श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 8/68 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला इस भक्तिका अनुशीलन श्रवण, कीर्तन आदिके द्वारा किया जाता है। इस भक्तिकी विशेषता यह है कि जीवको उसके स्वरूप 'श्रीकृष्णके नित्यदास' की उपलब्धि करवा देती है। यदि कोई व्यक्ति श्रवण, कीर्तन आदि द्वारा नवधा-भक्तिका अज्ञानवशतः अनुकरण करते हुए भक्तिसे सम्बन्ध प्राप्त कर ले, तो उसे भक्तिका फल प्राप्त हो जाता है। प्रह्लाद महाराजने अपने पूर्व जन्ममें अज्ञानतावश ही श्रीनृसिंह चतुर्दशीका उपवास किया था, उस सुकृतिके बलसे उन्होंने अपने अगले जन्ममें हजारों वर्षों तक माताके गर्भमें महर्षि नारद गोस्वामीका सङ्ग प्राप्तकर उनसे हरिकथा श्रवण की। इसके फलस्वरूप उन्हें उत्तम-महाभागवत प्रह्लाद महाराजका जन्म प्राप्त हुआ। श्रीरूपगोस्वामीने पूर्व आचार्योंके द्वारा दी गयी भक्तिकी सभी परिभाषाओंको क्रोड़ीभूत करके उत्तमाभक्तिकी परिभाषाका एक अद्भुत श्लोक दिया है (भःरःसिः 1/1/11)— “अन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञानकर्माद्यनावृतम्। आनुकूल्येनकृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा॥” अर्थात् “श्रीकृष्णकी सेवाके अतिरिक्त अन्य सभी कामनाओंसे रहित होकर निर्भेद-ज्ञान एवं नित्य-नैमित्तिक कर्म, योग, तपस्यासे अनावृत एवं अनुकूल भावसे श्रीकृष्णका जो अनुशीलन अर्थात् श्रीकृष्ण-सेवा की जाती है, उसे उत्तमा भक्ति कहते हैं।” इस सूत्रमें भक्तिके स्वरूप और तटस्थ—दोनों लक्षणोंका विशद विवेचन किया गया है। अनुकूल भावसे श्रीकृष्णका अनुशीलन अथवा उनकी सेवा—यह भक्तिका स्वरूप-लक्षण है। भक्ति जो अन्याभिलाषाओंसे रहित हो और उसमें ज्ञान-कर्म आदिकी प्रधानता न हो—यह तटस्थ-लक्षण है। इसे उत्तमा भक्ति अथवा शुद्धभक्ति कहा जाता है। इन्द्रियों, मन, वाणीकी समस्त चेष्टाओंके द्वारा और हृदयके समस्त भावोंके द्वारा श्रीकृष्णकी सेवा हो, इसे कृष्णानुशीलन कहते हैं। ये चेष्टाएँ दो प्रकारकी होती हैं—प्रवृत्ति-मूलक और निवृत्ति-मूलक। इन्द्रियोंकी चेष्टाके द्वारा श्रवण, कीर्तन आदि भक्तिके अङ्गोंका पालन प्रवृत्ति-मूलक चेष्टा है। भक्ति-विरोधी-भाव, अपराध, आलस्य, अनर्थ आदिका त्याग निवृत्ति-मूलक चेष्टा है। भक्तिमें ये दोनों ही आवश्यक हैं। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर कहते हैं—अपराधयुक्त नाम-कीर्तन छिद्रयुक्त पात्रमें रखे जलके समान निकल जायेगा, ठहरेगा नहीं। सावधानीपूर्वक अपराध-रहित होकर भक्तिके अङ्गोंका पालनसे सिद्धि होती है। भक्ति आनुगत्यमयी होती है। श्रीकृष्ण हेतु समस्त प्रकारकी चेष्टाएँ अनुकूल भावसे हो, उसमें प्रतिकूल भावना न हो और रसिक-तत्त्वज्ञ गुरु-वैष्णवोंके आनुगत्यमें इसका नित्य-निरन्तर इसका अनुष्ठान होना चाहिये। भक्तिकी सिद्धिके लिये अनुकूल अनुशीलनकी आवश्यकता है, क्योंकि प्रतिकूल आचरणसे सिद्धि नहीं होती। कोई-कोई महानुभाव कहते हैं कि अनुकूलका अर्थ है, जो कृष्णको रुचिकर हो। परन्तु इसमें अतिव्याप्ति और अव्याप्तिके दोष हो सकते हैं। 'अतिव्याप्ति-दोष'—श्रीकृष्ण चाणूर-मुष्टिकके सङ्ग युद्धमें अतिरुचिपूर्वक वीर-रसका आस्वादन कर रहे हैं। इससे असुरोंमें भक्ति व्याप्त लगती है, परन्तु उनमें श्रीकृष्णके प्रति द्वेष-रूप प्रतिकूल भाव होनेके कारण इसे भक्ति नहीं माना जा सकता। 'अव्याप्ति-दोष'—दूसरी ओर, स्तनपानमें श्रीकृष्णको अतृप्त छोड़कर माता यशोदा चूल्हेपर उफनते हुए दूधको उतारनेके लिये चली गयीं। माता यशोदाकी यह क्रिया श्रीकृष्णके लिये रुचिकर नहीं हुई। यहाँ ऐसा प्रतीत होता है, जैसे माता यशोदामें भक्ति अव्याप्त है अर्थात् उनमें भक्ति नहीं है। किन्तु श्रीकृष्णकी सेवामें उपयोग होनेवाली प्रत्येक वस्तुकी रक्षा करना परिपूर्ण भक्ति है; वह माताका श्रीकृष्णके प्रति वात्सल्यका प्रकाश है। श्रीकृष्णका जिसमें मङ्गल हो, वही भाव अनुकूल है। माता यशोदाका विचार है कि उनके दूधसे श्रीकृष्णकी पूर्ति नहीं होगी, उससे दही, मक्खन, छाछ और रबड़ी आदि मिष्ठान नहीं बनेंगे। 254 ।