भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1121

आठवाँ अध्याय 8/97–99 ] श्रीराधाको नहीं देखकर समझ गई कि हमारी राधाको लेकर ही कृष्ण अन्तर्धान हुए हैं। अतः वे युगलको ढूँढनेमें व्यग्र हो गईं। किन्तु जो गोपियाँ इस रहस्यको नहीं समझ पायीं, वे श्रीकृष्णको ही खोजनेमें ही तत्पर थीं। खोजते-खोजते उन्होंने श्रीकृष्णके चरण-चिह्न देखे, कुछ आगे बढ़नेपर श्रीकृष्णके चरण-चिह्नोंके मध्य छोटे आकारवाले किसी रमणीके पद-चिह्नोंको भी देखा। स्वपक्षा सखियाँ अन्तरङ्गा होनेके कारण उन चरण-चिह्नोंको पहचान गईं, परन्तु गम्भीरताके साथ चुप रहीं। विपक्षा चन्द्रावली आदि दुःखसे अधीर होनेके कारण कुछ बोल नहीं सकीं। तटस्था गोपियोंने इसका विचार नहीं किया कि श्रीकृष्णके चरण-चिह्नोंके साथ किसी रमणीके भी चरण-चिह्न हैं, वे भी चुप रहीं। प्रस्तुत श्लोक श्रीराधाकी सुहृत्-पक्षा गोपियोंके द्वारा उच्चारित हुआ है। उनके कहनेका भाव है—'गोविन्द इस रमणीके साथ रमण करनेके लिये उसे अपने अङ्कमें वहन करके ले गये हैं। एक निकुञ्जसे दूसरेमें प्रवेश करते हुए विलास कर रहे हैं। उन्होंने पुष्पोंका चयन करके इस शृङ्गार-वटमें उस कान्ताका केश-प्रसाधन किया।' उधर वनप्रदेशमें चलते-चलते श्रीराधाने कहा—'बहुत चलनेके कारण मैं थक गई हूँ, अब चल नहीं पा रही हूँ।' श्रीकृष्ण बोले—'अन्य सब गोपियाँ यहींपर आनेवाली हैं। तब हमारे निर्जन विहारमें बाधा पड़ जायेगी।' श्रीराधाने कहा—'मुझे पहलेकी भाँति उठाकर ले चलो।' श्रीकृष्णने कहा—'प्रिये! क्या तुम्हें किसी निभृत निकुञ्जमें पुष्पोंकी शय्यापर ले चलूँ?' श्रीराधाने कहा—'जहाँ तुम्हारा मन चाहे वहाँ ले चलो।' श्रीकृष्ण बोले—'अच्छा प्रिये, तुम मेरे कन्धेपर चढ़ जाओ।' यह सुनकर जैसे ही वे श्रीकृष्णके कन्धेपर चढ़ने लगीं, उसी क्षण श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गये और श्रीराधा निरन्तर विलाप करने लगीं—'हा नाथ! हा रमण! हा प्रेष्ठ! हा महाभुज ! तुम कहाँ हो? कहाँ हो?' इसके पश्चात् श्रीराधामें और विलाप करनेकी शक्ति भी नहीं रही और वे विरहमें मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़ीं। श्रीकृष्णको खोजते हुए अन्य गोपियाँ वहीं आ पहुँचीं। उन्होंने विद्युतके समान उज्ज्वल कान्तियुक्त उस सखीको भूमिपर पड़ा देखा। सखियाँ उच्च स्वरसे रोते-रोते यत्नपूर्वक पंखा झलकर सेवाके द्वारा श्रीराधाको सचेत करनेकी चेष्टा करने लगीं। श्रीकृष्ण श्रीराधाको लेकर आये, उनका शृङ्गार किया, अन्तमें उन्हें भी छोड़कर इसलिये चले गये कि उन्होंने विचार किया—'राधाने मेरे साथ विलासरसमें आपेसे बाहर होकर नायिकाके स्वधर्म वाम्यता और लज्जाका विसर्जन कर दिया है। सुनायिकाएँ कभी भी नायकको पुष्प-शय्यापर ले जानेकी सम्मति प्रदान नहीं करतीं। यदि राधिकाने वाम्य-रूप स्वधर्मका परित्यागकर दिया, तब मुझे भी नायकके कान्ताको अनुगमन करनेके दाक्षिण-भावको त्यागकर वाम्य-भावको ग्रहण करना चाहिये, अन्यथा यह रसजनक नहीं होगा। दोनों ही वाम्य अथवा दाक्षिण हों, तो मिलन सुरस नहीं होता। इसके अतिरिक्त गोपियोंने राधामें केवल मेरे मिलन-जनित सौभाग्यका दर्शन किया है, जब वे राधाकी तीव्र विरहमें उदित होनेवाली असाधारण दशाको भी देखेंगी कि राधाका विरह-दुःख दावानलके समान है और उनका विरह-दुःख एक दीप-शिखाके समान; तब वे राधाके आनुगत्यको स्वीकार करेंगी। साथ ही इसके द्वारा अन्य सभी गोपियोंकी ईर्ष्या भी दूर हो जायेगी और सभीमें एक मतका स्थापन होगा।' श्रीकृष्ण एक कार्यके द्वारा अनेक कार्य सम्पादन करते हैं, यह उनकी परम चातुरी है। पक्षान्तरमें श्रीकृष्णका विचार है—'मेरे द्वारा दिये गये विरहमें राधाको देखकर सभी गोपियोंकी एक जैसी विरह-दशा हो जायेगी तथा सभीका चित्त एक भावसे मुझमें निविष्ट हो जायेगा। इस प्रकार रासलीला भी सार्थक होगी।'”—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 97–99 ॥ । 273