भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1103

आठवाँ अध्याय 8/68-70 ] [ बायाँ स्तम्भ ] इसलिये दूधकी रक्षा करनी चाहिये। यह प्रीतिका लक्षण है। श्रीकृष्णकी सेवामें उपयोगमें आनेवाली वस्तुओंमें भक्तोंकी श्रीकृष्णसे भी अधिक प्रीति होती है। केवल प्रातिकूल्य-रहित होना भी भक्ति नहीं है, क्योंकि घड़ेमें श्रीकृष्णके लिये प्रतिकूल भाव नहीं है, परन्तु साथ श्रीकृष्णकी सेवाकी कोई चेष्टा भी नहीं है। भक्ति भक्त-वृत्तिपर निर्भर करती है, श्रीकृष्ण-वृत्तिपर नहीं। ‘आनुकूल्येन कृष्णानुशीलन’—ये दोनों क्रियाएँ आवश्यक हैं। यह भक्तिका स्वरूप-लक्षण है। इसी स्वरूप-सिद्धा भक्तिका अनुष्ठान उत्तमा भक्तिमें पर्यवसित होता है।”—श्रीभक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ॥ 68 ॥ भक्तके प्रेमसे ही श्रीकृष्ण वशीभूत :— पद्यावली 11वें अङ्कमें उद्धृत श्रीरामानन्द राय-कृत श्लोक— नानोपचार-कृतपूजनमार्त्तबन्धोः प्रेम्णैव भक्तहृदयं सुखविद्रुतं स्यात्। यावत् क्षुदस्ति जठरे जरठा पिपासा तावत् सुखाय भवतो ननु भक्ष्य-पेये ॥ 69 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 69 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जैसे पेटमें जब तक बहुत जोरकी भूख और प्यास रहती है, तब तक ही खाने-पीने योग्य सब वस्तुएँ सुखदायक होती हैं, उसी प्रकार आर्त्तबन्धुकी (दीनबन्धु श्रीकृष्णकी) नाना उपचारसे पूजा होनेपर भी जब वह प्रेमयुक्त होती है, तभी भक्तोंका हृदय आनन्दसे पिघल जाता है ॥ 69 ॥ अनुभाष्य— यावत् जठरे (उदरे) जरठा (अतिशयिनी) क्षुत् पिपासा च अस्ति, तावत् भक्ष्यपेये [यथा] सुखाय (आनन्दाय) भवतः, [तथा] आर्त्तबन्धोः (दीननाथस्य) नानोपचार-कृतपूजनं (विविध- षोडशोपचारसमन्विताचार्चनादिकम् अनुष्ठितमपि)) भक्तहृदयं प्रेम्णा (कृष्णोन्द्रिय-तोषणमया भक्त्या) एव सुख-विद्रुतम् (आनन्देन द्रवीभूतं) स्यात्। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 69 ॥ [ दायाँ स्तम्भ ] रागमार्गके द्वारा ही श्रीकृष्णप्रेमकी प्राप्ति, सुकृतिसे उत्पन्न वैधभक्तिसे दुर्लभ :— (पद्यावली 12 अंकमें उद्धृत श्रीरामानन्द राय-कृत श्लोक)— कृष्णभक्तिरसभाविता मतिः क्रीयतां यदि कुतोऽपि लभ्यते। तत्र लौल्यमपि मूल्यमेकलं जन्मकोटिसुकृतैर्न लभ्यते ॥ 70 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 70 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—करोड़ों जन्मोंमें की गयी सुकृतियोंके द्वारा जिसे प्राप्त नहीं किया जा सकता, परन्तु लोभरूपी एक मूल्य देकर जिसे प्राप्त किया जा सकता है, ऐसी श्रीकृष्णभक्तिरसभावित मति जहाँसे भी मिले, उसे खरीद लो। उक्त दो श्लोकोंमें, पहला श्रद्धामूलक वैधीभक्तिको सूचित कर रहा है और दूसरा लोभमूलक रागानुगा-भक्तिको सूचित कर रहा है। इसके बाद इसी रागानुगा-भक्तिका अवलम्बन करके ही श्रीराय रामानन्दके द्वारा कहे जानेवाले वचन व्यवहार होंगे। अर्थात् अब यहाँसे वे रागभक्ति-सिद्धान्तका अवलम्बन कर रहे हैं और उन्होंने वैधी-भक्तिकी बातको छोड़ दिया है ॥ 70 ॥ अनुभाष्य— कृष्णभक्तिरसभाविता (कृष्णसेवारस-भावनामयी) मतिः (बुद्धिः) यदि कुतः (यत्र क्वापि देशकालपात्रतः अनुष्ठानात् वा) लभ्यते, तदा [युष्माभिः तादृशी मतिः] क्रीयतां (मूल्यप्रदानेन अवश्यमेव ग्रहणीया)। तत्र (मतिविक्रयवाणिज्ये) एकलं लौल्यं (लोभः) एव हि मूल्यं, [यतः तन्मतिः] जन्मकोटि-सुकृतैः (बहुजन्मजन्मान्तरसञ्चितभाग्यैः) न लभ्यते, [सा परमदुर्लभा एवेत्यर्थः]। श्लोक-भावानुवाद—श्रीकृष्णसेवारस-भावनामयी मति यदि किसी स्थानपर, किसी समय भी, किसी भी व्यक्तिसे मिल रही हो, तो वैसी मति मूल्य देकर खरीद लो। लोभ ही उस मतिको खरीदनेके लिये एकमात्र मूल्य है, बहुत जन्म-जन्मान्तरके सञ्चित भाग्यसे भी । 255

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