण ही परिपूर्ण मात्रामें पाये जाते हैं; इसलिये परिपूर्ण-श्रीकृष्णप्राप्ति 'मधुर' अथवा शृङ्गार-रस-रूपी प्रेममें ही होती है। भागवतमें कहा गया है-मधुररससे उत्फुल्ल प्रेमसे श्रीकृष्ण पूर्णतया वशीभूत होते हैं॥ 82-88 ॥ अनुभाष्य-'किन्तु याँर येइ रस, सेइ सर्वोत्तम'-इस वाक्यके द्वारा यह नहीं समझना चाहिये कि जिसका जैसा भी मनोधर्म या विचार होगा, वही सर्वोत्तम है; उच्छ्र “श्रुतिस्मृतिपुराणादि-पञ्चरात्रविधिं बिना। ऐकान्तिकी हरेर्भक्तिरुत्पातायैव केवलम्॥” “श्रुति-स्मृति पुराणादि एवं पञ्चरात्रकी विधिका त्याग करके ऐकान्तिकी हरिभक्ति भी विघ्न ही उत्पादन किया करती है।” गृहस्थमें आसक्त व्यक्तिके लिये भागवतका व्यापार जिसे शास्त्रोंमें निन्दनीय अपराध कहा गया है, मन्त्र 264 ।
आठवाँ अध्याय 8/82-91 ] देनेका व्यापार, शिष्य बनानेका व्यापार, कीर्तनका व्यापार, बहिर्मुख-सामाजिकता, लौकिकता आदि अपेक्षाओंसे युक्त मनोधर्म—इन सबको और शुद्धभक्तिको एक समान कहनेका यहाँ उद्देश्य नहीं है। आउल, बाउल, कर्त्ताभजा, नेड़ा, दरवेश, साँई, अतिबाड़ि, चूड़ाधारी, गौराङ्गनागरी, गोस्वामियोंके नये मत अथवा जाति-गोस्वामियोंके मतका प्रचार करनेवाले एवं इन जाति गोस्वामियोंके मतको ही 'षड्गोस्वामियोंका मत' कहकर लोगोंको छलनेवाले, श्रीकृष्णके अभक्त, गौरमन्त्र और गौरनामके विरोधी, नये-नये छड़ा (सिद्धान्तविरोधी कीर्तनों)की रचना करनेवाले, विग्रहके व्यापारी, धन लेकर पाठ करनेवाले आदि, नीचजातिके सङ्गसे उत्पन्न वर्णब्राह्मणताको ही 'वैदिक ब्राह्मणता' कहकर प्रचार करनेवाले, स्मार्त्त, सात्वतपञ्चरात्रके विरोधी, मायावादी, स्त्रीसङ्गी आदि कभी भी निष्किञ्चन, श्रीकृष्णके लिये समस्त चेष्टा करनेवाले, प्रतिक्षण हरिसेवामें रत सर्वस्व-त्यागी, श्रीगुरुगौराङ्गको अपने-आपको बेच देनेवाले, नैष्ठिक ब्रह्मचारी, संयत-गृहस्थ, वानप्रस्थ और त्रिदण्डिवेशधारी लोगोंके साथ एक अथवा समान नहीं हो सकते। जिस प्रसङ्गमें कविराज गोस्वामीने इस वाक्यको उद्धृत किया है, वह सिद्धभावपञ्चक (पाँच भावोंमेंसे किसीमें सिद्धि) की बात है। अर्थात् शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर—इन पाँच प्रकारके भावोंमें इन पाँच रसोंके रसिक सेवा किया करते हैं। अनर्थ निवृत्तिके बाद इन सब सिद्धभावोंमेंसे जो कोई किसीके भी नित्यसिद्ध स्वरूपके स्वभावके अनुसार क्यों न उदित हो, वह उस-उस रसके अधिकारी व्यक्तिके लिये सर्वोत्तम है। इसका कारण यह है कि सभीके विषय श्रीकृष्ण ही है, श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य-अन्य कोई प्राकृत देवतादि नहीं। और दूसरी तरफ तटस्थ अर्थात् मध्यस्थ होकर विचार करनेपर उन पाँच प्रकारके भावोंके रसास्वादनमें तारतम्य अनुभव होता है;—जैसे दास्यरसमें शान्तरस और दास्यरस,—दोनों ही एक साथ वर्तमान हैं, इसलिये वह शान्तरसकी अपेक्षा श्रेष्ठ है। दूसरी ओर, सख्यरसमें शान्त और दास्य वर्तमान हैं; इसलिये वह शान्त और दास्यसे और भी उन्नत है। फिर, वात्सल्य रसमें शान्त, दास्य एवं सख्य अन्तर्भुक्त होनेके कारण उसमें पूर्वोक्त तीनों प्रकारके रसोंसे अधिक चमत्कारिता वर्तमान है। फिर, मधुररसमें पूर्ववर्त्ती चार प्रकारके रस विराजमान होनेसे उसकी चमत्कारिता और माधुर्य सर्वश्रेष्ठ है। वैष्णव और भक्तिसिद्धान्तोंमें निपुण महाजनोंने इस प्रकारके उत्तरोत्तर क्रमसे स्वरूपकी उपलब्धिका सूक्ष्मातिसूक्ष्म तत्त्वसमूह विचार किया है। दुर्भाग्यवशतः दैव-मायाके द्वारा विमूढ़ असत्-सिद्धान्तोंमें निपुण व्यक्ति इन सब सिद्धान्तोंकी कुछ भी उपलब्धि नहीं कर पानेके कारण शुद्धवैष्णव- सिद्धान्तोंपर दोषारोपण करते हैं, —उनका ऐसा करना बालकों जैसी बातें करनेवाले उन सभी व्यक्तियोंके दुर्भाग्यका ही परिचय देता है॥ 82-86॥ श्रीकृष्णमें प्रेमभक्ति ही श्रीकृष्ण-प्रदाता :— श्रीमद्भागवत (10/82/44)— मयि भक्तिर्हि भूतानाममृतत्वाय कल्पते। दिष्ट्या यदासीन्मत्स्नेहो भवतीनां मदापनः ॥ 89 ॥ अनुवाद—मेरे प्रति भक्ति ही जीवोंके लिये अमृत है। हे गोपियों! मेरे प्रति तुम्हारा जो स्नेह है, वही एकमात्र तुम लोगोंका मुझे प्राप्त करनेका कारण है॥ 89 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 4/23 संख्या देखें॥ 89 ॥ भक्तके भजनकी गाढ़ताके तारतम्यसे ही श्रीकृष्णभक्तिकी प्राप्तिमें भी तारतम्य :— कृष्णेर प्रतिज्ञा दृढ़ सर्वकाले आछे। ये यैछे भजे, कृष्ण तारे भजे तैछे॥ 90 ॥ गोपियोंकी मधुर-रसकी सेवाके बदले श्रीकृष्णके द्वारा स्वयंको प्रदान करनेकी असमर्थता हेतु ऋण :— एइ 'प्रेमेर अनुरूप ना पारे भजिते। अतएव 'ऋणी' हय—कहे भागवते॥ 91 ॥ । 265
[ 8/90–91 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—श्रीकृष्णने पहले सर्वकालके लिये एक दृढ़ प्रतिज्ञा की है कि जो मुझे जिस प्रकार भजता है, मैं भी उसका उसी प्रकारसे भजन करता हूँ। परन्तु भागवतमें कहा गया है कि माधुर्य रसमें जो श्रीकृष्णप्रेम है, उसके अनुरूप श्रीकृष्ण उसका प्रतिदान नहीं दे पाते, इसलिये वे माधुर्य रसके भक्तोंके ऋणी ही रहते हैं॥90-91॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णकी यह साधारण प्रतिज्ञा है कि जो उनका जिस रूपमें भजन करेगा, श्रीकृष्ण भी उसका उस रूपमें भजन करेंगे। अन्यान्य रसोंके भक्तोंके भजनके अनुरूप प्रतिभजन करनेमें श्रीकृष्ण समर्थ हैं; किन्तु मधुररससे उत्फुल्ल प्रेममें भजनके अनुरूप प्रतिभजन न देख पानेके कारण श्रीकृष्णने कहा,—हे व्रजसुन्दिरयों! मैं तुम्हारे ऋणका शोधन नहीं कर पाया अर्थात् चुका नहीं पाया॥90-91॥ अनुभाष्य—प्राकृत लोगोंका विचार—"जो जिस भी भावसे भजन क्यों न करें, वे भगवान्को ही प्राप्त करते हैं। कर्म, ज्ञान, योग, तपस्या, जिस किसी भी उपायसे भगवान्का भजन किया जाय, उस उपायसे कुछ लेना देना नहीं है। जैसे, किसी स्थानपर जानेके लिये अनेक मार्ग हैं, उसी प्रकार भगवान्के निकट जानेके भी विभिन्न मार्ग हैं। भगवान्को काली, दुर्गा, शिव, गणेश, राम, हरि, ब्रह्म, जिस किसी भी नामसे क्यों न पुकारा जाय, एक ही बात है। अथवा जैसे एक ही व्यक्तिके अलग-अलग नाम हैं, तो उनमेंसे जिस किसी भी नामसे पुकारनेपर वह उत्तर देता है, उसी प्रकार भगवान्के सम्बन्धमें भी ऐसी बात है।" किन्तु यह सब बातें बालकों जैसे मनोधर्मी व्यक्तियोंके लिये मनोरञ्जक होनेपर भी सारग्राही व्यक्ति उसे कुसिद्धान्तपूर्ण ही मानते हैं। जो स्वर्ग आदिकी कामनासे आधिकारिक (भगवान्के द्वारा अधिकार प्राप्त) देवताओंकी उपासना करेंगे, भगवान्से विमुख करनेवाली मायाशक्ति उनको इन सभी आधिकारिक देवताओंमें ही श्रद्धारूपी फल देकर उन्हें सर्वोत्तम मङ्गलरूपी फलसे वञ्चित कर देंगी और जन्म-मरणरूपी मालाके कर्मचक्रमें कभी स्वर्ग, तो कभी मर्त्यलोकमें भ्रमण करायेंगी। और जो नित्य भगवान्की सेवाके लिये प्रार्थना करेंगे, भगवान् उन्हें अपनी नित्य-सेवा प्रदान करेंगे। इसलिये जो जिस प्रकारसे भी भजन क्यों न करें, उन्हें अपने भजनके अनुरूप ही फल प्राप्त होगा, ये बात सत्य है। किन्तु यह विशेष रूपसे लक्ष्य करना उचित है कि सब फल समान नहीं हैं। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष कामी व्यक्तियोंका फल और नित्य-अहैतुकी श्रीकृष्णसेवाकी प्रार्थना करनेवाले व्यक्तियोंको प्राप्त होने वाला फल एक नहीं है। धर्म-अर्थ आदिका फल-नश्वर स्वर्गादि है, सायुज्य- मोक्षादिका फल-आत्माका विनाश आदि है, अहैतुकी हरिसेवाका उत्तम फल-नित्य नवनवायमान हरिसेवाकी प्राप्ति अथवा भगवद्-प्रेम है। इसलिये धर्म-अर्थकामी, निर्विशेष-मुक्तिकामी और हरिसेवामें तत्पर व्यक्तियोंके फलमें 'आकाश-पाताल'का भेद है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। जड़-जगत्की अधिष्ठात्री जगत्-जननी महामाया और अन्यान्य आधिकारिक देवता—श्रीभगवान्की बहिरङ्गा शक्ति और विरूप (विपरीत) वैभव हैं। वे भगवान्के आदेशसे जगत्-सृष्टि-कार्योंके विभिन्न अंशोंकी देख- रेखकर रहे हैं। जगत्-सृष्टि-कार्यमें भगवान्की अन्तरङ्गा शक्तिका कोई सम्बन्ध नहीं है। चिद्-धाममें जो सब कार्य होते हैं, वे ही अन्तरङ्गा शक्तिके कार्य हैं, वे सब योगमायाके द्वारा साधित होते हैं। योगमाया-भगवान्की अन्तरङ्गा शक्ति या चिद्-शक्ति है; जो चिद्-धाममें भगवान्के सेवाप्रार्थी हैं, वे योगमायाकी निष्कपट श्रीकृष्ण-सेवोन्मुखी कृपा प्राप्त करते हैं। और जो जड़-ब्रह्माण्डमें उत्तरोत्तर उन्नतिके लिये धर्म, अर्थ, काम आदि अन्याभिलाषकी इच्छा करते हैं या भगवद्-सेवा- विमुखिनी निर्विशेष-गतिकी इच्छा करते हैं, वे महामाया या रुद्रादि देवताओंकी उपासना करते हैं। इसलिये देखा जाता है,—गोपियोंने नन्दगोपके पुत्रको पतिके रूपमें प्राप्त करनेके लिये अर्थात् चिद्-धाममें उनकी नित्य 266 ।
आठवाँ अध्याय 8/90-92 ]
सेवा प्राप्तिके लिये चिद्-शक्ति योगमायाकी आराधना की थी। और देखा जाता है कि सातवीं शताब्दीमें राजा सुरथ एवं समाधि-नामक वैश्यने अपने आपको वर्णाश्रमके अन्तर्गत कोई अभावग्रस्त जीव मानकर जड़जगत्की अधिष्ठात्री महामायाकी आराधना की थी। इसलिये जहाँ 'योगमाया' और 'जड़माया'को एक ही करके 'मूड़ि और मिश्री'को एक ही भावमें चलानेका प्रयास करनेवालोंके जैसे 'समन्वयवाद'का प्रचार किया जाता है, वहाँ अज्ञानता, मूर्खता और भगवान्के स्वरूपकी उपलब्धिकी अभाव ही जानना होगा। दूसरा, इस जगत्में देखा जाता है, - 'किसीके काने पुत्रका नाम 'पद्मलोचन' (कमलनयन) होता है, किन्तु भगवान्के सम्बन्धमें ऐसा नहीं है। भगवान्के नाम और नामीमें कोई भेद नहीं है, भगवान्का कोई भी नाम निरर्थक अथवा भगवान्की वास्तविक सत्तासे अलग नहीं है। श्रीभगवान्के नाम बहुत प्रकारके हैं, जैसे परमात्मा, ब्रह्म, सृष्टिकर्त्ता, नारायण, रुक्मिणीरमण, गोपीनाथ, कृष्ण आदि। किन्तु जो भगवान्को 'सृष्टिकर्त्ता' कहकर पुकारेंगे, वे नारायणका रसास्वादन नहीं कर पायेंगे, क्योंकि 'सृष्टिकर्त्ता' आदि नामसमूह जगत्के बहिर्मुख जीवोंके द्वारा उनके प्राकृत ज्ञानके द्वारा दिये गये नाम हैं। 'सृष्टिकर्त्ता' कहनेसे भगवान्की परिपूर्ण सत्ताकी उपलब्धि नहीं होती, क्योंकि सृष्टिकार्य भगवान्की स्वरूप शक्तिका कार्य नहीं है, वह-उनकी बहिर्मुखी शक्तिका परिचायक है। और 'ब्रह्म' कहनेसे भगवान्के छह प्रकारके ऐश्वर्योंका परिचय नहीं पाया जाता; क्योंकि, भगवान्का निर्विशेष भाव ही 'ब्रह्म'के नामसे प्रसिद्ध है, इसलिये वह भगवान्के सम्पूर्ण सच्चिदानन्द विग्रहका द्योतक नाम नहीं है। 'परमात्मा' कहनेसे भी भगवान्का सम्पूर्ण परिचय नहीं होता, क्योंकि प्रत्येक जीवके हृदयमें अन्तर्यामीके रूपमें भगवान्का आंशिक परिचय ही 'परमात्मा'के नामसे प्रसिद्ध है। और, नारायणका भजन करनेवाले व्यक्ति भी श्रीकृष्णके माधुर्यकी उपलब्धि नहीं कर पाते। पुनः एक श्रीकृष्णमें ही माधुर्यके द्वारा नारायणके ऐश्वर्यको आच्छादित करके सम्पूर्ण परम-चमत्कारिताको विद्यमान देखकर श्रीकृष्णभक्त नारायणका भजन करनेकी स्पृहा नहीं करते, - गोपियाँ श्रीकृष्णको कभी भी 'रुक्मिणीरमण' कहकर सम्बोधन नहीं करतीं। 'रुक्मिणीरमण' और 'श्रीकृष्ण' जागतिक शब्दकोशके अनुसार प्रति-शब्द या समानार्थक-शब्द होनेपर भी, एकके स्थानपर दूसरा शब्द प्रयोग नहीं हो सकता। यदि मूर्खतावशतः कोई उन्हें एक ही समझकर व्यवहार करे, तो यह 'रसाभास'-दोष होता है। जिन्होंने भगवान्के स्वरूपकी उपलब्धि की है, वे अनजान लोगोंकी भाँति ऐसा रसाभास या सिद्धान्तका विरोध नहीं करते। किन्तु तो भी कलिकी प्रबलताके कारण उच्छ्र ही उदारता अथवा महासमन्वय-वादके नामसे एवं सत्-सिद्धान्त ही मूर्ख लोगोंके द्वारा सङ्कीर्णताके नामसे प्रचारित हो रहे हैं॥ 90 ॥ गोपियोंके प्रेमका ऋण श्रीकृष्ण चुका नहीं सकते :- श्रीमद्भागवत (10/32/22)- न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां स्वसाधुकृत्यं विबुधायुषापि वः। या माभजन् दुर्जय-गेहशृङ्खलाः संवृश्च्य तद्वः प्रतियातु साधुना ॥ 92 ॥ अनुवाद- हे प्यारी गोपियों! मेरे साथ तुम्हारा मिलन सर्वथा निर्दोष और निर्मल-निजसुखकी कामनाके लेशसे भी रहित विशुद्ध प्रेममय है। तुमने घर-गृहस्थीकी दुष्कर बेड़ियोंको तोड़कर तथा लोक-मर्यादाका उल्लङ्घनकर मेरा भजन किया है। मैं देवताओं जैसी लम्बी आयु प्राप्त करके भी तुम्हारे इस प्रेम, त्याग और सेवाका बिन्दुमात्र भी बदला चुकानेमें असमर्थ हूँ। तुम अपने सौम्य-स्वभावसे ही मुझे उऋण कर सकती हो, किन्तु मैं तो तुम्हारे प्रेमका सदा ऋणी ही हूँ और रहूँगा॥ 92 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 4/177-180 संख्या देखें॥ 90-92 ॥
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[ 8/90-92 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अमृताणुकणिका—"श्रीकृष्ण अन्यान्य रसोंके भक्तोंके भजनके अनुरूप प्रतिदान करनेमें समर्थ हैं, परन्तु वे ब्रजगोपियोंके प्रेमके अनुरूप प्रतिदान नहीं कर सके, इसलिये उनके ऋणी बन गये। भागवतके उपरोक्त श्लोकमें श्रीकृष्णने स्वयं इस बातको स्वीकार किया है। शरद पूर्णिमाकी रात्रिको श्रीकृष्ण और गोपियोंकी रास-क्रीड़ा हुई, उसमें अन्यान्य गोपियोंको सौभाग्य-मद और श्रीराधाको मान हो गया। यह देखकर श्रीकृष्णने सोचा कि इन परिस्थितियोंमें सुष्ठु रूपसे रास होना सम्भव नहीं है। अतः वे अन्य गोपियोंके सौभाग्य-मदको दूर करनेके लिये और श्रीराधाके मान-प्रसादन हेतु श्रीराधाको लेकर अन्तर्धान हो गये। फिर एकान्तमें श्रृङ्गार, वार्त्तालाप और विहार-विलास आदिके पश्चात् श्रीराधाको भी छोड़कर पुनः अन्तर्धान हो गये। सब गोपियोंने तीव्र विरह-वेदनायुक्त गोपीगीतका अत्यन्त करुण स्वरमें गान किया जिसे सुनकर श्रीकृष्ण अपने मन्मथ-मन्मथ रूपमें पुनः आविर्भूत हुए। गोपियोंने विचार किया—'अहो! प्रेमियोंके शिरोमणि होकर भी इन्होंने हम लोगोंकी ऐसी दुरावस्था की है, इसलिये इनका हमारे प्रति क्या भाव है, क्या यह प्रीतियुक्त है या उदासीन है अथवा द्रोहपूर्ण है?' इसे जाननेके लिये गोपियोंने उनसे तीन प्रश्न किये—हे कृष्ण, एक श्रेणीके लोग केवल प्रेम करनेवालोंसे प्रेम करते हैं, इसके विपरीत एक अन्य श्रेणीके लोग प्रेम न करनेवालोंसे भी प्रेम करते हैं, तथा कुछ लोग ऐसे होते हैं जो प्रेम करनेवाले और न करनेवाले—दोनोंसे ही प्रेम नहीं करते। हे प्रियतम, हम लोगोंके तीन प्रश्नोंका उत्तर यथार्थ रूपमें प्रदान करो। तुम इनमेंसे किसे अच्छा समझते हो?' श्रीकृष्णने कहा—'हे मेरी प्रिय सखियों, जो प्रेम करनेपर ही बदलेमें प्रेम करते हैं, वे प्रेमी नहीं व्यापार करनेवाले बनिये हैं। जो प्रेम नहीं करनेपर भी प्रेम करते हैं, वे करुणाशील व्यक्ति, गुरुजन और माता-पिता हैं। इस श्लोकमें श्रीकृष्णने ब्रजगोपियोंको सुमध्यमा कहकर सम्बोधित किया है। श्लेष भावसे वे यह कह रहे हैं कि 'तुम्हारी शोभा तुम्हारे इस मध्यम प्रश्नमें ही स्थापित है। इस सुशोभन मध्यवर्त्ती प्रश्नके उत्तरकी आधार तो तुम लोग ही हो। प्रेम न करनेवालोंसे भी प्रेम करना—यह गुण तुम लोगोंमें उज्ज्वल रूपसे प्रकाशित हो रहा है। जो लोग प्रीति करनेवालोंसे भी प्रीति नहीं करते, वे चार प्रकारके होते हैं—आत्माराम, आप्तकाम, अकृतज्ञ और गुरुद्रोही। आत्माराम अपनी आत्मामें ही रमणशील होनेके कारण स्वयंमें सम्पूर्ण होते हैं, आप्तकाम जन सभी कामनाएँ पूर्ण रहनेके कारण भोग-इच्छासे रहित होते हैं, अकृतज्ञ दूसरोंके द्वारा किये हुए उपकार आदिको स्मरण नहीं करते और गुरुद्रोही तो उपकारीके प्रति भी द्रोहका आचरण करते हैं।' यदि गोपियाँ कहें कि पहले और दूसरे प्रश्नके उत्तरके उदाहरण तुम नहीं हो, तुम तीसरी श्रेणीके अन्तर्गत दोषी हो। ऐसा कहकर वे एक-दूसरेको आँखोंके इशारेकर मुस्कुराने लगीं। तो श्रीकृष्ण कहने लगे—'हे सखियों, सुनो! क्या तुम मेरे मुखसे मेरी पराजय सुननेकी इच्छा कर रही हो? हे मन्द-मन्द मुस्कानके विलाससे युक्त कटाक्षकी नटन-चातुरीकी चूड़ामणि! तुम लोगोंको अपना दर्शनानन्द प्रदान करनेके कारण मैं गुरुद्रोही नहीं हूँ। हे गोपियों! तुम मेरी अत्यन्त प्रिया हो और मैं तुम्हारा परम प्रियतम हूँ। इसलिये तुम लोगोंके द्वारा मेरे प्रेममें दोष देखना उचित नहीं है। मैं तुम लोगोंका प्रेमालाप श्रवण करनेके लिये अन्तर्हित हो गया था। हे सखियों! मैं तो प्रेम करनेवालोंसे भी वैसा प्रेम नहीं करता जैसा करना चाहिये। मैं ऐसा इसलिये करता हूँ जिससे उनकी चित्तवृत्ति मुझमें लगी रहे। जैसे निर्धन व्यक्तिको कभी बहुत-सा धन मिल जाये और फिर वह खो जाय, तो उसका हृदय खोये हुए धनके चिन्तनमें निमग्न रहता है। वह भूख, प्यास आदि दूसरी वस्तुओंको भूल जाता है। उसी प्रकार मैं भी मिलकर छिप जाता हूँ, जिससे मेरा चिन्तन नित्य-निरन्तर बना रहे। हे प्रियाओं, मेरे 268 ।
आठवाँ अध्याय 8/90-93 ] मनमें सदैव जो बात उदित होती है, उसे सुनो। मेरे साथ तुम्हारा यह मिलन निर्मल और निर्दोष है। यह संयोग काममय प्रतीत होनेपर भी वस्तुतः निर्मल प्रेममय होनेके कारण पवित्र और निर्दोष है। इस मिलनकी यदि कोई निन्दा करता है, तो वह स्वयं निन्दनीय है, वह प्रेमका मर्म नहीं जानता।' गोपियोंका प्रेम और संयोग प्रेमका परिपक्व विलास है। इस प्रकार स्मृतिशास्त्रके द्वारा स्वीकृत कामादिका खण्डन हुआ है। श्रीकृष्णने आगे कहा, - 'हे गोपियों! तुम्हारे जो साधुकृत्य हैं, वे असाधारण हैं। मैं वैसा करनेमें समर्थ नहीं हूँ। मैं देवताओं जैसी परम आयु पाकर भी तुम्हारे साधुकृत्यका ऋण-शोधन करनेमें समर्थ नहीं हो पाऊँगा। तुम लोगोंने उचित-अनुचितकी विवेचना न कर लोकधर्मका त्याग किया है, धर्म-अधर्मका विचार न कर वेद-धर्मका विसर्जन किया है, अपने आत्मीय स्वजन, बन्धु-बान्धव सबका परित्यागकर मेरे पास आयी हो, अर्थात् तुम लोगोंने गृहस्थ धर्मकी शृङ्खलाओंमें पति, श्वसुर, पिता, भाई आदिके स्नेह-बन्धनको छिन्न-भिन्नकर मेरा भजन किया है, तुम मेरे प्रति एकनिष्ठ हुई हो। किन्तु मैंने माता-पिता, भाई, बन्धु, बान्धवों सभीके प्रति स्नेह-सम्बन्ध रखते हुए तुम्हारा भजन किया है। मेरा चित्त अनेक-अनेक भक्तोंके प्रति प्रेमयुक्त होनेके कारण बहु-निष्ठ है। किन्तु तुम्हारा चित्त मुझमें एकनिष्ठ है। इसका प्रतिदान करनेमें मैं सफल नहीं हो सकता, यह मेरे सामर्थ्यकी बात नहीं है। तुम लोगोंके सुशीलता गुणके द्वारा ही मैं ऋणमुक्त हो सकता हूँ; किन्तु वास्तवमें मैं तुम लोगोंका ऋणी ही रहना चाहता हूँ।' ब्रज-गोपियोंके भाव-विशेषका परम आश्चर्यपूर्ण माहात्म्य स्वयं श्रीभगवान् अपने मुखसे वर्णन कर रहे हैं। भगवान् गोपियोंके प्रेमसे पराजित हो गये। अपनी प्रतिज्ञापर कटिबद्ध न रहनेके कारण वे गोपियोंके प्रेमके ऋणी हो गये। यह श्रीभगवान्की परम-विनय उक्तिकी माधुरी ही है—ऐसा समझना होगा। श्रीसनातन गोस्वामीके अनुसार मूल श्लोकके 'स्वसाधुकृत्यं' पदका अर्थ है- 'मेरे प्रति तुम्हारा 'सु' अर्थात् सुष्ठु असाधुकृत्य रूप निष्ठुरताका भाव विद्यमान रहनेपर वे कार्य साधुकृत्य किस प्रकार होंगे? तुम लोग मुझसे कहती हो— 'तुम महाधूर्त्त हो! तुम्हारे मुखमें एक बात और मनमें दूसरी, तुम्हारे वचन मन्द-मन्द मुस्कानयुक्त होनेपर भी उनमें नारी-वधकी वासनाका गूढ़ विष रहता है। व्याध जिस प्रकार मधुर वंशीध्वनिके द्वारा हिरणीका चित्त आकर्षणकर फिर उसका वध करता है, तुम्हारी वंशीध्वनि भी उसी प्रकारसे ही मधुर है। तुमने जन्म लेते ही पूतनाका वध किया था, इसलिये जन्मसे ही नारीवध करना तुम्हारे जीवनका व्रत है। तुम महाचोर-चूड़ामणि हो। बाल अवस्थामें तुमने गोपियोंके घर-घरसे मक्खन चुराया, किशोर अवस्थामें तुमने कात्यायनी व्रत करनेवाली कुमारी गोपियोंके वस्त्रहरणके छलसे उनकी लज्जाका हरण किया तथा मर्यादा प्राप्त कुलस्त्रियोंके पातिव्रत्य धर्मका हरण किया। हे दुल्लीलशेखर ! हे कितवेन्द्र धूर्त्तराज ! आदि तुम्हारे ये कठोर वचनरूप महारससिन्धुकी तरङ्गमाला मेरे हृदयको उद्वेलित करती है। इसलिये इन वचनोंके द्वारा तुम्हारे साधुकृत्य किस प्रकार निष्पन्न होंगे?' वास्तवमें ब्रजगोपियोंके साथ निरन्तर क्रीड़ाके लोभसे ही श्रीकृष्ण ये चातुरीपूर्ण वचन कह रहे हैं।"—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 90-92 ॥ गोपियोंके मधुर-प्रेममें ही श्रीकृष्ण-माधुर्य-विलास प्रकटित :- यद्यपि सौन्दर्य कृष्ण-माधुर्यरे धुर्य। व्रजदेवीरे सङ्गे ताँर बाड़ये माधुर्य ॥ 93 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 93 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यद्यपि श्रीकृष्णका असमोध्वं सौन्दर्य ही श्रीकृष्ण-माधुर्यकी पराकाष्ठा है, तथापि ब्रजदेवियोंका सङ्ग होनेसे वह माधुर्य अनन्तगुणा वृद्धि प्राप्त करता है; इसलिये गोपीजन-वल्लभ-प्रेम ही सभी भक्तोंके लिये साध्यसार है। इसमें भक्तको जिस प्रकार । 269
[ 8/93-94 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (परिपूर्ण-माधुर्यमय) श्रीकृष्णकी प्राप्ति होती है, वैसी अन्य रसकी किसी अवस्थामें नहीं होती ॥ 93 ॥ गोपीके मध्य श्रीकृष्ण-जैसे मणिके बीचमें मरकत :- श्रीमद्भागवत (10/33/6)— तत्रातिशुशुभे ताभिर्भगवान् देवकीसुतः। मध्ये मणीनां हैमानां महामरकतो यथा ॥ 94 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 94 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-देवकीसुत भगवान् समस्त सौन्दर्यके सार होनेपर भी व्रजदेवियोंके साथ वे सोनेकी मणियोंके बीच महा-मरकतके समान अतिशय शोभायमान हुए थे॥ 94 ॥ अनुभाष्य-श्रीशुकदेवके द्वारा परीक्षितको रासलीला करनेवाली गोपियोंके बीचमें श्रीकृष्णके सौन्दर्यका वर्णन- तत्र (वृन्दावने रासमण्डले) हैमानां (सुवर्णखचितानां) मणीनां मध्ये महामरकतः यथा, [तथा इव] ताभिः (व्रजदेवीभिः) [वेष्टितः सन्] भगवान् देवकीसुतः अतिशुशुभे। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 94 ॥ अमृतानुकणिका- "श्रीकृष्णके प्रेमपूर्ण अत्यन्त मनोहर वचनोंको सुनकर गोपियोंका विरहसे उदित सन्ताप दूर हो गया। गोपियों और श्रीकृष्णके प्रश्नोत्तर समाप्त होनेपर गोपियोंका मान शान्त हुआ। तदनन्तर उस मनोहर यमुना पुलिनमें श्रीकृष्णने अपनी प्रीतिपरायण अनुरागी गोपियोंके साथ रासक्रीड़ा आरम्भ की। 'मध्ये मणीनां हेमानां महामरकत यथा'-उस रासमण्डलमें व्रजसुन्दरियोंके मध्य भगवान् श्रीकृष्ण इस प्रकार सुशोभित हो रहे थे जैसे स्वर्णमयी-मणियोंकी मालाके बीचमें ज्योतिर्मयी नीलमणि चमक रही हो। श्रीकृष्णका वर्ण इन्द्रनीलमणिके समान और गोपियोंका वर्ण स्वर्णके समान है। गोपियाँ गोलाकार मण्डलमें थीं, इसलिये उन्हें स्वर्ण मणियोंसे निर्मित हारकी उपमा दी है। गोपियोंकी स्वर्ण कान्तिसे मिलकर श्रीकृष्णकी कान्ति मरकत वर्णकी हुई। गोपियोंके आलिङ्गनसे उनके पीतवर्णसे श्रीकृष्णके श्यामल शरीरकी आभा कुछ ढक गयी, उसपर गोपियोंकी अङ्गकान्तिकी परछाईं पड़ने लगी और वे पीताभा लिये श्यामल वर्णके दिखने लगे। श्रीकृष्णकी शोभा अनेकों गुणा और बढ़ गयी - 'अति शुशुभे' अर्थात् अतुलनीय रूपसे शोभित हुए। वस्तुतः श्रीभगवान् प्रकाशभेदसे अनेकों होकर विराजमान हो रहे थे तथा रासमण्डलीके केन्द्रमें भी श्रीकृष्ण श्रीराधाके साथ वेणुवादनपूर्वक भ्रमण करते-करते विहार कर रहे थे। श्रीराधाकृष्ण युगलका यह प्रकाश सम्पूर्ण रासमण्डलीकी शोभाका अतिशय वर्धन कर रहा था। क्रमदीपिकाके अनुसार 'श्रीकृष्णने अपने दिव्यातिदिव्य विग्रहोंको अनेकों रूपोंमें प्रकाशित किया। दो-दो गोपियोंके मध्य एक-एक रूपमें प्रवेश करके अपनी दोनों भुजाओंको अपनी प्रेयसियोंके गलेमें डालकर विराजमान हुए।' प्रस्तुत श्लोकमें भगवान्को 'देवकीसुत' कहकर सम्बोधित किया है; विष्णुपुराणके अनुसार श्रीनन्द महाराजकी पत्नीके दो नाम हैं-एक यशोदा और दूसरा देवकी। अतः देवकीसुत कहनेसे यशोदानन्दन ही उपलक्षित होते हैं। देवकीसुत एकवचनमें है और गोपियाँ शतकोटि संख्यामें, तो क्या श्रीकृष्ण रासमण्डलमें एक थे या प्रत्येक गोपीके साथ एक-एक? इससे अगले श्लोकमें श्रीशुकदेव गोस्वामी वर्णन कर रहे हैं— 'गायन्त्यस्तं तडित इव ता मेघचक्रे विरेजुः ॥' अर्थात् 'गान करती हुई श्रीकृष्ण-प्रियाएँ मेघमें विद्युतकी भाँति सुशोभित हो रही थीं।' इसकी टीकामें श्रील श्रीधरस्वामी कहते हैं- 'तत्र नानामूर्तिः कृष्णो मेघचक्रमिव' अर्थात् 'श्रीकृष्ण नाना मूर्तियोंमें मेघचक्रकी भाँति प्रकाशित होने लगे।' पूर्ववर्त्ती श्लोक (10/33/3)में भी कहा गया है- 'रासोत्सवः सम्प्रवृत्तो गोपीमण्डलमण्डितः। योगेश्वरेण कृष्णेन तासां मध्ये द्वयोर्द्वयोः।' अर्थात् 'सम्पूर्ण योगके स्वामी भगवान् श्रीकृष्ण दो-दो गोपियोंके बीच प्रकट हो गये और उनके गलेमें अपनी बाहें डाल दीं।' इस प्रकार एक गोपी और एक कृष्ण-इस क्रमके कारण प्रत्येक गोपी ऐसा अनुभव कर रही थीं कि मेरे प्रियतम मेरे पास ही हैं। ऐसा समझकर गोपियाँ 270 ।
आठवाँ अध्याय 8/93-98 ] आनन्दसे ऐसी विह्वल हो गयीं कि वे यह न समझ सकीं कि श्रीकृष्ण उनके दोनों ओर विराजमान हैं। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं- 'श्रीकृष्ण गोपीमण्डलके मध्यमें विराजमान रहते हुए ऐसी तीव्र गतिसे नृत्य कर रहे थे कि एक परमाणु मात्र समयके भीतर ही मध्य-स्थलसे आकर मण्डलस्थ करोड़ों गोपियोंको नृत्य-सहित आलिङ्गन करते हुए पुनः मध्यस्थलमें उपस्थित हो जाते थे। श्रीकृष्णका यह तीव्र गतिसे नृत्य-सञ्चालन अलात-चक्रकी अपेक्षा भी अत्यन्त अधिक तीव्र सूचित हो रहा है, क्योंकि उन समस्त गोपियोंने श्रीकृष्णको अपने समीप ही अनुभव किया था।' इस प्रकारकी अद्भुत क्रियाके सम्पादनका विशेषण है- 'योगेश्वर'। श्रीकृष्ण दुर्घटन-घटन पटीयसी 'योगमाया'के अधीश्वर होनेके कारण 'योगेश्वर' हैं। समस्त गोपियाँ ही श्रीकृष्णके आलिङ्गनकी इच्छाका पोषण करती हैं और श्रीकृष्ण भी उनकी इच्छा पूर्ण करना चाहते हैं। इसलिये योगमायाने जितनी गोपियाँ थीं, उतनी संख्यामें श्रीकृष्णकी प्रकाशमूर्ति प्रकटितकर दोनों पक्षोंकी इच्छा पूर्ण की। ऐसा होनेपर भी श्रीकृष्ण जो प्रत्येक गोपीके निकट देखे जा रहे थे, वह उनकी नाट्य-विद्याका प्रभाव है। साथ ही श्रीकृष्ण श्रीवृषभानुनन्दिनीके साथ आलिङ्गित मध्य-स्थलमें भी सुशोभित हो रहे थे। ये सब क्रीड़ाएँ श्रीभगवान्की भगवत्ता-विशेषके द्वारा नहीं अपितु नृत्य-शक्तिके अपूर्व कौशलके कारण हुईं।"—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी॥ 93-94॥ (ग) गोपियोंका श्रीकृष्णप्रेम साध्यकी सीमा होनेपर भी महाप्रभुके द्वारा पुनः प्रश्न :- प्रभु कहे, - "एइ 'साध्यावधि' सुनिश्चय। कृपा करि' कह, यदि आगे किछु हय॥" 95॥ अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 95॥ अमृतप्रवाह भाष्य - यहाँ तकका सिद्धान्त श्रवण करके महाप्रभुने कहा, - "श्रीगोपीजनवल्लभ-प्रेम ही साध्यतत्त्वकी सीमा है, तथापि यदि और भी कुछ हो, उसे बोलो॥" 95॥ प्रश्नकर्त्ता महाप्रभुका 'असमोध्वैत्व'-रूपमें श्रीरायको ज्ञान :- राय कहे, - "इहार आगे पुछे हेन जने। एतदिन नाहि जानि, आछये भुवने ॥ 96॥ अनुवाद - श्रीराम call? श्रीरामानन्द रायने कहा,- “मैं अब तक नहीं जानता था कि इस त्रिभुवनमें ऐसा कोई व्यक्ति होगा, जो इसके भी आगे कुछ और पूछेगा ॥ 96 ॥ (घ) श्रीराधाका श्रीकृष्णप्रेम ही-साध्यशिरोमणि :- इँहार मध्ये राधार प्रेम-'साध्यशिरोमणि'। याँहार महिमा सर्वशास्त्रेते बाखानि ॥ 97 ॥ अनुवाद-इस कान्ताप्रेमके बीचमें तो बस श्रीराधाका प्रेम ही है, जो 'साध्यशिरोमणि' है और जिसकी महिमा सभी शास्त्रोंमें वर्णन की गयी है॥ 97॥ अमृतप्रवाह भाष्य-साधारण गोपियोंका जो श्रीकृष्णप्रेम है, उसमेंसे श्रीराधाजीका श्रीकृष्णप्रेम ही साध्य- शिरोमणि-तत्त्व है। साधारण जीवोंके लिये इस भाव (श्रीराधाजीके) जैसे भावको ग्रहण करनेका उपदेश नहीं है। किन्तु उस भावके अनुगत अर्थात् उसके अनुरूप श्रीकृष्णप्रेमके अति-उच्च भाव ग्रहण करनेकी जीवोंकी योग्यता सिद्धावस्थामें हो सकती है। साधनावस्थामें राधिकाकी सखी और उनकी परिचारिकाओं (दासियों)का भाव ही अनुसरणीय है। उद्धव-दर्शनसे राधिकाके जो भाव महाप्रभुमें लक्षित होते थे, वे भाव जीवोंके लिये साध्य नहीं है, किन्तु कुछ अन्य प्रकारसे अनुसरणीय हैं॥ 97॥ श्रीराधाके समान श्रीराधाकुण्ड भी श्रीकृष्णको प्रिय :- लघुभागवतामृत (2/45)में उद्धृत पद्मपुराण वाक्य- यथा राधा प्रिया विष्णोस्तस्याः कुण्डं प्रियं तथा। सर्वगोपीषु सैवैका विष्णोरत्यन्तवल्लभा ॥ 98 ॥ । 271
[ 8/97–99 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-श्रीराधिका जिस प्रकार श्रीकृष्णकी प्रिया हैं, राधाकुण्ड भी वैसे ही उनका प्रिय स्थान है। सभी गोपियोंमें श्रीराधा ही श्रीकृष्णकी अत्यन्त प्रिया हैं॥98॥ अनुभाष्य-आदिलीला 4/215 संख्या देखें ॥ 98 ॥ भागवतमें श्रीराधाको इङ्गित करना और उनका अद्वितीयत्व :- श्रीमद्भागवत (10/30/28)- अनयाराधितो नूनं भगवान् हरिरीश्वरः। यन्नो विहाय गोविन्दः प्रीतो यामनयद्रहः ॥ 99 ॥ अनुवाद-हे सखि ! हम लोगोंको परित्यागकर श्रीकृष्ण जिन गोपीको एकान्तमें ले गये हैं, उन्होंने अवश्य ही ईश्वर श्रीहरिकी अधिक रूपसे आराधना की होगी। इसका गूढ़ अर्थ यह है कि वे कृष्णकान्ताओंकी शिरोमणि हैं, इसलिये उनका नाम 'राधिका' हुआ है॥99॥ अनुभाष्य-आदिलीला 4/88 संख्या देखें ॥ 99 ॥ अमृतानुकणिका- "श्रीराय रामानन्दसे साध्य-तत्त्वकी सीमा कान्तप्रेमके विषयमें सुनकर महाप्रभुने आगे भी कुछ अधिक सुननेकी जिज्ञासा की; वास्तवमें वे श्रीराधाके प्रेमके विषयमें सुनना चाहते थे। श्रीरायने भी कहा कान्ताप्रेमके मध्य श्रीराधाप्रेम ही 'साध्य शिरोमणि' है, इसकी महिमा समस्त शास्त्रोंमें वर्णित है। क्रमदीपिका आदि आगम ग्रन्थोंमें ऐसा उल्लेख है कि 'व्रजमें सैंकड़ों कोटि प्रमदाएँ (प्रेम-मदसे परिपूर्ण) हैं' और इन सबमें श्रीराधा ही सब प्रकारसे सर्वश्रेष्ठा हैं। भगवान्की समस्त शक्तियोंमें 'ह्लादिनी' नामक जो सर्वश्रेष्ठ महाशक्ति है, श्रीराधा उस ह्लादिनीकी भी सार-स्वरूपा, महाभाव-स्वरूपा और अनन्त गुणशालिनी हैं। व्रजकी कोटि-कोटि गोपियोंके अनेक यूथ हैं। इन यूथेश्वरियाेंमें परस्पर चार भेद हैं-स्वपक्षा, विपक्षा, सुहृत्-पक्षा और तटस्था। श्रीराधाकी सखियाँ-ललिता, विशाखा आदि स्वपक्षा हैं, श्रीमती चन्द्रावली श्रीराधाकी विपक्षा हैं, श्यामला सखी सुहृत्-पक्षा हैं और भद्रा तटस्थ-पक्षा हैं। श्रीमती राधिका धीराधीरा मध्या, वाम स्वभावयुक्त, समस्त गोपियोंमें श्रीकृष्णकी सर्वाधिक प्रियतमा हैं। इसकी पुष्टि उपरोक्त श्लोकसे हो रही है-'यथा राधा प्रिया..।' वे सुरम्य अङ्गयुक्त सर्व-सुलक्षणशालिनी हैं; महामाधुरी, प्रेम-विदग्धता आदि गुणोंमें पराकाष्ठा प्राप्त हैं। जिस प्रकार नायकके सभी भेद और अवस्था श्रीकृष्णमें विद्यमान हैं, उसी प्रकार श्रीमती राधिकामें सभी नायिकाओंकी प्रायः सभी अवस्थाएँ विराजमान होती हैं। उनमें केवल स्वकीया और कन्यका अवस्था-भेद और कनिष्ठा भावभेद नहीं पाया जाता। वे समस्त प्रकारके भावोंकी रस-चमत्कारिता तथा अपूर्व प्रेम-विदग्धताके कारण श्रीकृष्णको अनन्त प्रकारसे रसास्वादन कराती हैं और अखिलरसामृतमूर्ति, 'रसो वै सः' को परितृप्त करनेमें कुशल और समर्था हैं। 'अनयाराधितो नूनं...'-वे श्रीराधा ही श्रीकृष्णकी सर्वश्रेष्ठ प्रियतमा हैं। यद्यपि श्रीशुकदेव गोस्वामीने कहीं भी प्रत्यक्ष रूपमें श्रीराधाका नाम उच्चारण नहीं किया है, किन्तु श्रीराधाकी कृपासे उनकी सौभाग्यरूपी दुन्दुभि बजानेके लिये उनके मुखचन्द्रसे श्रीराधिकाका नाम स्वयं ही निकल गया। रासलीलाके मध्य श्रीराधा यह देखकर मानिनी हो गईं थी कि श्रीकृष्ण सभी गोपियोंको समभावसे आदर और प्रेमालिङ्गन प्रदान कर रहे हैं, इसलिये वे रास छोड़कर चली गईं। श्रीराधाको न देखकर श्रीकृष्ण व्याकुल होकर उन्हें मनानेके लिये उनके पीछे-पीछे चले गये। श्रीकृष्णको अपने मध्य न देखकर गोपियाँ उनका अन्वेषण करने लगीं। भागवतमें केवल श्रीकृष्णके ही अन्तर्धान होनेका वर्णन है, उनके साथ किसी गोपीके जानेका स्पष्ट उल्लेख नहीं है। केवल श्लोक (10/30/11)में पहली बार गोपियाँ हिरणियोंसे जिज्ञासा करते हुए कह रही हैं-'अप्येणपत्त्युपगतः' अर्थात् हे हिरण पत्नियों ! कृष्ण क्या (अपनी) प्रियाके साथ यहाँ आये थे?' जिस समय श्रीराधिकाको लेकर कृष्ण सहसा अन्तर्हित हुए, उस समय स्वपक्षा सखियाँ 272 ।
आठवाँ अध्याय 8/97–99 ] श्रीराधाको नहीं देखकर समझ गई कि हमारी राधाको लेकर ही कृष्ण अन्तर्धान हुए हैं। अतः वे युगलको ढूँढनेमें व्यग्र हो गईं। किन्तु जो गोपियाँ इस रहस्यको नहीं समझ पायीं, वे श्रीकृष्णको ही खोजनेमें ही तत्पर थीं। खोजते-खोजते उन्होंने श्रीकृष्णके चरण-चिह्न देखे, कुछ आगे बढ़नेपर श्रीकृष्णके चरण-चिह्नोंके मध्य छोटे आकारवाले किसी रमणीके पद-चिह्नोंको भी देखा। स्वपक्षा सखियाँ अन्तरङ्गा होनेके कारण उन चरण-चिह्नोंको पहचान गईं, परन्तु गम्भीरताके साथ चुप रहीं। विपक्षा चन्द्रावली आदि दुःखसे अधीर होनेके कारण कुछ बोल नहीं सकीं। तटस्था गोपियोंने इसका विचार नहीं किया कि श्रीकृष्णके चरण-चिह्नोंके साथ किसी रमणीके भी चरण-चिह्न हैं, वे भी चुप रहीं। प्रस्तुत श्लोक श्रीराधाकी सुहृत्-पक्षा गोपियोंके द्वारा उच्चारित हुआ है। उनके कहनेका भाव है—'गोविन्द इस रमणीके साथ रमण करनेके लिये उसे अपने अङ्कमें वहन करके ले गये हैं। एक निकुञ्जसे दूसरेमें प्रवेश करते हुए विलास कर रहे हैं। उन्होंने पुष्पोंका चयन करके इस शृङ्गार-वटमें उस कान्ताका केश-प्रसाधन किया।' उधर वनप्रदेशमें चलते-चलते श्रीराधाने कहा—'बहुत चलनेके कारण मैं थक गई हूँ, अब चल नहीं पा रही हूँ।' श्रीकृष्ण बोले—'अन्य सब गोपियाँ यहींपर आनेवाली हैं। तब हमारे निर्जन विहारमें बाधा पड़ जायेगी।' श्रीराधाने कहा—'मुझे पहलेकी भाँति उठाकर ले चलो।' श्रीकृष्णने कहा—'प्रिये! क्या तुम्हें किसी निभृत निकुञ्जमें पुष्पोंकी शय्यापर ले चलूँ?' श्रीराधाने कहा—'जहाँ तुम्हारा मन चाहे वहाँ ले चलो।' श्रीकृष्ण बोले—'अच्छा प्रिये, तुम मेरे कन्धेपर चढ़ जाओ।' यह सुनकर जैसे ही वे श्रीकृष्णके कन्धेपर चढ़ने लगीं, उसी क्षण श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गये और श्रीराधा निरन्तर विलाप करने लगीं—'हा नाथ! हा रमण! हा प्रेष्ठ! हा महाभुज ! तुम कहाँ हो? कहाँ हो?' इसके पश्चात् श्रीराधामें और विलाप करनेकी शक्ति भी नहीं रही और वे विरहमें मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़ीं। श्रीकृष्णको खोजते हुए अन्य गोपियाँ वहीं आ पहुँचीं। उन्होंने विद्युतके समान उज्ज्वल कान्तियुक्त उस सखीको भूमिपर पड़ा देखा। सखियाँ उच्च स्वरसे रोते-रोते यत्नपूर्वक पंखा झलकर सेवाके द्वारा श्रीराधाको सचेत करनेकी चेष्टा करने लगीं। श्रीकृष्ण श्रीराधाको लेकर आये, उनका शृङ्गार किया, अन्तमें उन्हें भी छोड़कर इसलिये चले गये कि उन्होंने विचार किया—'राधाने मेरे साथ विलासरसमें आपेसे बाहर होकर नायिकाके स्वधर्म वाम्यता और लज्जाका विसर्जन कर दिया है। सुनायिकाएँ कभी भी नायकको पुष्प-शय्यापर ले जानेकी सम्मति प्रदान नहीं करतीं। यदि राधिकाने वाम्य-रूप स्वधर्मका परित्यागकर दिया, तब मुझे भी नायकके कान्ताको अनुगमन करनेके दाक्षिण-भावको त्यागकर वाम्य-भावको ग्रहण करना चाहिये, अन्यथा यह रसजनक नहीं होगा। दोनों ही वाम्य अथवा दाक्षिण हों, तो मिलन सुरस नहीं होता। इसके अतिरिक्त गोपियोंने राधामें केवल मेरे मिलन-जनित सौभाग्यका दर्शन किया है, जब वे राधाकी तीव्र विरहमें उदित होनेवाली असाधारण दशाको भी देखेंगी कि राधाका विरह-दुःख दावानलके समान है और उनका विरह-दुःख एक दीप-शिखाके समान; तब वे राधाके आनुगत्यको स्वीकार करेंगी। साथ ही इसके द्वारा अन्य सभी गोपियोंकी ईर्ष्या भी दूर हो जायेगी और सभीमें एक मतका स्थापन होगा।' श्रीकृष्ण एक कार्यके द्वारा अनेक कार्य सम्पादन करते हैं, यह उनकी परम चातुरी है। पक्षान्तरमें श्रीकृष्णका विचार है—'मेरे द्वारा दिये गये विरहमें राधाको देखकर सभी गोपियोंकी एक जैसी विरह-दशा हो जायेगी तथा सभीका चित्त एक भावसे मुझमें निविष्ट हो जायेगा। इस प्रकार रासलीला भी सार्थक होगी।'”—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 97–99 ॥ । 273
[ 8/100-106 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला महाप्रभुका उल्लास और श्रीरायकी प्रशंसा करना :- प्रभु कहे,–“आगे कह, शुनिते पाइ सुखे। अपूर्वामृत-नदी बहे तोमार मुखे ॥ 100 ॥ अद्वितीया श्रीराधाके प्रति श्रीकृष्णका निरपेक्ष प्रेम :- चुरि करि' राधाके निल गोपीगणेर डरे। अन्यापेक्षा हैले प्रेमेर गाढ़ता ना स्फुरे ॥ 101 ॥ श्रीराधामें श्रीकृष्णका एकनिष्ठ प्रेम :- राधा लागि' गोपीरे यदि साक्षात् करे त्याग। तबे जानि,–राधाय कृष्णेर गाढ़-अनुराग ॥"102 ॥ अनुवाद-इस श्लोकको सुनकर महाप्रभु गद्गद हो उठे और कहने लगे,–“आगे और कहो राय, मुझे यह सुनकर बड़ा सुख प्राप्त हो रहा है। तुम्हारे मुखसे अद्भुत, अनुपम, अमृतकी चमत्कारपूर्ण नदी प्रवाहित हो रही है। श्रीकृष्ण अन्य गोपियोंके भयसे श्रीराधाको चोरी करके ले गये। जहाँ अन्यापेक्षा है अर्थात् वे दूसरी गोपियोंसे भी प्रेम करते हैं, वहाँ श्रीराधाके प्रेमकी प्रगाढ़ता दूसरी गोपियोंसे अधिक प्रमाणित नहीं होती। यदि श्रीकृष्ण समस्त गोपियोंके सम्मुख ही उन सबका परित्यागकर श्रीराधाको अपने साथ ले जाते, तो समझा जा सकता है कि श्रीकृष्णका श्रीराधाजीके प्रति सर्वाधिक दृढ़ अनुराग था ॥ 100-102 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-रासलीलामें श्रीकृष्णने देखा, - अन्य समस्त गोपियोंके साथ विराजमान राधिकाके साथ निरपेक्ष प्रेम नहीं हुआ, अन्य गोपियोंकी अपेक्षाके कारण प्रेमकी अति गाढ़ स्फूर्त्ति नहीं हुई, इसी कारण श्रीकृष्ण गोपियोंके भयसे राधिकाको रासस्थलीसे चोरी करके अन्य गोपियोंसे अलग होकर वहाँसे चले गये। “कंसारिरपि” श्लोक (संख्या 105) यहाँ पर उदाहरणीय है ॥ 101-102 ॥ श्रीराधामें श्रीकृष्णकी प्रीतिका निरुपमत्व :- राय कहे,–“तबे शुन प्रेमेर महिमा। त्रिजगते राधा-प्रेमेर नाहिक उपमा ॥ 103 ॥ सेवककी सेवा ग्रहण करनेके लिये उसके दर्शन न होनेसे सेव्यका विलाप :- गोपीगणेर रास-नृत्य-मण्डली छाड़िया। राधा चाहि' वने फिरे विलाप करिया ॥ 104 ॥ अनुवाद-श्रीरायने कहा,-“तब राधाप्रेमकी महिमाको सुनो। तीनों लोकोंमें श्रीमती राधारानीके प्रेमकी कोई उपमा नहीं है। श्रीराधाके मान करके रास छोड़ जानेपर श्रीकृष्ण गोपियोंकी रास-नृत्य-मण्डलीको छोड़कर श्रीराधाको खोजनेके लिये विलाप करते हुए वनमें घूमने लगे ॥ 103-104 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीराधिका रासमण्डलीमें गोपियोंकी साधारण प्रेम-सुलभ ममताको देखकर कौटिल्यवामतासे युक्त होकर रासमण्डलीको छोड़कर चली गयीं। श्रीकृष्णकी इच्छा थी कि श्रीमती रासलीलाके रसकी पुष्टि करें, किन्तु उनके भावमें श्रीकृष्ण खिन्न होकर विलाप करते-करते श्रीमतीको ढूँढ़नेके लिये वनमें घूमने लगे ॥ 104 ॥ श्रीराधा ही श्रीकृष्णप्रीति-सेवाकी मूर्ति :- श्रीगीतगोविन्द (3/1)- कंसारिरपि संसारवासनाबद्धशृङ्खलाम्। राधामाधाय हृदये तत्याज व्रजसुन्दरीः ॥ 105 ॥ अनुवाद-कंसारि (श्रीकृष्ण) ने सम्पूर्ण साररूप रासलीलाकी वासनाके बन्धनको दृढ़ करनेवाली शृङ्खलारूपी रासक्रीड़ाकी परमाश्रया श्रीराधाको हृदयमें पूर्णरूपसे धारण करके अन्य सभी गोपियोंको त्याग दिया ॥ 105 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 4/219 संख्या देखें ॥ 105 ॥ श्रीगीतगोविन्द (3/2)- इतस्ततस्तामनुसृत्य राधिकामनङ्ग- बाणव्रण-खिन्नमानसः । कृतानुतापः स कलिन्दनन्दिनी- तटान्तकुञ्जे विषसाद माधवः ॥ 106 ॥ 274 ।
आठवाँ अध्याय 8/102-107 ] अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥106॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अनङ्ग बाणोंसे जर्जरित खिन्न मनसे अपने द्वारा किये गये कार्यके लिये अनुताप करते हुए, माधव कलिन्दनन्दिनी (यमुना)के तटपर स्थित वनमें इधर-उधर राधिकाको ढूँढ़नेपर भी प्राप्त नहीं कर पानेपर कुञ्जमें प्रवेश करके विषाद करने लगे॥106॥ अनुभाष्य— अनङ्गबाणव्रणखिन्नमानसः (कामशरव्रणेन खिन्नं मानसं यस्य सः) माधवः इतस्ततः तां राधिकाम् अनुसृत्य (अन्विष्य) कृतानुतापः (कृतः अनुष्ठितः अनु पश्चात् तापो येन सः राधिकानादर-रूप-निजाचरितकर्मजन्य-शोकवशः सन्) कलिन्दनन्दिनी तटान्त-कुञ्जे (यमुना तटप्रान्तस्थकुञ्जे) विषसाद (विषण्णः अभूत्)। श्लोक-भावानुवाद—कामबाणोंसे जर्जरित अपने द्वारा किये गये श्रीराधिकाका अनादर रूप कार्यके लिये शोकाकुल होकर माधव इधर-उधर श्रीराधिकाको ढूँढ़नेपर भी नहीं प्राप्त कर पानेपर यमुना तटपर स्थित कुञ्जमें प्रवेश करके विषाद करने लगे॥106॥ अमृतानुकणिका—'वासन्ती रासलीलाके मध्य श्रीराधाने देखा श्रीकृष्ण समस्त गोपाङ्गनाओंके साथ समान स्नेह करते हुए विहार कर रहे हैं। अपने प्रति विशिष्ट स्नेह प्रदर्शित नहीं होनेके कारण वे प्रणय-कोपके आवेशमें अन्यत्र एक कुञ्जमें जाकर छिप गयीं। श्रीकृष्ण श्रीराधाको न देखकर विषादयुक्त हो गये। यद्यपि वहाँ अनेकों व्रजसुन्दरियाँ उपस्थित थीं, किन्तु वे उनके प्रति उदासीन हो गये। वे सोचने लगे—'मुझे अनेकों गोपियोंके मध्य विलास करते देख, राधा मान करके चली गयी। अपनेको अपराधी समझकर मैं उसे रोकनेका साहस भी न कर सका। उसने अपने आपको अनादृत और उपेक्षित समझा, किन्तु वही मेरे हृदयमें प्रेयसीके रूपमें विराजमान है। विरह-तापमें वह न जाने क्या करती होगी, न जाने क्या कहेगी? राधाके विरहमें मुझे धन, जन, गोधन और गृह-सम्पदा आदि सब कुछ तुच्छ प्रतीत होता है। मैं जब उससे मिलूँगा, तब न जाने वह कोप तथा ईर्ष्याकी अभिव्यक्ति कैसे करेगी? निर्दयी, निष्ठुर कहकर मुझपर अभियोग लगायेगी, न जाने क्या-क्या कहेगी? यदि मैं जानता कि राधे तुम कहाँ गयी हो, तो तुम्हारा पाद-स्पर्श करके तुम्हें मना लेता, तुमसे क्षमा माँग लेता।' इस प्रकार अनुतापयुक्त होकर श्रीकृष्ण श्रीराधाका इधर-उधर अन्वेषण करने लगे और फिर उनके कहीं भी न मिलनेपर विषादयुक्त हो गये। (इस रासमें श्रीकृष्ण उसी प्रकार श्रीराधाको खोज रहे हैं, जिस प्रकार विरह-व्याकुल होकर शारदीय रासमें गोपियोंने उन्हें खोज रहीं थी।) अनङ्ग-बाणसे जर्जरित उनका हृदय श्रीराधाके लिये अत्यन्त आकुल-व्याकुल हो गया; मनमें श्रीराधाकी स्फूर्त्ति होने लगी—'हे राधे! मुझे दर्शन दो। मैं तुम्हारा अतिप्रिय हूँ। तुम मेरी आँखोंसे ओझल मत होओ। तुम्हारे विरहमें मैं काम-तापसे झुलस रहा हूँ, मुझे दर्शन दो। मुझमें विरह-व्याधिकी यातना बढ़ती जा रही है।' 'कंसारि'—अर्थात् श्रीकृष्ण जो कंसको परास्त करनेमें समर्थ हैं, किन्तु श्रीराधाके प्रेमके द्वारा परास्त हो जाते हैं। 'संसारवासनाबद्धशृङ्खला'—यहाँ संसार शब्द आनन्दमय, भावमय मधुररसका वाचक है। मधुररसमें सतत रहनेवाली वासना ही संसार-वासना है। श्रीकृष्णको अपने वशमें बनाये रखनेके कारण रासमें श्रीराधा ही शृङ्खला हैं। जब कोई विवेकी पुरुष तारतम्यके द्वारा किसी वस्तुकी सर्वश्रेष्ठताको जान लेता है, तब वह अन्य वस्तुओंका परित्याग कर देता है। उसी प्रकार श्रीराधाकी सर्वश्रेष्ठता अनुभव करके श्रीकृष्णने अन्यान्य गोपियोंका परित्याग कर दिया।"—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी॥102-106॥ उपरोक्त दोनों श्लोकोंका विचार :— एइ दुइ श्लोकेर अर्थ विचारिले जानि। विचारिते उठे येन अमृतेर खनि॥107॥ अनुवाद—इन दोनों श्लोकोंके अर्थका विचार । 275
[ 8/107-115 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला करनेपर ही जाना जा सकता है कि श्रीराधाप्रेम तो अमृतकी खान है ॥ 107 ॥ रासका वर्णन :- शतकोटि गोपी-सङ्गे रास-विलास। तार मध्ये एक-मूर्त्ये रहे राधा-पाश ॥ 108 ॥ श्रीराधिकाके श्रीकृष्णप्रेममें वामता-भावकी प्रधानता :- साधारण-प्रेम देखि' सर्वत्र 'समता'। राधार कुटिल-प्रेम हइल 'वामता' ॥ 109 ॥ अनुवाद—सौ-करोड़ गोपियोंके साथ रास-विलास करते समय श्रीकृष्ण जिस प्रकार अपनी एक-एक मूर्तिसे प्रत्येक गोपीके साथ विराज रहे थे, उसी प्रकार उनमेंसे एक श्रीकृष्णमूर्ति श्रीराधाके पास भी विद्यमान थी। अपने प्रति श्रीकृष्णका दूसरी गोपियोंके समान साधारण प्रेम देखकर श्रीराधामें वाम्य-भाव उत्पन्न हो गया, क्योंकि प्रेमका स्वभाव ही कुटिल होता है॥ 108-109 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—रासमण्डलमें दो-दो गोपियोंके बीच एक मूर्ति श्रीकृष्ण एवं श्रीराधिकाके पार्श्वमें एक मूर्ति श्रीकृष्ण—इस प्रकारसे प्रकाशित हुए थे। श्रीराधिकाने उसमें अपने कुटिल-प्रेमकी 'वामता' प्रकाशित की ॥ 109 ॥ श्रीकृष्णप्रेमका कौटिल्य :- उज्ज्वलनीलमणिके शृङ्गारभेद-कथनमें (102)— अहेरिव गतिः प्रेम्णः स्वभावकुटिला भवेत्। अतो हेतोरहेतोश्च यूनोर्मान उदञ्चति ॥ 110 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 110 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—(उज्ज्वलनीलमणिमें कहा गया है)—सर्पके समान प्रेमकी भी स्वाभाविक कुटिल गति होती है; इसी कारणसे युवक और युवतीमें 'अहेतु' (बिना किसी कारणसे) और 'सहेतु' (किसी कारणसे)—इन दो प्रकारका मान उदित होता है ॥ 110 ॥ अनुभाष्य— अहेः (सर्पस्य) इव प्रेम्णः गतिः स्वभावकुटिला (निसर्गतः वक्रा) भवेत्; अतः (अस्मात् कारणात्) हेतोः (कारणोदयात्) अहेतोः च (कारणाभावदपि) यूनोः (कान्ताकान्तयोः) मानः उदञ्चति (उदेति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 110 ॥ श्रीराधाके रास परित्यागसे श्रीकृष्णका उनको ढूँढ़ना :- क्रोध करि' रास छाड़ि' गेला मान करि'। ताँरे ना देखिया व्याकुल हैल हरि ॥ 111 ॥ सम्यक् वासना कृष्णेर, इच्छा रासलीला। रासलीला-वासनाते राधिका शृङ्खला ॥ 112 ॥ ताँहा बिना रासलीला नाहि ताँर चित्ते। मण्डली छाड़िया गेला राधा अन्वेषिते ॥ 113 ॥ इतस्ततः भ्रमि' काँहा राधा ना पाञा। विषाद करेन कामबाणे खिन्न हञा ॥ 114 ॥ श्रीकृष्णकामपूर्त्ति-विग्रह श्रीराधाका असमोर्ध्वत्व :- शतकोटि-गोपीते नहे काम-निर्वापण। ताहातेइ अनुमानि श्रीराधिकार गुण ॥” 115 ॥ अनुवाद—राधाजीको सहेतुक मान हो गया और वे मान करके रासमण्डली छोड़कर चली गयीं। श्रीहरिने जब उन्हें रासस्थलीमें नहीं देखा, तो वे व्याकुल हो उठे। रासलीला ही श्रीकृष्णकी सम्पूर्णरूपसे सारभूता इच्छा है अर्थात् प्रधान-वासना है। रासलीलाकी वासनाको आबद्ध करनेके लिये राधाजी ही प्रधान शृङ्खला हैं। श्रीराधाके बिना रासलीलामें श्रीकृष्णका चित्त नहीं लगता, इसलिये वे रासमण्डलीको छोड़कर श्रीराधाको ढूँढ़ने चले गये। इधर-उधर भ्रमण करनेपर भी जब श्रीराधा नहीं मिली, तो श्रीकृष्ण कामबाणसे खिन्न होकर विषाद करने लगे। रासस्थलीमें शतकोटि गोपियाँ भी श्रीकृष्णके कामकी पूर्ति नहीं कर सकीं, इससे ही राधाजीके गुणोंका अनुमान लगाया जा सकता है॥” 111-115 ॥ अनुभाष्य—इसी अध्यायकी 104 संख्याका अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 112-113 ॥ 276 ।
आठवाँ अध्याय 8/97-126 ] आदिलाला 4/68-97 और 122-143, 214-219, 239-262 संख्या देखें॥ 97-115 ॥ वक्ता श्रीरायके समक्ष श्रोतारूपी महाप्रभुका शिष्यत्व अभिमान :- प्रभु कहे,—“ये लागि' आइलाम तोमा-स्थाने। सेइ सब तत्त्ववस्तु हैल मोर ज्ञाने ॥ 116 ॥ अब महाप्रभुका श्रीकृष्णभजन-क्रमका श्रवण :- एबे जानिलुँ साध्य-साधन-निर्णय। आगे आर आछे किछु, शुनिते मन हय ॥ 117 ॥ अनुवाद—महाप्रभु बोले,-“राय! जिस कार्यके लिये मैं आपके पास आया था, उन सभी तत्त्व-वस्तुओंका ज्ञान मुझे आपसे प्राप्त हो गया। अब मैंने साध्य-साधन तत्त्वका निर्णय जान लिया। तथापि मुझे लगता है कि इससे भी आगे कुछ है, और उसे सुननेकी मेरे मनमें इच्छा है॥ 116-117 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 8/1 श्लोक देखें। 'साध्य-साधन-निर्णय'के पाठान्तरमें- 'सेव्य-साधन-निर्णय' ॥ 116-117 ॥ महाप्रभुका (1) श्रीकृष्ण, (2) श्रीराधा, (3) रस और (4) प्रेमके स्वरूप-तत्त्वका वर्णन करनेके लिये श्रीरायसे अनुरोध :- 'कृष्णेर-स्वरूप' कह 'राधार स्वरूप'। 'रस' - कोन् तत्त्व, 'प्रेम' - कोन् तत्त्वरूप ॥ 118 ॥ कृपा करि' एइ तत्त्व कह त' आमारे। तोमा-बिना केह इहा निरूपिते नारे ॥” 119॥ अनुवाद—श्रीकृष्णका स्वरूप क्या है? इसे बताइये, श्रीराधाजीका स्वरूप भी कहिये, रसतत्त्व क्या है और प्रेमतत्त्वका स्वरूप क्या है? कृपा करके इन सब तत्त्वोंको मुझे बतलाइये, आपके अतिरिक्त इन तत्त्वोंका कोई भी निरूपण नहीं कर सकता॥”118-119 ॥ श्रीरायका अपनेको 'यन्त्र' और महाप्रभुको 'यन्त्री'-ज्ञान :- राय कहे, —“इहा आमि किछुइ ना जानि। तुमि येइ कहाओ, सेइ कहि वाणी ॥ 120 ॥ तोमार शिक्षाय पड़ि येन शुक-पाठ। साक्षात् ईश्वर तुमि, के बुझे तोमार नाट ॥ 121 ॥ हृदये प्रेरण कर, जिह्वाय कहाओ वाणी। कि कहिये भाल-मन्द, किछुइ ना जानि ॥”122 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा, —“मैं इस विषयमें कुछ भी नहीं जानता हूँ। आप मुझसे जो कहलवाते हैं, मैं वही कह रहा हूँ। तोतेकी भाँति आपके द्वारा सिखाये गये विषयोंका ही पाठ कर रहा हूँ। आप तो साक्षात् ईश्वर हैं, आपके नाटकको भला कौन जान सकता है? भला है या बुरा है- मैं कुछ भी नहीं जानता, अन्तर्यामी रूपसे आप हृदयमें जो प्रेरणा करते हो, जिह्वासे उसी वाणीको कहलवा देते हो॥ 120-122 ॥ अपनेको 'श्रीकृष्ण-विमुख' और 'दीन' बतलाकर महाप्रभुके द्वारा श्रीरायको छलनेकी चेष्टा :- प्रभु कहे,-“मायावादी आमि त' संन्यासी। भक्तितत्त्व नाहि जानि, मायावादे भासि ॥ 123 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, —“मैं तो मायावादी संन्यासी हूँ। भक्तितत्त्वको मैं कैसे समझ सकता हूँ? मैं तो सदैव मायावादमें ही डूबा रहता हूँ ॥ 123 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीसार्वभौम और श्रीरामानन्दके वैशिष्ट्य और तारतम्यका वर्णन; श्रीसार्वभौम-ब्राह्मण और मुक्तिदाता; श्रीरामानन्द- श्रीकृष्ण-तत्त्वज्ञ और कीर्तनकारी आचार्य अथवा वैष्णव :- सार्वभौम-सङ्गे मोर मन निर्मल हइल। 'कृष्णभक्ति-तत्त्व कह', ताँहारे पुछिल ॥ 124 ॥ तँहो कहे,—'आमि नाहि जानि कृष्णकथा। सबे रामानन्द जाने, तँहो नाहि एथा ॥' 125 ॥ 'वञ्चक'-लीलाभिनयकारी वैष्णव :- तोमार ठाञि आइलाङ तोमार महिमा शुनिया। तुमि मोरे स्तुति कर 'संन्यासी' जानिया ॥ 126 ॥ अनुवाद- श्रीसार्वभौमके सङ्गसे मेरा मन निर्मल हुआ था, इसलिये मैंने उनसे कृष्णभक्तितत्त्वके विषयमें । 277
[ 8/124–127 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला पूछा था। किन्तु उन्होंने कहा, —'मैं श्रीकृष्णकथा नहीं जानता हूँ, रामानन्दराय ही इस विषयमें सब कुछ जानते हैं, परन्तु वे इस समय यहाँ नहीं हैं।' आपकी महिमा सुनकर मैं आपके पास आया हूँ और आप मुझे संन्यासी जानकर मेरी ही स्तुति कर रहे हैं॥ 124–126॥ अनुवाद—चाहे ब्राह्मण हों या संन्यासी हों, अथवा शूद्र ही क्यों न हों, जो कृष्णतत्त्वको जाननेवाले हैं, वे ही वास्तवमें गुरु हैं॥ 127॥ अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभुने कहा, —“मैंने ब्राह्मण घरमें जन्म ग्रहण करके संन्यास ग्रहण किया है। इसलिये शूद्र व्यक्तिसे धर्मकी शिक्षा ग्रहण करना मेरे लिये अनुचित है, ऐसा मत सोचना। क्योंकि वर्णाश्रमरूपी धर्मशिक्षा और दीक्षामें ही ब्राह्मण-गुरुकी आवश्यकता होती है। किन्तु 'श्रीकृष्णतत्त्व-ज्ञान' सभी जीवोंका परमार्थ है। इस तत्त्वज्ञानके गुरु होनेके अधिकारके विचारमें केवलमात्र यही सिद्धान्त है—ब्राह्मण ही हो अथवा शूद्रजातिका ही हो, गृहस्थ ही हो अथवा संन्यासी ही हो, श्रीकृष्णतत्त्वको जाननेवाला ही 'गुरु' हो सकता है। श्रीहरिभक्तिविलासमें जो यह कहा गया है कि उच्चवर्णमें योग्य पुरुषके होनेपर, हीनवर्णके व्यक्तिसे श्रीकृष्णमन्त्र लेना उचित नहीं है—वह लोक-अपेक्षा रखनेवाले वैष्णवोंके लिये है। अर्थात् जो संसारमें प्रचलित-विधिके मतानुसार उसमें थोड़ा-बहुत परमार्थको भी जोड़ना चाहते हैं, उनके लिये ही यह विधि है। परन्तु जो वैधी और रागानुगा भक्तिके तात्पर्यको जानकर विशुद्ध श्रीकृष्णभक्ति प्राप्त करनेकी इच्छा करते हैं, उनके लिये उपयुक्त श्रीकृष्णतत्त्व-वेत्ता जिस-किसी भी वर्ण अथवा जिस-किसी भी आश्रममें क्यों न पाया जाय, उन्हींको ही 'गुरु'के रूपमें वरण करना ही विधि है। श्रीहरिभक्तिविलासमें उद्धृत पद्मपुराणके वचन— अनुभाष्य—अप्राकृत श्रीकृष्णप्रेमधनमें धनी गुरु-वैष्णवोंके लिये सांसारिक-सम्पत्तिका मूल्य अत्यन्त तुच्छ होता है। इसलिये गुरु-वैष्णवोंके पास अपने वास्तविक कल्याणके लिये शिष्य बननेके लिये आये व्यक्तिको इन सब लौकिक वस्तुओंके अभिमानको कभी भी प्रदर्शित नहीं करना चाहिये। जन्म, ऐश्वर्य, ज्ञान या बुद्धि और सौन्दर्यका अभिमान रखते हुए यदि कोई व्यक्ति वास्तवमें शरणागति, विनम्र जिज्ञासा और सेवाभावके बिना गुरु-वैष्णवोंके निकट आता है, तो वैष्णव भी उसको उसके द्वारा वाञ्छित बाहरी सम्मान देकर विदा कर देते हैं। वे उसे अब्राह्मण अथवा शूद्र समझकर कभी भी दिव्यज्ञान अर्थात् अप्राकृत श्रीकृष्णके सम्बन्धकी अनुभूति प्रदान नहीं करते। इसके फलस्वरूप वह व्यक्ति परमार्थ मार्गसे वञ्चित होकर नरकके पथपर ही अग्रसर होता है। श्रीगौरसुन्दर सांसारिक लोगोंकी दृष्टिमें वर्णाश्रम धर्मकी सर्वोत्कृष्ट अवस्था (ब्राह्मणवर्ण और संन्यासाश्रम) में स्थित थे। और श्रीरामानन्द उनकी अपेक्षा नीची अवस्था (शूद्रवर्ण और गृहस्थाश्रम) में थे। तो भी श्रीरामानन्दके सामने दीनता दिखलाते हुए महाप्रभुने कलिके प्रभावसे ग्रस्त, सांसारिक ज्ञानको ही सब कुछ समझनेवाले अज्ञानी जीवोंको अभिमानयुक्त दुर्बुद्धिसे सतर्क करनेके लिये जगद्गुरु आचार्यके रूपमें शिक्षा प्रदान की है॥ 126॥ “न शूद्रा भगवद्भक्तास्तेऽपि भागवतोत्तमाः। सर्ववर्णेषु ते शूद्रा ये न भक्ता जनार्दने। षट्कर्मनिपुणो विप्रो मन्त्रतन्त्र-विशारदः। अवैष्णवो गुरुर्न स्याद्वैष्णवः श्वपचो गुरुः॥ महाकुल-प्रसूतोऽपि सर्वयज्ञेषुः दीक्षितः। सहस्रशाखाध्यायी च न गुरुः स्यादवैष्णवः॥ विप्रक्षत्रियवैश्याश्च गुरवः शूद्रजन्मनाम्। शूद्राश्च गुरवस्तेषां त्रयाणां भगवत्प्रियाः॥” जिस किसी भी अवस्थामें क्यों न रहे, श्रीकृष्णतत्त्वको जानने वाला ही दिव्यज्ञानदाता :— किवा विप्र, किवा न्यासी,, शूद्र केने नय। येइ कृष्णतत्त्ववेत्ता, सेइ 'गुरु' हय ॥ 127॥ 278 ।