भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1106

[ 8/73-75 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला साधनसिद्ध और साधक—ये तीन प्रकारके भेद हैं। श्रीकृष्णकी कृपा, चरणरज और भुक्तावशेष (महाप्रसाद) आदि उद्दीपन हैं एवं श्रीकृष्णकी आज्ञा पालन करना अनुभाव है। दास्य-भक्तमें यह भावना होती है कि श्रीकृष्ण मेरे प्रभु हैं और मैं उनका दास हूँ।”—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 73 ॥ (2) ‘सख्यप्रेम’—उत्तम :- प्रभु कहे,—“एहो हय, किछु आगे आर।” राय कहे,—“सख्य-प्रेम—सर्वसाध्यसार॥” 74 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“दास्यप्रेम साध्य है, आपका यह कथन ठीक है, परन्तु इससे आगे और कुछ बतलाइये।” श्रीरामानन्द-रायने कहा,—“श्रीकृष्णके प्रति सख्य-प्रेम ही सभी साध्योंका सार है॥” 74 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यह बात सुनकर महाप्रभुने कहा,—और कुछ आगे बढ़ पानेपर ही सर्वसार प्राप्त होगा। श्रीरायने उसके उत्तरमें कहा,—श्रीकृष्णमें ‘सख्यप्रेम’ ही सभी साध्योंका सार है। श्रीरायके कहनेका तात्पर्य यह है कि दास्यप्रेममें ‘ममता’ रहनेपर भी उसमें ‘भगवान्’—‘प्रभु’ हैं, इस प्रकारकी बुद्धि रहनेके कारण एक प्रकारका ‘भय’ और ‘सम्भ्रम’ अर्थात् गौरवका भाव सहज ही उदित होता है। उस ‘भय’ और ‘सम्भ्रम’का परित्याग करके ‘विश्रम्भ’ अर्थात् ‘एकान्त विश्वास’को ग्रहण कर पानेपर वही प्रेम ही ‘सख्यप्रेम’ होता है। इस प्रेममें श्रीकृष्ण और उनके सखाओंके बीचमें एक ‘समता भाव’ उदित होता है ॥ 74 ॥ व्रजके गोपालगणोंकी श्रीकृष्णसख्य-महिमा :- श्रीमद्भागवत (10/12/11)— इत्थं सतां ब्रह्मसुखानुभूत्या दास्यं गतानां परदैवतेन। मायाश्रितानां नरदारकेण सार्द्धं विजह्रुः कृतपुण्यपुञ्जाः ॥ 75 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 75 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीभागवतमें कहा गया है,—जो ज्ञानमार्गमें ब्रह्मसुखानुभूति स्वरूपमें, दास्यरसके भक्तोंको परदेवतारूपमें एवं मायाश्रित व्यक्तियोंको नरबालकके रूपमें प्रतीत होते हैं, उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णके साथ व्रजके गोपबालकोंने बहुत सुकृतिके फलस्वरूप सख्यरसमें विहार किया था ॥ 75 ॥ अनुभाष्य—श्रीशुकदेव गोस्वामी परीक्षितको वन-भोजनके लिये निकले श्रीकृष्णके साथ विश्रम्भ-प्रेमके सूत्रमें बँधे सखा व्रज-गोपबालकोंके अतिशय सौभाग्यका वर्णन कर रहे हैं— इत्थम् (एवम्प्रकारेण) कृतपुण्यपुञ्जाः (कृतः अनुष्ठितः पुण्यानां पुञ्जः समूहः यैः ते गोपबालकाः) सतां (निर्विशेषज्ञानिनां) ब्रह्मसुखानुभूत्या (ब्रह्मानन्दानुभवैकस्वरूपेण), दास्यं गतानां (लब्धभजनानां भक्तानामिति यावत्) परदैवतेन (परमेश्वर-स्वरूपेण) मायाश्रितानां (भगवन्माया-मोहितानां) नरदारकेण (नरबालकरूपेण) [भगवता] सार्द्धं [सख्येन] विजह्रुः (विहाराणि चक्रु भाग्यं कृष्ण-सखानामिति भावः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 75 ॥ अमृताणुकणिका—‘सख्य दो प्रकारका होता है—ऐश्वर्ययुक्त तथा माधुर्य-युक्त। यहाँ श्रीराय रामानन्दका उद्देश्य शुद्ध माधुर्यमय व्रजके सख्यसे है, इसमें शान्तरसकी श्रीकृष्णमें एकनिष्ठता, दास्यकी सेवा तथा विश्रम्भ-सख्य है। प्रस्तुत श्लोकमें इसीका उदाहरण है। इसमें बतलाया है कि विभिन्न भावनावाले भक्त श्रीकृष्णको विभिन्न रूपोंमें देखते हैं। ‘सतां’—निर्विशेषवादी ब्रह्मज्ञानी भगवान्को ‘ब्रह्मसुखानुभूति स्वरूप’में जानते हैं। वे श्रीकृष्णके साथ विहार नहीं कर सकते, क्योंकि ब्रह्मसुखमें कोई अस्तित्व नहीं है, सत्ता नहीं है, वे परतत्त्व रूपमें ब्रह्मकी उपासनाकर ब्रह्मसायुज्यकी कामना करते हैं; निर्विशेष ब्रह्मके साथ क्रीड़ा करना सम्भव नहीं है। ‘दास्यं गतानां’—इनमें आराध्यका भाव है। इस गौरव-बुद्धिके कारण वे न तो श्रीकृष्णके साथ खेल सकते हैं और न अन्य क्रीड़ा ही कर सकते हैं। ‘मायाश्रितानां’—मायामोहित जीव श्रीकृष्णको एक नरबालकके 258 ।