श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1120, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 8/97–99 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-श्रीराधिका जिस प्रकार श्रीकृष्णकी प्रिया हैं, राधाकुण्ड भी वैसे ही उनका प्रिय स्थान है। सभी गोपियोंमें श्रीराधा ही श्रीकृष्णकी अत्यन्त प्रिया हैं॥98॥ अनुभाष्य-आदिलीला 4/215 संख्या देखें ॥ 98 ॥ भागवतमें श्रीराधाको इङ्गित करना और उनका अद्वितीयत्व :- श्रीमद्भागवत (10/30/28)- अनयाराधितो नूनं भगवान् हरिरीश्वरः। यन्नो विहाय गोविन्दः प्रीतो यामनयद्रहः ॥ 99 ॥ अनुवाद-हे सखि ! हम लोगोंको परित्यागकर श्रीकृष्ण जिन गोपीको एकान्तमें ले गये हैं, उन्होंने अवश्य ही ईश्वर श्रीहरिकी अधिक रूपसे आराधना की होगी। इसका गूढ़ अर्थ यह है कि वे कृष्णकान्ताओंकी शिरोमणि हैं, इसलिये उनका नाम 'राधिका' हुआ है॥99॥ अनुभाष्य-आदिलीला 4/88 संख्या देखें ॥ 99 ॥ अमृतानुकणिका- "श्रीराय रामानन्दसे साध्य-तत्त्वकी सीमा कान्तप्रेमके विषयमें सुनकर महाप्रभुने आगे भी कुछ अधिक सुननेकी जिज्ञासा की; वास्तवमें वे श्रीराधाके प्रेमके विषयमें सुनना चाहते थे। श्रीरायने भी कहा कान्ताप्रेमके मध्य श्रीराधाप्रेम ही 'साध्य शिरोमणि' है, इसकी महिमा समस्त शास्त्रोंमें वर्णित है। क्रमदीपिका आदि आगम ग्रन्थोंमें ऐसा उल्लेख है कि 'व्रजमें सैंकड़ों कोटि प्रमदाएँ (प्रेम-मदसे परिपूर्ण) हैं' और इन सबमें श्रीराधा ही सब प्रकारसे सर्वश्रेष्ठा हैं। भगवान्की समस्त शक्तियोंमें 'ह्लादिनी' नामक जो सर्वश्रेष्ठ महाशक्ति है, श्रीराधा उस ह्लादिनीकी भी सार-स्वरूपा, महाभाव-स्वरूपा और अनन्त गुणशालिनी हैं। व्रजकी कोटि-कोटि गोपियोंके अनेक यूथ हैं। इन यूथेश्वरियाेंमें परस्पर चार भेद हैं-स्वपक्षा, विपक्षा, सुहृत्-पक्षा और तटस्था। श्रीराधाकी सखियाँ-ललिता, विशाखा आदि स्वपक्षा हैं, श्रीमती चन्द्रावली श्रीराधाकी विपक्षा हैं, श्यामला सखी सुहृत्-पक्षा हैं और भद्रा तटस्थ-पक्षा हैं। श्रीमती राधिका धीराधीरा मध्या, वाम स्वभावयुक्त, समस्त गोपियोंमें श्रीकृष्णकी सर्वाधिक प्रियतमा हैं। इसकी पुष्टि उपरोक्त श्लोकसे हो रही है-'यथा राधा प्रिया..।' वे सुरम्य अङ्गयुक्त सर्व-सुलक्षणशालिनी हैं; महामाधुरी, प्रेम-विदग्धता आदि गुणोंमें पराकाष्ठा प्राप्त हैं। जिस प्रकार नायकके सभी भेद और अवस्था श्रीकृष्णमें विद्यमान हैं, उसी प्रकार श्रीमती राधिकामें सभी नायिकाओंकी प्रायः सभी अवस्थाएँ विराजमान होती हैं। उनमें केवल स्वकीया और कन्यका अवस्था-भेद और कनिष्ठा भावभेद नहीं पाया जाता। वे समस्त प्रकारके भावोंकी रस-चमत्कारिता तथा अपूर्व प्रेम-विदग्धताके कारण श्रीकृष्णको अनन्त प्रकारसे रसास्वादन कराती हैं और अखिलरसामृतमूर्ति, 'रसो वै सः' को परितृप्त करनेमें कुशल और समर्था हैं। 'अनयाराधितो नूनं...'-वे श्रीराधा ही श्रीकृष्णकी सर्वश्रेष्ठ प्रियतमा हैं। यद्यपि श्रीशुकदेव गोस्वामीने कहीं भी प्रत्यक्ष रूपमें श्रीराधाका नाम उच्चारण नहीं किया है, किन्तु श्रीराधाकी कृपासे उनकी सौभाग्यरूपी दुन्दुभि बजानेके लिये उनके मुखचन्द्रसे श्रीराधिकाका नाम स्वयं ही निकल गया। रासलीलाके मध्य श्रीराधा यह देखकर मानिनी हो गईं थी कि श्रीकृष्ण सभी गोपियोंको समभावसे आदर और प्रेमालिङ्गन प्रदान कर रहे हैं, इसलिये वे रास छोड़कर चली गईं। श्रीराधाको न देखकर श्रीकृष्ण व्याकुल होकर उन्हें मनानेके लिये उनके पीछे-पीछे चले गये। श्रीकृष्णको अपने मध्य न देखकर गोपियाँ उनका अन्वेषण करने लगीं। भागवतमें केवल श्रीकृष्णके ही अन्तर्धान होनेका वर्णन है, उनके साथ किसी गोपीके जानेका स्पष्ट उल्लेख नहीं है। केवल श्लोक (10/30/11)में पहली बार गोपियाँ हिरणियोंसे जिज्ञासा करते हुए कह रही हैं-'अप्येणपत्त्युपगतः' अर्थात् हे हिरण पत्नियों ! कृष्ण क्या (अपनी) प्रियाके साथ यहाँ आये थे?' जिस समय श्रीराधिकाको लेकर कृष्ण सहसा अन्तर्हित हुए, उस समय स्वपक्षा सखियाँ 272 ।