श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1105, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय 8/71-73 ] भक्तमें कोई सम्बन्ध स्थापित नहीं होता। 'भगवान् ही मेरे प्रभु हैं'-इस प्रकारका ममता-भाव उसमें जुड़नेसे साधारण प्रेम 'दास्यप्रेम' हो जाता है, यह साधारण प्रेमकी अपेक्षा ऊँचा है ॥ 71 ॥ अनुभाष्य-ऊपर लिखे दो श्लोकोंमें प्रेमभक्तिको साधारण रूपसे 'साध्य' निर्णय करनेपर श्रीमहाप्रभुने श्रीरामानन्दको और भी अग्रसर होकर इस 'साध्य'की विशेष रूपसे धारावाहिककी भाँति व्याख्या करनेके लिये कहा। तब वे 'दास्यप्रेमभक्ति'को 'साध्य' कहकर प्रमाणित कर रहे हैं ॥ 71 ॥ श्रीकृष्ण-दास ही श्रीकृष्णके सर्व-ऐश्वर्यके अधिकारी :- श्रीमद्भागवत (9/5/16)- यन्नामश्रुतिमात्रेण पुमान् भवति निर्मलः। तस्य तीर्थपदः किंवा दासानामवशिष्यते ॥ 72 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 72 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीमद्भागवतमें कहा गया है,-जिनके नाम-श्रवणमात्रसे ही जीव निर्मल होता है, उन तीर्थपद भगवान्के जो दास हैं, उनके लिये और क्या वस्तु प्राप्त करनी बाकी रहती है? ॥ 72 ॥ अनुभाष्य-स्वयंमें ब्राह्मण होनेका अभिमान और देहाभिमानके कारण दूसरोंमें दोष-दृष्टि रखनेवाले तथा वैष्णव-विरोधरूपी दुर्वासनासे ग्रस्त दुर्वासा, जिन्हें वैष्णवास्त्र श्रीसुदर्शन कष्ट दे रहे थे, उनकी महाभागवत अम्बरीषकी प्रार्थनासे श्रीसुदर्शन चक्रसे रक्षा हुई; ऐसा देखकर दुर्वासाकी जातिबुद्धि दूर हुई, तब उनके द्वारा की गयी शुद्धभक्त और भगवान्की ऐसी स्तुति- यन्नामश्रुतिमात्रेण (यस्य भगवतः नामश्रवणेनैव) पुमान् (जीवः) निर्मलः (शुद्धः) भवति, तस्य तीर्थपदः (तीर्थं पदे यस्य सः तस्य भगवतः) दासानां (किङ्कराणां) किं वा अवशिष्यते? [न किञ्चिदेवेत्यर्थः]। श्लोक-भावानुवाद-जिनका नाम श्रवणमात्रसे ही जीव निर्मल हो जाता है, तब उन भगवान् जिनके चरणकमलोंमें समस्त तीर्थ वास करते हैं, उनके दासोंको क्या पाना शेष रह जाता है, अर्थात् कुछ भी बाकी नहीं रहता है-यह अर्थ है ॥ 72 ॥ भगवान्के दासकी दीनता :- यामुनाचार्यपाद-कृत स्तोत्ररत्न (46)- भवन्तमेवानुचरन्निरन्तरः प्रशान्तनिःशेषमनोरथान्तरः। कदाहमैकान्तिकनित्यकिङ्करः प्रहर्षयिष्यामि स नाथ जीवितम् ॥ 73 ॥ अनुवाद-हे नाथ! आपकी निरन्तर सेवाके द्वारा अन्य मनोरथोंसे सर्वथा रहित होकर प्रशान्तभावसे मैं कब अपनेको आपका नित्यदास कहकर दास्यजीवनके सहित आनन्दसे प्रफुल्लित होऊँगा? ॥ 73 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 1/206 संख्या देखें ॥ 73 ॥ अमृताणुकणिका-“शान्त भावमें निष्ठा है, परन्तु ममता नहीं है, इसलिये उसमें प्रेमका विकास भी नहीं है। शान्त रसके भक्त सनक-सनन्दनादि चार कुमार आदि हैं। ये ज्ञान-दृष्टिसे सभी कुछ जानते हैं। किन्तु उनका अपना रस कौन-सा है, वे किस रूपमें सेवा करते हैं, यह निश्चित नहीं है। उन्हें अपनी सेवाकी परिपाटी भी ज्ञात नहीं है। दास्यभावमें निष्ठाके साथ ममतासे सेवाभाव भी युक्त हो जाता है। सम्भ्रम और विश्रम्भ भावसे दास्य दो प्रकारका होता है। वैकुण्ठमें शुद्ध सम्भ्रमयुक्त दास्य है। अयोध्या तथा द्वारकामें भी गौरव-मिश्रित सम्भ्रम दास्य-रस है। किन्तु वह वैकुण्ठसे कुछ ऊँचा है। केवल व्रजमें ही शुद्ध विश्रम्भ-भावयुक्त दास्य प्रेम अवस्थित है। व्रजके दास्य भक्तोंमें ममतायुक्त सख्य और वात्सल्यका मिश्रण रहता है। दास्य प्रेममें श्रीकृष्ण विषय-आलम्बन हैं और वे भक्त-वात्सल्य आदि गुणोंसे युक्त हैं। श्रीकृष्णके दास आश्रय-आलम्बन हैं। श्रीकृष्णके दासोंमें नित्य-सिद्ध, । 257