श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 8/70-71 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला वह प्राप्त नहीं की जा सकती; इसका अर्थ यह है कि वह परम दुर्लभा है ॥ 70 ॥ अमृताणुकणिका-“ 'नानोपचार-कृतपूजनमार्त्तबन्धोः' —यहाँ ऐसा लगता है कि दृष्टान्त और दाष्ट्रान्तिककी सङ्गति नहीं है। दृष्टान्त कहता है कि अन्न-जल उसीको सुखदायी होता है, जिसे भूख-प्यास हो; यहाँ भोजनका सुख भोक्ताको प्राप्त हो रहा है, उसे तीव्र भूख-प्यास है। परन्तु दाष्ट्रान्तिकमें देखा जाता है कि है—जो उपचारके साथ पूजा करेंगे, उनके हृदयमें यदि प्रेम रहे, तभी भगवान्का हृदय सुखसे द्रवित हो जाता है। परन्तु यह शङ्का निराधार है, क्योंकि जब भक्तका प्रेम आर्तिकी अवस्थामें पहुँचता है, तब भगवान् आर्त्तबन्धु होकर सेवा ग्रहण करते हैं। उन्हें विदुरानीके प्रेमके कारण भूख लग गयी, तो केलेके छिलके भी स्वाद लेकर खाये। किन्तु वे दुर्योधनका राजमहल और छप्पन भोग परित्याग करके चले आये, क्योंकि दुर्योधनमें प्रेम नहीं था। महाप्रभु श्रीधरकी दुकानसे केला, मोचा छीनकर लाते थे, श्रीरामचन्द्रने शबरीके झूठे बेर भी खाये, वे गोपियोंके घरसे माखन भी चुराकर खाते थे। क्योंकि भगवान् प्रेमके भूखे हैं। श्रीराय रामानन्दका यह उदाहरण वैधीभक्तिके अन्तर्गत है। 'कृष्णभक्तिरसभाविता मतिः'-यह उदाहरण अनुरागमयी रागानुगा भक्तिका है। कोटि जन्मोंकी सुकृतिसे साधुसङ्ग प्राप्त होता है और साधुसङ्गके द्वारा भक्ति होती है। किन्तु लोभमयी रागानुगा भक्ति कोटि जन्मोंकी सुकृतिसे भी नहीं मिलती। केवल साधुसङ्गमें रुचियुक्त हरिकथा श्रवणसे रुचियुक्त सेवा-वासना उदित होती है। उस समय वह कथा हृदय और कानोंके लिये रसायन हो जाती है। निरन्तर श्रवण करते-करते लोभमयी वासना आती है। भगवद्-कथाओंको सुनकर यदि लोभ हो जाय कि माता यशोदा, श्रीदाम, सुबल, गोपियाँ जैसे श्रीकृष्णकी सेवा करते हैं, मैं भी वैसी सेवा करूँ—इस लोभके उदित होनेके साथ ही रागानुगा भक्ति आरम्भ होती है। यह अवस्था रुचिकी है। यहींसे साधकका भक्ति-साधन आरम्भ होता है। इसके पूर्वकी अवस्थाएँ, निष्ठा आदि इसमें अन्तर्निहित हैं। यह दुर्लभ भक्ति श्रीकृष्ण तथा उच्च कोटिके रागानुगा भक्तोंकी कृपासे मिलती है। जैसे-श्रीशुकदेव गोस्वामीके द्वारा परीक्षित महाराजको भागवत श्रवण करवाना। ईश्वर-कृपा महद्-कृपाकी अनुगामिनी होती है। दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर भावयुक्त भक्त रागानुग भक्तोंकी श्रेणीमें आते हैं। और श्रवण यदि किसी रूपानुग भक्तसे हो, तो अधिक लाभ है। रागानुगा भक्तोंमें भी रूपानुग भक्त विशेष हैं। ये श्रीरूप मञ्जरीके अनुगत हैं और मधुर-भावापन्न हैं। रूपानुग भक्त परम दुर्लभ हैं। साधनावस्थाके सभी सोपानोंमें श्रद्धासे आरम्भकर आसक्तिकी दशा तक श्रद्धा हर स्थितिमें रहती है। इसीसे साधक रतिकी अवस्था तक पहुँचता है। यही रति या भाव प्रेमका अङ्कुर है। रतिकी अवस्थाकी श्रद्धा दिव्य है। इस स्थितिको प्राप्त करके साधक एक भूत-ग्रस्त व्यक्तिकी भाँति प्रेम-ग्रस्त हो जाता है और सभी प्रकारकी शास्त्र-युक्तियोंको भूल जाता है; कैसे कृष्णसे मिलूँ-यही विचार प्रधान हो जाता है।”—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 70 ॥ (1) 'दास्य-प्रेम' उत्तम नहीं :- प्रभु कहे,—“एहो हय, आगे कह आर।” राय कहे,—“दास्य-प्रेम—सर्वसाध्यसार॥” 71 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,–“यह ठीक है, इससे आगे और कुछ कहिये।” तब श्रीरामानन्द रायने कहा,—“दास्यप्रेम सब साध्योंका सार है॥” 71 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यहाँ तक सुनकर महाप्रभुने कहा,—यह ठीक है; किन्तु इसके बाद जो है, उसे बताओ। उसके उत्तरमें श्रीरायने कहा,—दास्यप्रेम ही सभी साध्योंका सार है। 'प्रेमलक्षणभक्ति'में 'ममता' जुड़ जानेसे 'दास्यप्रेम' होता है। साधारण प्रेममें भगवान् और 256